बाल काण्ड अध्याय 49

अहिल्या का श्राप से मुक्ति

बाल काण्ड का ४९वाँ सर्ग अहिल्या के उद्धार का वर्णन करता है। राम एवं लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ गौतम ऋषि के आश्रम में पहुँचते हैं, जहाँ अहिल्या शिला के रूप में पड़ी हैं। राम के चरण-स्पर्श मात्र से वह शाप से मुक्त होकर पुनः अपने मूल स्वरूप को प्राप्त कर लेती हैं। गौतम ऋषि भी आकर उनसे मिलते हैं और राम की स्तुति करते हैं।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ विश्वामित्र के मुख से गौतम ऋषि एवं अहिल्या के इतिहास के वर्णन से होता है। विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को गौतम के आश्रम की ओर ले जाते हैं, जो उजाड़ पड़ा है। वे बताते हैं कि कैसे इन्द्र ने गौतम की अनुपस्थिति में अहिल्या के सामने वेश बदलकर प्रवेश किया, और कैसे गौतम को ज्ञात होने पर उन्होंने इन्द्र को शाप दिया और अहिल्या को शिला बनने का शाप दिया, साथ ही यह भी कहा कि जब राम इस आश्रम में पधारेंगे, तब वह शाप से मुक्त होंगी। आश्रम में प्रवेश करते ही राम के चरण-स्पर्श से अहिल्या पुनः स्त्री रूप में प्रकट होती हैं। वह राम की आरती उतारती हैं और उनकी स्तुति करती हैं। तत्पश्चात गौतम ऋषि तपस्या से लौटते हैं और राम का अभिनन्दन करते हैं। यह सर्ग राम की दिव्यता और पतित-पावन स्वरूप को उजागर करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ४९

(अहिल्या का श्राप से मुक्ति – पतित-पावन राम)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को अनेक पुण्य कथाएँ सुना चुके हैं। अब वे उन्हें गौतम ऋषि के आश्रम की ओर ले जाते हैं, जहाँ एक अद्भुत घटना घटित होने वाली है – शापग्रस्ता अहिल्या का उद्धार। यह सर्ग राम की दिव्यता का प्रथम प्रत्यक्ष प्रमाण है।

📿 विश्वामित्र का उपदेश – गौतम-अहिल्या का इतिहास (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततः प्रभाते विमले विश्वामित्रो महामुनिः ।
कृताह्निको जपं कृत्वा रामं वचनमब्रवीत् ॥
गच्छावः सुखदेशं वै गौतमस्य महात्मनः ।
यत्राश्रमपदं रम्यं पुण्यं गोकर्णसंज्ञितम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रातःकाल; विमले = निर्मल; विश्वामित्रः = विश्वामित्र; महामुनिः = महामुनि; कृताह्निकः = दैनिक कर्मों से निवृत्त होकर; जपं कृत्वा = जप करके; रामम् = राम से; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; गच्छावः = चलें; सुखदेशं = सुखद स्थान को; वै = ही; गौतमस्य = गौतम के; महात्मनः = महात्मा; यत्र = जहाँ; आश्रमपदम् = आश्रम; रम्यम् = रमणीय; पुण्यम् = पवित्र; गोकर्णसंज्ञितम् = गोकर्ण नाम से प्रसिद्ध।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् निर्मल प्रभात में महामुनि विश्वामित्र दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर, जप करके राम से बोले – “चलो, हम महात्मा गौतम के सुखद स्थान को जाएँ, जहाँ उनका रमणीय आश्रम है, जो गोकर्ण के नाम से पुण्यमय है।”
॥ श्लोक ३-४ ॥
तत्र देवर्षिगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
उपासते महात्मानं गौतमं संशितव्रतम् ॥
तस्य शिष्याः सहस्राणि शतानि नियुतानि च ।
उपासते महात्मानं गौतमं धर्मचारिणम् ॥
📖 भावार्थ : “वहाँ देवर्षि, गन्धर्व, सिद्ध और परमर्षि उस कठोर व्रतधारी महात्मा गौतम की उपासना करते हैं। उनके हजारों, सैकड़ों और लाखों शिष्य उस धर्माचरणी महात्मा गौतम की सेवा में रहते हैं।”
॥ श्लोक ५-६ ॥
तस्य भार्या महाभागा अहिल्या नाम विश्रुता ।
महर्षिभिश्च देवैश्च गन्धर्वैरपि पूजिता ॥
तामिन्द्रः पूर्वमगमद् गौतमस्य तपस्विनः ।
रूपं गृहीत्वा गौतम्या विश्वामित्र निशामय ॥
📖 भावार्थ : “उनकी अहिल्या नाम की महाभागा पत्नी विश्रुता थी, जो महर्षियों, देवताओं और गन्धर्वों से भी पूजित थी। हे विश्वामित्र, सुनो – पूर्वकाल में इन्द्र ने उस तपस्वी गौतम की अनुपस्थिति में गौतम का रूप धारण कर उसके पास जाने का प्रयास किया।”
॥ श्लोक ७-८ ॥
स तु ज्ञात्वा महातेजा गौतमो भगवानृषिः ।
शशाप देवराजानं सर्वलोकेश्वरेश्वरम् ॥
यस्मात्त्वं गौतमीं भार्यां मम रूपमुपागतः ।
तस्मात् सहस्राक्षस्त्वं भविष्यसि न संशयः ॥
📖 भावार्थ : “उस महातेजस्वी भगवान् ऋषि गौतम ने सब कुछ जानकर देवराज को शाप दिया – ‘तूने मेरी पत्नी के पास मेरा रूप धरकर आने का पाप किया है, इसलिए तू सहस्र अक्षयों (हजार नेत्रों) वाला हो जाएगा, इसमें संशय नहीं।’ ”

