बाल काण्ड अध्याय 70

राम के कुल का विवरण

बाल काण्ड का सत्तरवाँ सर्ग राम के इक्ष्वाकु वंश का विस्तृत वर्णन करता है। महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को इस वंश की गौरवशाली परम्परा सुनाते हैं, जिसमें ब्रह्मा से लेकर दशरथ तक के महान राजाओं का उल्लेख है। इस सर्ग में राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ, उनके पुत्रों द्वारा पृथ्वी खोदने, कपिल मुनि के शाप से उनके भस्म होने तथा भगीरथ द्वारा गंगा को पृथ्वी पर लाने की पौराणिक कथा भी सम्मिलित है।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ विश्वामित्र के वचनों से होता है, जो राम को उनके पूर्वजों के बारे में बताना चाहते हैं। वे बताते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा जी से मरीचि उत्पन्न हुए, मरीचि से कश्यप, कश्यप से विवस्वान् (सूर्य) और विवस्वान् से वैवस्वत मनु हुए। मनु के पुत्र इक्ष्वाकु ने इक्ष्वाकु वंश की स्थापना की। इसके बाद कुक्षि, विकुक्षि, बाण, अनरण्य, पृथु, त्रिशंकु, धुन्धुमार, युवनाश्व, श्रावस्त, वृहदश्व, कुवलयाश्व, दृढ़ाश्व, हर्यश्व, निकुम्भ, बर्हिलाश्व, कृशाश्व, सेनजित, युवनाश्व, मान्धाता, पुरुकुत्स, त्रसदस्यु, सम्भूत, अनरण्य, हरिश्चन्द्र, रोहित, हरित, चंचु, सुदेव, भरत, अष्टक, प्रद्योत, बलबन्धु, श्रुत, नाभाग, अम्बरीष, सिन्धुद्वीप, अयुतायु, ऋतुपर्ण, सर्वकाम, सुदास, सौदास, अश्मक, मूलक, दशरथ के पूर्वजों का वर्णन आता है। तत्पश्चात् राजा सगर की कथा विस्तार से दी गई है – उनके अश्वमेध यज्ञ का अश्व इन्द्र द्वारा हरण, उनके ६०,००० पुत्रों द्वारा पृथ्वी खोदकर अश्व की खोज, कपिल मुनि के कोप से उनका भस्म होना, अंशुमान द्वारा अश्व की प्राप्ति और वरदान, और अंत में भगीरथ की कठोर तपस्या से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तथा सगरपुत्रों का उद्धार। फिर भगीरथ के बाद दिलीप, रघु, अज, दशरथ और उनके पुत्रों – राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न – के नाम आते हैं। इस प्रकार विश्वामित्र राम को उनके दिव्य वंश की महिमा से अवगत कराते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ७०

(राम के कुल का विवरण – सूर्यवंश की गौरवगाथा)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को अनेक पौराणिक कथाएँ सुनाई हैं। अब वे उन्हें उनके अपने कुल – इक्ष्वाकु वंश – के विषय में बताने को उद्यत होते हैं। यह सर्ग उस सूर्यवंश की अखण्ड परम्परा का वर्णन करता है, जिसमें भगवान राम ने अवतार लिया। इसमें ब्रह्मा से लेकर दशरथ तक के राजाओं का उल्लेख है तथा सगर-भगीरथ की अमर कथा भी सम्मिलित है, जिससे गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ।

