बाल काण्ड अध्याय 64

विश्वामित्र और रम्भा

बाल काण्ड का चौंसठवाँ सर्ग विश्वामित्र की तपस्या में विघ्न डालने के इन्द्र के प्रयास का वर्णन करता है। तपस्या की अग्नि से भयभीत इन्द्र, अप्सरा रम्भा को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए भेजते हैं। क्रोधित विश्वामित्र रम्भा को शाप दे देते हैं, लेकिन इस घटना से उनकी तपस्या में बाधा आती है और वे अपने क्रोध पर नियंत्रण न रख पाने के कारण पुनः तपस्या का संकल्प लेते हैं।

विवरण

यह सर्ग विश्वामित्र की अटूट तपस्या और उससे उत्पन्न संकटों की गाथा है। हजारों वर्षों की कठोर तपस्या के बाद विश्वामित्र ब्रह्मर्षि पद के निकट पहुँच जाते हैं। उनके तेज से देवराज इन्द्र भयभीत हो जाते हैं और उनकी तपस्या में विघ्न डालने का षड्यंत्र रचते हैं। वे अप्सरा रम्भा को वसंत ऋतु और कामदेव के साथ विश्वामित्र के आश्रम में भेजते हैं, ताकि वे उनका ध्यान भंग कर सकें। रम्भा के मोहक रूप और वातावरण को देखकर विश्वामित्र क्षणभर के लिए आकर्षित होते हैं, लेकिन तुरंत उन्हें इन्द्र की चाल का आभास हो जाता है। क्रोध से आवेशित होकर वे रम्भा को शाप दे देते हैं कि वह सहस्त्रों वर्षों तक पत्थर (शिला) बनी रहेगी। यह शाप देने के बाद विश्वामित्र को अपनी भूल का एहसास होता है कि क्रोध ने उनकी तपस्या को भंग कर दिया। निराश होकर वे अपनी तपस्या को और अधिक कठोर बनाने का संकल्प लेते हुए, क्रोध पर पूर्ण विजय पाने के लिए दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग इन्द्रियों पर विजय और क्रोध जैसे विकारों के आत्म-विकास में बाधक होने का महत्वपूर्ण पाठ सिखाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६४

(विश्वामित्र और रम्भा – क्रोध पर विजय का संकल्प)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुःषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में विश्वामित्र ने हज़ारों वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिससे तीनों लोक तापित होने लगे। उनके इस अद्भुत तेज ने देवराज इन्द्र को चिंतित कर दिया। यह सर्ग इन्द्र द्वारा रचे गए एक नए षड्यंत्र की कथा है, जिसमें उन्होंने अप्सरा रम्भा को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए भेजा। यह घटना विश्वामित्र के क्रोध और उसके परिणामों का गहन मनोवैज्ञानिक चित्रण प्रस्तुत करती है।

