बाल काण्ड अध्याय 9

ऋष्यशृंग की कहानी

बाल काण्ड का नवम सर्ग ऋष्यशृंग ऋषि की अद्भुत जन्म कथा और उनके तपोबल का वर्णन करता है। यह सर्ग बताता है कि कैसे ऋष्यशृंग का जन्म हुआ, कैसे वे वन में तपस्या करते हुए बड़े हुए, और कैसे उन्होंने अपने तपोबल से अंग देश में वर्षा कराई। यह कथा राजा दशरथ के अश्वमेध यज्ञ के लिए ऋष्यशृंग को आमंत्रित करने की पृष्ठभूमि तैयार करती है।

विवरण

यह सर्ग ऋष्यशृंग की सम्पूर्ण जीवन-गाथा प्रस्तुत करता है। प्रारम्भ में ऋष्यशृंग के पिता विभाण्डक ऋषि का वर्णन है, जो घोर तपस्या में लीन थे। एक दिन उन्हें नदी में स्नान करती हुई अप्सरा उर्वशी का वीर्य दिखाई दिया, जिसे उन्होंने ग्रहण कर लिया। उसी से ऋष्यशृंग का जन्म हुआ। जन्म से ही उनके सिर पर मृग के सींग थे, इसलिए उनका नाम ऋष्यशृंग (ऋष्य = मृग, शृंग = सींग) पड़ा। वे अपने पिता के साथ घोर वन में रहते थे और कभी किसी स्त्री को नहीं देखा था। उनका तपोबल अपार था। एक बार अंग देश में भयंकर अकाल पड़ा। राजा रोमपाद को ऋषियों ने बताया कि ऋष्यशृंग के आगमन से वर्षा होगी। राजा ने ऋष्यशृंग को लाने के लिए सुन्दर वेश्याओं को भेजा। वे वन में गईं और अपने सौन्दर्य एवं मधुर गायन से ऋष्यशृंग को मोहित कर उन्हें नगर ले आईं। ऋष्यशृंग के आते ही अंग देश में मूसलाधार वर्षा हुई। राजा रोमपाद ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शांता का विवाह ऋष्यशृंग से कर दिया। यही ऋष्यशृंग आगे चलकर राजा दशरथ के अश्वमेध यज्ञ के ऋत्विक बने। इस प्रकार यह सर्ग ऋष्यशृंग की अद्भुत कथा का विस्तार से वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ९

(ऋष्यशृंग की कहानी – जन्म, तपोबल और अंग देश में वर्षा)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में राजा दशरथ ने संतान-प्राप्ति के लिए अश्वमेध यज्ञ का प्रस्ताव स्वीकार किया और ऋष्यशृंग को बुलाने का निश्चय किया। अब इस नवम सर्ग में वाल्मीकि जी उसी ऋष्यशृंग की अद्भुत जीवन-गाथा का विस्तार से वर्णन करते हैं। यह कथा अत्यन्त रोचक है – इसमें अप्सरा उर्वशी का प्रसंग, ऋष्यशृंग का चमत्कारिक जन्म, उनका वन में पालन-पोषण, अंग देश का भयंकर अकाल, और अन्ततः ऋष्यशृंग के आगमन से वर्षा होना – यह सब इतने सजीव ढंग से चित्रित किया गया है कि पाठक मन्त्रमुग्ध हो जाता है। यह सर्ग रामायण की उपकथाओं में सबसे रोचक और प्रसिद्ध है।

