बाल काण्ड अध्याय 74

अयोध्या वापसी यात्रा

बाल काण्ड का चौहत्तरवाँ सर्ग राम-लक्ष्मण-सीता सहित विश्वामित्र और जनक की अयोध्या वापसी यात्रा का वर्णन करता है। यह सर्ग मिथिला से प्रस्थान, मार्ग के दृश्य, अयोध्या में भव्य स्वागत और राजा दशरथ की प्रसन्नता का चित्रण करता है।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ विवाह समाप्ति के पश्चात् मिथिला से प्रस्थान से होता है। राजा जनक ने अपनी पुत्रियों सीता, उर्मिला, माण्डवी और श्रुतकीर्ति को यथोचित दहेज सहित विदा किया। विश्वामित्र ने राजा दशरथ और जनक को आशीर्वाद दिया। विशाल बारात अयोध्या के लिए प्रस्थान करती है। मार्ग में विविध वन, नदियाँ एवं ग्राम पड़ते हैं। भगवान राम एवं सीता का जन-मानस ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया। अयोध्या पहुँचने पर राजा दशरथ ने पुत्र-वधुओं के स्वागत हेतु नगरी को ध्वज-पताकाओं से सजवाया। नगरवासियों ने दीप जलाकर एवं पुष्प वर्षा कर उनका अभिनन्दन किया। गुरु वसिष्ठ ने मंगल कामनाएँ दीं। यह सर्ग अयोध्या के हर्ष-उल्लास एवं विवाहोत्सव की पराकाष्ठा का वर्णन करता है, जो आगे के जीवन के सुखद आरम्भ का सूचक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ७४

(अयोध्या वापसी यात्रा – राम-सीता का अयोध्या आगमन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुःसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में हम राम-सीता एवं तीनों भाइयों के मिथिला में विवाह का वैभव देख चुके हैं। अब राजा दशरथ, विश्वामित्र एवं जनक की आज्ञा से सभी अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग उस आनन्दमयी वापसी का सजीव चित्रण करता है, जब अयोध्या नगरी दीपों से जगमगा उठती है और प्रजा अपने भावी राजा एवं रानियों के दर्शन से पुलकित होती है।

🚩 मिथिला से प्रस्थान (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततो यात्रां विधायाथ राजा जनकनन्दनः ।
प्रययौ सहितो रामैः अयोध्यां पुरमुत्तमम् ॥
ददौ द्विजेभ्यो विपुलं धनं धान्यं च पुष्कलम् ।
आशीर्भिरभिनन्द्याथ विश्वामित्रं महामुनिम् ॥
वसिष्ठप्रमुखान् विप्रान् पूजयित्वा यथाविधि ।
प्रणम्य शिरसा देवान् प्रययौ मुदितो नृपः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; यात्राम् = यात्रा; विधाय = रचकर; अथ = फिर; राजा = राजा (दशरथ); जनकनन्दनः = जनक के दुलारे (राम); प्रययौ = चल पड़े; सहितः = साथ लिए हुए; रामैः = राम आदि को; अयोध्याम् = अयोध्या को; पुरमुत्तमम् = उत्तम नगरी; ददौ = दिया; द्विजेभ्यः = ब्राह्मणों को; विपुलम् = बहुत; धनम् = धन; धान्यम् = अन्न; च = और; पुष्कलम् = प्रचुर; आशीर्भिः = आशीर्वादों से; अभिनन्द्य = अभिनन्दन करके; अथ = फिर; विश्वामित्रम् = विश्वामित्र को; महामुनिम् = महामुनि; वसिष्ठप्रमुखान् = वसिष्ठ आदि प्रमुख; विप्रान् = ब्राह्मणों को; पूजयित्वा = पूजा करके; यथाविधि = विधिपूर्वक; प्रणम्य = नमस्कार करके; शिरसा = सिर झुकाकर; देवान् = देवताओं को; प्रययौ = चल पड़े; मुदितः = प्रसन्न होकर; नृपः = राजा (दशरथ)।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् यात्रा की तैयारी करके राजा दशरथ राम आदि पुत्रों के साथ अयोध्या के लिए चल पड़े। उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत धन और अन्न दान किया। फिर आशीर्वाद लेकर महामुनि विश्वामित्र को प्रणाम किया और वसिष्ठ आदि ब्राह्मणों का यथाविधि पूजन किया। इसके बाद सिर झुकाकर देवताओं को नमस्कार करके राजा बड़े प्रसन्न होकर चल दिए।
॥ श्लोक ७-८ ॥
रथैश्च विविधैर्दिव्यैः स्त्रियश्चाप्सरसामिव ।
सीतामादाय रामोऽपि प्रययौ पुरमुत्तमम् ॥
जनकोऽपि महातेजाः पुत्रीणां च शुभं वचः ।
उक्त्वा प्रियाशिषः स्नेहात् प्रययौ स्वपुरं प्रति ॥
📖 भावार्थ : अप्सराओं के समान वधूएँ दिव्य विविध रथों में सवार हुईं। सीता को साथ लेकर राम भी उत्तम नगरी अयोध्या के लिए चल पड़े। महातेजस्वी जनक ने भी पुत्रियों से स्नेहपूर्वक कल्याणकारी वचन कहकर तथा आशीर्वाद देकर अपनी राजधानी मिथिला की ओर प्रस्थान किया।
🔍 व्याख्या : यहाँ प्रस्थान के समय का मार्मिक दृश्य है – राजा जनक का पुत्रियों से बिछोह, फिर भी हर्ष कि वे सुयोग्य पतियों के साथ जा रही हैं।

