बाल काण्ड अध्याय 73

विवाह समारोह

बाल काण्ड का तिहत्तरवाँ सर्ग राम-सीता एवं अन्य राजकुमारों के भव्य विवाह समारोह का वर्णन करता है। राजा जनक की आज्ञा से मिथिला नगरी को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अग्नि के समक्ष चारों राजकुमारों का विवाह मिथिला की चारों राजकुमारियों से संपन्न होता है। यह सर्ग रामायण के बाल काण्ड की पराकाष्ठा है।

विवरण

यह सर्ग मिथिला नगरी में उत्सव के दृश्य से आरम्भ होता है। राजा जनक ने विवाह की तैयारियों के आदेश दिए हैं। नगर को फूलों, पताकाओं और मंगल कलशों से सजाया जाता है। राजा दशरथ एवं उनका पूरा दल मिथिला के बाहर डेरा डाले हुए है। राजा जनक स्वयं अयोध्या के राजा का स्वागत करने जाते हैं। दोनों राजा मिलते हैं और भावपूर्ण संवाद होता है। इसके पश्चात विवाह की विधि आरम्भ होती है। ऋषि विश्वामित्र के निर्देशन में वैदिक मंत्र पढ़े जाते हैं। राम का विवाह सीता से, लक्ष्मण का उर्मिला से, भरत का माण्डवी से तथा शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति से होता है। वर-वधू अग्नि की सात परिक्रमा करते हैं और पवित्र बन्धन में बंधते हैं। राजा जनक अयथेष्ट दान-दक्षिणा देते हैं। विवाह सम्पन्न होने के पश्चात राजा दशरथ एवं नवविवाहित जोड़े अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ७३

(विवाह समारोह – चारों राजकुमारों का पाणिग्रहण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में राजा जनक ने शर्त पूरी होने पर राम-सीता के विवाह की स्वीकृति दे दी थी। अब वह शुभ मुहूर्त आ गया है जब चारों राजकुमार और चारों राजकुमारियाँ एक साथ पवित्र सूत्र में बंधने वाले हैं। यह सर्ग बालकाण्ड की पराकाष्ठा है, जिसमें राम एवं सीता के मिलन का अनुपम दृश्य अंकित है। सप्तर्षियों की भाँति ऋषि विश्वामित्र की उपस्थिति इस यज्ञ (विवाह) को पूर्णता प्रदान करती है।

🏰 मिथिला का श्रृंगार एवं राजाओं का भव्य मिलन (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो यज्ञे समाप्ते तु राजा जनक महायशाः ।
विवाहार्थं च रामस्य चकार विधिपूर्वकम् ॥
मिथिलां समलंचक्रे पताकाध्वजशोभिताम् ।
चन्दनैः स्रग्भिश्चैव सुगन्धैश्चानुलेपनैः ॥
प्रविश्य तु पुरीं रम्यां दशरथः सहानुजः ।
ददर्श राजा राजानं जनकं धर्मवत्सलम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; यज्ञे = यज्ञ; समाप्ते = समाप्त होने पर; तु = ही; राजा = राजा; जनकः = जनक; महायशाः = महान यश वाले; विवाहार्थम् = विवाह के लिए; च = और; रामस्य = राम का; चकार = किया; विधिपूर्वकम् = विधिपूर्वक; मिथिलाम् = मिथिला को; समलंचक्रे = सजाया; पताकाध्वजशोभिताम् = पताकाओं और ध्वजों से सुशोभित; चन्दनैः = चन्दन; स्रग्भिः = फूलों की मालाओं; च = और; एव = ही; सुगन्धैः = सुगंधित; अनुलेपनैः = लेपों से; प्रविश्य = प्रवेश करके; तु = फिर; पुरीम् = नगरी; रम्याम् = रमणीय; दशरथः = दशरथ; सहानुजः = अनुजों (लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) सहित; ददर्श = देखा; राजा = राजा; राजानम् = राजा को; जनकम् = जनक; धर्मवत्सलम् = धर्मवत्सल।
📖 भावार्थ : उसके बाद, जब यज्ञ समाप्त हो गया, तब महायशस्वी राजा जनक ने राम के विवाह की तैयारी विधिपूर्वक आरंभ की। मिथिला नगरी को पताकाओं एवं ध्वजों से सुशोभित किया गया। चन्दन, पुष्पमालाओं एवं सुगंधित लेपों से नगर महक उठा। उस रमणीय नगरी में प्रवेश कर राजा दशरथ ने अपने चारों पुत्रों सहित धर्मवत्सल राजा जनक को देखा।
🔍 व्याख्या : विवाह को केवल अनुष्ठान न मानकर सम्पूर्ण नगर के उत्सव के रूप में मनाया गया। यह संपूर्ण समाज की भागीदारी को दर्शाता है।
॥ श्लोक ८-१२ ॥
ततः प्रीतः स राजर्षिर्जनको राजसत्तमम् ।
दशरथं समाश्लिष्य यथार्हं प्रत्यपूजयत् ॥
कुशलं चाव्ययं चैव पुत्राणां च परंतप ।
पप्रच्छ धर्मसंयुक्तं वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
उपस्थिता च सेयं ते ब्रूहि किं करवाणि ते ।
त्वया संगम्य राजेन्द्र धन्योऽस्मीति पुनः पुनः ॥
📖 भावार्थ : तब राजर्षि जनक अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजश्रेष्ठ दशरथ को आलिंगन कर यथायोग्य पूजा की। वाक्यविशारद जनक ने धर्मयुक्त वाणी में दशरथ के पुत्रों का कुशलक्षेम पूछा। उन्होंने कहा, "आपका यहाँ पधारना हुआ। हे राजेन्द्र, मैं क्या करूँ? आपसे मिलकर मैं बार-बार धन्य हो गया हूँ।"
🔍 व्याख्या : राजा जनक का आतिथ्य एवं विनम्रता आदर्श संबंधों का सूत्र है। वे अयोध्या के राजा को सम्मान देते हैं और उनके आगमन को अपना सौभाग्य मानते हैं।

