बाल काण्ड अध्याय 67

राम द्वारा धनुष भंग

बालकाण्ड का सड़सठवाँ सर्ग राम द्वारा शिव-धनुष के भंग का वर्णन करता है। राजा जनक के निमंत्रण पर आए हुए राजाओं और राजकुमारों के समक्ष वह अत्यंत भारी धनुष लाया जाता है। सभी राजा उसे उठाने में असफल हो जाते हैं, तब राम उसे सहजता से उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं और इतना खींचते हैं कि धनुष टूट जाता है। इस घटना से सिद्ध होता है कि राम ही सीता के लिए योग्य वर हैं।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ राजा जनक के आदेश से होता है कि शिव-धनुष को सभा में लाया जाए। पाँच हज़ार बलशाली पुरुष उस अष्टचक्र वाले खट्वा (ठेले) को लेकर आते हैं, जिस पर वह अत्यंत भारी धनुष रखा हुआ है। उसे देखकर सभी राजा और राजकुमार चकित रह जाते हैं। राजा जनक उस धनुष का इतिहास और शर्त बताते हैं कि जो इसे उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता का वर बनेगा। सभी राजा क्रमशः प्रयास करते हैं, परंतु कोई भी उसे हिला तक नहीं पाता। अंत में विश्वामित्र की आज्ञा से राम आगे बढ़ते हैं, सहजता से धनुष उठाते हैं, प्रत्यंचा चढ़ाते हैं और खींचते हुए मध्य से तोड़ देते हैं। धनुष टूटने की भीषण ध्वनि से सभी भयभीत हो जाते हैं, केवल जनक, विश्वामित्र और कुछ ऋषि शांत रहते हैं। जनक आनन्दित होकर कहते हैं कि आज उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और वे सीता का दान राम को करेंगे। फिर वे दशरथ को बुलाने के लिए दूत भेजते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६७

(राम द्वारा धनुष भंग – सीता स्वयंवर की निर्णायक घटना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तषष्ठितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में राजा जनक ने विश्वामित्र को अपने यज्ञ और सीता के स्वयंवर के बारे में बताया था। अब सभी आमंत्रित राजा और राजकुमार सभा में एकत्रित हैं। जनक ने शर्त रखी है कि जो भी शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता का वर बनेगा। यह सर्ग उस ऐतिहासिक क्षण का वर्णन करता है जब राम न केवल उस अटूट धनुष को उठाते हैं, बल्कि उसे मध्य से तोड़ डालते हैं।

🏹 धनुष का सभा में आगमन और उसका स्वरूप (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततो जनक राजर्षिर्विश्वामित्रं महामुनिम् ।
उवाच वचनं श्रुत्वा राघवाणां यशस्करम् ॥
इदं धनुः परं ब्रह्मन् राघवाणां महात्मनाम् ।
येन यज्ञे पुरा राज्ञा देवदत्तं महात्मना ॥
न शक्यमेतदन्येन नरैरुत्तमतेजसा ।
आरोपयितुमप्याजौ किमु मा बन्धनं प्रति ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; जनक राजर्षिः = राजर्षि जनक; विश्वामित्रम् = विश्वामित्र को; महामुनिम् = महामुनि; उवाच = बोले; वचनम् = वचन; श्रुत्वा = सुनकर; राघवाणाम् = राघवों के; यशस्करम् = यश बढ़ाने वाला; इदम् = यह; धनुः = धनुष; परम् = उत्तम; ब्रह्मन् = हे ब्रह्मन्; राघवाणाम् = राघवों के; महात्मनाम् = महात्माओं के; येन = जिसके द्वारा; यज्ञे = यज्ञ में; पुरा = पूर्वकाल में; राज्ञा = राजा द्वारा; देवदत्तम् = देवताओं से प्राप्त; महात्मना = महात्मा ने; न = नहीं; शक्यम् = सम्भव; एतत् = यह; अन्येन = दूसरे के द्वारा; नरैः = मनुष्यों द्वारा; उत्तमतेजसा = उत्तम तेज वाले भी; आरोपयितुम् = चढ़ाना; अपि = भी; आजौ = संग्राम में; किमु = क्या; मा = मत; बन्धनम् = बाँधना; प्रति = प्रति।
📖 भावार्थ : तब राजर्षि जनक महामुनि विश्वामित्र से बोले, "हे ब्रह्मन्! यह उत्तम धनुष राघवों (देवताओं) का है। पूर्वकाल में किसी महात्मा राजा ने इसे यज्ञ के अवसर पर देवताओं से प्राप्त किया था। इसे अन्य मनुष्य, चाहे वे उत्तम तेज वाले ही क्यों न हों, युद्ध में भी नहीं चढ़ा सकते, फिर इसे बाँधने की तो बात ही क्या है।"
🔍 व्याख्या : जनक धनुष की दिव्यता और उसकी अभेद्यता का बखान करते हैं, जिससे सभा में उपस्थित राजाओं के समक्ष इसकी गरिमा स्थापित होती है।
॥ श्लोक ४-५ ॥
तस्याद्भुततमं रूपं दृष्ट्वा राजन् सहस्रशः ।
राजानश्च महाराज विस्मयं परमं गताः ॥
आनिन्युस्ते तदा धनुः शतशोऽथ सहस्रशः ।
न शेकुस्ते समाधातुं राजानः सह सैनिकैः ॥
📖 भावार्थ : उस अद्भुत धनुष के रूप को देखकर हजारों राजा और महाराजा अत्यधिक विस्मित हुए। उन्होंने उस धनुष को सैकड़ों-हजारों प्रयासों से उठाना चाहा, परन्तु वे सब-के-सब सैनिकों सहित उसे स्थापित भी नहीं कर सके।

