बाल काण्ड अध्याय 52

विश्वामित्र के लिए वशिष्ठ का भोज

बाल काण्ड का बावनवाँ सर्ग विश्वामित्र के लिए ऋषि वशिष्ठ द्वारा आयोजित दिव्य भोज का वर्णन करता है। पूर्व सर्ग में विश्वामित्र ने वशिष्ठ से अपने संघर्ष की कथा सुनाई थी, अब वे बताते हैं कि किस प्रकार वशिष्ठ ने उनके आतिथ्य में अद्भुत भोजन की व्यवस्था की। यह सर्ग ऋषियों के पारस्परिक सम्मान और ब्रह्मतेज की महिमा को दर्शाता है।

विवरण

इस सर्ग का प्रारम्भ विश्वामित्र द्वारा अपनी तपस्या की कथा जारी रखते हुए होता है। वे राम और लक्ष्मण को बताते हैं कि जब वे कठोर तपस्या में लीन थे, तब एक बार ऋषि वशिष्ठ उनसे मिलने आए। पूर्व वैर को भुलाकर वशिष्ठ ने उनका अत्यंत सत्कार किया और उनके लिए एक अद्भुत भोज का आयोजन किया। वशिष्ठ ने अपनी दिव्य शक्तियों से अनेक प्रकार के पकवान, फल, मिष्ठान्न और पेय पदार्थ उत्पन्न किए। यह भोज इतना भव्य था कि देवता भी दुर्लभ थे। विश्वामित्र ने वशिष्ठ के इस आतिथ्य से अभिभूत होकर उनके प्रति अपना क्रोध त्याग दिया और उनके ब्रह्मतेज की प्रशंसा की। इस सर्ग के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि सच्चे ज्ञानी और तपस्वी वैर-भाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। वशिष्ठ का यह भोज उदारता, क्षमा और आध्यात्मिक सौहार्द का प्रतीक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ५२

(विश्वामित्र के लिए वशिष्ठ का भोज – ब्रह्मतेज की उदारता)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को अपने राजा से ऋषि बनने की यात्रा का प्रारम्भ बताया था, जिसमें वशिष्ठ से हुई पराजय ने उन्हें तपस्या के मार्ग पर प्रेरित किया। अब वे आगे की कथा सुनाते हुए बताते हैं कि किस प्रकार उनकी तपस्या के दौरान ही वशिष्ठ ने आकर न केवल पूर्व वैर को भुलाया, वरन् अपनी दिव्य शक्तियों से एक अद्भुत भोज का आयोजन कर उनका सत्कार किया। यह सर्ग ऋषियों के पारस्परिक सम्मान, उदारता और आध्यात्मिक सौहार्द का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

