बाल काण्ड अध्याय 39

घोड़े की खोज और पृथ्वी का खोदना

बाल काण्ड का उनतालीसवाँ सर्ग राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ का वर्णन करता है। इन्द्र द्वारा यज्ञ के घोड़े की चोरी और सगर के साठ हजार पुत्रों द्वारा पृथ्वी खोदकर उसकी खोज करने की कथा आरम्भ होती है।

विवरण

इस सर्ग में राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ का विस्तृत वर्णन है। सगर ने अपने पुत्रों सहित यज्ञ प्रारम्भ किया। इन्द्र को भय हुआ कि कहीं यज्ञ की समाप्ति पर सगर अमर न हो जाएँ, अतः उन्होंने यज्ञ के घोड़े को चुरा लिया और पाताल में ले जाकर कपिल मुनि के आश्रम के पास बाँध दिया। घोड़े के गायब होने पर सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को आदेश दिया कि वे पृथ्वी खोदकर घोड़े का पता लगाएँ। पुत्रों ने पृथ्वी को खोदना शुरू किया और अन्ततः पाताल पहुँच गए। वहाँ उन्होंने घोड़े को देखा और कपिल मुनि पर चोरी का आरोप लगाया। क्रोधित कपिल ने उन्हें भस्म कर दिया। यह सर्ग राजा सगर के यज्ञ और उसके परिणामों की कहानी का प्रारम्भ है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ३९

(घोड़े की खोज और पृथ्वी का खोदना – सगर के पुत्रों का अभियान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के जन्म का वर्णन हुआ। अब यह सर्ग उनके अश्वमेध यज्ञ और उससे जुड़ी घटनाओं का सूत्रपात करता है। इन्द्र के कपट से यज्ञ का घोड़ा गायब हो जाता है और सगर के पुत्र पृथ्वी को खोदकर उसकी खोज में निकल पड़ते हैं। यह कथा आगे चलकर समुद्र के निर्माण और गंगा के अवतरण तक का मार्ग प्रशस्त करती है।

🔥 राजा सगर का अश्वमेध यज्ञ (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-२ ॥
श्रूयतां राजशार्दूल यथा तस्य महात्मनः ।
अश्वमेधे समारब्धे हृतोऽश्वो वै महात्मना ॥
इन्द्रेण हृतमश्वं तं विज्ञाय स महीपतिः ।
पुत्रान् सर्वान् समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह ॥
🔹 पदच्छेद : श्रूयताम् = सुनो; राजशार्दूल = हे राजाओं में श्रेष्ठ; यथा = जैसे; तस्य = उसके; महात्मनः = महात्मा का; अश्वमेधे = अश्वमेध यज्ञ में; समारब्धे = प्रारम्भ होने पर; हृतः = चुराया गया; अश्वः = घोड़ा; वै = ही; महात्मना = महात्मा (इन्द्र) द्वारा; इन्द्रेण = इन्द्र ने; हृतम् = चुराया; अश्वम् = घोड़े को; तम् = उस; विज्ञाय = जानकर; सः = वह; महीपतिः = राजा; पुत्रान् = पुत्रों को; सर्वान् = सबको; समाहूय = बुलाकर; वाक्यम् = वचन; एतत् = यह; उवाच ह = कहा।
📖 भावार्थ : हे राजाओं में श्रेष्ठ! सुनिए कि कैसे उन महात्मा राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ के प्रारम्भ होने पर घोड़ा चुरा लिया गया। इन्द्र द्वारा घोड़े के हरण की बात जानकर राजा ने सभी पुत्रों को बुलाकर यह वचन कहा।
🔍 व्याख्या : यह सर्ग राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ के आयोजन से आरम्भ होता है। इन्द्र को यज्ञ की सफलता से भय हुआ और उन्होंने घोड़ा चुरा लिया।
॥ श्लोक ३-४ ॥
गवेषयत पुत्रा मे हृतमश्वं महात्मना ।
खनित्वा पृथिवीं सर्वां शीघ्रमानयताश्वम् ॥
ते तु पितुर्वचः श्रुत्वा खनितुं पृथिवीं ततः ।
प्रारेभिरे महात्मानः सगरस्य सुतास्तदा ॥
📖 भावार्थ : "मेरे पुत्रो! उस महात्मा (इन्द्र) द्वारा चुराए गए घोड़े को खोजो। सम्पूर्ण पृथ्वी को खोदकर शीघ्र ही उस घोड़े को ले आओ।" पिता के इन वचनों को सुनकर वे सभी महात्मा सगर पुत्र उस समय पृथ्वी खोदने लगे।
॥ श्लोक ५-६ ॥
खन्यमाने तदा तस्मिन् ददृशुस्ते वसुन्धराम् ।
नागान् दैत्यांश्च राजेन्द्र राक्षसांश्च सहस्रशः ॥
न चाश्वं ददृशुस्ते वै खन्यमाना वसुन्धराम् ।
ततस्ते पितुरादेशात् खनन्तः पृथिवीं तदा ॥
📖 भावार्थ : उस समय पृथ्वी खोदे जाने पर उन्होंने नागों, दैत्यों और हजारों राक्षसों को देखा, हे राजेन्द्र! परन्तु पृथ्वी खोदते हुए भी उन्हें घोड़ा नहीं दिखाई दिया। तब पिता की आज्ञा से वे पृथ्वी खोदते रहे।
॥ श्लोक ७-८ ॥
अथ दिग्विजयं चक्रुः सगरस्य सुता बलात् ।
पातालं तु ततो गत्वा ददृशुस्ते वसुन्धराम् ॥
तत्राश्वं तु भ्रमन्तं ते ददृशुः सुमहाबलाः ।
कपिलस्याश्रमे पुण्ये चरन्तं पापनाशने ॥
📖 भावार्थ : फिर सगर के पुत्रों ने बलपूर्वक दिग्विजय किया। तत्पश्चात् पाताल में जाकर उन्होंने पृथ्वी को देखा। वहाँ उन महाबली पुत्रों ने उस घोड़े को देखा, जो कपिल मुनि के पुण्य और पापनाशक आश्रम में विचर रहा था।