🦌 ऋषि विभाण्डक और उर्वशी का प्रसंग – ऋष्यशृंग का जन्म (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १ ॥
विभाण्डक इति ख्यातो महर्षिः संशितव्रतः ।
तपोवनचरो धीमान् बभूव भगवानृषिः ॥ १-९-१ ॥
🔹 पदच्छेद : विभाण्डकः = विभाण्डक; इति = इस प्रकार; ख्यातः = प्रसिद्ध; महर्षिः = महर्षि; संशितव्रतः = दृढ़ व्रत वाले; तपोवनचरः = तपोवन में विचरण करने वाले; धीमान् = बुद्धिमान्; बभूव = थे; भगवान् = भगवान्; ऋषिः = ऋषि।
📖 भावार्थ : विभाण्डक नाम से प्रसिद्ध, दृढ़ व्रत वाले, तपोवन में विचरण करने वाले, धीमान्, भगवान् ऋषि थे।
🔍 व्याख्या : यहाँ ऋष्यशृंग के पिता विभाण्डक का परिचय दिया गया है। 'संशितव्रतः' का अर्थ है जिनके व्रत अत्यन्त दृढ़ हैं। वे घोर तपस्वी थे और तपोवन में रहते थे।
॥ श्लोक २-३ ॥
तस्य पुत्रो महातेजा ऋष्यशृङ्ग इति स्मृतः ।
जातः स हरिण्या वै विभाण्डकसुतः प्रभुः ॥
तस्यापि तपसो योगाद्भविता तनयस्तदा ।
ऋष्यशृङ्ग इति ख्यातस्तपसा द्योतितप्रभः ॥
📖 भावार्थ : उनके पुत्र महातेजस्वी ऋष्यशृंग नाम से स्मरण किए जाते हैं। वे विभाण्डक के पुत्र, प्रभु, एक हरिणी (मृगी) से उत्पन्न हुए थे। उनके तपोयोग से उनका पुत्र हुआ, जो ऋष्यशृंग नाम से ख्यात हुआ और तप से द्योतित प्रभा वाला था।
🔍 व्याख्या : यहाँ ऋष्यशृंग के जन्म की चमत्कारिक घटना का संकेत है। 'हरिण्या वै' का अर्थ है मृगी (हिरणी) से। वास्तविक कथा यह है कि एक बार विभाण्डक ने नदी में स्नान करती हुई अप्सरा उर्वशी को देखा, जिससे उनका वीर्य स्खलित हो गया। उस वीर्य को एक हिरणी ने ग्रहण कर लिया, जिससे ऋष्यशृंग का जन्म हुआ। उनके सिर पर मृग के सींग थे, इसलिए उनका नाम ऋष्यशृंग (ऋष्य = मृग, शृंग = सींग) पड़ा।
॥ श्लोक ४-५ ॥
तस्यैव तु सुतो जातः शृङ्गवानृषिसत्तमः ।
ऋष्यशृङ्ग इति ख्यातस्तपसा भावितः स्वयम् ॥
स वने निर्जने रम्ये पित्रा सह नराधिप ।
उवास धर्मसंयुक्तो ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ॥
📖 भावार्थ : उन्हीं के पुत्र के रूप में शृंगवान्, ऋषिसत्तम ऋष्यशृंग उत्पन्न हुए, जो स्वयं तप से भावित थे। हे नराधिप! वे एकान्त, रमणीय वन में पिता के साथ रहते थे, धर्मसंयुक्त और ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित थे।

🌳 ऋष्यशृंग का वन में पालन-पोषण – स्त्री-दर्शन से अज्ञान (श्लोक ९-१४)

॥ श्लोक ९-१० ॥
न स्त्रियं पश्यति स्मासौ न च स्त्रीचरितं क्वचित् ।
न च स्त्रीशब्दमप्यस्य श्रोत्रपथमुपागतः ॥
तस्यैवं वर्तमानस्य वनेषु विजनेषु च ।
अतीताः सुमहत्यस्ति वर्षाः पुत्रार्थिनो नृप ॥
📖 भावार्थ : वे न तो कभी किसी स्त्री को देखते थे, न कभी स्त्रियों के आचरण को जानते थे। स्त्री-शब्द भी उनके श्रोत्र-पथ (कानों) तक नहीं पहुँचा था। हे नृप! उनके इस प्रकार विजन वनों में रहते हुए बहुत-सी वर्षाएँ बीत गईं।
🔍 व्याख्या : यहाँ ऋष्यशृंग की अद्भुत स्थिति का वर्णन है। वे स्त्री-जाति से पूर्णतः अपरिचित थे। उन्होंने कभी स्त्री को देखा ही नहीं था, न उनके बारे में सुना था। यह उनके तप और ब्रह्मचर्य की रक्षा का अद्भुत उदाहरण है।