🔥 यज्ञवेदी एवं मंगल मंत्रोच्चार (श्लोक १३-२४)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा वेदीं चक्रे समन्ततः ।
ऋत्विजः संन्यवेश्याथ वैदिकैर्मंत्रसंपदा ॥
अग्निं प्रज्वाल्य विधिवत्पूर्णाहुतिमथापराम् ।
जुहाव विधिवद्विप्रो मंत्रवत्सुसमाहितः ॥
ततो जनकराजेन आनीता सीता स्वलंकृता ।
रामस्य पार्श्वतः स्थाप्य वेदीमध्ये व्यवस्थिता ॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा विश्वामित्र ने चारों ओर वेदी तैयार की। उन्होंने ऋत्विजों (याजकों) को बैठाया और वैदिक मंत्रों का उच्चारण प्रारम्भ किया। विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित की और पूर्णाहुति दी। विप्रवर विश्वामित्र ने समाधिस्थ होकर मंत्रोच्चार के साथ आहुति दी। तब राजा जनक द्वारा लाई गई अलंकृत सीता को राम के पार्श्व में स्थापित किया गया। वे वेदी के मध्य में स्थित हुईं।
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र यहाँ केवल संरक्षक नहीं, अपित्र पुरोहित की भूमिका में हैं। उनकी उपस्थिति इस विवाह को दिव्य आयाम प्रदान करती है। सीता का स्वयंवर में स्वयं वरण करने की परंपरा थी, यहाँ वे अलंकृत होकर आती हैं।
॥ श्लोक १९-२४ ॥
ततो राजा दशरथः स्वपुत्रान् मन्त्रपूर्वकम् ।
उपनीय तु काकुत्स्थान् वैदिकैर्मंत्रसंपदा ॥
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य वसिष्ठं च महामुनिम् ।
जनकश्चापि राजेन्द्रः कन्यादानमथाकरोत् ॥
इदं दानं मया दत्तं सीताया रामहेतवे ।
साक्षिणो देवताः सर्वे ब्राह्मणाश्च समागताः ॥
📖 भावार्थ : तब राजा दशरथ ने अपने पुत्रों (राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) को मंत्रपूर्वक आगे किया। विश्वामित्र एवं वसिष्ठ को आगे रखकर राजेन्द्र जनक ने कन्यादान किया। उन्होंने कहा, "यह दान मैंने राम के लिए सीता का दिया है। समस्त देवतागण एवं समागत ब्राह्मण इसके साक्षी हैं।"
🔍 व्याख्या : राजा जनक सीता को राम को सौंपते समय सम्पूर्ण ब्रह्मांड को साक्षी मानते हैं। यह दान पुत्री को पवित्रतम भाव से विदा करने का संकल्प है।

💞 चारों कुमारों का चारों कुमारियों से पाणिग्रहण (श्लोक २५-३५)