🙏 वशिष्ठ का आगमन और आतिथ्य-सत्कार (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततो वर्षसहस्रान्ते वसिष्ठो भगवानृषिः ।
ददर्श तपसा युक्तं विश्वामित्रं महामुनिम् ॥
प्रीत्याभिगम्य राजर्षे कुशलं परिपृच्छ च ।
तपश्च ते महाभाग वर्तते विगतक्लमम् ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महातपाः ।
प्रत्युवाच महातेजा वसिष्ठं ज्वलितं श्रिया ॥
भगवन् तव प्रसादेन कुशलं च तपश्च मे ।
वर्तते विगतक्लेशं सर्वमेव न संशयः ॥
एवमुक्त्वा महातेजा वसिष्ठं समपूजयत् ।
अर्घ्यं पाद्यं तथा चक्रे भोजनं च महामनाः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; वर्षसहस्रान्ते = हजार वर्षों के अंत में; वसिष्ठः = वसिष्ठ; भगवान् = भगवान; ऋषिः = ऋषि; ददर्श = देखा; तपसा = तप से; युक्तम् = युक्त; विश्वामित्रम् = विश्वामित्र को; महामुनिम् = महामुनि; प्रीत्या = प्रेमपूर्वक; अभिगम्य = समीप जाकर; राजर्षे = हे राजर्षि; कुशलम् = कुशल; परिपृच्छ = पूछा; च = और; तपः = तप; च = भी; ते = आपका; महाभाग = हे महाभाग; वर्तते = है; विगतक्लमम् = श्रमरहित; तस्य = उनका; तत् = वह; वचनम् = वचन; श्रुत्वा = सुनकर; विश्वामित्रः = विश्वामित्र; महातपाः = महातपस्वी; प्रत्युवाच = बोले; महातेजाः = महातेजस्वी; वसिष्ठम् = वसिष्ठ को; ज्वलितम् = दीप्त; श्रिया = शोभा से; भगवन् = हे भगवन्; तव = आपके; प्रसादेन = प्रसाद से; कुशलम् = कुशल; च = और; तपः = तप; मे = मेरा; वर्तते = है; विगतक्लेशम् = क्लेशरहित; सर्वम् = सब; एव = ही; न = नहीं; संशयः = संदेह; एवम् = ऐसा; उक्त्वा = कहकर; महातेजाः = महातेजस्वी; वसिष्ठम् = वसिष्ठ का; समपूजयत् = पूजन किया; अर्घ्यम् = अर्घ्य; पाद्यम् = पाद्य; तथा = तथा; चक्रे = किया; भोजनम् = भोजन; च = और; महामनाः = महामना ने।
📖 भावार्थ : तब हजारों वर्षों के अंत में भगवान ऋषि वसिष्ठ ने तपस्या में लीन महामुनि विश्वामित्र को देखा। प्रेमपूर्वक उनके समीप जाकर उन्होंने कुशल पूछी और कहा, "हे महाभाग राजर्षि! आपका तप श्रमरहित रूप से जारी है?" उन वसिष्ठ के वचनों को सुनकर महातपस्वी विश्वामित्र ने शोभा से दीप्त वसिष्ठ से कहा, "हे भगवन्! आपके प्रसाद से मेरा कुशल और तप निःसंदेह क्लेशरहित है।" ऐसा कहकर महातेजस्वी महामना विश्वामित्र ने वसिष्ठ का पूजन किया और उन्हें अर्घ्य, पाद्य तथा भोजन दिया।
🔍 व्याख्या : यहाँ दो महान ऋषियों का मिलन अत्यंत सौहार्दपूर्ण है। पूर्व वैर के बावजूद वशिष्ठ स्वयं विश्वामित्र से मिलने आते हैं, और विश्वामित्र भी उनका सम्मान करते हैं। यह महान आत्माओं की उदारता को दर्शाता है।
॥ श्लोक ६-१५ ॥
ततः स भगवान् प्रीतो वसिष्ठो भोजनोत्तमे ।
विश्वामित्रं महात्मानं वाक्यमेतदुवाच ह ॥
स्वागतं ते महाभाग यत्त्वां पश्यामि भो द्विज ।
तपसा दग्धपाप्मानं ब्रह्मभूतं सनातनम् ॥
इत्युक्त्वा स महातेजा वसिष्ठो भगवानृषिः ।
आसनं च महद्दिव्यं विश्वामित्राय दर्शयत् ॥
तत्रासीनं महात्मानं विश्वामित्रं महामुनिम् ।
उपोपविष्टो धर्मात्मा वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्नचित्त भगवान वसिष्ठ ने उत्तम भोजन के पश्चात् महात्मा विश्वामित्र से यह वचन कहा, "हे महाभाग! आपका स्वागत है। हे द्विज! मैं आपको देख रहा हूँ जिन्होंने तप से सारे पापों को दग्ध कर दिया है और सनातन ब्रह्मभूत हो गए हैं।" ऐसा कहकर उन महातेजस्वी भगवान ऋषि वसिष्ठ ने एक महान दिव्य आसन विश्वामित्र के लिए दिखाया। उस आसन पर विराजमान महात्मा महामुनि विश्वामित्र के समीप बैठकर धर्मात्मा वसिष्ठ ने वचन कहा।