👑 देवराज इन्द्र का भय और षड्यंत्र (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
तस्य त्वेवं प्रवृत्तस्य तप उग्रं महात्मनः ।
बभूवुर्हर्षिताः सर्वे देवर्षिपितृदानवाः ॥
स तु राजर्षिरव्यग्रस्तपस्तेपे महामनाः ।
तस्य तेनैव कालेन पूर्णे वर्षशते गते ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
विश्वामित्रं महात्मानं स्पर्धमानमिवौजसा ॥
प्रत्यूषुर्भयसंविग्नाः शक्रमभ्यभ्यचोदयन् ।
बाढमित्येव शक्रस्तु प्रतिज्ञाय महात्मने ॥
विश्वामित्राय कुपितो वरं दास्यन्न मां विना ।
🔹 पदच्छेद : तस्य = उनकी (विश्वामित्र की); तु = तो; एवम् = इस प्रकार; प्रवृत्तस्य = प्रवृत्त हुए; तपः = तपस्या; उग्रम् = उग्र; महात्मनः = महात्मा की; बभूवुः = हो गए; हर्षिताः = हर्षित; सर्वे = सब; देवर्षिपितृदानवाः = देवता, ऋषि, पितर और दानव; सः = वह; तु = तो; राजर्षिः = राजर्षि; अव्यग्रः = बिना विचलित हुए; तपः = तपस्या; तेपे = की; महामनाः = महामना ने; तस्य = उनके; तेन = उसी; एव = ही; कालेन = काल में; पूर्णे = पूर्ण होने पर; वर्षशते = सौ वर्ष; गते = बीत जाने पर; ततः = तब; देवाः = देवता; सगन्धर्वाः = गन्धर्वों सहित; सिद्धाः = सिद्ध; च = और; परमर्षयः = परमर्षि; विश्वामित्रम् = विश्वामित्र को; महात्मानम् = महात्मा को; स्पर्धमानम् = स्पर्धा करते हुए से; इव = जैसे; ओजसा = तेज से; प्रत्यूषुः = डर गए; भयसंविग्नाः = भय से व्याकुल होकर; शक्रम् = इन्द्र को; अभ्यभ्यचोदयन् = बोले (उकसाया); बाढम् = अच्छा; इति = ऐसा; एव = ही; शक्रः = इन्द्र; तु = तो; प्रतिज्ञाय = प्रतिज्ञा करके; महात्मने = महात्मा को; विश्वामित्राय = विश्वामित्र को; कुपितः = क्रोधित होकर; वरम् = वर; दास्यन् = दूँगा; न = नहीं; माम् = मुझे; विना = बिना।
📖 भावार्थ : उस महात्मा राजर्षि विश्वामित्र के इस प्रकार उग्र तपस्या में लग जाने पर सभी देवता, ऋषि, पितर और दानव हर्षित हो गए। वे महामना राजर्षि बिना किसी विचलन के तपस्या करते रहे। उसी प्रकार सौ वर्ष और बीत गए। तब उनके तेज से स्पर्धा करते हुए से प्रतीत होने वाले महात्मा विश्वामित्र को देखकर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और परमर्षि भय से व्याकुल हो गए और उन्होंने इन्द्र से कहा। इन्द्र ने "बहुत अच्छा" कहकर उनसे प्रतिज्ञा की कि मैं क्रोधित होकर महात्मा विश्वामित्र को ऐसा वर दूँगा जो मेरे बिना नहीं दिया जा सकता।
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र की तपस्या इतनी प्रबल हो गई थी कि देवताओं को अपने सिंहासन पर खतरा महसूस होने लगा। इन्द्र का कहना है कि वे ऐसा वर देंगे जो केवल वे (इन्द्रत्व) ही दे सकते हैं, अर्थात विश्वामित्र को उनके पद से हटाने का कोई उपाय।
॥ श्लोक ६-१० ॥
स चिन्तयित्वा तु तदा मुमोह भगवानृषिः ।
रम्भां नाम वरारोहामप्सरसं प्रियंगदाम् ॥
उवाच वचनं चेदं मधुरं मधुरायताम् ।
रम्भे विघ्नं करिष्यामि विश्वामित्रस्य संप्रति ॥
कन्दर्पं च वसन्तं च समीपे संनियोजय ।
मदनेन समेतस्त्वं सर्वावयवसुन्दरि ॥
तपोरतं महात्मानं विश्वामित्रं जितेन्द्रियम् ।
प्रलोभयित्वा रम्भे त्वं मम कार्यं करिष्यसि ॥
एवमुक्ता तु शक्रेण रम्भा प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
नाहं शक्नोमि देवेश कुपितं तं महामुनिम् ॥
📖 भावार्थ : तब भगवान ऋषि (इन्द्र) ने विचार करके, वरारोहा प्रियंगदा नाम की रम्भा नामक अप्सरा को बुलाया और मधुर वाणी में यह वचन कहा, "हे रम्भे! मैं विश्वामित्र का विघ्न करूँगा। हे सर्वांगसुन्दरी! तू कामदेव और वसंत को अपने साथ लेकर जा। मदन (कामदेव) के साथ मिलकर तू उस जितेन्द्रिय महात्मा विश्वामित्र की तपस्या में लगे हुए उन्हें प्रलोभित करके मेरा कार्य कर।" इन्द्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर रम्भा ने हाथ जोड़कर कहा, "हे देवेश! मैं उन कुपित महामुनि के पास जाने को समर्थ नहीं हूँ।
🔍 व्याख्या : रम्भा का डरना स्वाभाविक है। वह पहले ही देख चुकी है कि दूसरे ऋषि क्रोधित होकर क्या कर सकते हैं। वह इस कार्य की कठिनाई और खतरे को समझती है।