⚡ पाताल में घोड़े के दर्शन और कपिल का क्रोध (श्लोक ९-१६)

॥ श्लोक ९-१० ॥
तमश्वं तु ततो दृष्ट्वा हृष्टाः सगरनन्दनाः ।
अमन्यन्त हृतं तेन कपिलेन महात्मना ॥
ततः क्रोधसमाविष्टाः कपिलं तमुपाद्रवन् ।
हनिष्याम इति क्रूराः खनित्रैः परिघैस्तथा ॥
📖 भावार्थ : उस घोड़े को देखकर सगर के पुत्र अति प्रसन्न हुए और समझे कि यह घोड़ा उस महात्मा कपिल ने चुराया है। तब क्रोध से भरकर वे क्रूर पुत्र कपिल मुनि की ओर दौड़े, यह सोचकर कि इसे मार डालेंगे, और वे खनित्र (फावड़े) और परिघ (लोहे के हथियार) लिए हुए थे।
🔍 व्याख्या : पुत्रों ने बिना विचारे कपिल मुनि पर आक्रमण करने का निश्चय किया, जो घोर तपस्वी और ज्ञानी थे। यह उनकी अविवेकपूर्ण हरकत थी।
॥ श्लोक ११-१२ ॥
ततस्तान् कपिलो दृष्ट्वा क्रोधसंरक्तलोचनः ।
हुंकारेणैव तान् सर्वान् भस्मसादकरोत् प्रभुः ॥
तस्मिन् विनिहते सैन्ये सगरस्य महात्मनः ।
अन्तरिक्षे महानादो बभूवाद्भुतदर्शनः ॥
📖 भावार्थ : उन्हें देखकर क्रोध से लाल-नेत्र हुए कपिल प्रभु ने केवल हुंकार मात्र से उन सबको भस्म कर दिया। उस महात्मा सगर की सेना के नष्ट होने पर आकाश में एक महान् और अद्भुत नाद हुआ।
॥ श्लोक १३-१४ ॥
ततः पितामहस्तत्र सह देवैरुपागमत् ।
कपिलं तं महात्मानं प्रसादयितुमीश्वरः ॥
तं दृष्ट्वा कपिलो राजन् प्रणम्य शिरसा तदा ।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं स्वागतं ते पितामह ॥
📖 भावार्थ : तब पितामह ब्रह्मा देवताओं सहित वहाँ आए, उस महात्मा कपिल को प्रसन्न करने के लिए। हे राजन्! कपिल ने उन्हें देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा – "आपका स्वागत है, हे पितामह!"
॥ श्लोक १५-१६ ॥
ब्रह्मोवाच – विदितं ते महाभाग यत्कृतं सगरात्मजैः ।
अवध्यास्ते कृता देवैर्भस्मीभूताश्च ते मुने ॥
एतेषां तु पुनः स्वर्गो भविष्यति न संशयः ।
त्वत्प्रसादान्महातेजः सगरस्य सुता इति ॥
📖 भावार्थ : ब्रह्मा ने कहा – हे महाभाग! सगर पुत्रों ने जो किया वह आपको विदित है। ये देवताओं द्वारा अवध्य थे और अब ये भस्म हो गए हैं, हे मुने! इन्हें आपके प्रसाद से स्वर्ग की प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं। हे महातेजस्वी! सगर के ये पुत्र ऐसा वरदान पाएँगे।