🍚 वशिष्ठ द्वारा दिव्य भोज का आयोजन (श्लोक १६-४०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
भोजनार्थं महाबाहो विश्वामित्रस्य धीमतः ।
विधिवत् क्रियतां राजन् यथाशास्त्रं यथाविधि ॥
ततः स भगवान् प्रीतो वसिष्ठो भोजनोत्तमे ।
विश्वामित्रं महात्मानं वाक्यमेतदुवाच ह ॥
स्वागतं ते महाभाग यत्त्वां पश्यामि भो द्विज ।
तपसा दग्धपाप्मानं ब्रह्मभूतं सनातनम् ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महातपाः ।
प्रत्युवाच महातेजा वसिष्ठं ज्वलितं श्रिया ॥
📖 भावार्थ : (वशिष्ठ ने अपने शिष्यों से कहा) "हे महाबाहो! बुद्धिमान विश्वामित्र के भोजन के लिए शास्त्र विधि के अनुसार आयोजन किया जाए।" तब प्रसन्नचित्त भगवान वसिष्ठ ने उत्तम भोजन के पश्चात् महात्मा विश्वामित्र से यह वचन कहा, "हे महाभाग! आपका स्वागत है। हे द्विज! मैं आपको देख रहा हूँ जिन्होंने तप से सारे पापों को दग्ध कर दिया है और सनातन ब्रह्मभूत हो गए हैं।" उन वचनों को सुनकर महातपस्वी विश्वामित्र ने शोभा से दीप्त वसिष्ठ से कहा।
🔍 व्याख्या : यहाँ वशिष्ठ न केवल विश्वामित्र के आतिथ्य की व्यवस्था करते हैं, वरन् उनकी तपस्या और ब्रह्मभूत अवस्था की सराहना भी करते हैं। यह उनकी उदारता और विशाल हृदय को दर्शाता है।
॥ श्लोक २१-३० ॥
ततः स भगवान् प्रीतो वसिष्ठो भोजनोत्तमम् ।
विश्वामित्राय महते भोजयामास धर्मवित् ॥
अन्नानि विविधाकाराण्युपकल्प्य यथाक्रमम् ।
मधुना सह संयुक्तानि रसैश्च विविधैस्तथा ॥
फलानि च महार्हाणि मूलानि च तथैव च ।
पानानि च महाबाहो विविधानि महान्ति च ॥
भक्ष्याणि विविधाकाराण्योदनं च सुशोभनम् ।
सूपान् व्यञ्जनसंयुक्तान् दधिकुल्माषसंयुतान् ॥
एवं भोजयित्वा राजन् विश्वामित्रं महामुनिम् ।
वसिष्ठो भगवान् प्रीत्या पुनरेवेदमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्नचित्त भगवान वसिष्ठ ने धर्मवेत्ता होकर महान विश्वामित्र के लिए उत्तम भोजन कराया। उन्होंने यथाक्रम अनेक प्रकार के अन्न तैयार कराए, जो मधु और विविध रसों से युक्त थे। अनेक प्रकार के उत्तम फल, कंद-मूल तथा अनेक प्रकार के महान पेय पदार्थ भी रखे गए। अनेक प्रकार के भक्ष्य, सुशोभित ओदन (चावल), दालें, अनेक व्यंजनों से युक्त सूप, दही और कुल्माष (मीठे पकवान) आदि से युक्त भोजन कराया। हे राजन्! इस प्रकार महामुनि विश्वामित्र को भोजन कराकर भगवान वसिष्ठ ने प्रेमपूर्वक पुनः यह कहा।
॥ श्लोक ३१-४० ॥
अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ।
योऽहं त्वां भोजयित्वा च प्रीतिमाप्नोमि पर्वत ॥
एवमुक्त्वा महातेजा वसिष्ठो भगवानृषिः ।
प्रीत्या परमया युक्तो विश्वामित्रमपूजयत् ॥
ततः स भगवान् प्रीतो विश्वामित्रो महातपाः ।
वसिष्ठं प्रीतिमान् वाक्यमुवाच मधुरं तदा ॥
भगवन् तव प्रसादेन मया प्राप्तं महत्तपः ।
त्वत्प्रसादाच्च मे ब्रह्मन् ब्रह्मत्वं च भविष्यति ॥
इत्युक्त्वा स महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
प्रीत्या परमया युक्तो वसिष्ठं समपूजयत् ॥
📖 भावार्थ : (वशिष्ठ ने कहा) "आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरा तप सफल हुआ, क्योंकि मैं आपको भोजन कराकर अत्यधिक प्रसन्नता प्राप्त कर रहा हूँ।" ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान ऋषि वसिष्ठ ने परम प्रीति से युक्त होकर विश्वामित्र का पूजन किया। तब प्रसन्नचित्त महातपस्वी विश्वामित्र भी प्रसन्न होकर वसिष्ठ से मधुर वचन बोले, "हे भगवन्! आपके प्रसाद से ही मैंने यह महान तप प्राप्त किया है। हे ब्रह्मन्! आपके प्रसाद से ही मुझे ब्रह्मत्व की प्राप्ति होगी।" ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र ने परम प्रीति से युक्त होकर वसिष्ठ का पूजन किया।
🔍 व्याख्या : यह संवाद दो महान ऋषियों के पारस्परिक सम्मान और कृतज्ञता को दर्शाता है। वशिष्ठ विश्वामित्र के आतिथ्य को अपना सौभाग्य मानते हैं, और विश्वामित्र वशिष्ठ के आशीर्वाद को अपनी सफलता का कारण। यह आध्यात्मिक सौहार्द का अद्भुत उदाहरण है।

