बाल काण्ड अध्याय 43

भगीरथ द्वारा गंगा का लाना

बाल काण्ड के तैंतालीसवें सर्ग में भगीरथ के कठोर तप द्वारा गंगा को पृथ्वी पर लाने की दिव्य कथा वर्णित है। राजा भगीरथ अपने पूर्वजों—राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों—के उद्धार के लिए गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने का संकल्प लेते हैं। गंगा के अवतरण की यह अद्भुत घटना शिव की जटाओं में गंगा के बंधन, उनके पृथ्वी पर प्रवाहित होने और अंततः सगरपुत्रों के भस्मों को पवित्र कर उन्हें मोक्ष दिलाने तक की गाथा प्रस्तुत करती है।

विवरण

इस सर्ग का प्रारम्भ भगीरथ के गोकर्ण तीर्थ में घोर तपस्या करने से होता है। वे हज़ार वर्षों तक केवल वायु भक्षण कर, ग्रीष्म में पंचाग्नि, वर्षा में खुले आकाश और शीत में जल में खड़े रहकर तपस्या करते हैं। उनकी अटल भक्ति और तप से प्रसन्न होकर गंगा देवी प्रकट होती हैं और वर माँगने को कहती हैं। भगीरथ उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे पृथ्वी पर अवतरित हों और उनके पूर्वजों—सगरपुत्रों की भस्म—को पवित्र कर उन्हें मुक्ति दिलाएँ। गंगा तो सहर्ष तैयार हो जाती हैं, पर कहती हैं कि मेरे वेग को पृथ्वी सहन नहीं कर सकती; अतः कोई ऐसा आधार चाहिए जो मेरे प्रपात को रोक सके। भगीरथ पुनः हिमालय पर जाकर भगवान शिव की आराधना करते हैं। शिव प्रकट होकर उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं और गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लेते हैं। गंगा के अहंकार को चूर करने के लिए शिव उन्हें अपनी जटाओं की भूलभुलैया में फँसा देते हैं। भगीरथ के पुनः तप करने पर शिव गंगा की एक धारा को जटाओं से मुक्त कर पृथ्वी पर गिरने देते हैं। वह धारा तीन भागों में विभाजित होती है: एक भाग भगीरथ के रथ के पीछे चलकर सागर तक जाती है, दूसरा भागवती के नाम से विख्यात होती है, तीसरी अन्य दिशा में प्रवाहित होती है। गंगा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चलकर समुद्र में मिलती हैं, फिर वहाँ से पाताल में प्रवेश करती हैं और सगरपुत्रों की भस्म का स्पर्श कर उन्हें पवित्र कर देती हैं। इस प्रकार भगीरथ के प्रयास से गंगा का पृथ्वी पर अवतरण संभव हुआ, जो तब से भागीरथी कहलाईं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ४३

(भगीरथ द्वारा गंगा का अवतरण – गंगा के धरती पर आने की कथा)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में राजा सगर के यज्ञ के घोड़े की रक्षा करते हुए उनके साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे। उनके उद्धार के लिए उनके वंशज भगीरथ ने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने का दुस्साहसिक संकल्प लिया। यह सर्ग उसी अद्भुत तपस्या और गंगा के धरती पर अवतरण की दिव्य गाथा प्रस्तुत करता है। गंगा के साथ शिव का संयोग और भगीरथ की अटल निष्ठा – यह सब इस सर्ग का मुख्य विषय है।

