बाल काण्ड अध्याय 35

गंगा का अवतरण

बाल काण्ड का पैंतीसवाँ सर्ग गंगा के अवतरण की कथा का वर्णन करता है। राजा भगीरथ अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए घोर तपस्या करते हैं, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान देते हैं। परन्तु गंगा के वेग को सहन करने के लिए भगीरथ शिव जी को प्रसन्न करते हैं, जो गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लेते हैं। तत्पश्चात् गंगा का पृथ्वी पर अवतरण होता है और वह भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर सागर तक जाती है और सगर के पुत्रों का उद्धार करती है।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ राजा भगीरथ द्वारा हिमालय पर घोर तपस्या करने से होता है। वे गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तप कर रहे हैं, ताकि उनके पूर्वज सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार हो सके। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं और उन्हें वरदान देते हैं कि गंगा पृथ्वी पर अवतरित होंगी। परन्तु वे यह भी कहते हैं कि गंगा के वेग को पृथ्वी सहन नहीं कर सकती, इसलिए भगीरथ को शिव जी को प्रसन्न करना होगा। भगीरथ पुनः तपस्या करते हैं और शिव जी प्रसन्न होकर गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लेते हैं। गंगा शिव की जटाओं से निकलकर पृथ्वी पर प्रवाहित होती हैं। भगीरथ उन्हें अपने रथ पर आगे-आगे ले जाते हैं और गंगा उनके पीछे-पीछे चलती हैं। अंत में गंगा सागर में मिलकर सगर पुत्रों की राख को भिगो देती हैं, जिससे उन्हें मोक्ष मिलता है। इस प्रकार यह सर्ग गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की पूरी कथा का वर्णन करता है, जो गंगा के महात्म्य और भगीरथ के अदम्य प्रयास को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ३५

(गंगा का अवतरण – भगीरथ का तप और सगर पुत्रों का उद्धार)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में सगर के यज्ञ और उनके पुत्रों के कपिल द्वारा भस्म होने का वर्णन हुआ। अब यह सर्ग राजा भगीरथ के अदम्य प्रयास का वर्णन करता है, जिन्होंने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा। यह कथा तप, दृढ़ संकल्प और देवताओं की कृपा का अद्भुत संगम है।