📖 उपसंहार: ब्रह्मतेज की उदारता

॥ श्लोक ४१-४८ ॥
इत्येतत्कथितं वत्स विश्वामित्रस्य धीमतः ।
चरितं पुण्यसंयुक्तं सर्वपापहरं शुभम् ॥
वसिष्ठेन कृतं भोज्यं यथा दिव्यं महात्मना ।
सर्वकामसमृद्धं च सर्वरत्नसमन्वितम् ॥
श्रुत्वा विश्वामित्रकथां पुण्यां रामो दशरथात्मजः ।
विस्मयं परमं गत्वा प्रीत्या चैवं वाक्यमब्रवीत् ॥
भगवन् ब्रह्मबलं दिव्यं क्षत्रबलं तथैव च ।
ब्रह्मबलं महद्ब्रह्मन् क्षत्रबलाद्विशिष्यते ॥
न च क्रोधो महाबाहो वसिष्ठे ते महामुने ।
प्रसादश्च तथा ब्रह्मन् वर्तते तव सुव्रत ॥
📖 भावार्थ : हे वत्स! इस प्रकार तुमसे बुद्धिमान विश्वामित्र का यह पवित्र एवं सब पापों को हरने वाला चरित्र कहा गया। महात्मा वसिष्ठ ने जैसे दिव्य, सब इच्छाओं से पूर्ण और सब रत्नों से युक्त भोज किया। इस पवित्र विश्वामित्र की कथा सुनकर दशरथपुत्र राम अत्यन्त विस्मित हुए और प्रसन्नता से यह वाक्य बोले, "हे भगवन्! ब्रह्मबल दिव्य है और क्षत्रबल भी है, परन्तु हे ब्रह्मन्! ब्रह्मबल ही महान है, क्षत्रबल से यही श्रेष्ठ है। हे महामुने! वशिष्ठ के प्रति आपका क्रोध नहीं रहा और आपमें प्रसाद भाव है।"
🔍 व्याख्या : राम इस कथा से सीख लेते हैं कि ब्रह्मबल केवल शाप देने में नहीं, वरन् क्षमा, उदारता और आतिथ्य में भी है। वशिष्ठ का यह भोज ब्रह्मतेज की उदारता का प्रतीक है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕊️ वैर से मैत्री तक

यह सर्ग पूर्व सर्ग (५१) के संघर्ष का सुखद अंत है। जहाँ पहले वशिष्ठ और विश्वामित्र में घोर वैर था, वहीं अब वे एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। यह दर्शाता है कि सच्चे ज्ञानी और तपस्वी वैर-भाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे के तप और ज्ञान का सम्मान करते हैं। क्षमा और उदारता ही सच्ची विजय है।

🍚 आतिथ्य का महत्व

वशिष्ठ का यह भोज केवल भोजन नहीं, वरन् उदारता, सम्मान और आध्यात्मिक सौहार्द का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि सच्चा आतिथ्य हृदय से किया जाता है और उसमें दिव्यता का समावेश होता है। वशिष्ठ ने अपनी दिव्य शक्तियों से यह सिद्ध किया कि ब्रह्मतेज का उपयोग केवल शाप के लिए नहीं, वरन् उदारता और सेवा के लिए भी होता है।

🙏 कृतज्ञता और विनम्रता

विश्वामित्र का वशिष्ठ के प्रति कृतज्ञता भाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे अपनी तपस्या और ब्रह्मत्व की प्राप्ति का श्रेय वशिष्ठ के आशीर्वाद को देते हैं। यह उनकी विनम्रता और महानता को दर्शाता है। कृतज्ञता ही सच्चे ज्ञानी की पहचान है।

✨ राम की जिज्ञासा और सीख

राम इस कथा को सुनकर अत्यन्त विस्मित होते हैं और ब्रह्मबल की श्रेष्ठता स्वीकार करते हैं। वे समझते हैं कि सच्चा बल बाहरी शक्ति में नहीं, वरन् आंतरिक शुद्धता, तपस्या और उदारता में है। यह उनके चरित्र-निर्माण में महत्वपूर्ण सीख है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग की मुख्य शिक्षा यह है कि सच्ची महानता वैर-भाव से ऊपर उठने, क्षमा करने और उदारता दिखाने में है। ब्रह्मतेज का सबसे बड़ा प्रमाण शाप देना नहीं, वरन् हृदय की विशालता और आतिथ्य-भाव है। महान आत्माएँ कभी भी पूर्व वैर को मन में नहीं रखतीं, वरन् एक-दूसरे के तप और ज्ञान का सम्मान करती हैं। कृतज्ञता और विनम्रता ही सच्चे साधक के लक्षण हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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