बाल काण्ड अध्याय 72

कुशध्वज की पुत्रियाँ

बाल काण्ड का बहत्तरवाँ सर्ग राजा जनक द्वारा अपने अनुज कुशध्वज की पुत्रियों माण्डवी और श्रुतकीर्ति का वरण तथा उनका भरत एवं शत्रुघ्न से विवाह प्रस्ताव का वर्णन करता है। इस सर्ग में चारों राजकुमारों के विवाह की योजना पूर्ण होती है।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ राजा जनक द्वारा राजा दशरथ एवं ऋषि विश्वामित्र के समक्ष अपने छोटे भाई कुशध्वज का परिचय देने से होता है। जनक कहते हैं कि उनके दो पुत्रियाँ हैं—सीता और ऊर्मिला, तथा उनके अनुज कुशध्वज की दो पुत्रियाँ—माण्डवी और श्रुतकीर्ति हैं। वे प्रस्ताव रखते हैं कि सीता का विवाह राम से, ऊर्मिला का लक्ष्मण से, और कुशध्वज की पुत्रियों का क्रमशः भरत और शत्रुघ्न से कर दिया जाए। राजा दशरथ इस प्रस्ताव को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और हर्षपूर्वक स्वीकार कर लेते हैं। इस प्रकार चारों राजकुमारों के विवाह की व्यवस्था हो जाती है। यह सर्ग मिथिला में हर्ष और उल्लास का वर्णन करते हुए आगामी विवाह समारोह की भूमिका तैयार करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ७२

(कुशध्वज की पुत्रियाँ – चारों विवाहों का निर्धारण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में शिव-धनुष भंग के पश्चात राजा जनक ने सीता को राम के लिए निश्चित कर दिया था। अब वे ऋषि विश्वामित्र और राजा दशरथ की उपस्थिति में एक और प्रस्ताव रखते हैं – अपने अनुज कुशध्वज की पुत्रियों का भी अयोध्या के राजकुमारों के साथ विवाह। यह सर्ग उसी प्रस्ताव, उसकी स्वीकृति तथा आगामी विवाहोत्सव की आधारशिला रखता है।

👥 राजा जनक का कुशध्वज से परिचय (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः कुशध्वजो नाम मम भ्राता महायशाः ।
यवीयान् वयसा राजन् धार्मिकः सत्यविक्रमः ॥
तस्य पुत्र्यौ महाभागौ रूपेणाप्रतिमौ भुवि ।
माण्डवी श्रुतकीर्तिश्च कीर्तिमत्यौ यशस्विनी ॥
ता मया प्रार्थिता राजन् त्वत्पुत्राणां यशस्विनाम् ।
वरयोग्या हि सदृशास्ताः प्रतीच्छ नराधिप ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; कुशध्वजः = कुशध्वज; नाम = नामक; मम = मेरा; भ्राता = भाई; महायशाः = महान यश वाले; यवीयान् = छोटे; वयसा = उम्र में; राजन् = हे राजन्; धार्मिकः = धर्मात्मा; सत्यविक्रमः = सत्य पराक्रमी; तस्य = उसके; पुत्र्यौ = दो पुत्रियाँ; महाभागौ = महाभाग्यशाली; रूपेण = रूप में; अप्रतिमौ = अतुलनीय; भुवि = पृथ्वी पर; माण्डवी = माण्डवी; श्रुतकीर्तिश्च = और श्रुतकीर्ति; कीर्तिमत्यौ = कीर्तिमती; यशस्विनी = यशस्विनी; ताः = वे; मया = मेरे द्वारा; प्रार्थिताः = माँगी गयी हैं; राजन् = हे राजन्; त्वत्पुत्राणाम् = आपके पुत्रों के लिए; यशस्विनाम् = यशस्वियों के लिए; वरयोग्याः = वर के योग्य; हि = ही; सदृशाः = समान; ताः = उन्हें; प्रतीच्छ = स्वीकार कीजिए; नराधिप = हे नरेश।
📖 भावार्थ : (राजा जनक दशरथ से कहते हैं) हे राजन्! मेरा एक छोटा भाई है, जो कुशध्वज नाम से विख्यात है। वह महान यशस्वी, धर्मात्मा और सत्य पराक्रमी है। उसकी दो पुत्रियाँ हैं—माण्डवी और श्रुतकीर्ति। ये दोनों पृथ्वी पर अद्वितीय रूपवती, कीर्तिमती और यशस्विनी हैं। हे नरेश! मैंने आपके यशस्वी पुत्रों के लिए उन्हें माँगा है। वे सभी प्रकार से वर के योग्य और सदृश हैं। कृपया उन्हें स्वीकार कीजिए।
🔍 व्याख्या : राजा जनक केवल अपनी पुत्रियों का ही नहीं, वरन् अपने अनुज की पुत्रियों का भी ध्यान रखते हैं। वे चाहते हैं कि चारों कन्याओं का विवाह उचित वरों के साथ हो।
॥ श्लोक ४-६ ॥
सीता मम सुता ज्येष्ठा ऊर्मिला चापि मे सुता ।
एते चतस्रो राजेन्द्र सदृश्यः सुतयोस्तव ॥
सीताया राघवो राम ऊर्मिलायास्तु लक्ष्मणः ।
माण्डव्या भरतः श्रीमान् श्रुतकीर्तेस्तु शत्रुहा ॥
एवं वरा नरव्याघ्र चत्वारश्चारुलोचनाः ।
प्रतिगृह्णन्तु राजेन्द्र मम पुत्रीश्चतस्रः ॥
📖 भावार्थ : "सीता मेरी ज्येष्ठ पुत्री है और ऊर्मिला भी मेरी ही पुत्री है। हे राजेन्द्र! ये चारों कन्याएँ आपके चारों पुत्रों के योग्य हैं। सीता के लिए राम, ऊर्मिला के लिए लक्ष्मण, माण्डवी के लिए श्रीमान भरत और श्रुतकीर्ति के लिए शत्रुहा (शत्रुघ्न) उपयुक्त वर हैं। हे नरव्याघ्र! ये चारों सुन्दर नेत्रों वाले राजकुमार मेरी इन चारों पुत्रियों को स्वीकार करें।"