🌄 भगीरथ का तप और ब्रह्मा का प्रकट होना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततो गतेषु पुत्रेषु सगरः परवीरहा ।
चिन्तयामास कौसल्यं पुत्रशोकसमन्वितः ॥
अंशुमांस्तु तदा राजन् पितॄणां कार्यमुत्तमम् ।
करिष्यामीति संकल्प्य हिमवन्तमुपागमत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; गतेषु = मर जाने पर; पुत्रेषु = पुत्रों के; सगरः = सगर; परवीरहा = शत्रुओं के वीरों का नाश करने वाला; चिन्तयामास = सोचने लगा; कौसल्यं = कुशलता से; पुत्रशोकसमन्वितः = पुत्रों के शोक से युक्त; अंशुमान् = अंशुमान; तु = तो; तदा = तब; राजन् = हे राजन्; पितॄणाम् = पितरों का; कार्यम् = कार्य; उत्तमम् = उत्तम; करिष्यामि = करूँगा; इति = इस प्रकार; संकल्प्य = संकल्प करके; हिमवन्तम् = हिमालय पर; उपागमत् = पहुँचे।
📖 भावार्थ : पुत्रों के मारे जाने पर सगर शोक में डूब गए। तब अंशुमान ने पितरों के उद्धार का संकल्प कर हिमालय की ओर प्रस्थान किया।
🔍 व्याख्या : यहाँ सगर के पुत्रों की मृत्यु के बाद अंशुमान के प्रयास का उल्लेख है, जो आगे चलकर भगीरथ के तप का आधार बनता है।
॥ श्लोक ३-४ ॥
अंशुमानपि तं देशं न प्राप स पितामहः ।
ततो भगीरथो राजा पितॄणां कार्यसिद्धये ॥
तपस्तेपे सुतुमुलं हिमवत्यद्रिसत्तमे ।
वर्षाणामयुतं राजा पादाङ्गुष्ठेन तिष्ठता ॥
📖 भावार्थ : अंशुमान भी उस स्थान (जहाँ सगर पुत्र भस्म हुए थे) तक नहीं पहुँच पाए। तब भगीरथ ने पितरों के कार्य की सिद्धि के लिए हिमालय पर घोर तप किया। वे हजारों वर्षों तक एक पैर के अंगूठे के बल खड़े रहे।
॥ श्लोक ५-६ ॥
तस्य तुष्टो महादेवो ब्रह्मा लोकपितामहः ।
प्रत्यक्षं दर्शयामास वरदोस्मीति चाब्रवीत् ॥
भगीरथस्तु तं दृष्ट्वा प्रणम्य विधिवत् तदा ।
पितॄणां निधनं पप्रच्छ गङ्गायाश्चावतारणम् ॥
📖 भावार्थ : उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले – "मैं तुम्हें वरदान देने को तैयार हूँ।" भगीरथ ने उन्हें प्रणाम करके पितरों के विनाश का कारण और गंगा के अवतरण की याचना की।
॥ श्लोक ७-८ ॥
तच्छ्रुत्वा ब्रह्मा प्राहेदं वचनं तदा ।
गङ्गा त्रिपथगा देवी पृथिव्यां गम्यतामिति ॥
तस्य वेगं महीं वोढुं न शक्ता पृथिवी स्वयम् ।
तस्मात् शिवं समाराध्य स गङ्गां प्राप्स्यति ध्रुवम् ॥
📖 भावार्थ : यह सुन ब्रह्मा ने कहा – "देवी गंगा तीनों लोकों में बहने वाली हैं, उन्हें पृथ्वी पर भेज दिया जाएगा। परन्तु उनके वेग को पृथ्वी सहन नहीं कर सकती। इसलिए तुम शिव जी की आराधना करो, तभी गंगा का अवतरण संभव होगा।"
॥ श्लोक ९-१० ॥
एवमुक्त्वा महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः ।
तत्रैवान्तरधीयत भगीरथस्य पश्यतः ॥
ततो भगीरथो राजा शिवाराधनतत्परः ।
तपस्तेपे पुनर्घोरं शिवं च समतोषयत् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर ब्रह्मा वहीं अंतर्धान हो गए। तब भगीरथ शिव की आराधना में लीन हो गए और पुनः घोर तप करके शिव जी को प्रसन्न किया।