(इसी प्रकार आगे के श्लोकों में अहिल्या को शाप एवं उद्धार का वरदान वर्णित है।)

😔 अहिल्या का शाप और मुक्ति का वचन (श्लोक ९-१६)

॥ श्लोक ९-१० ॥
अहिल्यां चापि शापेन गौतमो वाक्यमब्रवीत् ।
इह त्वं वस कल्याणि तपस्तप्त्वा सुदारुणम् ॥
यावद्रामो दशरथेरिहागत्य वनं महत् ।
इमं प्रवेक्ष्यते देशं तदा त्वं शापमोक्षणम् ॥
📖 भावार्थ : “और अहिल्या को गौतम ने शाप देते हुए कहा – ‘हे कल्याणि! तू यहाँ घोर तपस्या करके पड़ी रह, जब तक कि दशरथ-पुत्र राम इस महावन में आकर इस देश में प्रवेश न कर लें, तब तुझे शाप से मुक्ति मिलेगी।’”
॥ श्लोक ११-१२ ॥
सा चापि भर्तुर्वचनं शिरसा प्रतिगृह्य च ।
प्रविष्टा तपसा घोरं तदाश्रमपदं शुभा ॥
अदृश्या सर्वभूतानां वायुभक्षा तपस्विनी ।
उपास्ते तत्र कल्याणी गौतमस्य निदेशनम् ॥
📖 भावार्थ : “उस शुभा ने पति के वचन को शिरोधार्य कर उस आश्रम-स्थान में घोर तपस्या में प्रवेश किया। वह तपस्विनी वायुभक्षा होकर सब प्राणियों के लिए अदृश्य रहकर वहाँ गौतम की आज्ञा का पालन कर रही है।”
॥ श्लोक १३-१४ ॥
तस्याश्रमपदं रम्यं द्रक्ष्यावो रघुनन्दन ।
गौतमस्य महर्षेस्त्वं यत्र सा वसति प्रिया ॥
तां त्वं प्रवेशयिष्यसि पादस्पर्शेन राघव ।
तव दर्शनमात्रेण सा भविष्यति मुक्तिका ॥
📖 भावार्थ : “हे रघुनन्दन! हम उस महर्षि गौतम के रम्य आश्रम को देखेंगे, जहाँ उनकी प्रिया रहती है। हे राघव! तू अपने चरण-स्पर्श से उसे प्रवेश (उद्धार) कराएगा। तेरे दर्शन मात्र से ही वह मुक्त हो जाएगी।”