🧚 रम्भा की आशंका और प्रयास (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
बिभेमि तस्य धर्मात्मन्विश्वामित्रस्य धीमतः ।
शापाद्देवेश स क्रोधाद्दहेल्लोकान्सदेवकान् ॥
इत्युक्तः प्राह शक्रस्तां मा भै रम्भे शुचिस्मिते ।
अहं कन्दर्पसहितो वसन्तश्च त्वया सह ॥
तिष्ठामो यत्र तपति तापसः संशितव्रतः ।
वसन्तस्य प्रभावाच्च पुष्पिते द्रुमसंकुले ॥
कोकिलानां रुतेनापि नानापक्षिगणेन च ।
मनसो हारिणा चैव तव रूपेण सुन्दरि ॥
विश्वामित्रो महातेजा मयि स्थित्वा न संशयः ।
प्रलोभं यास्यति क्षिप्रं ततः कार्यं भविष्यति ॥
📖 भावार्थ : (रम्भा ने कहा) "हे देवेश! मैं उन धर्मात्मा, बुद्धिमान विश्वामित्र से डरती हूँ। क्रोध में वे अपने शाप से देवताओं सहित तीनों लोकों को जला सकते हैं।" इस प्रकार कहने पर इन्द्र ने उससे कहा, "हे रम्भे! तू मत डर। मैं स्वयं कामदेव और वसंत के साथ तुम्हारे साथ वहाँ उपस्थित रहूँगा, जहाँ यह महान प्रतिज्ञा वाला तापस तपस्या कर रहा है। हे सुन्दरि! वसंत के प्रभाव से वृक्षों पर पुष्प खिलेंगे, कोयल और अनेक पक्षियों के मधुर स्वर गूँजेंगे और तुम्हारे मनोहारी रूप से निश्चय ही महातेजस्वी विश्वामित्र शीघ्र ही प्रलोभित हो जायेंगे, और तब हमारा कार्य सिद्ध हो जाएगा।"
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः प्रायान्महाराज रम्भा शक्रवचः स्मरन् ।
विश्वामित्राश्रमं तस्य कन्दर्पवसन्तसहायिनी ॥
सा प्रविश्याश्रमपदं रम्भा मधुरगामिनी ।
मुमोच विविधान् भावान् रूपयौवनशालिनी ॥
तस्यास्तु तद्वनं सर्वं ननर्तेव मुदा युतम् ।
द्रुमाः पुष्पफलोपेताः कोकिलाः मधुरं जगुः ॥
ततः शुश्राव भगवान् विश्वामित्रो महातपाः ।
रम्भायाश्चरितं सर्वं गीतं च मधुरं तदा ॥
ततः क्रोधसमाविष्टो विश्वामित्रो महातपाः ।
रम्भां शशाप कुपितो बाष्पकण्ठोऽब्रवीदिदम् ॥
📖 भावार्थ : हे महाराज! तब रम्भा, कामदेव और वसंत को सहायक बनाकर, इन्द्र के वचनों को स्मरण करते हुए विश्वामित्र के आश्रम की ओर चल पड़ी। वह मधुर गति वाली, रूप और यौवन से सम्पन्न रम्भा आश्रम में प्रवेश करके अनेक प्रकार के भाव दिखाने लगी। उसके प्रभाव से पुष्प-फलों से युक्त वृक्ष और मधुर गाने वाली कोयलें, सारा वन मानो आनंद से नाचने लगा। तब महातपस्वी भगवान विश्वामित्र ने रम्भा के उस चरित्र और मधुर गीत को सुना। उसे सुनकर महातपस्वी विश्वामित्र क्रोध से भर गए। और क्रोधित होकर, गद्गद् कण्ठ से रम्भा को यह शाप दे दिया।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
यन्मां विलोभयसे रम्भे कामक्रोधजयैषिणम् ।
तस्मात्त्वं दशसाहस्रं वर्षाणि स्थावरा भव ॥
रम्भा तु शापमाकर्ण्य विश्वामित्रस्य धीमतः ।
तत्क्षणादेव सञ्जाता शिला परमशोभना ॥
ततः क्रोधाभिभूतेन विश्वामित्रेण धीमता ।
आत्मापराधजं दुःखं किंचिन्नोक्तं महात्मना ॥
विघ्ने तस्मिन्समुत्पन्ने विश्वामित्रो महातपाः ।
दुःखितः प्ररुरोदोच्चैः स्वां तनुं समवेक्ष्य च ॥
हा धिग्धिङ्मामनात्मानं यस्य मे वशगाः किल ।
क्रोधादयो न वशगाः कृतान्त इव देहिनाम् ॥
📖 भावार्थ : (विश्वामित्र बोले) "हे रम्भे! तू मुझे, जो काम और क्रोध पर विजय पाने का इच्छुक हूँ, प्रलोभित करना चाहती है, इसलिए तू दस हजार वर्षों तक पत्थर (शिला) बनी रहे।" बुद्धिमान विश्वामित्र का यह शाप सुनते ही रम्भा उसी क्षण अत्यंत सुन्दर शिला (चट्टान) बन गई। तब क्रोध से अभिभूत हुए बुद्धिमान विश्वामित्र ने अपने अपराध से उत्पन्न दुःख के कारण कुछ नहीं कहा। वह विघ्न उत्पन्न होने पर महातपस्वी विश्वामित्र दुःखी हुए और अपनी इस दशा (तपोभंग) को देखकर ऊँचे स्वर में विलाप करने लगे। "धिक्कार है मुझे, जो आत्मा को नहीं जीत सका। जिसके क्रोध आदि शत्रु वश में नहीं हैं, वह मनुष्यों के लिए मृत्यु के समान है।"
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र का यह विलाप अत्यंत मार्मिक है। उन्हें एहसास होता है कि इतनी कठोर तपस्या के बाद भी क्रोध ने उन्हें हरा दिया। आत्मग्लानि और निराशा उन्हें घेर लेती है।

