बाल काण्ड अध्याय 69

दशरथ का मिथिला में आगमन

बाल काण्ड का उनहत्तरवाँ सर्ग राजा दशरथ के मिथिला आगमन और भव्य स्वागत का वर्णन करता है। विश्वामित्र के निमंत्रण पर दशरथ अपनी सेना और परिवार के साथ मिथिला पहुँचते हैं, जहाँ राजा जनक उनका अत्यंत आदर-सत्कार करते हैं। यह सर्ग दो महान राजाओं के मिलन और राम-सीता विवाह की तैयारियों का आधार तैयार करता है।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ राजा दशरथ के मिथिला की ओर प्रस्थान से होता है। विश्वामित्र के मुख से यह जानकर कि राम ने सीता स्वयंवर की शर्त पूरी कर दी है और राजा जनक उनसे विवाह करना चाहते हैं, दशरथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वे अपने यज्ञपुरोहित वसिष्ठ, वामदेव आदि ऋषियों तथा सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप आदि महर्षियों के साथ मिथिला के लिए प्रस्थान करते हैं। उनके साथ उनकी विशाल सेना भी होती है। मिथिला पहुँचने पर राजा जनक उनके स्वागत के लिए स्वयं नगर द्वार तक आते हैं। दोनों राजाओं की भेंट अत्यंत हार्दिक होती है। जनक दशरथ और उनके साथ आए सभी महानुभावों का यथोचित पूजन, आसन और आवास की व्यवस्था करते हैं। इस प्रकार यह सर्ग दो कुलीनों के मिलन और शुभ विवाह के शुभारम्भ का सूत्रपात करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६९

(दशरथ का मिथिला में आगमन – दो राजवंशों का मिलन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में विश्वामित्र ने राजा जनक को दशरथ के आगमन की प्रतीक्षा करने को कहा था। अब समय आ गया है। राम द्वारा शिव-धनुष के भंजन के पश्चात् राजा जनक ने यह निश्चय कर लिया है कि सीता का विवाह केवल राम के साथ ही होगा। वे विश्वामित्र से प्रार्थना करते हैं कि राजा दशरथ को तुरंत मिथिला बुलाया जाए। यह सर्ग उस निमंत्रण के परिणामस्वरूप राजा दशरथ के भव्य आगमन और मिथिला में हुए हार्दिक स्वागत का वर्णन करता है।

🚩 दशरथ का मिथिला के लिए प्रस्थान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य विश्वामित्रस्य धीमतः ।
राजा दशरथो हृष्टो ववन्दे मुनिपुङ्गवम् ॥
ततो यज्ञं समाप्यैव राजा दशरथः सुखी ।
आजगाम तदा राम विश्वामित्रस्य शासनात् ॥
सह पुत्रैः सहामात्यैः सह बन्धुजनेन च ।
प्रययौ मिथिलां राम राजा दशरथस्तदा ॥
तस्य यान्तस्य मार्गे तु वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः ।
अनुजग्मुर्महात्मानो वेदवेदाङ्गपारगाः ॥
सुयज्ञश्च वसिष्ठश्च वामदेवश्च धार्मिकः ।
जाबालिश्च महातेजाः काश्यपश्च महानृषिः ॥
🔹 पदच्छेद : तत् = उस; श्रुत्वा = सुनकर; वचनम् = वचन को; तस्य = उनके; विश्वामित्रस्य = विश्वामित्र के; धीमतः = बुद्धिमान; राजा = राजा; दशरथः = दशरथ; हृष्टः = प्रसन्न होकर; ववन्दे = प्रणाम किया; मुनिपुङ्गवम् = मुनिश्रेष्ठ को; ततः = तत्पश्चात्; यज्ञम् = यज्ञ को; समाप्य = समाप्त करके; एव = ही; राजा = राजा; दशरथः = दशरथ; सुखी = सुखी होकर; आजगाम = आ गए; तदा = तब; राम = हे राम; विश्वामित्रस्य = विश्वामित्र के; शासनात् = आदेश (निमंत्रण) से; सह = साथ; पुत्रैः = पुत्रों के; सह = साथ; अमात्यैः = मंत्रियों के; सह = साथ; बन्धुजनेन = बन्धु-बान्धवों के; च = और; प्रययौ = गए; मिथिलाम् = मिथिला को; राजा = राजा; दशरथः = दशरथ; तदा = तब; तस्य = उनके; यान्तस्य = जाते हुए; मार्गे = मार्ग में; तु = तो; वसिष्ठप्रमुखाः = वसिष्ठ के नायकत्व वाले; द्विजाः = ब्राह्मण; अनुजग्मुः = पीछे चले; महात्मानः = महात्मा; वेदवेदाङ्गपारगाः = वेद-वेदांग के पारंगत; सुयज्ञः = सुयज्ञ; च = और; वसिष्ठः = वसिष्ठ; च = और; वामदेवः = वामदेव; च = और; धार्मिकः = धार्मिक; जाबालिः = जाबालि; च = और; महातेजाः = महातेजस्वी; काश्यपः = काश्यप; च = और; महान्ऋषिः = महान ऋषि।
📖 भावार्थ : (राजा दशरथ से कहा गया) हे राम! बुद्धिमान विश्वामित्र के उस वचन (विवाह हेतु बुलाये जाने) को सुनकर राजा दशरथ अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र को प्रणाम किया। तत्पश्चात् यज्ञ को समाप्त करके सुखी राजा दशरथ, विश्वामित्र के निमंत्रण पर, हे राम! अपने पुत्रों, मंत्रियों और बन्धु-बान्धवों के साथ मिथिला के लिए प्रस्थान किए। उनके मार्ग में जाते हुए, वसिष्ठ के नेतृत्व में वेद-वेदांग के पारंगत महात्मा ब्राह्मण, सुयज्ञ, वसिष्ठ, धार्मिक वामदेव, महातेजस्वी जाबालि और महान ऋषि काश्यप आदि उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।
🔍 व्याख्या : दशरथ की इस यात्रा में उनके कुलगुरु वसिष्ठ के साथ-साथ अनेक महान ऋषियों का होना इस बात का प्रतीक है कि यह विवाह केवल दो परिवारों का नहीं, बल्कि दो महान परम्पराओं का मिलन है।

