अयोध्या आगमन
बाल काण्ड का सतहत्तरवाँ सर्ग राम-सीता एवं अन्य भाइयों के अयोध्या वापस लौटने का वर्णन करता है। राजा दशरथ अपने पुत्रों एवं नववधुओं के साथ मिथिला से अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में विभिन्न प्रदेशों की शोभा एवं अयोध्यावासियों के उल्लास का चित्रण है। यह सर्ग अयोध्या में भव्य स्वागत एवं नगर की सजावट का वर्णन करते हुए बालकाण्ड का समापन करता है।
विवरण
राजा दशरथ, अपने पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न तथा नवविवाहिता वधुओं सीता, ऊर्मिला, माण्डवी और श्रुतकीर्ति के साथ, राजा जनक की अनुमति लेकर मिथिला से प्रस्थान करते हैं। उनके साथ विशाल सेना एवं रथ-गज-अश्वों का समूह है। रास्ते में वे विविध नदियों एवं वनों को पार करते हैं। अयोध्यावासियों को उनके आगमन की सूचना मिलती है, और वे नगर को ध्वज-पताकाओं एवं फूलों से सजाते हैं। नगर के निवासी उत्सुकता से उनकी प्रतीक्षा करते हैं। जब राजा और राजकुमार नगर में प्रवेश करते हैं, तो जनता उनका जयकारा लगाती है। नगर में उत्सव का माहौल होता है। महल में पहुँचकर राजा दशरथ अपनी रानियों एवं पुरोहितों से मिलते हैं। वशिष्ठ आदि ऋषि आशीर्वाद देते हैं। राम और सीता का अयोध्या में स्वागत होता है। यह सर्ग एक सुखद समापन है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ७७
(अयोध्या आगमन – नगर प्रवेश और उत्सव)
🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में राम-सीता एवं अन्य भाइयों के विवाह का वर्णन हुआ। अब राजा दशरथ अपने पुत्रों और नववधुओं के साथ अयोध्या लौट रहे हैं। सम्पूर्ण नगरी उनके स्वागत को आतुर है। यह सर्ग अयोध्या के वैभव, नागरिकों के प्रेम और उस आनन्द का चित्रण करता है जो राम के आगमन से नगर में छा जाता है।
🚩 मिथिला से प्रस्थान (श्लोक १-८)
जनकस्यानुयात्रायां प्रययौ स्वपुरं प्रति ॥
रामं सीतां च सौमित्रिं भरतं च महाबलम् ।
शत्रुघ्नं च महातेजाः कृत्वा रथगतान् नृपः ॥
धनंजयस्य संकाशैर्हयैर्वातसमैर्जवे ।
महत्या सेनया सार्धं शनैर्याति स्म राघवः ॥
जनकोऽपि महातेजाः पुत्रीणां प्रियकाम्यया ।
ययौ किञ्चित्पुरस्कृत्य राज्ञो दशरथस्य ह ॥
🛤️ मार्ग का वर्णन (श्लोक ९-१५)
ददृशुर्विविधान् देशान् ग्रामान् नगरवीथिकाः ॥
शैलांश्च विविधाकारान् नदीः सरसि चैव ह ।
रम्याणि विविधारण्यान् पुष्पितान् फलितान् द्रुमान् ॥
सीता तु रामं संप्रेक्ष्य सर्वभूतमनोहरम् ।
नातिप्रहृष्टा नोद्विग्ना मुदा युक्ता बभूव ह ॥
रामोऽपि जनकपुत्रीं तां दृष्ट्वा प्रियतरां प्रियाम् ।
बभूव परमप्रीतो देव्या सह यथा हरिः ॥
🏙️ अयोध्या में स्वागत की तैयारियाँ (श्लोक १६-२१)
चारुप्राकारतोरणा विमानैरिव शोभिता ॥
नानाद्विजगणैः कीर्णा नानादेवकुलैर्युता ।
नानापण्यसमाकीर्णा नानापुष्पफलद्रुमैः ॥
तस्यां प्रविश्य नगर्यां राजा दशरथः प्रभुः ।
ददर्श राजमार्गांश्च सुसज्जितान् सुशोभनान् ॥
चन्दनागुरुभिश्चैव माल्यैश्च विविधैः शुभैः ॥
तोरणै राजमार्गांश्च कारयित्वा समन्ततः ।
द्वाराणि च पुरस्यासन् सुसज्जितानि सर्वशः ॥
बभूव तुमुलः शब्दः पौराणां हर्षवर्धनः ।
जयेति शब्दः सुमहान् प्रादुरासीत्समन्ततः ॥
🎉 नगर प्रवेश और जनता का उल्लास (श्लोक २२-३०)
प्रविवेश पुरीं रम्यां वन्द्यमानः सुमन्त्रिभिः ॥
तं प्रविष्टं नरेन्द्रं तु प्रजा हर्षसमन्विताः ।
द्रष्टुं समभ्ययुः सर्वा यथेन्द्रं त्रिदशा यथा ॥
रामं सीतां च सौमित्रिं भरतं च महाबलम् ।
शत्रुघ्नं च महातेजा दृष्ट्वा प्रीता महाजनाः ॥
प्रासादशिखरस्थाश्च स्त्रियः सम्प्रेक्ष्य राघवम् ।
प्रहर्षं परमं जग्मुर्मुदा संयुक्तचेतसः ॥
शनैः शनैः प्रयात्येव रामः सीतामुखेक्षकः ॥
ततः प्रविश्य भवनं पित्रा सह महाद्युतिः ।
मातॄणामपि सर्वासां चकार चरणानतिम् ॥
ताश्चैनं प्रेक्ष्य सुप्रीताः पुत्रवत्संप्रहर्षिताः ।
आशीर्भिर्योजयामासुः पुत्रस्य सदृशीस्तदा ॥
वसिष्ठश्च महातेजा विश्वामित्रादिभिः सह ।
आशीर्भिरभिनन्द्यैनं जगाम स्वगृहान् मुनिः ॥
इत्येष बालकाण्डस्य सर्गः सप्तसप्ततिः स्मृतः ।
रामस्य नगरे प्राप्तिर्यत्र प्रीतिः परा स्मृता ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🏰 अयोध्या की समृद्धि
इस सर्ग में अयोध्या की भव्यता, सजावट और नागरिकों के उत्साह का वर्णन है। यह दर्शाता है कि राजा दशरथ कितने प्रिय शासक थे और राम जन-मानस में कितने लोकप्रिय थे।
💞 राम-सीता का प्रेम
रास्ते में राम-सीता के परस्पर प्रेम का सूक्ष्म चित्रण है। यह उनके दांपत्य सुख के प्रारम्भ का सूचक है।
🙏 माताओं का आशीर्वाद
राम का सभी माताओं (कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी) के चरण स्पर्श करना उनकी विनम्रता और परिवार के प्रति कर्तव्य को दर्शाता है।
📖 बालकाण्ड का समापन
यह सर्ग बालकाण्ड का उपसंहार है। विवाहोपरांत अयोध्या में सुखद वापसी से बाल्यावस्था और यौवनारम्भ की लीला समाप्त होती है, और अयोध्याकाण्ड के घटनाक्रमों की भूमिका तैयार होती है।
🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि सच्चा सुख परिवार, समाज और प्रियजनों के मिलन में है। नगर का वैभव तभी सार्थक है जब वहाँ के निवासी प्रसन्न हों और नायक जनप्रिय हों। राम का आगमन अयोध्या के लिए उत्सव बन जाता है, यह उनके चरित्र के प्रभाव को दर्शाता है।