🧘 भगीरथ की कठोर तपस्या और गंगा का वरदान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततो गोकर्णमासाद्य भगीरथो महीपतिः ।
तपस्तेपे महातेजा वर्षाणां परमार्चितः ॥
निराहारो जितक्रोधो जितेन्द्रियपरिग्रहः ।
वायुभक्षः स्थितस्तत्र वर्षाणामयुतं नृपः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; गोकर्णम् = गोकर्ण तीर्थ को; आसाद्य = पहुँचकर; भगीरथः = भगीरथ; महीपतिः = राजा; तपः = तपस्या; तेपे = की; महातेजाः = महातेजस्वी; वर्षाणाम् = वर्षों तक; परमार्चितः = अत्यंत पूजित; निराहारः = निराहार; जितक्रोधः = क्रोध पर जीत पाने वाला; जितेन्द्रियपरिग्रहः = इंद्रियों को वश में करने वाला; वायुभक्षः = वायु भक्षण करने वाला; स्थितः = रहा; तत्र = वहाँ; वर्षाणाम् अयुतम् = दस हज़ार वर्ष; नृपः = राजा।
📖 भावार्थ : तदनन्तर महातेजस्वी राजा भगीरथ गोकर्ण तीर्थ में जाकर घोर तपस्या में लीन हो गए। वे निराहार रहकर, क्रोध को जीतकर, इंद्रियों को वश में करके केवल वायु का भक्षण करते हुए दस हज़ार वर्षों तक वहाँ स्थित रहे।
॥ श्लोक ३-४ ॥
तस्य तुष्टाऽभवद् गङ्गा श्रेष्ठा सागरगामिनी ।
प्रत्यक्षं सा तदा भूत्वा वरदाऽस्मीत्युवाच ह ॥
भगीरथः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच च ।
यदि प्रसन्ना देवि त्वं मम पूर्वपितॄन् प्रति ॥
📖 भावार्थ : उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर सागर तक जाने वाली श्रेष्ठ गंगा प्रकट हुईं। साक्षात् प्रकट होकर उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें वर देने को तैयार हूँ।” तब भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा, “हे देवि! यदि तुम प्रसन्न हो तो मेरे पूर्वजों के लिए...”
॥ श्लोक ५-६ ॥
पितॄणां तु सहस्राणि षष्टिः पुत्रा महात्मनाम् ।
कपिलेन च दग्धास्ते भस्मीभूता महीतले ॥
तेषामाप्लावनं देहि भस्मनां पुण्यवाहिनि ।
स्वर्गं गच्छेयुरत्यन्तं यथा देवि तथा कुरु ॥
📖 भावार्थ : “मेरे पूर्वज साठ हज़ार महात्मा पुत्र कपिल मुनि द्वारा दग्ध होकर भूतल पर भस्म हो गए हैं। हे पुण्यवाहिनी! उन भस्मों का स्पर्श कराकर उन्हें स्वर्ग प्रदान करने की कृपा करो।”

🕉️ गंगा का शिव के पास जाने का निर्देश (श्लोक ११-१८)

॥ श्लोक ७-८ ॥
ततः प्रोवाच गङ्गा तं भगीरथमिदं वचः ।
एवमेतत् करिष्यामि यथात्थ त्वं न संशयः ॥
पतिष्ये पृथिवीपृष्ठे तव वाक्यप्रचोदिता ।
पतन्ती च महावेगा भित्त्वा पृथ्वीं गमिष्यति ॥
📖 भावार्थ : तब गंगा ने भगीरथ से कहा, “ऐसा ही होगा जैसा तुम कहते हो, इसमें संशय नहीं। मैं तुम्हारे वचन से प्रेरित होकर पृथ्वी पर गिरूँगी, पर मैं अत्यंत वेग से गिरूँगी और पृथ्वी को भेदकर नीचे चली जाऊँगी।”
॥ श्लोक ९-१० ॥
तस्मात् त्वं शंकरं देवं तोषयस्व महेश्वरम् ।
स हि मे पातनं सोढुं शक्तः पृथ्वीतले प्रभुः ॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्या भगीरथो महायशाः ।
जगाम हिमवत्पार्श्वं तपसे धृतनिश्चयः ॥
📖 भावार्थ : “इसलिए तुम देव शंकर महेश्वर को प्रसन्न करो; वे ही मेरे गिरने के वेग को पृथ्वी पर सहन करने में समर्थ हैं।” यह वचन सुनकर महायशस्वी भगीरथ ने दृढ़ निश्चय कर हिमालय के पार्श्व में तपस्या के लिए प्रस्थान किया।
॥ श्लोक ११-१२ ॥
ततो वर्षसहस्राणि भगीरथः प्रतापवान् ।
तोषयामास देवेशं शूलपाणिं त्रिलोचनम् ॥
प्रसन्नोऽभूत् तदा रुद्रो वरेण छन्दयत् प्रभुः ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते यथेष्टं प्रतिगृह्यताम् ॥
📖 भावार्थ : तब प्रतापी भगीरथ ने हज़ारों वर्षों तक तपस्या कर त्रिलोचन शूलपाणि देवेश शिव को प्रसन्न किया। प्रसन्न होकर रुद्र ने कहा, “वर माँगो, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।”
॥ श्लोक १३-१४ ॥
भगीरथस्तदा प्राह गङ्गायाः पतनं प्रति ।
धर्तुमिच्छामि देवेश त्वयि श्रेष्ठे व्यवस्थिते ॥
तथेत्युक्त्वा ततो रुद्रो गङ्गां घोरां महानदीम् ।
जटामध्येऽग्रहीद्देवीं चन्द्रलेखामिवामलाम् ॥
📖 भावार्थ : भगीरथ ने कहा, “हे देवेश! गंगा के अवतरण के समय आप उन्हें धारण करें।” रुद्र ने “तथास्तु” कहकर उस घोर महानदी गंगा को, जैसे चन्द्रलेखा को धारण किया जाता है, अपनी जटाओं में धारण कर लिया।