🏯 मिथिला नरेश जनक का स्वागत-सत्कार (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तेषामागच्छतां शब्दं श्रुत्वा जनकपालिताः ।
प्रहर्षमतुलं लेभुः पौरा जानपदास्तथा ॥
राजा च जनको राजन् श्रुत्वा दशरथागमम् ।
पूजार्हं पूजयामास प्रीत्या परमया युतः ॥
स्वयं नगरद्वारे तु प्रत्युद्गम्य नराधिपः ।
ददर्श दशरथं राजा प्रीतिसंयुक्तलोचनः ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य धर्मात्मा जनकाधिपः ।
स्वागतं ते नरश्रेष्ठ इत्युक्त्वा प्रतिपूजयत् ॥
ततः प्रवेशयामास स्वपुरं राजसत्तमः ।
सत्कारेण महार्हेण पूजयामास चैव ह ॥
📖 भावार्थ : हे राजन् (राम)! उनके आने की सूचना सुनकर जनक द्वारा पालित नगर के और जनपद के निवासी अत्यन्त प्रसन्न हुए। राजा जनक ने भी राजा दशरथ के आगमन की सूचना पाकर, परम प्रीति से युक्त होकर, पूजा के योग्य उनका सत्कार किया। वे नराधिप (जनक) स्वयं नगरद्वार तक आगे बढ़कर राजा दशरथ से मिले। उनकी आँखें प्रेम से भर गईं। धर्मात्मा राजा जनक ने उन्हें आते देखकर कहा, "हे नरश्रेष्ठ! आपका स्वागत है" और उनका यथोचित सत्कार किया। तत्पश्चात् उन राजर्षि ने दशरथ को अपने नगर में प्रवेश कराया और अत्यन्त उत्तम सत्कार के साथ उनकी पूजा की।
🔍 व्याख्या : राजा जनक का स्वयं नगर द्वार तक आना उनकी विनम्रता और दशरथ के प्रति अगाध सम्मान को दर्शाता है। यह आतिथ्य सत्कार की सनातन परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
॥ श्लोक १६-२० ॥
गां च मधुपर्कं च ददौ तस्मै महात्मने ।
आसनानि च मुख्यानि ऋषिभ्यः प्रददौ तदा ॥
ततः कुशलिनौ राज्ञौ परस्परजयैषिणौ ।
पप्रच्छतुः परं राजन् सर्वं चैवानुपूर्वशः ॥
ततः प्रीतिमनाः श्रीमान् राजा जनकधार्मिकः ।
उवाच वचनं राज्ञो दशरथस्य धीमतः ॥
स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ।
दिष्ट्या पुत्रानिमान् राजन् पश्यामि सह लक्ष्मणान् ॥
दिष्ट्या सीतामिमां प्राप्तो रामाय विदितात्मने ।
धन्योऽस्मि प्राप्य वै राजन् त्वामतिथिं पुत्रवत्सलम् ॥
📖 भावार्थ : उन्होंने उस महात्मा दशरथ को गौ और मधुपर्क (आदर का प्रतीक) भेंट किया तथा ऋषियों को उत्तम आसन प्रदान किए। तत्पश्चात् हे राजन्! परस्पर कुशलक्षेम चाहने वाले वे दोनों राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने क्रमशः सब कुशल समाचार पूछे। तत्पश्चात् प्रसन्न मन वाले धार्मिक एवं श्रीमान् राजा जनक ने बुद्धिमान राजा दशरथ से कहा, "हे नरश्रेष्ठ राघव! आपका स्वागत है। सौभाग्य से आप पधारे हैं। हे राजन्! सौभाग्य से मैं आपके इन पुत्रों को लक्ष्मण सहित देख रहा हूँ। सौभाग्य से यह सीता ज्ञानी राम के लिए प्राप्त हुई हैं। हे राजन्! पुत्रवत्सल आपको अतिथि के रूप में पाकर मैं धन्य हो गया।"