॥ श्लोक २५-३० ॥
ततः सीता समुत्थाय रामं प्रदक्षिणं गता ।
अग्निं साक्षीकृत्य तदा पाणिमग्राहयद्गुरुः ॥
एवं लक्ष्मणमुर्विला भरतश्च माण्डवीम् ।
श्रुतकीर्तिं च शत्रुघ्नो जगृहुः पाणिमन्त्रतः ॥
चतस्रः कन्यकाः प्राप्य चत्वारस्ते महारथाः ।
रेजुः समेत्य धर्मेण शक्रवत्सुरसत्तमाः ॥
📖 भावार्थ : तब सीता ने उठकर राम की प्रदक्षिणा की। अग्नि को साक्षी मानकर गुरु ने उनका पाणिग्रहण कराया। इसी प्रकार लक्ष्मण ने ऊर्मिला को, भरत ने माण्डवी को तथा शत्रुघ्न ने श्रुतकीर्ति को पाणिग्रहण मंत्र से ग्रहण किया। उन चारों महारथियों ने चारों कन्याओं को धर्मपूर्वक प्राप्त किया। इस प्रकार वे देवताओं की भाँति शोभायमान हुए।
🔍 व्याख्या : यहाँ चारों विवाह एक साथ सम्पन्न होते हैं, जो इस आयोजन की भव्यता और समानता को दर्शाता है। सीता का राम की प्रदक्षिणा करना पत्नी द्वारा पति की आरती एवं सम्मान की परंपरा का सूचक है।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ददौ दानानि विप्रेभ्यो जनको राजसत्तमः ।
गवां सहस्रं रत्नानि वासांसि विविधानि च ॥
दशरथो महाराजः प्रीत्या परमया युतः ।
ददौ दानानि विप्रेभ्यो हेमरत्नविभूषितान् ॥
ततः कृतस्वस्त्ययनाः कृतदाराश्च राघवाः ।
प्रतस्थुः स्वपुरीं रम्यां मिथिलाया मुदा युताः ॥
📖 भावार्थ : राजश्रेष्ठ जनक ने ब्राह्मणों को हजारों गायें, रत्न और विविध प्रकार के वस्त्र दान में दिए। परम प्रसन्नता से युक्त महाराज दशरथ ने भी ब्राह्मणों को सोने-रत्नों से युक्त दान दिए। तब राघवों ने, जिनका कल्याण (स्वस्ति) हो चुका था और जो विवाह कर चुके थे, प्रसन्नतापूर्वक मिथिला से अपनी रमणीय नगरी (अयोध्या) की ओर प्रस्थान किया।
🔍 व्याख्या : विवोपरांत ब्राह्मणों को दान देना धार्मिक अनुष्ठान का अंग है। अंत में नवविवाहित जोड़ों का अयोध्या के लिए प्रस्थान रामायण के अगले चरण (अयोध्याकाण्ड) की भूमिका तैयार करता है।

📖 उपसंहार: अयोध्या की ओर

॥ श्लोक ३६-४० ॥
ततः प्रयाते राजेन्द्रे दशरथे सह बन्धुभिः ।
जनको धनसम्पूर्णो विससर्ज महामतिः ॥
प्रेषयामास चानीकं चतुरङ्गं महाबलम् ।
गजवाजिरथोपेतं पदातिजनसंकुलम् ॥
श्रुत्वा तु नगरीं प्राप्तान् रामं दशरथात्मजम् ।
प्रहर्षातुल्यं संजज्ञे पौराणां जानकीप्रियम् ॥
📖 भावार्थ : तब राजेन्द्र दशरथ के बन्धुओं सहित प्रयाण करने पर महामति जनक ने धन से परिपूर्ण होकर उन्हें विदा किया। उन्होंने चतुरंगिणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) भी साथ भेजी। यह सुनकर कि दशरथपुत्र राम नगरी (अयोध्या) को प्राप्त हुए, जो सीता को प्रिय हैं, पौरों में अपार हर्ष हुआ।
🔍 व्याख्या : राजा जनक की उदारता पुत्री के विवाह के उपरांत भी दिखती है। अयोध्या में राम एवं सीता के स्वागत की तैयारी हो रही है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💍 आदर्श विवाह संस्था

यह सर्ग हिन्दू विवाह परंपरा का मूल आधार है। अग्नि को साक्षी मानना, सप्तपदी (यहाँ संक्षेप में परिक्रमा), कन्यादान, वैदिक मंत्रोच्चार - ये सभी संस्कार आज भी प्रचलित हैं। राम-सीता का विवाह पति-पत्नी के आदर्श संबंधों की नींव रखता है।

🏹 चारों जोड़ियों का महत्व

राम एवं सीता के साथ-साथ तीन अन्य जोड़ियों का विवाह यह दर्शाता है कि यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि दो राजवंशों का वैवाहिक सम्बन्ध है। भरत का माण्डवी से एवं शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति से विवाह आगे चलकर राम के वनवास के समय भरत के त्याग की भावना को और गहराई प्रदान करता है।

🧘 विश्वामित्र की सार्थकता

ऋषि विश्वामित्र, जिन्होंने राजा से ऋषि बनने की यात्रा तय की, अब राम को लेकर मिथिला आए। यहाँ वे न केवल विवाह के साक्षी हैं, बल्कि संपूर्ण आयोजन के मार्गदर्शक हैं। उनकी तपस्या उस समय सफल होती है जब वे राम एवं सीता को परस्पर मिलते देखते हैं।

👑 राजा जनक का आदर्श

राजा जनक इस सर्ग में आदर्श शासक, आदर्श पिता और आदर्श धर्मज्ञ के रूप में उभरते हैं। वे पुत्री के वरण का अधिकार उसे देते हैं, धन-दौलत उदारता से बाँटते हैं और राम जैसे दामाद को पाकर स्वयं को धन्य मानते हैं।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन है। धर्म, प्रेम और आपसी सहमति इसके आधार हैं। समाज एवं परिवार की सहभागिता इस संस्कार को पूर्णता प्रदान करती है। राम एवं सीता का यह पवित्र मिलन सनातन परंपरा का आधार स्तंभ है, जिससे प्रेरणा लेकर लाखों जोड़े आज भी विवाह बंधन में बंधते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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