🙏 यज्ञ की पूर्ति और भविष्यवाणी (श्लोक १७-२४)

॥ श्लोक १७-१८ ॥
ततः कपिलः प्रोवाच वरं वरद तेऽनघ ।
एतेषां सगरपुत्राः स्वर्गं यास्यन्ति मद्वरात् ॥
गङ्गा तु तारयिष्यति सगरस्य सुतान् दिवम् ।
तस्यास्तु पुण्यतोयाया नाम्ना ते त्रिदिवं ययुः ॥
📖 भावार्थ : तब कपिल ने कहा – हे वरदाता! हे अनघ! आपके वरदान से ये सगर पुत्र मेरे वर से स्वर्ग जाएँगे। गंगा ही इन सगर पुत्रों को स्वर्ग ले जाएगी। उस पुण्यतोया गंगा के नाम से ये दिव्य लोक को प्राप्त होंगे।
🔍 व्याख्या : यहाँ गंगा के अवतरण की भविष्यवाणी है, जो आगे चलकर भगीरथ के प्रयासों से पूर्ण होगी।
॥ श्लोक १९-२० ॥
ब्रह्मोवाच – एवमस्तु गमिष्यामि कपिले त्वं कुरु प्रभो ।
सगरस्य तु पुत्राणां यथोक्तं भविता नृप ॥
इत्युक्त्वा ब्रह्मा देवेशो देवैः सह महात्मभिः ।
जगाम त्रिदिवं राजन् कपिलश्चाश्रमं ययौ ॥
📖 भावार्थ : ब्रह्मा ने कहा – "ऐसा ही होगा। हे कपिल! मैं जाता हूँ, आप अपना कार्य करें। हे राजन्! सगर पुत्रों के विषय में जैसा कहा गया है, वैसा ही होगा।" ऐसा कहकर ब्रह्मा देवेश्वर महात्मा देवताओं के साथ त्रिदिव (स्वर्ग) चले गए और कपिल भी अपने आश्रम लौट गए।
॥ श्लोक २१-२२ ॥
सगरस्तु तदा राजा पुत्रशोकसमन्वितः ।
यज्ञं समाप्य विधिवत् पुत्रकार्यमचारयत् ॥
अंशुमन्तं समाहूय पौत्रं वाक्यमुवाच ह ।
पितॄणां श्राद्धकर्ता त्वं भविष्यसि न संशयः ॥
📖 भावार्थ : तब राजा सगर पुत्रों के शोक से व्याकुल हो गए। उन्होंने यज्ञ को विधिपूर्वक समाप्त किया और पुत्रों के कृत्य का विचार किया। फिर अपने पौत्र अंशुमान को बुलाकर कहा – "तुम निश्चय ही पितरों का श्राद्ध करने वाले होगे।"
॥ श्लोक २३-२४ ॥
गच्छ पुत्र महाबाहो पितॄणां त्वं गतिं कुरु ।
गङ्गायां तु महातेजो नयैनान् परमां गतिम् ॥
अंशुमांस्तु ततः प्राह करिष्ये पितृसत्तम ।
यथा भवान् समादिश्टस्तथा पितृगतिं नये ॥
📖 भावार्थ : "हे महाबाहो पुत्र! जाओ, पितरों की गति प्रदान करो। गंगा में महातेज से इन्हें परम गति दिलाओ।" तब अंशुमान ने कहा – "हे पितृश्रेष्ठ! जैसा आप आदेश देते हैं, मैं वैसे ही पितरों को गति दिलाऊँगा।"

🌊 अंशुमान का प्रयास और अगले सर्ग की भूमिका (श्लोक २५-३२)

