बाल काण्ड अध्याय 61

विश्वामित्र की तपस्या और शुनःशेप

बाल काण्ड का इकसठवाँ सर्ग विश्वामित्र द्वारा राम-लक्ष्मण को शुनःशेप आख्यान सुनाने का वर्णन करता है। इसमें राजा अम्बरीष के यज्ञ में शुनःशेप के बलि होने की कथा, विश्वामित्र द्वारा उसे दिए गए मन्त्र तथा उसके उद्धार की घटना का वर्णन है। इस कथा के फलस्वरूप विश्वामित्र ब्रह्मर्षि पद को प्राप्त होते हैं।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ राम और लक्ष्मण के प्रश्न से होता है कि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कैसे बने। तब विश्वामित्र शुनःशेप की प्रसिद्ध कथा सुनाते हैं। राजा अम्बरीष ने राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया, किन्तु इन्द्र यज्ञ पशु को हर ले गए। यज्ञ के निर्विघ्न सम्पन्न होने हेतु ऋत्विजों ने कहा कि या तो वह पशु लाया जाए अथवा किसी मनुष्य का बलिदान दिया जाए। राजा ने बहुत धन देकर ऋषि अजीगर्त से उनके पुत्र शुनःशेप को खरीदा। जब शुनःशेप को यज्ञ की वेदी पर बाँध दिया गया, तब वह देवताओं की स्तुति करने लगा। उस समय महर्षि विश्वामित्र वहाँ उपस्थित थे और उन्होंने शुनःशेप को वे मन्त्र बताए जिनसे उसने इन्द्र आदि देवताओं की स्तुति की। देवता प्रसन्न हुए और शुनःशेप की रक्षा हुई। इस घटना के पश्चात् विश्वामित्र ने और भी कठोर तप किया और अन्ततः ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६१

(विश्वामित्र की तपस्या और शुनःशेप – ब्रह्मर्षित्व की प्राप्ति)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में विश्वामित्र ने अपने राजा से ऋषि बनने के संकल्प की कथा सुनाई थी। अब राम की जिज्ञासा पर वे शुनःशेप का प्रसिद्ध आख्यान सुनाते हैं, जिसके बाद वे ब्रह्मर्षि पद को प्राप्त हुए। यह कथा तपस्या की शक्ति, देवताओं की कृपा और सच्चे मन्त्रों के प्रभाव को दर्शाती है।

🙏 राम की जिज्ञासा और कथा का प्रारम्भ (श्लोक १-४)

॥ श्लोक १-४ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामः सौमित्रिणा सह ।
उवाच वाक्यं धर्मज्ञो विश्वामित्रं महामुनिम् ॥
भगवन् श्रोतुमिच्छामः परं कौतूहलं हि नः ।
यथा भवान् ब्रह्मर्षित्वं प्राप्तवान् तपसा स्वयम् ॥
किमर्थं च परित्यज्य राज्यं च महदैश्वरम् ।
प्रव्रज्या भवता प्राप्ता तन्नो ब्रूहि महामुने ॥
एवमुक्तो महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
प्रोवाच वचनं रामं शुनःशेपस्य यत्कथाम् ॥
🔹 पदच्छेद : तस्य = उनका (विश्वामित्र का); तत् = वह; वचनम् = वचन; श्रुत्वा = सुनकर; रामः = राम; सौमित्रिणा = लक्ष्मण के साथ; सह = सहित; उवाच = बोले; वाक्यम् = वाक्य; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; विश्वामित्रम् = विश्वामित्र को; महामुनिम् = महामुनि; भगवन् = हे भगवन्; श्रोतुम् = सुनने की; इच्छामः = इच्छा रखते हैं; परम् = अत्यधिक; कौतूहलम् = कौतूहल; हि = ही; नः = हमें; यथा = जैसे; भवान् = आप; ब्रह्मर्षित्वम् = ब्रह्मर्षित्व; प्राप्तवान् = प्राप्त किया; तपसा = तपस्या से; स्वयम् = स्वयं; किमर्थम् = किसलिए; च = और; परित्यज्य = त्यागकर; राज्यम् = राज्य को; च = और; महत् = महान; ऐश्वरम् = ऐश्वर्य; प्रव्रज्या = सन्यास; भवता = आपके द्वारा; प्राप्ता = प्राप्त किया गया; तत् = वह; नः = हमें; ब्रूहि = बताइए; महामुने = हे महामुनि; एवम् = इस प्रकार; उक्तः = कहे गए; महातेजाः = महातेजस्वी; विश्वामित्रः = विश्वामित्र; महामुनिः = महामुनि; प्रोवाच = बोले; वचनम् = वचन; रामम् = राम से; शुनःशेपस्य = शुनःशेप की; यत्कथाम् = जो कथा है।
📖 भावार्थ : महामुनि विश्वामित्र के पूर्व कथन को सुनकर धर्मज्ञ राम ने लक्ष्मण के साथ पुनः प्रश्न किया, "हे भगवन्! हम यह सुनना चाहते हैं कि आपने किस प्रकार तपस्या से ब्रह्मर्षित्व प्राप्त किया? किस कारण से आपने राज्य और ऐश्वर्य का त्याग कर संन्यास लिया? यह हमें कृपया बताइए।" महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र ने राम के इस प्रकार पूछने पर शुनःशेप की कथा कहनी आरम्भ की।
🔍 व्याख्या : राम की यह जिज्ञासा सर्ग ५१ की कथा को आगे बढ़ाती है। अब विश्वामित्र ब्रह्मर्षित्व प्राप्ति की सार्थक कथा सुनाते हैं।