🏰 राजा जनक द्वारा भव्य आतिथ्य (श्लोक २६-४०)

॥ श्लोक २६-३० ॥
एवमुक्त्वा तु राजानं दशरथं जनकाधिपः ।
आजुहाव वसिष्ठं च शतानन्दं च धार्मिकम् ॥
उवाच च महातेजाः शतानन्दं जनकाधिपः ।
गुरवे दीयतां सर्वं यथाशास्त्रं यथाविधि ॥
ततः शतानन्दो राज्ञा समादिष्टो महात्मना ।
चकार सत्क्रियां सर्वां गुरोर्धर्मभृतां वरः ॥
ततः प्रीतमना राजा जनको राजसत्तमम् ।
दशरथं महात्मानं प्रवेशयत वेश्मनि ॥
स च राजा महातेजा दशरथो महायशाः ।
सह पुत्रैः समागम्य जनकेन सुसत्कृतः ॥
📖 भावार्थ : राजा जनक ने राजा दशरथ से ऐसा कहकर, वसिष्ठ और धार्मिक शतानन्द को बुलाया। महातेजस्वी राजा जनक ने शतानन्द से कहा, "गुरु (वसिष्ठ) के लिए शास्त्र और विधि के अनुसार सब सामग्री दी जाए।" तब राजा द्वारा आदिष्ट धर्मियों में श्रेष्ठ शतानन्द ने अपने गुरु (वसिष्ठ) का सब प्रकार से सत्कार किया। तत्पश्चात् प्रसन्न मन वाले राजा जनक ने उस राजश्रेष्ठ महात्मा दशरथ को अपने महल में प्रवेश कराया। महातेजस्वी और महायशस्वी राजा दशरथ पुत्रों सहित जनक द्वारा सुसत्कृत होकर वहाँ रहे।
🔍 व्याख्या : शतानन्द का उल्लेख यहाँ महत्वपूर्ण है। वे गौतम ऋषि के पुत्र और अहल्या के साथ हुए प्रसंग से जुड़े हैं। उनका वसिष्ठ का सत्कार करना गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वहन है।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ततो जनकराजेन दत्तं भवनमुत्तमम् ।
सुखार्हाणां सुखं तेषां सर्वकामफलप्रदम् ॥
सुविभक्तानि चित्राणि शयनान्यासनानि च ।
भोजनानि च मुख्यानि पानानि विविधानि च ॥
गावश्च बहुसाहस्रा दत्तास्ताभ्यां महात्मना ।
धनानि च महार्हाणि वासांसि विविधानि च ॥
एवं सत्कृत्य राजानं दशरथं जनकाधिपः ।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम् ॥
भगवन् श्रोतुमिच्छामि यागेनानेन सुव्रत ।
यज्ञियानि च सर्वाणि क्रमशः सम्प्रचोदय ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् राजा जनक ने उन सुख के योग्य दशरथ आदि को उत्तम भवन दिया, जो सब इच्छित पदार्थों को देने वाला था। उसमें सुन्दर रीति से सजे हुए चित्र-विचित्र शय्या, आसन, उत्तम भोजन और विविध प्रकार के पेय पदार्थ थे। उन महात्मा जनक ने उन्हें हजारों गौएँ, अनमोल धन और विविध प्रकार के वस्त्र भी भेंट किए। इस प्रकार राजा जनक ने राजा दशरथ का सत्कार करके, तपोधन विश्वामित्र से हाथ जोड़कर कहा, "हे भगवन्! हे सुव्रत! मैं इस यज्ञ के विषय में सब कुछ क्रम से सुनना चाहता हूँ। आप यज्ञीय कार्यों की आज्ञा दीजिए।"
॥ श्लोक ३६-४० ॥
ततः प्रातः समुत्थाय कृतपौर्वाह्णिकक्रियाः ।
समीयुस्ते महात्मानो राजानौ सह बन्धुभिः ॥
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य वसिष्ठप्रमुखास्तथा ।
ऋत्विजो ब्राह्मणाश्चैव समवायन् यथाविधि ॥
ततस्ते समवेतास्तु राजानौ सह बन्धुभिः ।
विवाहं सम्प्रचक्रुस्ते राघवाणां महात्मनाम् ॥
इत्येतत्कथितं वत्स रामस्य चरितं महत् ।
यथा विवाहः सम्पन्नो रामस्य विदितात्मनः ॥
श्रुत्वा विवाहं रामस्य नरो नार्यथ वा शुभे ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् प्रातःकाल उठकर, पूर्वाह्न की क्रियाओं को सम्पन्न करके वे दोनों महात्मा राजा अपने बन्धुओं के साथ एकत्रित हुए। विश्वामित्र को आगे करके, वसिष्ठ के नेतृत्व में ऋत्विज और ब्राह्मण भी विधिपूर्वक वहाँ एकत्रित हुए। तब वे सब बन्धुओं सहित एकत्रित हुए राजाओं ने उन महात्मा राघवों (राम आदि) का विवाह सम्पन्न कराया। हे वत्स! इस प्रकार तुमसे राम का यह महान चरित्र कहा गया कि किस प्रकार ज्ञानी राम का विवाह सम्पन्न हुआ। इस पवित्र राम-विवाह की कथा सुनने वाला पुरुष या स्त्री समस्त पापों से मुक्त होकर परम ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
🔍 व्याख्या : यह श्लोक इस सर्ग का समापन करते हुए अगले सर्ग (विवाह) की ओर संकेत करता है। यह कथा के श्रवण माहात्म्य को भी बताता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏛️ राजनयिक शिष्टाचार एवं आतिथ्य