॥ श्लोक २५-२६ ॥
अंशुमान् प्रययौ शीघ्रं पातालं प्रति वीर्यवान् ।
तत्राश्वं च समादाय भस्मराशिं च ददृशे ॥
कपिलं च महात्मानं तेजसाप्रतिमं भुवि ।
दृष्ट्वा प्रणम्य शिरसा स्तुत्वा वचनमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : वीर्यवान् अंशुमान शीघ्र ही पाताल की ओर गए। वहाँ उन्होंने घोड़े को ले लिया और भस्म के ढेर को देखा। महात्मा कपिल को, जो पृथ्वी पर अप्रतिम तेज वाले थे, देखकर उन्होंने सिर झुकाकर प्रणाम किया और स्तुति करते हुए वचन कहे।
॥ श्लोक २७-२८ ॥
भगवन् कपिलश्रेष्ठ ज्ञानिनां परमा गतिः ।
मम पितॄन् महात्मानः प्रसादात् तव साम्प्रतम् ॥
गतिं प्राप्नुयुरव्यग्रां त्वत्प्रसादान्महामुने ।
इत्युक्तः कपिलो राजन् प्रसन्नो वाक्यमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : "हे भगवन्! कपिलश्रेष्ठ! ज्ञानियों की परम गति आप हैं। मेरे पितरों के लिए आपके प्रसाद से अब अव्यग्र गति प्राप्त हो। हे महामुने! आपकी कृपा से।" हे राजन्! ऐसा कहने पर प्रसन्न होकर कपिल ने वचन कहा।
॥ श्लोक २९-३० ॥
कपिल उवाच – गङ्गा तारयितुं शक्ता सगरस्य सुतान् दिवम् ।
तस्मात् त्वं तप आतिष्ठ गङ्गानयनकाम्यया ॥
भविष्यति तव वंश्यो यो गङ्गां तारयिष्यति ।
सागरं तं विजानीहि सगरस्य सुतैः कृतम् ॥
📖 भावार्थ : कपिल ने कहा – "गंगा ही सगर पुत्रों को स्वर्ग ले जाने में सक्षम है। अतः तुम गंगा को लाने की इच्छा से तप करो। तुम्हारे वंश में ही वह होगा जो गंगा को लाएगा। सगर पुत्रों द्वारा किए गए (खोदे गए) स्थान को सागर (समुद्र) के नाम से जानो।"
🔍 व्याख्या : यहाँ सागर शब्द की उत्पत्ति बताई गई है – सगर के पुत्रों द्वारा खोदे जाने के कारण समुद्र का नाम सागर पड़ा।
॥ श्लोक ३१-३२ ॥
एवमुक्त्वा तु कपिलो ययौ ध्यानं महामुनिः ।
अंशुमांश्च तमादाय यज्ञियाश्वं नरर्षभ ॥
आजगाम पुरीं स्फीतामयोध्यां पितुरन्तिकम् ।
निवेद्य चाश्वं राज्ञे तु सर्वमाख्यातवान् क्रमात् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर महामुनि कपिल ध्यान में लीन हो गए। हे नरश्रेष्ठ! अंशुमान उस यज्ञ के घोड़े को लेकर समृद्ध अयोध्या नगरी में पिता के पास आए। राजा को घोड़ा सौंपकर उन्होंने क्रमशः सब कुछ बता दिया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚡ अश्वमेध यज्ञ और इन्द्र का भय

अश्वमेध यज्ञ राजाओं की सर्वोच्च साम्राज्यवादी अभिलाषा का प्रतीक है। इन्द्र का भय दर्शाता है कि अत्यधिक शक्तिशाली राजा देवताओं के लिए भी चुनौती बन सकते हैं।

⛏️ पृथ्वी खोदना – समुद्र की उत्पत्ति

पृथ्वी खोदने से जो गड्ढा बना, वही आगे चलकर समुद्र (सागर) कहलाया। यह पौराणिक भूगोल का रोचक वर्णन है।

🙏 कपिल मुनि का क्रोध और वरदान

कपिल मुनि का क्रोध उनके तपोबल को दर्शाता है। साथ ही, वे करुणामयी हैं और ब्रह्मा के आग्रह पर पुत्रों को स्वर्ग का वरदान देते हैं।

🌊 गंगा के अवतरण की पृष्ठभूमि

यह सर्ग गंगा अवतरण की कथा की नींव रखता है। सगर पुत्रों की मुक्ति के लिए गंगा का पृथ्वी पर आना आवश्यक हो जाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि क्रोध और अविवेक से विनाश होता है। सगर पुत्रों ने बिना सोचे-समझे कपिल मुनि पर आक्रमण किया और भस्म हो गए। वहीं अंशुमान ने विनम्रता और भक्ति से कार्य साधा। साथ ही, यह भी सिखाता है कि पितरों की मुक्ति के लिए संतान का प्रयास आवश्यक है – जो भगीरथ द्वारा पूरा होगा।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।