🕉️ राजा अम्बरीष का यज्ञ और इन्द्र का विघ्न (श्लोक ५-१२)

॥ श्लोक ५-८ ॥
अम्बरीषो महाराजः पुत्रकामो नराधिपः ।
अयजद्यज्ञं राजर्षिर्बहुवर्षधनायुतम् ॥
तस्य यज्ञस्य चेन्द्रेण हृतः पशुरनन्तरम् ।
ह्रियमाणे पशौ तस्मिन्नृत्विजो राजसत्तमम् ॥
ऊचुस्ते राजशार्दूल नष्टे पशौ नराधिप ।
पुरुषो यज्ञियो राजन् यज्ञस्य परिकल्पताम् ॥
इत्युक्तः स तदा राजा मन्त्रिभिः सह पार्थिवः ।
अन्वियेष महातेजा यज्ञियं पुरुषं प्रभुः ॥
📖 भावार्थ : राजर्षि अम्बरीश नामक महाराजा थे, जिन्होंने पुत्र की कामना से अनेक वर्षों तक चलने वाला और अपार धन से युक्त यज्ञ किया। उस यज्ञ के पशु को इन्द्र ने छीन लिया। जब पशु हर लिया गया, तब ऋत्विजों ने उत्तम राजा से कहा, "हे राजन्! पशु के नष्ट हो जाने पर यज्ञ के लिए किसी मनुष्य की बलि का प्रबन्ध करना चाहिए।" ऐसा कहे जाने पर राजा ने मन्त्रियों के साथ यज्ञ योग्य मनुष्य की खोज प्रारम्भ की।
🔍 व्याख्या : इन्द्र का यह विघ्न देवताओं द्वारा यज्ञ में बाधा डालने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। साथ ही, यह मानव बलि की प्राचीन परम्परा की ओर संकेत करता है, जिसका वर्णन वैदिक साहित्य में मिलता है।

💰 शुनःशेप का क्रय और बलि वेदी पर बंधन (श्लोक १३-१८)

॥ श्लोक १३-१६ ॥
स चचार महीपालो यज्ञियं पुरुषं तदा ।
ददर्श च महातेजा ऋषेः पुत्रं महात्मनः ॥
अजीगर्तस्य पुत्रांस्त्रीन् शुनःशेपं च मध्यमम् ।
तान् दृष्ट्वा राजशार्दूलो हर्षसम्पूर्णलोचनः ॥
गृहाण धनमेतत्त्वं शतं गवां सहस्रशः ।
एकं पुत्रं प्रयच्छस्व यज्ञियं पुरुषं मम ॥
इत्युक्तः स तु राज्ञा तु अजीगर्तो महानृषिः ।
शुनःशेपं ददौ राज्ञे गृहीत्वा धनमुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : राजा अम्बरीश यज्ञ के लिए मनुष्य की खोज करते हुए ऋषि अजीगर्त के पास पहुँचे। अजीगर्त के तीन पुत्र थे, जिनमें मध्यम पुत्र शुनःशेप था। राजा ने अजीगर्त से कहा, "आप यह अपार धन, लाखों गायें लीजिए और मुझे यज्ञ के लिए एक पुत्र दीजिए।" राजा के ऐसा कहने पर महर्षि अजीगर्त ने धन लेकर शुनःशेप को राजा को सौंप दिया।
🔍 व्याख्या : यहाँ पिता द्वारा पुत्र को बेचने की घटना अत्यन्त मार्मिक है। शुनःशेप का बलि के लिए चुना जाना उसकी कर्म-गति को दर्शाता है।
॥ श्लोक १७-१८ ॥
तं नीत्वा यज्ञवाटं तु राजा वै समयोजयत् ।
यूपे निबध्य तं वीरं रक्षोभ्यः समकल्पयत् ॥
स बद्धो यूपमाश्रित्य शुनःशेपो महातपाः ।
दध्यौ देवर्षिदेवानां प्रसादकरणं महत् ॥
📖 भावार्थ : राजा उसे यज्ञशाला में ले गए और यज्ञ के यूप (खम्भे) से बाँधकर राक्षसों (अथवा रक्षोघ्न देवताओं) के लिए उसे अर्पित कर दिया। यूप से बँधे हुए महातपस्वी शुनःशेप ने देवर्षियों और देवताओं को प्रसन्न करने के लिए ध्यान किया।

