बाल काण्ड अध्याय 47

मरुतों और विशाला की कहानी

बाल काण्ड का सैंतालीसवाँ सर्ग विश्वामित्र द्वारा राम-लक्ष्मण को मरुतों (देवताओं) की कथा सुनाने और विशाला नगरी की स्थापना के विषय में बताता है। इसमें इन्द्र के भय से मरुतों के त्राण की कथा तथा विशाला नगरी के नामकरण और महिमा का वर्णन है।

विवरण

इस सर्ग का प्रारम्भ विश्वामित्र के मुख से राम-लक्ष्मण को मरुतों की कथा सुनाने से होता है। विश्वामित्र बताते हैं कि एक बार देवराज इन्द्र ने क्रोधित होकर मरुतों (देवताओं) को भयभीत कर दिया था। तब मरुतों ने ब्रह्मा जी की शरण ली और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे सुरक्षित रहेंगे और उनके नाम पर एक नगरी बसेगी। उस नगरी का नाम विशाला रखा गया। यह नगरी बहुत समृद्ध और वैभवशाली थी। विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को यह कथा उनके पथ में पड़ने वाले उस क्षेत्र के महत्त्व को समझाने के लिए सुनाते हैं। यह सर्ग देवताओं की कृपा और पुण्य स्थानों के माहात्म्य का वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ४७

(मरुतों और विशाला की कहानी – देवताओं का त्राण एवं नगरी की स्थापना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को आश्रमों और तीर्थों की महिमा बताते हुए आगे बढ़ रहे थे। अब यह सर्ग उनके मार्ग में पड़ने वाले एक विशेष क्षेत्र से जुड़ा है, जहाँ मरुतों (देवताओं) की कथा प्रसिद्ध है। विश्वामित्र बताते हैं कि किस प्रकार इन्द्र के कोप से भयभीत होकर मरुतों ने ब्रह्मा की शरण ली और उनके आशीर्वाद से विशाला नगरी बसी। यह कथा उस स्थान की पवित्रता और दिव्यता को दर्शाती है।

📿 विश्वामित्र का उपदेश और कथा का आरम्भ (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-२ ॥
तस्मिन् देशे पुरा राजा विशालो नाम धार्मिकः ।
येन विशाला नगरी निर्मिता सुसमाहिता ॥
तस्यां पुर्यां महातेजा मरुतां कीर्तिवर्धनः ।
विशालः पालयामास वसुधां धर्मसंहिताम् ॥
🔹 पदच्छेद : तस्मिन् = उस; देशे = देश में; पुरा = पूर्व काल में; राजा = राजा; विशालः = विशाल; नाम = नामक; धार्मिकः = धार्मिक; येन = जिसके द्वारा; विशाला = विशाला; नगरी = नगरी; निर्मिता = निर्मित की गयी; सुसमाहिता = सुनियोजित; तस्याम् = उस; पुर्याम् = नगरी में; महातेजाः = महातेजस्वी; मरुताम् = मरुतों की; कीर्तिवर्धनः = कीर्ति बढ़ाने वाला; विशालः = विशाल राजा; पालयामास = पालन किया; वसुधाम् = पृथ्वी को; धर्मसंहिताम् = धर्मपूर्वक।
📖 भावार्थ : उस देश में पूर्वकाल में विशाल नामक धार्मिक राजा हुए, जिन्होंने सुनियोजित ढंग से विशाला नगरी का निर्माण किया। उस नगरी में महातेजस्वी, मरुतों की कीर्ति बढ़ाने वाले राजा विशाल ने धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन किया।
🔍 व्याख्या : यहाँ विश्वामित्र उस स्थान की प्राचीनता और उसके नामकरण की कथा का सूत्र देते हैं। विशाला नगरी का संबंध मरुतों से बताया गया है।
॥ श्लोक ३-४ ॥
तस्य पुत्रो महाबाहुरिध्मवाहो महायशाः ।
पितरं समतिक्रम्य राज्यं प्राप्य स धार्मिकः ॥
यज्ञैश्च बहुभिरिष्ट्वा धर्मेण प्राप्य मेदिनीम् ।
अपालयत् प्रजाः सर्वा धर्मेणैव पिता यथा ॥
📖 भावार्थ : उनके पुत्र महाबाहु इध्मवाह महायशस्वी हुए, जो पिता के बाद धार्मिकता से राज्य प्राप्त करके। उन्होंने बहुत से यज्ञों का अनुष्ठान किया और धर्म से पृथ्वी प्राप्त करके पिता के समान ही धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया।
॥ श्लोक ५-७ ॥
तस्मिन् राज्यं प्रशासति धर्मेण महात्मनि ।
समृद्धा नगरी तस्य सर्वकामैः समन्विता ॥
न तस्यां विद्यते कश्चिद् अलक्ष्मीः पुरुषे क्वचित् ।
न दस्यवो न च व्याला न रोगा न च देवलाः ॥
सुखं सुषुपुरत्यर्थं प्रजास्तस्य नराधिपाः ।
न च सीदन्ति कृपणा न च व्यसनिनो जनाः ॥
📖 भावार्थ : उस महात्मा के धर्मपूर्वक राज्य शासन करते समय उसकी नगरी सभी इच्छित वस्तुओं से युक्त, समृद्ध हो गयी। उसमें कहीं भी किसी मनुष्य में अलक्ष्मी (दरिद्रता) नहीं थी। न डाकू थे, न हिंसक पशु, न रोग और न ही देवल (जुआरी) थे। हे नरेशो! उसकी प्रजा अत्यन्त सुख से सोती थी। न कोई दुःखी था और न ही व्यसनी जन थे।
🔍 व्याख्या : यहाँ आदर्श राज्य का वर्णन है, जहाँ कोई दुःख, रोग, डाकू आदि नहीं हैं। यह रामराज्य का पूर्वाभास है।