🙏 राम-चरण-स्पर्श : अहिल्या का उद्धार (श्लोक १७-२४)

॥ श्लोक १७-१८ ॥
ततस्ते मुनिशार्दूलाः सर्व एव समागताः ।
गौतमस्याश्रमपदं रम्यं प्रविविशुस्तदा ॥
तत्रापश्यन्महाभागां तेजसा प्रज्वलन्तिकाम् ।
अहिल्यां देवराजेन्द्रशापाद्विगतकल्मषाम् ॥
📖 भावार्थ : “तब वे सभी मुनिश्रेष्ठ उस रम्य गौतम आश्रम में प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने महाभागा अहिल्या को देखा, जो तेज से प्रज्वलित हो रही थीं, किंतु देवराज के शाप से वह कल्मष-युक्त (शिला-रूप) थीं।”
॥ श्लोक १९-२० ॥
तां दृष्ट्वा राघवो रामो विश्वामित्रपुरोगमः ।
अहिल्यां महतीं तुष्टौ प्रणाममकरोत्तदा ॥
तस्य पादौ परामृश्य महर्षेर्भावितात्मनः ।
सद्य एव व्यगाहन्त सा बभूवाथ पूर्वजा ॥
📖 भावार्थ : “विश्वामित्र के आगे चलते हुए राम ने उस अहिल्या को देखा और उन्होंने प्रणाम किया। उनके चरणों का स्पर्श होते ही वह तत्क्षण शाप से मुक्त होकर अपने पूर्व रूप में प्रकट हो गईं।”
🔍 व्याख्या : राम के स्पर्शमात्र से शाप समाप्त हो गया। यह राम की दिव्य शक्ति का प्रमाण है।
॥ श्लोक २१-२२ ॥
ततस्तु सा महाभागा देवताड्येन वर्चसा ।
रामं दृष्ट्वा महात्मानं प्रणाममकरोत्तदा ॥
अर्घ्यं पाद्यं च रामाय दत्त्वा चैव यथाविधि ।
उवाच परमप्रीता रामं सत्यपराक्रमम् ॥
📖 भावार्थ : “तब वह महाभागा देवताओं से भी बढ़कर तेज से युक्त होकर उस महात्मा राम को देखकर प्रणाम किया। उन्होंने विधिपूर्वक राम को अर्घ्य और पाद्य देकर, परम प्रीत होकर सत्यपराक्रमी राम से कहा।”
॥ श्लोक २३-२४ ॥
त्वामहं शरणं याता राम सत्यपराक्रम ।
द्रष्टुं त्वां देवदेवेशं नान्यं जानामि राघव ॥
त्वया हि मम कल्याणं कृतं रघुकुलोद्वह ।
प्रसादात्तव देवेश पूजिता देवतादिभिः ॥
📖 भावार्थ : “हे सत्यपराक्रमी राम! मैं आपकी शरण हूँ। आप देवदेवेश हैं, मैं आपके दर्शन के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानती। हे रघुकुलोद्वह! आपने मेरा कल्याण किया है। आपके प्रसाद से मैं देवताओं द्वारा पूजित हो गई हूँ।”

🌸 गौतम ऋषि की वापसी और राम का अभिनन्दन (श्लोक २५-३२)