🕊️ विश्वामित्र का उपदेश और शुनःशेप की स्तुति (श्लोक १९-२२)

॥ श्लोक १९-२२ ॥
तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना विश्वामित्रं तपोधनम् ।
उपास्य ध्यानयोगेन प्रसादयितुमीश्वरम् ॥
स तु दृष्ट्वा महात्मानं विश्वामित्रं तपोधनम् ।
अवन्दत महाभागं प्रणामपरमायनः ॥
तमुवाच महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
वत्स शुनःशेप त्वं मां प्रपन्नो भव सुव्रत ॥
अहं ते रक्षणं वत्स करिष्यामि न संशयः ।
इमं स्तुतिं च देवानां ब्रूहि त्वं यत्नमास्थितः ॥
📖 भावार्थ : तब शुनःशेप को बुद्धि हुई कि वह तपोधन विश्वामित्र का ध्यान करके उन्हें प्रसन्न करें। उसने महात्मा विश्वामित्र को देखकर उन्हें प्रणाम किया। महातेजस्वी विश्वामित्र ने उससे कहा, "वत्स शुनःशेप! तुम मेरी शरण में आओ। मैं निःसन्देह तुम्हारी रक्षा करूँगा। तुम यत्नपूर्वक देवताओं की यह स्तुति करो।"
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र की दया और शक्ति यहाँ प्रकट होती है। वे शुनःशेप को ऐसे मन्त्र प्रदान करते हैं जो देवताओं को आकर्षित करते हैं।

✨ देवताओं की प्रसन्नता और शुनःशेप की मुक्ति (श्लोक २३-२६)

॥ श्लोक २३-२६ ॥
ततः स्तुतिं प्रकुर्वाणो देवानां शुनःशेपकः ।
तोषयामास तान् देवान् स्तुतिभिः परमर्षिभिः ॥
ततः प्रसन्ना वरदा देवाः शुनःशेपं तदा ।
ऊचुः प्रीतमनाः सर्वे वरं वरय पुत्रक ॥
स तु देववराद्राजन् मुक्तो बन्धनबन्धनात् ।
प्राप्तवान् परमां सिद्धिं विश्वामित्रप्रसादतः ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा ब्रह्मर्षिता मया ।
प्राप्ता तपसा वीर्येण शुनःशेपस्य चानघ ॥
📖 भावार्थ : तब शुनःशेप ने देवताओं की स्तुति की और उन परमर्षियों द्वारा रचित स्तुतियों से देवताओं को प्रसन्न किया। तब सभी देवता प्रसन्न होकर वरदान देने को तैयार हुए और बोले, "पुत्र! वर माँग लो।" हे राजन्! उस देववर से बन्धन से मुक्त होकर शुनःशेप ने परम सिद्धि प्राप्त की। यह सब विश्वामित्र की कृपा से हुआ। (अन्त में विश्वामित्र कहते हैं) हे अनघ राम! इस प्रकार तुमसे मेरे द्वारा ब्रह्मर्षित्व प्राप्त करने की सम्पूर्ण कथा कही गई, जो तप, वीर्य और शुनःशेप के कारण हुई।
🔍 व्याख्या : शुनःशेप की मुक्ति के साथ ही विश्वामित्र के तप को भी मान्यता मिलती है। इस घटना के बाद ही उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित किया गया।

📖 उपसंहार: ब्रह्मतेज की विजय और शरणागत की रक्षा

🔱 शरणागत वत्सलता

विश्वामित्र ने शुनःशेप को शरण दी और उसकी रक्षा की। यह सर्ग सिखाता है कि सच्चे तपस्वी का कर्तव्य है कि वह संकटग्रस्त की रक्षा करे।

📿 मन्त्रों की शक्ति

शुनःशेप ने जिन मन्त्रों से देवताओं को प्रसन्न किया, वे आज भी ऋग्वेद में संकलित हैं। मन्त्रों का सही उच्चारण और भावना देवताओं को आकर्षित करती है।

🧘 तपस्या और ब्रह्मर्षित्व

विश्वामित्र की तपस्या को शुनःशेप की घटना से पूर्णता मिली। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि क्षत्रिय होते हुए भी ब्रह्मर्षि बना जा सकता है।

⚖️ धर्म का पालन

राजा अम्बरीष ने ऋत्विजों के आदेश का पालन किया, परन्तु शुनःशेप के उद्धार से यज्ञ सफल हुआ। धर्म की रक्षा के लिए नये मार्ग भी बनते हैं।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग बताता है कि सच्ची तपस्या और दया से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। शरणागत की रक्षा करना परम धर्म है। विश्वामित्र ने शुनःशेप को मन्त्रोपदेश देकर न केवल उसके प्राण बचाए, बल्कि स्वयं ब्रह्मर्षित्व के शिखर पर पहुँचे।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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