⚔️ राजाओं के असफल प्रयास और राम का अग्रसर होना (श्लोक ६-१५)

॥ श्लोक ६-१० ॥
तेषां तु प्रयतन्तानां राज्ञां बलसमन्वितानाम् ।
नाशकद्धनुषां मध्ये कोऽपि धनुरुद्धरेत् ॥
ततो विश्वामित्रो वाक्यमुवाच परमर्षभः ।
राम राम महाबाहो धनुरेतत् समुद्धर ॥
इत्युक्तः स तु रामेण सहितः सौमित्रिणा तदा ।
उदतिष्ठन्महातेजा धनुर्मध्ये महाबलः ॥
📖 भावार्थ : बल से युक्त वे सभी राजा प्रयत्न करते रहे, परंतु उनमें से कोई भी उस धनुष को नहीं उठा सका। तब परमर्षभ विश्वामित्र ने वचन कहा, "हे राम! हे महाबाहो! तुम इस धनुष को उठाओ।" ऐसा कहे जाने पर महातेजस्वी राम लक्ष्मण सहित उठे और धनुष के मध्य भाग में जा पहुँचे।
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र को राम की शक्ति पर पूर्ण विश्वास है। वे बिना किसी हिचकिचाहट के राम को आज्ञा देते हैं। राम भी नम्रतापूर्वक आगे बढ़ते हैं।
॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः कोपात् समाविष्टो धनुर्मध्ये महाबलः ।
उद्बबर्ह महातेजा बालचन्द्रनिभं धनुः ॥
चकार सज्यं काकुत्स्थः पश्यतां नृपतेस्तदा ।
बभञ्ज मध्यतश्चापि धनुर्मध्ये महाबलः ॥
तस्य शब्दो महानासीत् पर्वतस्येव दीर्यतः ।
निपेतुर्भूतले सर्वे राजानः सह सैनिकैः ॥
📖 भावार्थ : तब कोप से युक्त महाबली राम ने धनुष के मध्य भाग को पकड़कर उस बालचन्द्र के समान सुन्दर धनुष को उठा लिया। सभी राजाओं के देखते-देखते ककुत्स्थवंशी राम ने उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी और फिर बलपूर्वक उसे मध्य से तोड़ डाला। उसके टूटने से ऐसी भीषण ध्वनि हुई मानो पर्वत फट रहा हो। उस ध्वनि से सभी राजा और उनके सैनिक धरती पर गिर पड़े।
🔍 व्याख्या : राम ने न केवल धनुष उठाया और चढ़ाया, बल्कि उसे तोड़ दिया – जो कि शर्त से भी अधिक था। यह उनके असाधारण बल और दैवीय स्वरूप को दर्शाता है।

