बाल काण्ड अध्याय 68

दशरथ की मिथिला यात्रा

बाल काण्ड का अड़सठवाँ सर्ग राजा दशरथ की मिथिला यात्रा का वर्णन करता है। राम-लक्ष्मण के विवाह का समाचार पाकर दशरथ अपनी विशाल सेना, गुरु वशिष्ठ तथा परिवार के साथ मिथिला के लिए प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग राजसी वैभव, यात्रा मार्ग के दृश्यों और राजा जनक द्वारा दशरथ के भव्य स्वागत का चित्रण करता है।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ राजा जनक द्वारा दशरथ के पास दूत भेजने से होता है, जो उन्हें राम-लक्ष्मण के विवाह के निश्चय की सूचना देता है। यह शुभ समाचार सुनकर दशरथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वे तुरंत गुरु वशिष्ठ की आज्ञा लेकर मिथिला यात्रा की तैयारी करते हैं। चारों ओर हर्ष का वातावरण छा जाता है। राजा दशरथ अपने साथ विशाल सेना, रथ, हाथी, घोड़े तथा आवश्यक धन-रत्न लेकर अयोध्या से प्रस्थान करते हैं। मार्ग में वे अनेक नदियों, वनों और प्रदेशों को पार करते हैं। उनकी सेना की ध्वजाएँ आकाश में फहराती हैं और रथों की गर्जना से दिशाएँ गूंज उठती हैं। राजा जनक को दशरथ के आगमन का समाचार मिलता है और वे स्वयं नगर से बाहर आकर उनका स्वागत करते हैं। दोनों राजाओं का मिलन अत्यंत हार्दिक होता है। जनक दशरथ को उचित सम्मान देकर सत्कारपूर्वक मिथिला ले जाते हैं। यह सर्ग दो महान राजवंशों के मिलन की सुंदर झाँकी प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६८

(दशरथ की मिथिला यात्रा – दो राजवंशों का मिलन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टषष्ठितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में हमने राम-लक्ष्मण के साथ विश्वामित्र के मिथिला आगमन, सीता-राम के भेंट, शिव-धनुष के भंजन और राजा जनक द्वारा विवाह का निश्चय किए जाने की कथा सुनी। अब इस सर्ग में राजा दशरथ को विवाह का निमंत्रण मिलता है और वे अयोध्या से विशाल सेना एवं परिवार के साथ मिथिला की ओर प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग दो महान राजाओं – दशरथ और जनक – के मिलन और उससे उपजे हर्षोल्लास का अद्भुत वर्णन करता है।

📜 मिथिला से शुभ समाचार का आगमन (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततो राज्ञो जनकस्य वचनान्नरसत्तमः ।
सूतो रथेनास्तगतं दिनकरमुपागमत् ॥
स गत्वा नगरीं रम्यामयोध्यां रघुपुङ्गवः ।
ददर्श राजधर्मेण धर्मात्मानं महीपतिम् ॥
दशरथं महात्मानं पूर्णचन्द्रं यथा दिवि ।
प्रजापालं महात्मानं ब्रह्माणमिव देवताः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; राज्ञः = राजा; जनकस्य = जनक के; वचनात् = वचन से; नरसत्तमः = श्रेष्ठ मनुष्य (दूत); सूतः = दूत; रथेन = रथ से; अस्तगतम् = अस्त हुए; दिनकरम् = सूर्य को; उपागमत् = प्राप्त हुआ (सूर्यास्त के समय); सः = वह; गत्वा = जाकर; नगरीम् = नगरी; रम्याम् = सुन्दर; अयोध्याम् = अयोध्या; रघुपुङ्गवः = रघुश्रेष्ठ; ददर्श = देखा; राजधर्मेण = राजधर्म से; धर्मात्मानम् = धर्मात्मा; महीपतिम् = राजा को; दशरथम् = दशरथ को; महात्मानम् = महात्मा; पूर्णचन्द्रम् = पूर्ण चन्द्र; यथा = जैसे; दिवि = आकाश में; प्रजापालम् = प्रजापालक; महात्मानम् = महान; ब्रह्माणम् = ब्रह्मा को; इव = समान; देवताः = देवता।
📖 भावार्थ : राजा जनक के आदेश से वह श्रेष्ठ दूत सूर्यास्त के समय रथ द्वारा अयोध्या पहुँचा। रघुकुलश्रेष्ठ उस दूत ने सुन्दर अयोध्या नगरी में जाकर राजधर्म से युक्त, धर्मात्मा महीपति दशरथ को देखा, जो आकाश में पूर्ण चन्द्रमा के समान और प्रजापालक महात्मा के रूप में देवताओं द्वारा सेवित ब्रह्मा के समान प्रतिभासित हो रहे थे।
🔍 व्याख्या : राजा दशरथ के व्यक्तित्व और उनकी धर्मपरायणता को ब्रह्मा और पूर्ण चन्द्रमा से उपमा देकर वाल्मीकि ने उनकी महानता का बखान किया है।
॥ श्लोक ४-६ ॥
स राज्ञा पूजितः सम्यक् क्षणेनैवाभ्ययान्मुनिम् ।
वसिष्ठं वाल्मिकिं चैव तथान्यानपि तापसान् ॥
ततः स राज्ञा सहितो वसिष्ठः सह तापसैः ।
जगाम राजभवनं यत्र राजा महायशाः ॥
तं दृष्ट्वा राजशार्दूलः प्रत्युत्थानेन पूजयन् ।
पप्रच्छ कुशलं चैव राज्ञो जनकधर्मिणः ॥
📖 भावार्थ : राजा द्वारा यथोचित पूजित होकर वह दूत क्षणभर में ही ऋषि वसिष्ठ, वाल्मीकि और अन्य तापसों के पास गया। तत्पश्चात राजा (दशरथ) के साथ वसिष्ठ और तापस राजा के महल में गए, जहाँ महायशस्वी राजा (दशरथ) स्थित थे। राजश्रेष्ठ दशरथ ने उन्हें देखकर आसन से उठकर उचित सम्मान दिया और राजा जनक के कुशलक्षेम के विषय में पूछा।