🌊 गंगा का शिव की जटा से निकलकर भगीरथ के पीछे चलना (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १५-१६ ॥
सा तु तत्र जटाजूटे चिरं स्थित्वा महानदी ।
न निर्गन्तुं च शक्नोति मोहिता तस्य तेजसा ॥
ततो भूयो भगीरथः प्रसादयत शंकरम् ।
निर्गम्यतां जटामध्यादिति शर्वमभाषत ॥
📖 भावार्थ : वह महानदी बहुत काल तक शिव की जटाओं में रही, उनके तेज से मोहित होकर बाहर न निकल सकी। तब भगीरथ ने पुनः शंकर को प्रसन्न किया और प्रार्थना की कि गंगा जटाओं से मुक्त हों।
॥ श्लोक १७-१८ ॥
ततो रुद्रः प्रसन्नात्मा मुमोच गिरिजां तदा ।
सप्तधा तां विभागेन प्रवहन्तीं महानदीम् ॥
ततो गङ्गा विभग्ना सा सप्तधा प्रवहत्तदा ।
ह्लादिनी पावनी चैव नलिनी च शुभा त्रिधा ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्नचित्त रुद्र ने उन्हें मुक्त किया, और वह महानदी सात भागों में विभक्त होकर प्रवाहित होने लगी। वे सात धाराएँ ह्लादिनी, पावनी, नलिनी आदि नामों से जानी गईं।
🔍 व्याख्या : कुछ पुराणों में तीन या सात धाराओं का वर्णन है। यहाँ सप्तधा का संकेत है।
॥ श्लोक १९-२० ॥
ततो भगीरथो राजा गङ्गां तां पुण्यवाहिनीम् ।
गृहीत्वा रथमारुह्य प्रायात् सागरदक्षिणाम् ॥
ततः प्रभृति तां गङ्गां भागीरथीति विश्रुताम् ।
पृथिव्यां सर्वलोकेषु कीर्तियुक्तां सनातनीम् ॥
📖 भावार्थ : तब राजा भगीरथ ने उस पुण्यवाहिनी गंगा को आगे बढ़ाया और रथ पर आरूढ़ होकर उसे दक्षिण दिशा में सागर की ओर ले गए। तभी से वह गंगा भागीरथी नाम से विख्यात हुई, सनातन और सर्वलोक में कीर्तियुक्त।

🏞️ गंगा का सागर में मिलन और पाताल में सगरपुत्रों की मुक्ति (श्लोक २९-३६)