🙏 दशरथ द्वारा प्रस्ताव की स्वीकृति (श्लोक ७-१४)

॥ श्लोक ७-१० ॥
तच्छ्रुत्वा दशरथो राजा जनकस्य वचः शुभम् ।
प्रहर्षमतुलं लेधे बभूव च पुनः पुनः ॥
प्रत्युवाच ततो राजा जनकं प्रति भारत ।
कृतकृत्योऽस्मि धर्मज्ञ यदिमाः सदृशाः स्नुषाः ॥
यथेष्टं क्रियतां राजन् विवाहो मम सम्मतः ।
त्वया सह कुरुष्वैनं यथाशास्त्रं यथाविधि ॥
इत्युक्त्वा स महातेजा जनकं मिथिलेश्वरम् ।
विश्वामित्रमुवाचेदं वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
📖 भावार्थ : राजा दशरथ ने जनक के उत्तम वचन सुनकर अपार हर्ष का अनुभव किया और बार-बार प्रसन्न हुए। हे भरत! तब राजा ने जनक से कहा, "हे धर्मज्ञ! मैं कृतकृत्य हो गया, क्योंकि ये सभी वधूएँ मेरे पुत्रों के योग्य हैं। हे राजन्! विवाह जैसा आप उचित समझें, वैसा कीजिए। मैं सहमत हूँ। आप मेरे साथ शास्त्र और विधि के अनुसार इस विवाह को सम्पन्न कीजिए।" ऐसा कहकर महातेजस्वी एवं वाक्य-विशारद दशरथ ने मिथिलेश्वर जनक से बात करके विश्वामित्र से भी कुछ कहा।
🔍 व्याख्या : दशरथ अत्यन्त प्रसन्न हैं। उनके चारों पुत्रों के लिए चार सुयोग्य वधूएँ मिल गई हैं। वे जनक के प्रस्ताव को शिरोधार्य करते हैं।
॥ श्लोक ११-१४ ॥
भगवन् क्रियतां शीघ्रं विवाहो मुनिपुंगव ।
यदा यथा च योग्यं स्यात्तदा कार्यमिति स्थितिः ॥
ततः प्रहर्षाद् राजा तु मिथिलाधिपतिस्तदा ।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य विवाहार्थमचोदयत् ॥
विश्वामित्रोऽब्रवीद् राजन् श्वो विवाह इति प्रभो ।
मुहूर्तो गदतीहैव श्वः पुष्येण करिष्यसि ॥
📖 भावार्थ : (दशरथ ने विश्वामित्र से कहा) "हे मुनिश्रेष्ठ! शीघ्र ही विवाह कीजिए। जैसा और जब योग्य हो, वैसा ही कार्य करना चाहिए।" तब मिथिला के राजा जनक ने हर्षित होकर विश्वामित्र को प्रमुख रखते हुए विवाह की तैयारी आरम्भ कर दी। विश्वामित्र ने कहा, "राजन्! कल विवाह होगा। हे प्रभो! मुहूर्त अब बता रहा हूँ—कल पुष्य नक्षत्र में आप विवाह करेंगे।"