🙏 दशरथ द्वारा दूत का सम्मान और यात्रा की स्वीकृति (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-९ ॥
कच्चिद्राजा जनकः सानुगः स यज्ञकर्मसु ।
कुशली चापि धर्मात्मा शीघ्रं ब्रूहि तपोधन ॥
एवमुक्तः स धर्मात्मा राज्ञा दशरथेन तु ।
प्रत्युवाच महात्मानं प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा ॥
राजा जनकः सानुगः कुशली च यज्ञकर्मसु ।
त्वद्दर्शनाक्षो देवेश प्रेषयामास मां नृपः ॥
📖 भावार्थ : "हे तपोधन! क्या राजा जनक अपने अनुचरों सहित यज्ञ-कार्यों में कुशल हैं? हे धर्मात्मन्! शीघ्र बताइए।" राजा दशरथ द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उस धर्मात्मा दूत ने हाथ जोड़कर और प्रणाम करके महात्मा दशरथ से कहा, "राजा जनक अपने अनुगमन करने वालों सहित यज्ञ-कार्यों में कुशल हैं। हे देवेश! वे नरेश आपके दर्शन की अभिलाषा से मुझे यहाँ भेजा है।"
🔍 व्याख्या : दशरथ का यह प्रश्न उनकी जनक के प्रति मैत्री और स्नेह को दर्शाता है। दूत का उत्तर भी बड़े ही विनम्र भाव से दिया गया है।
॥ श्लोक १०-१२ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दूतस्य विदितात्मनः ।
हर्षेण महताविष्टो वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥
श्रुतं भगवता वाक्यं दूतस्यास्य तपोधन ।
यथा राजा जनकः स प्रेषयामास मां प्रति ॥
तदनुज्ञातुमिच्छामि त्वां गुरुं देवसत्तमम् ।
किमत्र पथ्यं मन्यस्व वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥
📖 भावार्थ : उस ज्ञानी दूत के वचन सुनकर राजा दशरथ महान हर्ष से भर गए और वसिष्ठ से इस प्रकार बोले, "हे भगवन्! हे तपोधन! इस दूत का वाक्य सुन लिया गया है कि राजा जनक ने मेरे लिए संदेश भेजा है। अतः हे देवसत्तम गुरो! मैं आपसे आज्ञा लेना चाहता हूँ। आप यहाँ क्या उचित समझते हैं? सत्य रूप में कहने की कृपा करें।"

🚩 यात्रा की तैयारी और प्रस्थान (श्लोक १३-२०)