यह सर्ग प्राचीन भारतीय राजनयिक शिष्टाचार और आतिथ्य परम्परा का एक सुन्दर चित्रण है। राजा जनक का स्वयं द्वार पर आकर स्वागत करना, मधुपर्क अर्पित करना, गौदान करना, और योग्य आवास की व्यवस्था करना उच्च कोटि के राजधर्म और सदाचार के उदाहरण हैं।

🙏 गुरु-शिष्य परम्परा का सम्मान

शतानन्द द्वारा अपने गुरु वसिष्ठ का सत्कार करना गुरु-शिष्य परम्परा की पवित्रता को दर्शाता है। साथ ही, दोनों राजाओं का ऋषियों को प्राथमिकता देना (विश्वामित्र को आगे करना) यह सिद्ध करता है कि उस युग में राजशक्ति से भी अधिक ज्ञान और तप की शक्ति का आदर किया जाता था।

💞 विवाह का शुभारम्भ

यह सर्ग राम-सीता विवाह की आधारशिला रखता है। दोनों राजाओं का हार्दिक मिलन, परस्पर संवाद और आदर-सत्कार इस शुभ अवसर की गरिमा को बढ़ाते हैं। राजा जनक का कथन, "सौभाग्य से सीता राम के लिए प्राप्त हुई हैं", इस विवाह की दिव्यता को रेखांकित करता है।

📿 कथा का माहात्म्य

सर्ग के अन्तिम श्लोक में इस कथा के श्रवण को सर्वपापहारी और ब्रह्मप्राप्ति का मार्ग बताया गया है। यह रामायण की प्रत्येक कथा में निहित आध्यात्मिक ऊर्जा और उसके श्रवण मात्र से होने वाले कल्याण का प्रतिपादन करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि वैवाहिक सम्बन्ध केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और संस्कृतियों का मिलन होता है। आतिथ्य, विनम्रता और परस्पर सम्मान किसी भी सम्बन्ध को सुदृढ़ बनाने के आधार हैं। बड़ों और ज्ञानियों का आदर करना चाहिए, क्योंकि उनका आशीर्वाद ही जीवन के मांगलिक कार्यों को सफल बनाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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