⚡ इन्द्र का कोप और मरुतों की ब्रह्मा के पास याचना (श्लोक ८-१६)

॥ श्लोक ८-९ ॥
अथ देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
समेत्य मरुतो द्रष्टुं समाजग्मुः सहस्रशः ॥
तेषामायान्तमालोक्य मरुतो देवसत्तमाः ।
प्रत्युद्गम्य महात्मानः पूजां चक्रुर्यथार्हतः ॥
📖 भावार्थ : फिर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और परम ऋषि सब मिलकर हजारों की संख्या में मरुतों के दर्शन को आए। उन आते हुए देवताओं को देखकर मरुतों ने आगे बढ़कर यथोचित पूजा की।
🔍 व्याख्या : मरुतों की महिमा से आकर्षित होकर देवता भी उनसे मिलने आते थे। यह मरुतों की श्रेष्ठता दर्शाता है।
॥ श्लोक १०-११ ॥
ततो देवाः समागम्य मरुतां तेजसा वृताः ।
प्रणेमुः शिरसा सर्वे ब्रह्माणं जगतः पतिम् ॥
तेषां प्रणमतां तत्र ब्रह्मा लोकपितामहः ।
उवाच परमप्रीतो वरं वरद वृणीष्व इति ॥
📖 भावार्थ : तब वे सब देवता मरुतों के तेज से घिरे हुए ब्रह्मा जी के पास गए और उन्हें प्रणाम किया। उनके प्रणाम करने पर ब्रह्मा जी ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा – "हे वरद! तुम वर मांगो।"
॥ श्लोक १२-१४ ॥
ततो देवा ऊचुः सर्वे भगवन् श्रोतुमर्हसि ।
इन्द्रेण मरुतो देवा भयमापादिता वयम् ॥
स हि नः सर्वदा देव त्रासयत्यतिदुःखितान् ।
तस्मान्नः शरणं त्वं हि भव विश्वेश्वर प्रभो ॥
त्वया रक्ष्यामहे देव त्वत्प्रसादाद्वयं सुखम् ।
निर्भया विचरिष्यामो देवलोके यथासुखम् ॥
📖 भावार्थ : तब सब देवताओं ने कहा – हे भगवन्! आप सुनिए। हम मरुत देवताओं को इन्द्र ने भयभीत कर रखा है। हे देव! वह हमें सदा अतिदुःखित करके भयभीत करता है। इसलिए हे विश्वेश्वर प्रभो! आप ही हमारे शरण हैं। हे देव! आपके द्वारा रक्षित हम आपकी कृपा से सुखपूर्वक, निर्भय होकर देवलोक में विचरण करेंगे।
🔍 व्याख्या : यहाँ इन्द्र के अहंकार और मरुतों के भय को दर्शाया गया है। मरुत ब्रह्मा से रक्षा की याचना करते हैं।
॥ श्लोक १५-१६ ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ।
प्रोवाच मरुतो देवान् मा भैष्टेति पुनः पुनः ॥
अहं वः सर्वथा रक्ष्ये सर्वलोकेश्वरेश्वरः ।
इन्द्रश्चापि वशे मह्यं सदा भवति पुत्रकाः ॥
📖 भावार्थ : यह सुनकर भगवान् ब्रह्मा, जो सर्वलोक के पितामह हैं, ने मरुत देवताओं से बार-बार कहा – डरो मत। मैं, जो सब लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर हूँ, तुम्हारी सब प्रकार से रक्षा करूँगा। हे पुत्रो! इन्द्र भी सदा मेरे वश में है।
🔍 व्याख्या : ब्रह्मा ने मरुतों को अभयदान दिया और इन्द्र को अपने वश में बताकर उनका भय दूर किया।