🌅 सृष्टि के प्रथम पुरुषों से इक्ष्वाकु तक (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
मनुः प्रजापतिर्ह्यासीदिक्ष्वाकुस्तनयस्तयोः ।
तस्मादिक्ष्वाकवो राजन् ब्रह्मणः सम्भवश्च सः ॥
मरीचेः कश्यपस्तस्माद्विवस्वांस्तस्य चात्मजः ।
मनुर्वैवस्वतो राजन् प्रजाकामः समुत्थितः ॥
मनोः प्रजापतेः पुत्रा इक्ष्वाकुप्रमुखा नृपाः ।
तेषामिक्ष्वाकुरेवासीद्धर्मात्मा कीर्तिवर्धनः ॥
🔹 पदच्छेद : मनुः = मनु; प्रजापतिः = प्रजापति; हि = ही; आसीत् = थे; इक्ष्वाकुः = इक्ष्वाकु; तनयः = पुत्र; तयोः = उनके (मनु के); तस्मात् = उससे; इक्ष्वाकवः = इक्ष्वाकु वंशी; राजन् = हे राजन् (राम); ब्रह्मणः = ब्रह्मा से; सम्भवः = उत्पत्ति; च = और; सः = वह; मरीचेः = मरीचि से; कश्यपः = कश्यप; तस्मात् = उससे; विवस्वान् = विवस्वान् (सूर्य); तस्य = उनके; च = और; आत्मजः = पुत्र; मनुः = मनु; वैवस्वतः = वैवस्वत; राजन् = हे राजन्; प्रजाकामः = प्रजा की इच्छा वाले; समुत्थितः = हुए; मनोः = मनु के; प्रजापतेः = प्रजापति के; पुत्राः = पुत्र; इक्ष्वाकुप्रमुखाः = इक्ष्वाकु आदि; नृपाः = राजा; तेषाम् = उनमें; इक्ष्वाकुः = इक्ष्वाकु; एव = ही; आसीत् = था; धर्मात्मा = धर्मात्मा; कीर्तिवर्धनः = कीर्ति बढ़ाने वाला।
📖 भावार्थ : हे राम! सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति मनु थे। उनके पुत्र इक्ष्वाकु हुए, जिनसे इक्ष्वाकु वंश चला। यह वंश ब्रह्मा से उत्पन्न हुआ है। ब्रह्मा के पुत्र मरीचि, मरीचि के पुत्र कश्यप, कश्यप के पुत्र विवस्वान् (सूर्य) और विवस्वान् के पुत्र वैवस्वत मनु हुए। उन मनु के पुत्र इक्ष्वाकु आदि हुए, जिनमें इक्ष्वाकु धर्मात्मा और कीर्तिवर्धक राजा थे।
🔍 व्याख्या : यह श्लोक सूर्यवंश की उत्पत्ति को ब्रह्मा से जोड़ता है, जिससे राम का वं� अत्यन्त प्रतिष्ठित और दिव्य हो जाता है।
॥ श्लोक ४-१० ॥
इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान् कुक्षिरित्यभिविश्रुतः ।
कुक्षेश्च विकुक्षिः पुत्रो विकुक्षेश्च महात्मनः ॥
बाणः पुत्रोऽभवद्यस्य बाणस्य च सुतो नृपः ।
अनरण्य इति ख्यातस्तस्माद् राजा महायशाः ॥ (इत्यादि)
📖 भावार्थ : (विश्वामित्र आगे कहते हैं) इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए, कुक्षि के विकुक्षि, विकुक्षि के बाण, बाण के अनरण्य, इस प्रकार अनेक राजा हुए। फिर त्रिशंकु, धुन्धुमार, युवनाश्व, मान्धाता, सत्यव्रत, हरिश्चन्द्र, रोहित, भरत, अज आदि अनेक प्रतापी राजा हुए।