॥ श्लोक १३-१५ ॥
ततः प्रोवाच धर्मात्मा वसिष्ठो भगवानृषिः ।
राज्ञा सार्धं सुहृद्भिश्च युक्तं गन्तुं न संशयः ॥
क्षिप्रं सज्जीक्रियतां सेना चतुरङ्गबलान्विता ।
रत्नानि च महार्हाणि धनं धान्यं रथास्तथा ॥
शीघ्रं यानानि युज्यन्तां गजाश्वरथसंकुलाः ।
पदातयश्च बलिनः सन्नद्धाः प्रस्थिता नृप ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा भगवान ऋषि वसिष्ठ ने कहा, "राजन! सुहृदों (मित्रों एवं परिजनों) के साथ जाना उचित है, इसमें संदेह नहीं। शीघ्र ही चतुरंगिणी सेना सुसज्जित की जाए। अनेक बहुमूल्य रत्न, धन, धान्य तथा रथ भी साथ ले जाए जाएँ। हे राजन्! हाथी, घोड़े और रथों से भरे हुए यान (वाहन) शीघ्र ही तैयार किए जाएँ और बलवान पैदल सैनिक सन्नद्ध होकर चलें।"
॥ श्लोक १६-१८ ॥
ततो राज्ञो वचः श्रुत्वा वसिष्ठस्य महात्मनः ।
सेना समुद्यता शीघ्रं यथोक्तं नृपतेस्तदा ॥
ततो राजा महातेजा वसिष्ठेन समन्वितः ।
शत्रुघ्नभरताभ्यां च युक्तः प्रायान्मुदा युतः ॥
रामलक्ष्मणयोरर्थे राजा जनकमीश्वरम् ।
दिदृक्षुर्हृष्टया सेनया परिवार्य पुरात् ततः ॥
📖 भावार्थ : महात्मा वसिष्ठ के वचन को सुनकर राजा (दशरथ) के आदेश से तत्काल वैसी ही सेना शीघ्र ही तैयार कर ली गई। तत्पश्चात् महातेजस्वी राजा दशरथ, वसिष्ठ जी के साथ, शत्रुघ्न और भरत सहित, हर्ष से युक्त होकर प्रस्थित हुए। राम और लक्ष्मण के लिए राजा जनक से मिलने की इच्छा से, वे प्रसन्न सेना से घिरे हुए नगर से बाहर निकले।
॥ श्लोक १९-२० ॥
ततः प्रयाते राजेन्द्रे दशरथे महात्मनि ।
सेना सुबहुला राजन् पृष्ठतः समवर्तत ॥
नानाप्रहरणोपेता नानावर्णविभूषिता ।
शुशुभे सा तदा सेना समुद्र इव पर्वणि ॥
📖 भावार्थ : जब राजेन्द्र महात्मा दशरथ चल दिए, तब अत्यन्त विशाल सेना उनके पीछे-पीछे चल रही थी। हे राजन्! वह सेना नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित और विविध वर्णों (रंगों) से विभूषित थी। वह सेना पर्व (अमावस्या या पूर्णिमा) के समुद्र के समान सुशोभित हो रही थी।
🔍 व्याख्या : दशरथ की सेना के वैभव का अद्भुत वर्णन। समुद्र की उपमा सेना के विशाल आकार और गंभीरता को दर्शाती है।

🌳 यात्रा मार्ग का मनोरम वर्णन (श्लोक २१-२६)

॥ श्लोक २१-२३ ॥
नदीः पुप्फुल्लकमलाः सरांसि च सरित्तटान् ।
वनानि च फुल्लद्रुमान् गिरींश्च धातुचित्रितान् ॥
सानूनि च वनोद्देशान् विविधान् पादपान् शुभान् ।
पश्यन्तः प्रययुर्हृष्टा वीराः सेनासमन्विताः ॥
गच्छतस्तस्य राज्ञस्तु दशरथस्य महात्मनः ।
तिस्रो रात्रीः समासाद्य विदेहान् प्राप नारद ॥
📖 भावार्थ : वे वीरगण सेना सहित प्रसन्नतापूर्वक चलते हुए, खिले हुए कमलों वाली नदियों, सरोवरों, नदियों के तटों, पुष्पित वृक्षों वाले वनों, धातुओं से चित्रित पर्वतों, पर्वत के शिखरों, वन के प्रदेशों और अनेक प्रकार के सुन्दर वृक्षों को देखते हुए आगे बढ़े। हे नारद! उस महात्मा राजा दशरथ के इस प्रकार जाने पर तीन रात्रियाँ बीत जाने के बाद वे विदेह देश (मिथिला) में जा पहुँचे।
॥ श्लोक २४-२६ ॥
ततो राजा जनकः श्रुत्वा राजानमायान्तं दशरथं ससैन्यम् ।
हर्षेण युक्तः प्रमुमोद धीमान् यथेन्द्रं वृत्रेण विनिर्जित्य शक्रः ॥
ततः समेत्य प्रयतः स राजा राज्ञा सहर्षं सुहृदा मुदा युतः ।
यथार्हमभ्यर्च्य च तं महात्मना निवेशयामास पुरं महायशाः ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् राजा जनक ने सुना कि राजा दशरथ अपनी सेना के साथ आ रहे हैं। यह सुनकर वे बुद्धिमान राजा हर्ष से भर गए और उसी प्रकार आनन्दित हुए, जैसे वृत्रासुर को जीतकर इन्द्र प्रसन्न हुए थे। तब वे राजा जनक मिलन के लिए आगे बढ़े। हर्षपूर्वक उन सुहृद राजा (दशरथ) से मिलकर, और महात्मा दशरथ को यथोचित अर्चना करके, महायशस्वी जनक उन्हें नगर (मिथिला) में ले गए।
🔍 व्याख्या : राजा जनक का हर्ष इन्द्र के हर्ष से तुलना करके अत्यधिक प्रसन्नता को दर्शाया गया है। उन्होंने स्वयं जाकर दशरथ का स्वागत किया।