🌲 मार्ग का मनोहारी वर्णन (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
नदीस्तीर्त्वा बहूदका नानादेशान् सरांसि च ।
वनानि च फुल्लानि द्रक्ष्यन्तः सुखमागमन् ॥
नानामृगगणैः कीर्णान् नानाद्विजगणान्वितान् ।
पश्यन्तो रामसहिताः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥
अर्धमार्गे नरव्याघ्रा विश्रान्ताः सह सैनिकैः ।
तत्र जनपदाः सर्वे राजानश्च समागताः ॥
📖 भावार्थ : बहुत-सी नदियों को पार करते हुए, अनेक देशों और सरोवरों को देखते हुए, तथा खिले हुए वनों को निहारते हुए वे सब सुखपूर्वक आगे बढ़े। राम के साथ वे नरश्रेष्ठ अन्तरात्मा से अत्यन्त प्रसन्न होकर विविध पशुओं और पक्षियों से भरे वनों को देखते जाते थे। आधे मार्ग में उन नरव्याघ्रों ने सेना सहित विश्राम किया। वहाँ सभी जनपदों के राजा एकत्रित हो गए।
॥ श्लोक १६-१८ ॥
नानारत्नप्रभाजालैर्नानामाल्यानुलेपनैः ।
अपूजयंस्तदा राज्ञः सर्वे रामं महाबलम् ॥
वैदेहीं चापि धर्मज्ञां लक्ष्मणं च महाबलम् ।
भरतं शत्रुघ्नं चैव प्रीतियुक्ता नराधिपाः ॥
📖 भावार्थ : उस समय सभी राजाओं ने अनेक रत्नों के प्रकाश-समूहों से, अनेक प्रकार की मालाओं और चन्दन से महाबली राम की पूजा की। और प्रीति से युक्त होकर धर्मज्ञ वैदेही (सीता), महाबली लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की भी पूजा की।
🔍 व्याख्या : मार्ग में जो राजागण मिले, उन्होंने राम-लक्ष्मण एवं नववधुओं का भव्य अभिनन्दन किया। यह दिखाता है कि राम का यश चारों ओर फैल गया था।

🏰 अयोध्या में भव्य स्वागत (श्लोक १९-३५)

॥ श्लोक १९-२४ ॥
अयोध्यां प्राप्य धर्मात्मा राजा दशरथः प्रभुः ।
ददर्श पुरुषव्याघ्रः पुरीं दीप्तां समन्ततः ॥
ध्वजैश्च पताकैश्चैव बहुरत्नैश्च भूषिताम् ।
गन्धैश्च सुमनोभिश्च सुस्रग्भिश्च सुगन्धिभिः ॥
ततो दाशरथी वीराः प्रविष्टा नगरोत्तमम् ।
जयाशीर्भिर्नरैः सर्वैः पूज्यमाना नृपात्मजाः ॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा प्रभु राजा दशरथ अयोध्या पहुँचकर नगरी को चारों ओर से देदीप्यमान देखा। वह पुरी ध्वजाओं, पताकाओं, बहुमूल्य रत्नों, सुगन्धित पुष्पों, सुन्दर मालाओं से सजी हुई थी। तत्पश्चात् वे राजकुमार, जो दशरथ के पुत्र थे, उत्तम नगर में प्रविष्ट हुए। सभी नागरिक उन्हें जय-आशीर्वाद देकर पूजा कर रहे थे।
॥ श्लोक ३०-३५ ॥
ददर्श राजा तत्रैव कौसल्यां मातरं तथा ।
सुमित्रां च कैकेयीं च वृतां स्त्रीभिः समन्ततः ॥
ताः सर्वा राममासाद्य सीतां च प्रियदर्शनाम् ।
लक्ष्मणं भरतं चैव शत्रुघ्नं च समन्ततः ॥
आशीर्भिरभिनन्द्याथ देवताश्च प्रपूज्य च ।
प्रहर्षमतुलं प्रापुर्बाष्पपूर्णेक्षणास्तदा ॥
📖 भावार्थ : राजा ने वहाँ कौशल्या माता को, तथा सुमित्रा और कैकेयी को देखा, जो चारों ओर से स्त्रियों से घिरी हुई थीं। उन सभी ने राम, प्रियदर्शना सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के पास आकर, आशीर्वाद दिया और देवताओं का पूजन किया। उनकी आँखें हर्षाश्रुओं से भर गईं और उन्होंने अतुलनीय हर्ष प्राप्त किया।
🔍 व्याख्या : माताओं का पुत्र-वधुओं से प्रथम मिलाप अत्यन्त भावुक क्षण है। यह आदर्श परिवार के प्रेम और सौहार्द्र को दर्शाता है।