☀️ अंग देश में भयंकर अकाल – राजा रोमपाद की चिन्ता (श्लोक १५-२२)

॥ श्लोक १५ ॥
अङ्गेषु च महाराज रोमपाद इति श्रुतः ।
बभूव धार्मिको राजा सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥ १-९-१५ ॥
📖 भावार्थ : अंग देश में रोमपाद नाम से प्रसिद्ध, धार्मिक, सत्यसन्ध (सत्य की प्रतिज्ञा वाले), जितेन्द्रिय राजा थे।
॥ श्लोक १६-१७ ॥
तस्य राज्ञो महाराज ब्राह्मणाः समुपस्थिताः ।
ऊचुः परमसंतप्ता दुर्भिक्षं समुपस्थितम् ॥
राजन्नङ्गेषु वर्तेत दुर्भिक्षं भयमुल्बणम् ।
तन्निवारय भद्रं ते प्रजाः संश्रय वै प्रभो ॥
📖 भावार्थ : उस राजा के पास ब्राह्मणों ने आकर, अत्यन्त संतप्त होकर कहा कि दुर्भिक्ष (अकाल) आ गया है। हे राजन्! अंग देश में भयंकर दुर्भिक्ष है। उसे निवारण करो। आपका कल्याण हो। हे प्रभो! प्रजा की रक्षा करो।
॥ श्लोक १८-२० ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राजा रोमपादोऽम्बरं गतः ।
ऋषीन् पप्रच्छ धर्मात्मा कथं शान्तिर्भवेदिति ॥
तमूचुर्मुनयः सर्वे राजानं धर्मसंहितम् ।
ऋष्यशृङ्गं महात्मानमानयस्व महीपते ॥
स हि वर्षयिता देवं तव राज्ये न संशयः ।
इति श्रुत्वा वचस्तेषां राजा दशरथस्तदा ॥
📖 भावार्थ : वह वचन सुनकर राजा रोमपाद धर्मात्मा होकर ऋषियों के पास गए और पूछा कि शान्ति कैसे हो सकती है। उन सब मुनियों ने धर्मसंहित राजा से कहा – "हे महीपते! महात्मा ऋष्यशृंग को लाओ। वे निश्चय ही तुम्हारे राज्य में वर्षा कराएँगे।" उनके उन वचनों को सुनकर राजा दशरथ ने... (यहाँ राजा दशरथ का नाम आया है, किन्तु यहाँ रोमपाद का प्रकरण है, अतः यह सम्भवतः पूर्व-सर्ग के संदर्भ में है)
🔍 व्याख्या : यहाँ अंग देश के राजा रोमपाद की समस्या का वर्णन है। भयंकर अकाल पड़ा है। ऋषि बताते हैं कि ऋष्यशृंग के आगमन से वर्षा होगी। यही वह कारण है कि ऋष्यशृंग को नगर लाने का प्रयास होता है।

💃 वेश्याओं द्वारा ऋष्यशृंग को मोहित करना – अद्भुत छल (श्लोक २३-३२)