🎉 मिथिला में हर्ष और विवाह की तैयारी (श्लोक १५-२४)

॥ श्लोक १५-१८ ॥
ततः प्रभाते विमले पुष्येण समुपस्थिते ।
आनीय मङ्गलं राजा कारयामास वै द्विजान् ॥
वेदीश्च कारयामास सुवर्णाभरणैर्युताः ।
तोरणानि च चैत्राणि स्रग्दामभिरलंकृताः ॥
ततो राजा दशरथो जनकश्च महीपतिः ।
पूजयामासतुः सर्वान् यथार्हं मुनिपुंगवान् ॥
विश्वामित्रवसिष्ठौ च वामदेवं च धार्मिकम् ।
📖 भावार्थ : फिर जब प्रातःकाल हुआ और पुष्य नक्षत्र आया, तो राजा (जनक) ने मंगल कार्यों के लिए ब्राह्मणों को बुलवाया। सुवर्ण आभूषणों से युक्त वेदियाँ बनवाई गईं, चैत्र मास के समान मनोहर तोरण बनाए गए तथा मालाओं से सजावट की गई। तत्पश्चात राजा दशरथ और राजा जनक ने यथायोग्य सभी मुनिश्रेष्ठों का पूजन किया—विश्वामित्र, वसिष्ठ और धार्मिक वामदेव आदि का।
🔍 व्याख्या : नगर को दुल्हन की तरह सजाया गया। विवाह की तैयारियाँ जोरों पर हैं। गुरुजनों का सम्मान किया जा रहा है।
॥ श्लोक १९-२२ ॥
तेषां मध्ये तु राजेन्द्र विश्वामित्रो महातपाः ।
रामलक्ष्मणयोर्वाक्यं श्रुत्वा प्रीतो बभूव ह ॥
ततो राज्ञो दशरथो जनकश्च महीपतिः ।
चक्रतुस्तौ विवाहार्थं संविधानं यथाविधि ॥
अलंकृत्य ततः कन्याः शोभमानाश्चतस्रः ।
आनिन्युस्ता यथान्यायं यज्ञवाटं मुदान्विताः ॥
📖 भावार्थ : राजेन्द्र! उन सबके बीच महातपस्वी विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण के वचन सुनकर प्रसन्नता प्राप्त की। तत्पश्चात दशरथ और जनक ने विवाह के लिए विधिवत आयोजन किया। चारों कन्याओं को सजाकर, सुशोभित करके वे हर्षपूर्वक उन्हें यथान्याय यज्ञवाट में ले आए।
॥ श्लोक २३-२४ ॥
ततो यथाविधि राजा वेदीमध्ये महीपतिः ।
उपनीय सुतान् सर्वान् कन्याभिः संयुयोज ह ॥
पाणिं गृहीत्वा रामस्य सीतायाः पृथिवीपतिः ।
प्रीत्या परमया युक्तो विवाहं कारयामास ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात राजा जनक ने विधिपूर्वक वेदी के मध्य में अपनी सभी पुत्रियों को लाकर उनका संयोग राजकुमारों से कराया। पृथ्वीपति जनक ने परम प्रीति के साथ राम का हाथ सीता के हाथ से मिलाकर विवाह सम्पन्न कराया। (इसी प्रकार अन्य तीनों विवाह भी हुए।)
🔍 व्याख्या : यहाँ चारों विवाहों का एक साथ होना सूचित किया गया है। अगले सर्ग में विस्तार से वर्णन होगा।

📖 उपसंहार: चारों विवाहों की आधारशिला

इस सर्ग में राजा जनक की उदारता एवं दूरदर्शिता देखने को मिलती है। वे केवल अपनी पुत्रियों का ही नहीं, वरन् अपने अनुज की पुत्रियों का भी उचित स्थान सुनिश्चित करते हैं। दशरथ की सहर्ष स्वीकृति से अयोध्या एवं मिथिला के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध और प्रगाढ़ होते हैं।

यह सर्ग हमें सिखाता है कि पारिवारिक सम्बन्धों का विस्तार केवल अपने तक सीमित न रखकर सम्पूर्ण परिवार के कल्याण के लिए सोचना चाहिए। जनक ने अपने भाई की पुत्रियों के लिए भी वैसा ही आग्रह किया जैसा अपनी पुत्रियों के लिए किया। इस प्रकार उन्होंने धर्म और स्नेह दोनों का निर्वाह किया।

🎯 शिक्षा : सच्चा प्रेम और कर्तव्य केवल अपने स्वार्थ तक सीमित नहीं होता, वरन् सम्पूर्ण कुटुम्ब के कल्याण की भावना रखता है। जनक ने इसका आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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