👑 राजा जनक की घोषणा और दूतों की प्रस्थान (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः प्रकृतिमापन्नो जनको राजर्षिसत्तमः ।
उवाच वचनं श्रीमान् विश्वामित्रं कृताञ्जलिः ॥
भगवन् देवदेवेश रामस्याद्भुतकर्मणः ।
पूर्णार्थोऽहं महाभाग सीता मे सुप्रजा इति ॥
सीता मे सुता भगवन् लोकादपि विशेषतः ।
रामाय दातुमिच्छामि यदि त्वमनुजानिहि ॥
ततो विश्वामित्रो वाक्यमुवाच परमर्षभः ।
दीयतामानय राजानं दशरथं सुव्रतम् ॥
स त्वरन् प्रेषयामास दूतान् राजर्षिसत्तमः ।
दशरथं सुविख्यातमानयध्वं महीपतेः ॥
📖 भावार्थ : तब सचेत हुए राजर्षि जनक ने हाथ जोड़कर विश्वामित्र से कहा, "हे भगवन्! देवदेवेश्वर! अद्भुत कर्म करने वाले राम के कारण मैं कृतार्थ हो गया। मेरी सीता का सौभाग्य जाग्रत हुआ। हे भगवन्! मेरी पुत्री सीता सबसे विशेष है। मैं उसे राम को देना चाहता हूँ, यदि आप अनुमति दें।" तब परमर्षभ विश्वामित्र ने कहा, "दीजिए। राजा दशरथ को आमंत्रित कीजिए।" तब राजर्षि जनक ने शीघ्र ही दूतों को भेजकर कहा, "सुविख्यात राजा दशरथ को यहाँ ले आओ।"
🔍 व्याख्या : जनक के हर्ष का ठिकाना नहीं है। वे विश्वामित्र से अनुमति लेकर तुरंत दशरथ को बुलाने की व्यवस्था करते हैं।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
ते दूता जनकादेशाच्छीघ्रं गत्वा महीपतिम् ।
ददृशुर्धर्मनिरतं दशरथं सुवर्चसम् ॥
निवेद्य जनकादेशं राज्ञे धर्मभृतां वरः ।
प्रहृष्टवदनाः सर्वे पुनराजग्मुरञ्जसा ॥
श्रुत्वा तु जनकादेशं दशरथः प्रतापवान् ।
वसिष्ठं पुरतो रम्यं कृत्वा प्रायान्महीपतिः ॥
📖 भावार्थ : वे दूत जनक के आदेश से शीघ्र ही जाकर धर्म में तत्पर तेजस्वी राजा दशरथ से मिले। उन्हें जनक का संदेश सुनाकर वे सब प्रसन्न मन से तुरंत लौट आए। प्रतापी दशरथ जनक का निमंत्रण सुनकर वसिष्ठ को आगे करके प्रस्थित हुए।

📖 उपसंहार: बल से बड़ा है सद्गुण

॥ श्लोक २६-३३ ॥
इत्येतत्कथितं वत्स रामस्याद्भुतकर्मणः ।
चरितं पुण्यसंयुक्तं सर्वपापहरं शुभम् ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं रामायणमनुत्तमम् ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत रुद्रलोकं स गच्छति ॥
श्रुत्वा विश्वामित्रकथां पुण्यां रामो दशरथात्मजः ।
विस्मयं परमं गत्वा प्रीत्या चैवं वाक्यमब्रवीत् ॥
भगवन् ब्रह्मबलं दिव्यं क्षत्रबलं तथैव च ।
ब्रह्मबलं महद्ब्रह्मन् क्षत्रबलाद्विशिष्यते ॥
📖 भावार्थ : हे वत्स! इस प्रकार तुमसे अद्भुत कर्म करने वाले राम का यह पवित्र एवं सब पापों को हरने वाला चरित्र कहा गया। जो इस अनुपम रामायण को नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर रुद्रलोक को प्राप्त होता है। इस पवित्र विश्वामित्र की कथा सुनकर दशरथपुत्र राम अत्यन्त विस्मित हुए और प्रसन्नता से यह वाक्य बोले, "हे भगवन्! ब्रह्मबल दिव्य है और क्षत्रबल भी है, परन्तु हे ब्रह्मन्! ब्रह्मबल ही महान है, क्षत्रबल से यही श्रेष्ठ है।"
🔍 व्याख्या : यहाँ राम ब्रह्मबल (आध्यात्मिक शक्ति) की श्रेष्ठता स्वीकार करते हैं। यद्यपि उन्होंने अपने क्षत्रिय बल से धनुष तोड़ा, पर वे जानते हैं कि मूल स्रोत ब्रह्मतेज ही है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏹 राम का बल और विनम्रता

राम ने वह कार्य कर दिखाया जो असंख्य राजा नहीं कर सके, फिर भी उनमें घमंड नहीं है। वे वहाँ विश्वामित्र की आज्ञा से गए और गुरु का सम्मान किया। यह सच्चे वीर का लक्षण है।

💍 सीता स्वयंवर का रहस्य

शिव-धनुष की शर्त के पीछे यह रहस्य था कि केवल वही पुरुष सीता के योग्य है, जो शिव की कृपा और परम शक्ति से सम्पन्न हो। राम ने उसे तोड़कर सिद्ध कर दिया कि वे स्वयं विष्णु हैं और शिव उनके आराध्य हैं।

🌍 सार्वभौमिक संदेश

यह घटना दर्शाती है कि कठिन से कठिन कार्य भी साहस, आत्मविश्वास और गुरु के आशीर्वाद से सम्भव है। राम ने बिना किसी संकोच के धनुष उठाया और अपनी असीम शक्ति का परिचय दिया।

🙏 जनक की भक्ति

जनक का राम के प्रति समर्पण और उनका आनन्द यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति ईश्वर की इच्छा को पहचान लेता है, तो उसका जीवन सार्थक हो जाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्ची वीरता विनम्रता में निहित है। जो स्वयं को सबसे छोटा मानता है, वही सबसे बड़ा कार्य कर सकता है। राम ने गुरु की आज्ञा का पालन किया और संसार को दिखा दिया कि बल का सदुपयोग धर्म की स्थापना के लिए होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे सप्तषष्ठितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।