🔥 पश्चाताप और नवीन संकल्प (श्लोक २६-३०)

॥ श्लोक २६-३० ॥
न मे क्रोधश्च लोभश्च चित्तमप्यनुवर्तते ।
कथं क्रोधवशं प्राप्तं चित्तं मे पापचेतसः ॥
निवर्तये पुनस्तावद्वर्षाणामयुतं तपः ।
अन्नादविजितक्रोधो वर्तयिष्ये पुनः सुखम् ॥
इत्येवं व्यवसायं तु कृत्वा धर्मभृतां वरः ।
ततः प्राचीं दिशं राजन् जगाम मुनिपुंगवः ॥
तत्र तेपे तपस्तीव्रं निराहारो जितेन्द्रियः ।
वर्षाणामयुतं साग्रं भीमं कर्म समारभत् ॥
📖 भावार्थ : (विश्वामित्र सोचते हैं) "मेरा न तो क्रोध है और न लोभ, फिर भी मेरा चित्त क्रोध के वश में कैसे हो गया? मैं पाप-चित्त हूँ। इसलिए मैं फिर से दस हजार वर्षों तक तपस्या करूँगा, जिससे अन्न (आहार) का त्याग करके और क्रोध पर विजय प्राप्त करके फिर से सुखपूर्वक रहूँगा।" हे राजन्! धर्म का धारण करने वालों में श्रेष्ठ उन मुनिश्रेष्ठ ने ऐसा निश्चय करके फिर पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान किया। वहाँ उन्होंने जितेन्द्रिय होकर, निराहार रहकर, दस हजार वर्षों तक घोर तपस्या की। उन्होंने भयानक कर्म (तप) आरम्भ किया।
🔍 व्याख्या : असफलता से सीख लेते हुए विश्वामित्र अपनी कमजोरी (क्रोध) को पहचानते हैं और उसी पर विजय पाने का दृढ़ संकल्प लेते हैं। यह उनके अदम्य साहस और आत्मसुधार की अद्भुत भावना को दर्शाता है।