॥ श्लोक २१-२२ ॥
ततः सागरमासाद्य गङ्गा सरित्सु शोभना ।
पूरयामास सलिलैर्लवणाम्भोधिमव्ययम् ॥
ततोऽन्तर्भूमिगा भूत्वा पातालं प्राविशत् तदा ।
यत्र ते सगरपुत्रा भस्मीभूता व्यवस्थिताः ॥
📖 भावार्थ : फिर वह सुन्दर नदी गंगा सागर तक पहुँची और अपने जल से लवण समुद्र को भर दिया। तत्पश्चात् वह भूमि के अंदर प्रवेश कर पाताल में चली गई, जहाँ वे सगरपुत्रों की भस्म स्थित थी।
॥ श्लोक २३-२४ ॥
तया तु भस्म संस्पृष्टं सगरात्मजसम्भवम् ।
दिव्यं वै वारिणा तेन सद्यो मुक्तिं ययुस्तदा ॥
ततः प्रभृति राजेन्द्र गङ्गा त्रिपथगा नृप ।
स्वर्गे मर्त्ये च पाताले भागीरथी प्रकीर्तिता ॥
📖 भावार्थ : उस दिव्य जल से भस्म स्पर्श होते ही सगर के पुत्र तत्काल मुक्त हो गए। हे राजेन्द्र! तभी से यह तीन मार्गों में बहने वाली गंगा – स्वर्ग, मर्त्य और पाताल में – भागीरथी कहलाई।
॥ श्लोक २५-२६ ॥
एवं भगीरथेनैषा पृथिव्यां सम्प्रवर्तिता ।
सगरस्य कुले श्रेष्ठा सन्ततिः पुण्यदायिनी ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं भगीरथसमुद्भवम् ।
स पुत्रवान् धनी राजा सुखी भवति मानवः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार भगीरथ द्वारा इस पृथ्वी पर गंगा लाई गई और सगर के कुल की श्रेष्ठ संतति को पुण्य प्रदान किया। जो मनुष्य प्रतिदिन भगीरथ के इस उद्यम की कथा सुनता है, वह पुत्रवान्, धनवान्, राजा के समान सुखी होता है।
॥ श्लोक २७-२८ ॥
अवभृथं ततः स्नात्वा राजा दशरथः शुचिः ।
रेमे पुत्रैः समं वीरैः पूजयामास देवताः ॥
📖 भावार्थ : इस कथा के अन्तर्गत राजा दशरथ का भी उल्लेख है कि वे अवभृथ स्नान कर पुत्रों के साथ देवताओं की पूजा करते हैं। (यह श्लोक अगले सर्ग का सूत्र है।)

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 भगीरथ का अदम्य साहस

भगीरथ ने हज़ारों वर्षों तक कठिन तपस्या की और असंभव को संभव किया। यह दर्शाता है कि संकल्प और तप से देवता भी प्रसन्न होते हैं और मनुष्य अपने पूर्वजों का उद्धार कर सकता है।

🙏 शिव का गंगाधारण

शिव ने गंगा के अहंकार को शांत करने के लिए उन्हें जटाओं में धारण किया और फिर उन्हें छोड़ा। यह घटना शिव की कृपा और गंगा की महिमा दोनों को स्थापित करती है।

🌊 गंगा की त्रिपथगा यात्रा

गंगा का स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में प्रवाहित होना उनके लोक-त्रय में पावनता फैलाने का प्रतीक है। इसी से वे भागीरथी, जाह्नवी, मन्दाकिनी आदि नामों से पुकारी जाती हैं।

🔥 पूर्वजों का उद्धार

सगरपुत्रों की मुक्ति से यह शिक्षा मिलती है कि संतान का कर्तव्य है कि वह पूर्वजों के सद्गति के लिए प्रयास करे। गंगा स्नान से मृतकों को तृप्ति मिलती है, यही भारतीय संस्कारों का आधार है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चे लगन और तप से दुर्लभ से दुर्लभ कार्य भी सिद्ध हो सकते हैं। भगीरथ ने केवल अपने पूर्वजों के मोक्ष के लिए इतनी घोर तपस्या की कि गंगा स्वयं पृथ्वी पर अवतरित हुईं। यह हमें अपने कुल और समाज के प्रति कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीगंगा जय भागीरथी जय शिवशंकर ॥
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