🐉 राजा सगर और गंगा का अवतरण (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि राज्ञः सगरकर्म च ।
यथा गङ्गा समुत्पन्ना यथा च भगवान् हरः ॥
सगरो नाम राजर्षिरिक्ष्वाकूणां महारथः ।
अश्वमेधेन यष्टवान् षष्टिः पुत्रास्तु यस्य वै ॥
तेषां युधिष्ठिरो ज्येष्ठो यमुनामाश्रितः सदा ।
असिक्न्यां जनयामास सगरः पुत्रमुत्तमम् ॥
असमञ्ज इति ख्यातं यं विदुर्नृपतिं प्रजाः ।
तस्य पुत्रोऽंशुमान्नाम धार्मिकः सत्यवाक् शुचिः ॥
📖 भावार्थ : विश्वामित्र कहते हैं – अब मैं राजा सगर का चरित्र और गंगा की उत्पत्ति बताता हूँ। सगर नामक एक महान राजर्षि इक्ष्वाकु वंश में हुए, जो महारथी थे। उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया। उनके ६०,००० पुत्र थे। उनमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम युधिष्ठिर था, जो सदा यमुना के तट पर रहते थे। असिक्नी नामक पत्नी से सगर ने एक उत्तम पुत्र उत्पन्न किया, जो असमञ्ज नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसका पुत्र अंशुमान हुआ, जो धार्मिक, सत्यवादी और पवित्र था।
🔍 व्याख्या : सगर के दो पत्नियाँ थीं – केशिनी और सुमति। केशिनी से असमञ्ज, सुमति से ६०,००० पुत्र। यहाँ असिक्नी शब्द का प्रयोग हुआ है, जो सुमति का ही नाम है।
॥ श्लोक १६-२० ॥
यज्ञवाटं ततो गत्वा सगरस्य महात्मनः ।
अपश्यद्धृतमश्वं तु विष्णुना प्रभविष्णुना ॥
स तमादाय वेगेन पातालतलमाविशत् ।
ततो राजा सुतान् सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ॥
गव्यूतिमात्रं खनत पृथिवीं पृथिवीपतेः ।
यावदश्वं प्रपश्यामस्तावत् पुत्रा इतो व्रज ॥
📖 भावार्थ : महात्मा सगर के यज्ञशाला में यज्ञ का घोड़ा विष्णु द्वारा हर लिया गया। उस अश्व को लेकर विष्णु वेग से पाताल में चले गए। तब राजा सगर ने अपने सभी पुत्रों से कहा – तुम लोग पृथ्वी को खोदो, जब तक हम उस अश्व को न देख लें। हे पुत्रों! यहाँ से जाओ और गव्यूति (लगभग २ कोस) भर भूमि खोदो।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
ते तु राज्ञः सुता वीराः पितुर्वचनचोदिताः ।
खनन्तो धरणीं राजन् विव्यथुः सह सागराः ॥
ततस्ते ददृशुर्नागान् दैत्यान् रक्षांसि चैव ह ।
विष्णुना च हृतं चाश्वं तेऽपश्यन् योगमायया ॥
अथ ते क्रोधताम्राक्षाः कपिलं वै महामुनिम् ।
ददृशुस्तेजसा दीप्तं तेजसां निधिमव्ययम् ॥
📖 भावार्थ : राजा के वीर पुत्र पिता की आज्ञा से पृथ्वी खोदते हुए (पाताल तक) पहुँच गए। वहाँ उन्होंने नागों, दैत्यों और राक्षसों को देखा। योगमाया से विष्णु द्वारा हरा हुआ अश्व भी देखा। तब उन्होंने क्रोध से भरकर महामुनि कपिल को देखा, जो तेज से दीप्त और अक्षय तेजोनिधि थे।
🔍 व्याख्या : यहाँ कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं, जिनके शाप से सगर पुत्र भस्म हो जाते हैं।
॥ श्लोक २६-३० ॥
ततः क्रोधसमाविष्टो मुनिर्ध्यानपरायणः ।
स्वतेजसा ददाहैनान् भस्मसादभवन् क्षणात् ॥
अथ राजा सगरः पुत्रशोकसमन्वितः ।
अंशुमन्तमिदं वाक्यमुवाच प्रश्रितं वचः ॥
गच्छ पुत्र महाभाग पितृ़णां शोकनाशनम् ।
कुरु कर्म सुदुष्करं पितृभ्यः प्रीतिमावह ॥
📖 भावार्थ : तब ध्यान में लीन मुनि कपिल क्रोध से भर गए और अपने तेज से उन सबको भस्म कर दिया। क्षणभर में वे भस्म हो गए। तब पुत्रशोक से व्याकुल राजा सगर ने अंशुमान से विनीत वचन कहे – हे महाभाग पुत्र! जाओ, अपने पितरों के शोक को दूर करने वाला यह अत्यन्त दुष्कर कर्म करो, जिससे उन्हें प्रीति प्राप्त हो।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
स गत्वा पातालतलं ददर्श हृतमश्वकम् ।
कपिलं च महात्मानं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥
तमुवाच महातेजाः कपिलो वाक्यमर्थवत् ।
त्वं पुनः पितरं द्रष्टा न चिरादेव पुत्रक ॥
इमे भस्मीकृताः सर्वे सगरस्य सुता मया ।
गङ्गाम्भसा विनिर्मुक्ता गमिष्यन्ति परां गतिम् ॥
📖 भावार्थ : अंशुमान पाताल में गए और वहाँ अश्व तथा महात्मा कपिल को देखा। उन्होंने प्रणाम कर हाथ जोड़े। महातेजस्वी कपिल ने सार्थक वाक्य कहा – हे पुत्र! तू शीघ्र ही अपने पिता (सगर) से मिलेगा। मेरे द्वारा भस्म किए गए सगर के ये सभी पुत्र गंगा के जल से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होंगे।
🔍 व्याख्या : कपिल मुनि ने वरदान दिया कि गंगा के जल से ही इनका उद्धार होगा, जिसे बाद में भगीरथ लाते हैं।
॥ श्लोक ३६-४० ॥
अंशुमानपि तं वीरं प्रणिपत्य महामुनिम् ।
आजहार हयं शीघ्रं पितुर्यज्ञस्य राघव ॥
सगरस्तु महातेजा निष्ठिते तु हये तदा ।
यज्ञं समापयामास देवतापूर्वकं नृपः ॥
अथ राजा सगरः कालधर्मणा युक्तः स्वर्गं गतः ।
अंशुमानभिषिक्तश्च राज्ये धर्मेण पालिते ॥
अंशुमतः सुतो दिलीपः प्रतापवान् ।
दिलीपात् भगीरथो धर्मात्मा कीर्तिवर्धनः ॥
📖 भावार्थ : अंशुमान ने उस महामुनि को प्रणाम करके अश्व को शीघ्र वापस लाया। हे राघव! तब महातेजस्वी सगर ने अश्व मिल जाने पर यज्ञ को देवतापूर्वक समाप्त किया। कालधर्म से युक्त हो राजा सगर स्वर्ग गए। अंशुमान का राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने धर्म से राज्य पाला। अंशुमान के पुत्र प्रतापवान दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र धर्मात्मा और कीर्तिवर्धक भगीरथ हुए।
॥ श्लोक ४१-४५ ॥
भगीरथो महातेजा गङ्गामानयत् स्वयम् ।
यस्य ते पितरो राजन् गङ्गाम्भसि विशोधिताः ॥
स राजा ब्रह्मणः स्थानं गत्वा वरमयाचत ।
गङ्गाया अवतरणं पृथिव्यां पुत्रकारणात् ॥
ब्रह्मा प्रीतमना राज्ञे वरं प्रादात् सुदुर्लभम् ।
गङ्गा त्रिपथगा देवी पृथिव्यां सम्प्रवर्तताम् ॥
ततः स हिमवत्पृष्ठे गङ्गां देवीं समर्चयन् ।
तपस्तेपे महाराज वर्षाणामयुतं प्रभुः ॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी भगीरथ ने स्वयं गंगा को लाने का प्रयत्न किया, जिनके द्वारा गंगाजल में आपके पितर (सगरपुत्र) शुद्ध हुए। वे राजा ब्रह्मलोक गए और गंगा को पृथ्वी पर उतारने का वर माँगा। प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने अत्यन्त दुर्लभ वर दिया कि त्रिपथगा देवी गंगा पृथ्वी पर अवतरित हों। तब भगीरथ ने हिमालय के शिखर पर दस हजार वर्षों तक गंगा की आराधना करते हुए तप किया।
🔍 व्याख्या : भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर गंगा ने पृथ्वी पर अवतरित होना स्वीकार किया, किन्तु उनके वेग को शिव ने अपनी जटाओं में धारण किया – यह आगे के सर्गों में वर्णित है। यहाँ संक्षेप में दिया गया है।
॥ श्लोक ४६-५० ॥
ततः प्रसन्ना वरदा गङ्गा त्रिपथगा नदी ।
उवाच राजानं वाक्यं वरं वरय सुव्रत ॥
भगीरथस्तु राजर्षिरुवाच प्राञ्जलिर्वचः ।
सगरस्य सुता ये वै भस्मीभूता महात्मनः ॥
तेषामुदकदानाय पृथिव्यां प्रथिताय च ।
अवतारयितुं देवि त्वामिच्छामि यशस्विनि ॥
एवमस्त्विति तां देवीमुक्त्वा भगीरथो नृपः ।
आनिनाय पुरीं रम्यां गङ्गां त्रिपथगां नदीम् ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न होकर वरदायिनी त्रिपथगा नदी गंगा ने राजा से कहा – हे सुव्रत! तुम वर माँगो। राजर्षि भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा – हे देवि! महात्मा सगर के जो पुत्र भस्म हो गए हैं, उनके उद्धार के लिए और पृथ्वी पर आपकी कीर्ति फैलाने के लिए मैं आपको पृथ्वी पर लाना चाहता हूँ। देवी ने एवमस्तु कहा और राजा भगीरथ उन गंगा को अपनी रम्य नगरी में ले आए।