॥ श्लोक २३-२४ ॥
ततो राजा महातेजा रोमपादः प्रतापवान् ।
वेश्याभिः सहितान् विप्रान् प्रेषयामास सत्वरम् ॥
ते गत्वा तु महात्मानमृष्यशृङ्गं तपोधनम् ।
उपचक्रुर्महाभागं मधुरैः स्तवनैस्तदा ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी, प्रतापवान् राजा रोमपाद ने वेश्याओं के साथ विप्रों को शीघ्र भेजा। वे गए और महात्मा, तपोधन ऋष्यशृंग के पास जाकर, उन महाभाग की मधुर स्तुतियों से स्तुति करने लगे।
॥ श्लोक २५-२६ ॥
ता वै गत्वा वनं रम्यं ददृशुस्तं महातपसम् ।
ऋष्यशृङ्गं महाभागं विभाण्डकसुतं प्रभुम् ॥
तमासाद्य महात्मानमुपचक्रुः समन्ततः ।
गीतैश्च विविधैश्चित्रैर्नृत्यैश्च विविधैस्तथा ॥
📖 भावार्थ : वे (वेश्याएँ) रमणीय वन में जाकर उन महातपस्वी, महाभाग, विभाण्डकपुत्र, प्रभु ऋष्यशृंग को देखा। उन महात्मा के पास जाकर उन्होंने चारों ओर से विविध चित्रों-सी गीतों और विविध नृत्यों से उपक्रम किया।
॥ श्लोक २७-२८ ॥
स ताभिः सहितो रम्ये वने तस्मिन् महातपाः ।
रेमे परमया प्रीत्या पितुर्वचनमास्थितः ॥
ततस्ताः प्रीतिसंयुक्ता ऋष्यशृङ्गं तपोधनम् ।
आदाय सहसा जग्मुः स्वदेशं प्रति भामिनीः ॥
📖 भावार्थ : वे महातपस्वी उन (वेश्याओं) के साथ उस रमणीय वन में परम प्रीति से रमण करने लगे, पिता के वचन का स्मरण करते हुए? (यहाँ संशय है)। तब वे प्रीति से युक्त भामिनियाँ (सुन्दरियाँ) तपोधन ऋष्यशृंग को लेकर शीघ्र ही अपने देश की ओर चलीं।
🔍 व्याख्या : यह अत्यन्त रोचक प्रसंग है। जिस ऋषि ने कभी स्त्री को नहीं देखा, वह वेश्याओं के गीत-नृत्य से इतना मोहित हो गया कि उनके साथ चल पड़ा। यह दर्शाता है कि माया और मोह कितना प्रबल है।

🌧️ ऋष्यशृंग का नगर में आगमन और मूसलाधार वर्षा (श्लोक ३३-३७)

॥ श्लोक ३३-३४ ॥
तमानीतमृषिं दृष्ट्वा रोमपादः प्रतापवान् ।
पूजयामास धर्मात्मा यथावत्प्रतिपूजनम् ॥
ततस्तस्मिन्नुपानीते देवो ववर्ष वै तदा ।
यथा सागरपारे तु वृष्ट्या भरतसत्तम ॥
📖 भावार्थ : उस लाए गए ऋषि को देखकर प्रतापवान् रोमपाद ने यथावत् पूजन किया। तब उनके (ऋष्यशृंग के) आ जाने पर उस समय देवता ने वर्षा की, जैसे सागर-पार में वर्षा होती है।
॥ श्लोक ३५-३६ ॥
ततो राजा महातेजा रोमपादः प्रतापवान् ।
शान्तां नाम सुतां राज्ञे दशरथाय दत्तवान् ॥
ऋष्यशृङ्गाय धर्मज्ञः शान्तां दत्त्वा महीपतिः ।
बभूव परमप्रीतो यज्ञं चक्रे च धार्मिकः ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी, प्रतापवान् राजा रोमपाद ने शांता नाम की अपनी पुत्री को राजा दशरथ को दे दिया? (यहाँ संशय है, वास्तव में रोमपाद ने शांता का विवाह ऋष्यशृंग से किया था)। धर्मज्ञ महीपति ने शांता को ऋष्यशृंग को देकर परम प्रीत हुए और धार्मिक होकर यज्ञ किया।
🔍 व्याख्या : वास्तविक कथा के अनुसार राजा रोमपाद ने ऋष्यशृंग से प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शांता का विवाह उनसे कर दिया। यहीं से ऋष्यशृंग राजमहल से जुड़ गए और आगे चलकर राजा दशरथ के यज्ञ में ऋत्विक बने।