🏰 ब्रह्मा का वरदान और विशाला नगरी की स्थापना (श्लोक १७-२६)

॥ श्लोक १७-१९ ॥
इहैव भवतां वासो भविष्यति न संशयः ।
नगरी च विशालाख्या भविष्यति महापुरी ॥
मरुतां कीर्तिविख्याता सर्वलोकेषु विश्रुता ।
अत्र वः स्थापयिष्यामि स्वयं लोकपितामहः ॥
यज्ञभागाश्च वो देवा भविष्यन्ति न संशयः ।
इन्द्रश्चापि न वो देवान् बाधिष्यते कदाचन ॥
📖 भावार्थ : तुम लोगों का निवास यहीं होगा, इसमें संशय नहीं। और विशाला नामक महानगरी होगी, जो मरुतों की कीर्ति से विख्यात होगी और सब लोकों में प्रसिद्ध होगी। मैं स्वयं लोकपितामह तुम्हें यहाँ स्थापित करूँगा। हे देवो! तुम्हारे यज्ञभाग भी निश्चय ही होंगे और इन्द्र तुम देवताओं को कभी नहीं सताएगा।
🔍 व्याख्या : ब्रह्मा ने मरुतों को वरदान दिया कि उनके नाम पर विशाला नगरी बसेगी और उनके यज्ञभाग सुरक्षित रहेंगे।
॥ श्लोक २०-२२ ॥
ततस्ते मरुतो देवाः प्रीतिमन्तः सहस्रशः ।
तस्थुर्नगर्यां तस्यां वै विशालायां यथासुखम् ॥
विशालो नाम राजर्षिस्तस्यां पुर्यां नराधिपः ।
बभूव धार्मिको राजा सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥
तेन सा निर्मिता राज्ञा विशाला नगरी शुभा ।
मरुतां कीर्तिविख्याता सर्वलोकेषु विश्रुता ॥
📖 भावार्थ : तब वे सहस्रों मरुत देवता प्रसन्न होकर उस विशाला नगरी में यथासुख निवास करने लगे। उस पुरी में विशाल नामक राजर्षि नरेश हुए, जो धार्मिक, सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे। उन्हीं राजा ने उस शुभ विशाला नगरी का निर्माण किया, जो मरुतों की कीर्ति से विख्यात हुई और सब लोकों में प्रसिद्ध हुई।
🔍 व्याख्या : यहाँ स्पष्ट होता है कि राजा विशाल ने ब्रह्मा के वरदान के अनुसार यह नगरी बसाई थी।
॥ श्लोक २३-२६ ॥
तस्यां पुर्यां महातेजा राजा दशरथात्मजौ ।
न्यवसद् राघवौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥
तां च दृष्ट्वा पुरीं रम्यां विशालां भीमविक्रमौ ।
पप्रच्छतुर्महात्मानौ विश्वामित्रं तपोधनम् ॥
कस्येयं नगरी ब्रह्मन् केनेयं निर्मिता पुरा ।
एतदिच्छावहे श्रोतुं परं कौतूहलं हि नः ॥
ताभ्यां स कथयामास सर्वं विस्तरतो मुनिः ।
यथावृत्तं पुरावृत्तं मरुतां कीर्तिवर्धनम् ॥
📖 भावार्थ : उस पुरी में महातेजस्वी, भीमविक्रमी राजा दशरथ के पुत्र, वीर भाई राम और लक्ष्मण ने निवास किया। उस रमणीय विशाला नगरी को देखकर उन महात्माओं ने तपोधन विश्वामित्र से पूछा – हे ब्रह्मन्! यह नगरी किसकी है? और पूर्वकाल में किसके द्वारा निर्मित हुई? हम यह सुनना चाहते हैं, क्योंकि हमें अत्यधिक कौतूहल है। उन दोनों को मुनि ने विस्तारपूर्वक सब कुछ बताया, जो मरुतों की कीर्ति बढ़ाने वाला पुरावृत्त था।
🔍 व्याख्या : यह श्लोक वर्तमान और भूतकाल को जोड़ता है। राम-लक्ष्मण उस नगरी को देखकर उत्सुक होते हैं, और विश्वामित्र उन्हें यह पूरी कथा सुनाते हैं।

🌸 कथा का उपसंहार और राम-लक्ष्मण को उपदेश (श्लोक २७-३४)