🙏 गुरुजनों के आशीर्वाद और विवाहोत्सव की समाप्ति (श्लोक ३६-४२)

॥ श्लोक ३६-४० ॥
ततो वसिष्ठो भगवान् विश्वामित्रश्च धर्मवित् ।
आशीर्भिरभिनन्द्यैनं राजानमिदमब्रुवन् ॥
राजर्षे त्वं कृतार्थोऽद्य पुत्रवान् पुत्रवत्सलः ।
धन्यश्चैव यशस्वी च रामाद्या यस्य ते सुताः ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो राजा प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
पूजयामास तान् सर्वान् मुनिवृन्दान् यथाविधि ॥
📖 भावार्थ : तदनन्तर भगवान् वसिष्ठ और धर्मज्ञ विश्वामित्र ने आशीर्वाद देकर राजा दशरथ से कहा, "हे राजर्षे! आज आप कृतार्थ हो गए, आप पुत्रवान हैं और पुत्रों के स्नेही हैं। आप धन्य हैं और यशस्वी हैं, क्योंकि आपके पुत्र राम आदि हैं।" राजा ने यह वचन सुनकर अन्तरात्मा से हर्षित होकर उन सभी मुनियों का यथाविधि पूजन किया।
॥ श्लोक ४१-४२ ॥
एवं विवाहो निखिलः सम्पन्नो राघवस्य च ।
प्रीतियुक्तो महाँल्लोके सर्वदेवर्षिपूजितः ॥
इत्येतद्वैदेहगतं चरितं पुण्यवर्धनम् ।
श्रुत्वा विमुच्यते पापैर्धन्यः कीर्तिमवाप्नुयात् ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार राघव (राम) का विवाह सम्पन्न हुआ, जो संसार में अत्यन्त प्रीतिकर, महान् तथा सभी देवताओं और ऋषियों द्वारा पूजित है। इस प्रकार यह वैदेही (सीता) से सम्बन्धित चरित्र पुण्य को बढ़ाने वाला है। इसे सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त होता है, धन्य होता है और कीर्ति को प्राप्त करता है।
🔍 व्याख्या : अन्त में फलश्रुति दी गई है – इस विवाह प्रकरण को सुनने से पाप नष्ट होते हैं और कीर्ति मिलती है। यह बालकाण्ड के इस भाग की पवित्रता को रेखांकित करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👪 आदर्श परिवार की स्थापना

यह सर्ग राम एवं सीता के दाम्पत्य जीवन के सुखद प्रारम्भ का द्योतक है। चारों भाइयों एवं उनकी पत्नियों का एक साथ अयोध्या में प्रवेश, माताओं का स्नेह, गुरुजनों का आशीर्वाद – सब मिलकर आदर्श कुटुम्ब का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

🎉 जनकल्याण एवं राजभक्ति

अयोध्यावासियों का उत्साह एवं सज्जा यह दर्शाती है कि राम जन-जन के प्रिय हैं। प्रजा का अपने राजकुमारों के प्रति यह प्रेम आगे चलकर वनवास के समय भी देखने को मिलता है। यह एक आदर्श राजा-प्रजा सम्बन्ध का सूत्रपात है।

📜 सांस्कृतिक परम्परा का चित्रण

इस सर्ग में विवाहोत्तर विदाई, यात्रा, स्वागत, एवं आशीर्वाद की जो परम्पराएँ वर्णित हैं, वे आज भी भारतीय संस्कृति में जीवित हैं। वाल्मीकि ने समाज के उत्सवपूर्ण पक्ष को बड़े ही मार्मिक ढंग से उकेरा है।

⚡ आगे के काण्डों की भूमिका

यह सर्ग राम के जीवन के सुखद अध्याय का समापन करता है। इसके बाद अयोध्याकाण्ड में वनवास का दुःख आता है। किन्तु यह सुखद आरम्भ याद दिलाता है कि राम और सीता का मिलन दिव्य एवं मंगलमय था, जो सम्पूर्ण रामायण के नैतिक बल को रेखांकित करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में उत्सवों एवं पारिवारिक सुखों का भी उतना ही महत्व है जितना कि संघर्षों का। राम का चरित्र इस सुख को भी समान भाव से ग्रहण करता है, जो एक आदर्श मनुष्य के सन्तुलित जीवन का लक्षण है। अयोध्या वापसी यात्रा हमें बताती है कि कर्तव्यपालन के साथ-साथ आनन्द एवं सम्बन्धों की सघनता भी जीवन का अभिन्न अंग है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे चतुःसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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