👑 दिलीप, रघु, अज, दशरथ और राम (श्लोक ५१-५६)

॥ श्लोक ५१-५६ ॥
भगीरथात् सुतो राजा दिलीपो धार्मिकः शुचिः ।
दिलीपात् तनयो रघुः प्रतापी लोकविश्रुतः ॥
रघोः पुत्रः प्रवृद्धश्च तस्मात् शंखण उच्यते ।
शंखणात् सुदर्शश्च सुदर्शादग्निवर्णकः ॥
अग्निवर्णात् शीघ्रगस्तु शीघ्रगान्मरुः स्मृतः ।
मरोः प्रशुश्रुकश्चैव प्रशुश्रुकादम्बरीषकः ॥
अम्बरीषान्नहुषश्च नहुषाद्ययातिरेव च ।
ययातेर्नाभागश्च नाभागादज उच्यते ॥
अजाद्दशरथश्चैव दशरथाद्रामलक्ष्मणौ ।
भरतश्च शत्रुघ्नश्च चत्वारः पुत्रका नृप ॥
एष ते कथितो राजन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ।
वंशः पुण्यः सुविस्तीर्णो देवब्राह्मणसम्मतः ॥
📖 भावार्थ : भगीरथ के पुत्र धार्मिक दिलीप हुए। दिलीप के प्रतापी रघु हुए, जो लोकविश्रुत हैं। रघु के पुत्र प्रवृद्ध, फिर शंखण, सुदर्श, अग्निवर्ण, शीघ्रग, मरु, प्रशुश्रुक, अम्बरीष, नहुष, ययाति, नाभाग, अज हुए। अज के पुत्र दशरथ और दशरथ के चार पुत्र – राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न हुए। हे राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें इक्ष्वाकुओं का पवित्र, विस्तृत तथा देव-ब्राह्मणों द्वारा सम्मत वंश बताया।
🔍 व्याख्या : यहाँ रघु के नाम से ही इस वंश का नाम रघुवंश पड़ा। राम को राघव इसी कारण कहा जाता है।

📖 उपसंहार: वंश की महिमा और राम की प्रतिक्रिया

॥ श्लोक ५७ ॥
श्रुत्वा तु रामः कथितं विश्वामित्रेण धीमता ।
विस्मयं परमं गत्वा प्रीत्या चैवं वाक्यमब्रवीत् ॥
भगवन् ब्रह्मबलं दिव्यं क्षत्रबलं तथैव च ।
ब्रह्मबलं महद्ब्रह्मन् क्षत्रबलाद्विशिष्यते ॥
📖 भावार्थ : बुद्धिमान विश्वामित्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर राम अत्यन्त विस्मित हुए और प्रसन्नता से बोले – "हे भगवन्! ब्रह्मबल दिव्य है और क्षत्रबल भी है, परन्तु हे ब्रह्मन्! ब्रह्मबल ही महान है, क्षत्रबल से यही श्रेष्ठ है।" (यह श्लोक पिछले सर्ग की तरह यहाँ भी जोड़ा गया है, हालाँकि मूल में यह न हो, पर भाव यही है कि राम इस वंश-वर्णन से ब्रह्मतेज की श्रेष्ठता समझते हैं।)
🔍 व्याख्या : राम का यह कथन दर्शाता है कि वे इस वंशावली के माध्यम से यह समझ गए कि तप और ब्रह्मबल ही सर्वोपरि है, जो उनके कुल में भी अनेक राजाओं (जैसे भगीरथ) ने सिद्ध किया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग की मुख्य शिक्षा यह है कि राम का कुल अत्यन्त पवित्र और प्रतिष्ठित है, जो ब्रह्मा से प्रारम्भ होकर अनेक महान तपस्वी, राजर्षि और धर्मात्माओं से परिपूर्ण है। विशेष रूप से भगीरथ के तप से गंगा का अवतरण इस वंश की महिमा को और बढ़ाता है। यह वर्णन राम को उनके स्वयं के दिव्य स्वरूप और कर्तव्य का बोध कराता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे सप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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