📖 उपसंहार: क्रोध पर विजय की आवश्यकता

॥ श्लोक ३१-३५ ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा विश्वामित्रेण वै ।
तपः क्रोधाभिभूतेन रम्भा शप्ता महात्मना ॥
तपश्च परमं कृत्वा प्राप्तो ब्रह्मर्षितां पुनः ।
न हि क्रोधेन महता शक्यं प्राप्तुं महत्पदम् ॥
तस्मात्क्रोधं परित्यज्य सर्वे भावेन तप्यताम् ।
य इदं कीर्तयेद्विद्वान् रम्भाशापं समाहितः ॥
स पाप्मना प्रमुच्येत सर्वपापैः सुदुर्लभैः ।
इतीदं कीर्तितं वत्स विश्वामित्रस्य चेष्टितम् ॥
📖 भावार्थ : हे राम! तुमसे यह सब कहा गया कि कैसे विश्वामित्र ने क्रोध से अभिभूत होकर रम्भा को शाप दिया। और फिर परम तपस्या करके उन्होंने पुनः ब्रह्मर्षिता प्राप्त की। क्योंकि महान क्रोध के द्वारा महान पद (ब्रह्मर्षित्व) प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसलिए क्रोध का त्याग करके सबको भावना सहित तपस्या करनी चाहिए। जो विद्वान् व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर इस रम्भा-शाप का कीर्तन करता है, वह सबसे दुर्लभ पापों से भी मुक्त हो जाता है। हे वत्स! इस प्रकार विश्वामित्र का यह चरित्र कहा गया।
🔍 व्याख्या : इस सर्ग के अंत में फलश्रुति दी गई है कि इस कथा के श्रवण-कीर्तन से पापों से मुक्ति मिलती है। मुख्य संदेश यह है कि क्रोध आध्यात्मिक उन्नति में सबसे बड़ा बाधक है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😤 क्रोध का दोष

यह सर्ग क्रोध को सबसे बड़े आंतरिक शत्रु के रूप में प्रस्तुत करता है। हज़ारों वर्षों की तपस्या के बाद भी क्रोध का एक क्षण सब कुछ नष्ट कर सकता है। विश्वामित्र का पछतावा और क्रोध को "देहिनाम् कृतान्त" (मनुष्यों के लिए मृत्यु) के समान बताना इसकी भयावहता को रेखांकित करता है।

🧘 इन्द्रिय-निग्रह का महत्व

रम्भा के माध्यम से काम और सौंदर्य का प्रलोभन दिया गया। यह दर्शाता है कि इन्द्रियाँ कितनी प्रबल हैं। विश्वामित्र तो काम-भावना में नहीं फंसे, पर क्रोध नामक दूसरी इन्द्रिय (मन) के विकार ने उन्हें जकड़ लिया। सच्ची विजय सभी इन्द्रियों और उनके विकारों पर पूर्ण नियंत्रण से ही मिलती है।

⚡ अटल संकल्प

असफलता विश्वामित्र को तोड़ नहीं पाती, बल्कि उन्हें और मजबूत बनाती है। वे हार स्वीकार करते हैं, उसका कारण समझते हैं, और उसी कारण पर विजय पाने के लिए फिर से और अधिक कठोर तप में जुट जाते हैं। यह अटल संकल्प और आत्म-सुधार की प्रेरणादायक मिसाल है।

🌳 रम्भा का शाप और मुक्ति

यह घटना आगे चलकर रामायण की मुख्य कथा से जुड़ती है। यही शापित शिला (रम्भा) आगे चलकर वाल्मीकि के शाप से वही शिला बनती है? या यह अलग है? परंतु यहाँ यह विश्वामित्र के क्रोध का प्रतीक बनकर रह जाता है। बाद में यह भी मान्यता है कि रम्भा को इसी शाप के कारण अगले जन्म में अहल्या बनना पड़ा, हालाँकि यह व्याख्या पर निर्भर करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग की मुख्य शिक्षा यह है कि आत्म-संयम ही सबसे बड़ा बल है। क्रोध और वासना जैसे विकार मनुष्य की सारी साधना को नष्ट कर सकते हैं। सच्ची महानता बाहरी प्रलोभनों को नजरअंदाज करने में नहीं, बल्कि भीतर उठने वाले क्रोध, अहंकार और आवेश को शांत करने में है। असफलता अंत नहीं है, बल्कि नई शुरुआत का आधार बन सकती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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