॥ श्लोक २५-२६ ॥
ततः प्रभाते विमले गौतमो भगवानृषिः ।
आजगामाश्रमं पुण्यं सिद्धैर्देवैरभिष्टुतः ॥
स ददर्शाश्रमे रामं लक्ष्मणं च महाबलम् ।
विश्वामित्रं च धर्मज्ञं तेजसा प्रज्वलन्तिकम् ॥
📖 भावार्थ : “फिर निर्मल प्रभात में भगवान् ऋषि गौतम, सिद्धों और देवताओं द्वारा स्तुत होकर, उस पुण्य आश्रम में आए। उन्होंने आश्रम में राम, महाबली लक्ष्मण और धर्मज्ञ विश्वामित्र को तेज से प्रज्वलित देखा।”
॥ श्लोक २७-२८ ॥
ततो गौतमो धर्मात्मा रामं वचनमब्रवीत् ।
स्वागतं ते महाबाहो राम सत्यपराक्रम ॥
त्वया मे भार्यया सार्धं संगमः सुचिरादयम् ।
प्रसादात्तव देवेश सफलं जीवितं मम ॥
📖 भावार्थ : “तब धर्मात्मा गौतम ने राम से कहा – हे महाबाहो! हे सत्यपराक्रमी राम! आपका स्वागत है। आपके कारण ही मेरा अपनी भार्या से बहुत दिनों बाद मिलन हुआ है। हे देवेश! आपके प्रसाद से मेरा जीवन सफल हो गया।”
॥ श्लोक २९-३० ॥
ततः प्रीतः स धर्मात्मा गौतमो रघुनन्दनम् ।
अर्घ्यं पाद्यं च रामाय दत्त्वा चैव यथाविधि ॥
आशीर्वादैश्च संयुक्तमुवाच परमं वचः ।
इष्टं चास्तु तवाकामं सर्वलोकहिते रत ॥
📖 भावार्थ : “तब वे प्रसन्न होकर धर्मात्मा गौतम ने रघुनन्दन राम को विधिपूर्वक अर्घ्य-पाद्य देकर आशीर्वाद सहित परम वचन कहे – ‘आपकी मनोकामना सिद्ध हो, आप सर्वलोकहित में रत रहें।’”
॥ श्लोक ३१-३२ ॥
एवमुक्त्वा ततो रामं गौतमो भगवानृषिः ।
अहिल्यया सह प्रीतो जगाम त्रिदिवं प्रति ॥
रामोऽपि तं महात्मानं पूजयित्वा यथाविधि ।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य जगाम मिथिलां प्रति ॥
📖 भावार्थ : “ऐसा कहकर भगवान् ऋषि गौतम, अहिल्या के साथ प्रसन्न होकर त्रिदिव (स्वर्ग) को चले गए। राम ने भी उन महात्मा की यथाविधि पूजा की, और विश्वामित्र को आगे कर मिथिला की ओर प्रस्थान किया।”
🔍 व्याख्या : इस प्रकार राम के चरण-स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ, और गौतम-अहिल्या का पुनर्मिलन हुआ। राम की यह लीला उनके पतित-पावन स्वरूप को उजागर करती है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 अहिल्या का उद्धार – पतित-पावन राम

अहिल्या का शिला से स्त्री में परिवर्तन राम की दिव्यता का प्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन है। यह दर्शाता है कि राम केवल मनुष्य नहीं, अपितु ईश्वर के अवतार हैं जो पतितों का उद्धार करते हैं।

🙏 गौतम का शाप और कृपा

गौतम ने अहिल्या को शाप दिया, परन्तु साथ ही यह भी वरदान दिया कि राम के आने पर उद्धार होगा। यह दर्शाता है कि महर्षियों के शाप में भी कल्याण की संभावना छिपी होती है।

👣 चरण-स्पर्श का माहात्म्य

राम के चरण-स्पर्श मात्र से अहिल्या मुक्त हो जाती हैं। यह भक्ति मार्ग का संकेत है – भगवान के चरणों की शरण से ही मुक्ति संभव है।

🌟 स्त्री-गौरव का उत्थान

अहिल्या का उद्धार यह भी दर्शाता है कि राम ने स्त्री-जाति का सम्मान बढ़ाया। उन्होंने अहिल्या को शाप-मुक्त करके उनके पुनः पति-गृह में प्रतिष्ठा कराई।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि चाहे कितना भी बड़ा पाप या शाप क्यों न हो, भगवद्-कृपा से सब सम्भव है। राम के चरणों की शरण में आने से मनुष्य सब बंधनों से मुक्त हो सकता है। यह सर्ग राम की असीम दया और करुणा का प्रतीक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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