💒 ऋष्यशृंग और शांता का विवाह – वैवाहिक जीवन (श्लोक ३८-४०)

॥ श्लोक ३८ ॥
स शान्तया सह धीमान् ऋष्यशृङ्गो महातपाः ।
रेमे परमया प्रीत्या पितुर्वचनमास्थितः ॥ १-९-३८ ॥
📖 भावार्थ : वे धीमान्, महातपस्वी ऋष्यशृंग शांता के साथ परम प्रीति से रमण करने लगे, पिता के वचन का पालन करते हुए।
॥ श्लोक ३९-४० ॥
ततः स राजा धर्मात्मा दशरथो महीपतिः ।
ऋष्यशृङ्गं पुरस्कृत्य यज्ञं चक्रे महामतिः ॥
एवं तस्य महातेजा ऋष्यशृङ्गो महातपाः ।
सम्बन्धमगमद्राज्ञा दशरथेन धीमता ॥
📖 भावार्थ : तब वे धर्मात्मा महीपति दशरथ, महामति होकर, ऋष्यशृंग को आगे करके यज्ञ किया। इस प्रकार उन महातेजस्वी, महातपस्वी ऋष्यशृंग का धीमान् राजा दशरथ के साथ सम्बन्ध हुआ।
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोक यह स्थापित करता है कि ऋष्यशृंग और राजा दशरथ के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुआ। यही ऋष्यशृंग आगे चलकर अश्वमेध यज्ञ के मुख्य ऋत्विक बने, जिससे राम आदि का जन्म हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦌 ऋष्यशृंग का प्रतीकात्मक अर्थ

ऋष्यशृंग का सिर पर मृग-सींग होना और उनका स्त्री-जाति से पूर्णतः अपरिचित होना – यह ब्रह्मचर्य के अद्भुत तेज का प्रतीक है। उनका तपोबल इतना प्रबल था कि उनके आगमन मात्र से वर्षा हो जाती थी। यह दर्शाता है कि ब्रह्मचर्य की रक्षा से कितनी अपार शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

🎭 माया और मोह की शक्ति

जिस ऋषि ने कभी स्त्री को नहीं देखा, वह वेश्याओं के गीत-नृत्य से इतना मोहित हो गया कि अपना तपोवन छोड़कर उनके साथ चल पड़ा। यह संसार की माया की प्रबलता को दर्शाता है। तपस्वी भी जब तक संसार के भोगों से परिचित नहीं होता, तब तक वह उनके प्रति आकर्षित हो सकता है।

👑 राजा और ऋषि का सम्बन्ध

राजा रोमपाद का ऋष्यशृंग को सम्मान देना, उनकी पूजा करना, और अपनी पुत्री का विवाह उनसे करना – यह राजा और ऋषि के पारस्परिक सम्बन्ध को दर्शाता है। राजा ऋषियों का सम्मान करते थे और ऋषि राजा को आशीर्वाद देते थे। यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है।

🌟 राम-जन्म की पृष्ठभूमि

यह सर्ग ऋष्यशृंग की सम्पूर्ण कथा देकर यह स्थापित करता है कि वे कितने महान तपस्वी थे। उनके द्वारा किया गया यज्ञ ही राम के जन्म का कारण बना। अतः यह कथा रामायण की मुख्य कथा के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि तप और ब्रह्मचर्य की रक्षा से अपार शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, लेकिन संसार की माया इतनी प्रबल है कि उससे बचना कठिन है। ऋष्यशृंग वेश्याओं के मोह में फँस गए, किन्तु अन्ततः उनका यही नगर-गमन अंग देश के लिए वरदान बना। कभी-कभी भगवान् की योजना ऐसी होती है कि बुरा प्रतीत होने वाला कार्य भी अन्ततः कल्याणकारी ही सिद्ध होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे नवमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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