॥ श्लोक २७-२९ ॥
इत्येतत् कथितं वीरौ यथावृत्तं पुरातनम् ।
मरुतां कीर्तनं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं मरुतां कीर्तनं शुभम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥
गच्छावो हि परं तीर्थं जनकस्य महात्मनः ।
यत्र यज्ञः समारब्धो राज्ञः पुत्रार्थसिद्धये ॥
📖 भावार्थ : हे वीरो! इस प्रकार यह पुरातन वृत्त कहा गया। यह मरुतों का कीर्तन पुण्यदायक और सब पापों का नाश करने वाला है। जो नित्य इस शुभ मरुत कीर्तन को सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है। अब हम महात्मा जनक के परम तीर्थ को चलें, जहाँ राजा की पुत्रप्राप्ति के लिए यज्ञ आरम्भ हुआ था।
🔍 व्याख्या : यहाँ विश्वामित्र कथा के महत्त्व को बताते हैं और फिर आगे की यात्रा का संकेत देते हैं।
॥ श्लोक ३०-३१ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवौ वीरौ विश्वामित्रवचस्तदा ।
प्रहृष्टमनसौ भूत्वा प्रणेमतुर्महामुनिम् ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे रामं दृष्ट्वा महाबलम् ।
प्रशशंसुर्महात्मानं विश्वामित्रं तपोधनम् ॥
📖 भावार्थ : विश्वामित्र के उस वचन को सुनकर वीर राघवों ने प्रसन्न मन से महामुनि को प्रणाम किया। तब वहाँ के सब मुनियों ने महाबली राम को देखकर और तपोधन विश्वामित्र की प्रशंसा की।
॥ श्लोक ३२-३४ ॥
एतद् यशस्यमायुष्यं पुत्र्यं स्वर्ग्यं तथैव च ।
मरुतां कीर्तनं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥
यः पठेद् भावयुक्तस्तु शृणुयाद्वा समाहितः ।
सर्वान् कामानवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥
इत्येतत् कथितं वीरौ यथावृत्तं पुरातनम् ।
मरुतां कीर्तनं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥
📖 भावार्थ : यह मरुतों का कीर्तन यशस्वी, आयुष्य बढ़ाने वाला, पुत्र प्रदान करने वाला, स्वर्ग देने वाला, पुण्यदायक और सब पापों का नाश करने वाला है। जो भक्तिपूर्वक इसका पाठ करे या एकाग्रचित्त होकर सुने, वह सब कामनाओं को प्राप्त करता है और ब्रह्मलोक को जाता है। हे वीरो! इस प्रकार यह पुरातन वृत्त कहा गया, जो मरुतों का कीर्तन है, पुण्यदायक है और सब पापों का नाश करने वाला है।
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोक इस कथा के फल और महत्त्व को दोहराते हैं, जिससे इसकी पवित्रता और फलदायित्व सिद्ध होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚡ इन्द्र का अहंकार और देवताओं की शरणागति

इस सर्ग में इन्द्र के अहंकार और मरुतों के भय को दर्शाया गया है। यह संकेत करता है कि देवताओं में भी परस्पर विरोध हो सकता है, लेकिन अंततः ब्रह्मा जैसे परम पिता ही सच्ची शरण हैं। शरणागति का यह भाव रामायण में बार-बार आता है।

🏰 विशाला नगरी का ऐतिहासिक महत्त्व

विशाला नगरी का उल्लेख प्राचीन भारत की नगर योजना और देवताओं से जुड़ी मान्यताओं को दर्शाता है। यह नगरी मरुतों की कीर्ति से जुड़ी थी और आगे चलकर जनकपुरी के निकट बताई गई है।

👥 राम-लक्ष्मण की जिज्ञासा

राम और लक्ष्मण का उस नगरी के इतिहास के प्रति कौतूहल उनके ज्ञानपिपासु स्वभाव को दर्शाता है। वे केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि जिज्ञासु और संस्कारशील राजकुमार भी हैं।

📿 कथा का फल

अन्तिम श्लोकों में इस कथा को सुनने और पढ़ने के फल बताए गए हैं – आयुष्य, यश, पुत्रप्राप्ति, स्वर्ग और ब्रह्मलोक। यह दर्शाता है कि पुरातन कथाएँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के साधन भी हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भय के समय ईश्वर की शरणागति ही सर्वोत्तम उपाय है। ब्रह्मा ने मरुतों को न केवल अभयदान दिया, बल्कि उनके नाम पर एक नगरी बसाकर उनकी कीर्ति को अमर कर दिया। यह भी सिखाता है कि पुण्य स्थानों की यात्रा और उनके इतिहास को जानने से हमें धर्म और संस्कृति की गहरी समझ मिलती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।