🏰 मिथिला में भव्य स्वागत और सत्कार (श्लोक २७-३२)

॥ श्लोक २७-२९ ॥
ततः प्रविश्य नगरं विदेहराजः स राज्ञा सहितो धर्मात्मा ।
पूजयामास राजेन्द्रं वसिष्ठं च महामुनिम् ॥
ऋत्विजश्च महात्मानः शतानन्दं पुरोहितम् ।
ये चान्ये तापसास्तत्र सर्वान् पूजाभ्यपूजयत् ॥
ततः राजा दशरथो वसिष्ठेन समन्वितः ।
जनकेनाभ्यनुज्ञातः प्रविवेश निवेशनम् ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् धर्मात्मा विदेहराज जनक, राजा दशरथ के साथ नगर में प्रवेश करके राजेन्द्र दशरथ, महामुनि वसिष्ठ, महात्मा ऋत्विजों, पुरोहित शतानन्द और वहाँ उपस्थित अन्य तापसों का उचित पूजन किया। तब राजा दशरथ, वसिष्ठ के साथ, जनक की आज्ञा लेकर अपने निवास स्थान (जो उनके लिए निर्धारित किया गया था) में प्रविष्ट हुए।
॥ श्लोक ३०-३२ ॥
स राजा राजभवने विश्रान्तः सह बन्धुभिः ।
राज्ञा जनकमुख्येन पूजितः प्रत्यपूजयत् ॥
ततः प्रभाते विमले कृताह्निकपुरःसरः ।
जनकं द्रष्टुमिच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ ययौ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे बालकाण्डे अष्टषष्ठितमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : राजा दशरथ बन्धुओं सहित राजभवन में विश्राम करके राजा जनक द्वारा पूजित होकर उन्होंने भी यथोचित प्रतिपूजन किया। तत्पश्चात् स्वच्छ प्रभात होने पर, नित्यक्रिया से निवृत्त होकर, राम और लक्ष्मण को देखने की इच्छा से वे (दशरथ) जनक के पास गए। इस प्रकार आर्ष (वाल्मीकीय) श्रीरामायण के बालकाण्ड में अड़सठवाँ सर्ग पूरा होता है।
🔍 व्याख्या : अगले सर्ग में राम-लक्ष्मण से मिलन और विवाह की तैयारियों का वर्णन होगा। इस सर्ग का समापन अगले प्रसंग की भूमिका तैयार करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राजसी वैभव का चित्रण

इस सर्ग में वाल्मीकि ने राजा दशरथ की यात्रा के माध्यम से अयोध्या के राजसी वैभव, सेना के ठाठ और सांस्कृतिक समृद्धि का अद्भुत चित्रण किया है। यह वर्णन उस युग की राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था की झलक प्रदान करता है।

🤝 राजाओं का आदर्श मिलन

दशरथ और जनक का मिलन दो आदर्श राजाओं के बीच मैत्री, सम्मान और स्नेह का प्रतीक है। जनक द्वारा स्वयं नगर से बाहर जाकर दशरथ का स्वागत करना और यथोचित सत्कार करना भारतीय आतिथ्य परंपरा की सर्वोच्च मिसाल है।

👨‍👩‍👦‍👦 परिवार का महत्व

दशरथ का अपने दोनों छोटे पुत्रों – भरत और शत्रुघ्न – को साथ ले जाना यह दर्शाता है कि वे परिवार के सभी सदस्यों को इस शुभ अवसर का भागीदार बनाना चाहते हैं। यह पारिवारिक एकता और स्नेह को रेखांकित करता है।

🌸 प्रकृति का सौंदर्य

इस सर्ग में यात्रा मार्ग के प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन अत्यंत मनोरम है। नदियाँ, कमल, फूलों से लदे वृक्ष, रंग-बिरंगे पर्वत – यह सब यात्रा की शोभा बढ़ाते हैं और पाठक के मन में एक सजीव चित्र उकेरते हैं।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि जीवन के शुभ अवसरों पर परिवार और मित्रों को साथ लेकर हर्ष और उल्लास से मिलना चाहिए। आतिथ्य और सम्मान का भाव ही सभ्य समाज की पहचान है। प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेना और उसकी सराहना करना भी जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे अष्टषष्ठितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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