🕉️ शिव का वरदान और गंगा का शिव की जटाओं में समाना (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१२ ॥
ततः प्रसन्नो भगवान् शिवः परमया मुदा ।
उवाच मधुरं वाक्यं भगीरथमिदं तदा ॥
भगीरथ महाभाग त्वद्भक्त्या परमया मम ।
गङ्गां वोढास्मि ते पृष्ठे पातयिष्ये न संशयः ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न होकर भगवान शिव ने भगीरथ से कहा – "हे महाभाग भगीरथ! तुम्हारी परम भक्ति से प्रसन्न होकर मैं गंगा को अपनी जटाओं में धारण करूँगा और फिर उन्हें पृथ्वी पर उतारूँगा, इसमें संशय नहीं।"
🔍 व्याख्या : शिव ने गंगा के प्रचंड वेग को रोकने का दायित्व स्वीकार किया।
॥ श्लोक १३-१४ ॥
ततो गङ्गा महावेगा स्वर्गादवततार ह ।
शिवस्य मूर्ध्नि सहसा पतिता क्रोधमूर्च्छिता ॥
तां धारयामास शिवो जटामण्डलमध्यतः ।
न च सा निर्गमं लेभे भ्रममाणा ततस्ततः ॥
📖 भावार्थ : तब महावेगवती गंगा स्वर्ग से उतरी और क्रोध में भरकर शिव के मस्तक पर गिरीं। शिव ने उन्हें अपनी जटाओं के मध्य में धारण कर लिया। वह वहाँ से निकलने का मार्ग न पा सकीं और चारों ओर भ्रमण करने लगीं।
॥ श्लोक १५-१६ ॥
ततो भगीरथः पुनः शिवं प्रणम्य भक्तितः ।
प्रार्थयामास गङ्गायाः पृथिव्यां पतनं प्रति ॥
तस्य भक्त्या प्रसन्नात्मा शिवः प्राह शुभं वचः ।
मुच्यतामिति गङ्गां च जटाभ्यः प्राहिणोत् प्रभुः ॥
📖 भावार्थ : तब भगीरथ ने पुनः शिव को प्रणाम करके गंगा को पृथ्वी पर उतारने की प्रार्थना की। भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने गंगा को अपनी जटाओं से मुक्त कर दिया।
॥ श्लोक १७-१८ ॥
ततो गङ्गा शिवाज्जटाभ्यः सप्तधा प्रवहत् ।
ह्लादिनी पावनी चैव नलिनी च शुभा सरित् ॥
सप्तधा भिन्नमार्गा सा भगीरथरथानुगा ।
जगाम सागरं तूर्णं यत्र ते भस्मसात् कृताः ॥
📖 भावार्थ : तब गंगा शिव की जटाओं से सात धाराओं में प्रवाहित हुईं – ह्लादिनी, पावनी, नलिनी आदि। सात मार्गों में बँटी वह नदी भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चलकर शीघ्र ही सागर तक पहुँची, जहाँ वे (सगर पुत्र) भस्म हुए थे।
॥ श्लोक १९-२० ॥
तया संस्पृष्टमात्रास्ते सगरस्य सुता नृप ।
दिव्यं विमानमास्थाय प्रयाताः परमां गतिम् ॥
ततो भगीरथो राजा गङ्गया सहितो नृप ।
जलमादाय तीर्थानि कृत्वा विधिवदच्युतः ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्! गंगा के जल से स्पर्श होते ही सगर के पुत्र दिव्य विमानों में बैठकर परम गति को प्राप्त हुए। तब भगीरथ ने गंगा के साथ जल लेकर विधिपूर्वक तीर्थों का सेवन किया।

🌸 सगर पुत्रों का मोक्ष और गंगा की महिमा (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२२ ॥
एवं गङ्गा समाख्याता त्रिपथगा भागीरथी ।
पुण्या च पावनी चैव सर्वपापप्रणाशिनी ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं गङ्गावतरणं शुभम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार गंगा का वर्णन किया गया, जो त्रिपथगा (तीनों लोकों में बहने वाली), भागीरथी, पुण्यदायिनी, पावन करने वाली और सर्वपापों का नाश करने वाली है। जो इस गंगावतरण की शुभ कथा को नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
🔍 व्याख्या : यह फलश्रुति है, जो इस कथा के श्रवण के महात्म्य को बताती है।
॥ श्लोक २३-२४ ॥
ततो राजा महातेजा भगीरथः प्रतापवान् ।
गङ्गया सहितो रम्यां अयोध्यां पुनरागतः ॥
राज्यं कृत्वा सुधर्मेण पुत्रं स्वं स्थापयन् पदे ।
ततः स्वर्गं गतः श्रीमान् यत्र गत्वा न शोचते ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी प्रतापी राजा भगीरथ गंगा के साथ अयोध्या लौटे। धर्मपूर्वक राज्य करके अपने पुत्र को राज्य पर स्थापित किया और स्वयं स्वर्गलोक को चले गए, जहाँ जाकर कभी शोक नहीं होता।
॥ श्लोक २५-२६ ॥
एतद्वः सर्वमाख्यातं यथा गङ्गा समागता ।
भगीरथेन महता तपसा प्रापिता भुवि ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गङ्गां संपूजयेत् सदा ।
स्नानं दानं जपः स्तोत्रं गङ्गायां सफलं भवेत् ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार मैंने तुम सबको बताया कि किस प्रकार भगीरथ के महान तप से गंगा पृथ्वी पर आईं। इसलिए सदा प्रयत्नपूर्वक गंगा की पूजा करनी चाहिए। गंगा में स्नान, दान, जप और स्तोत्र सब सफल होते हैं।
॥ श्लोक २७-२८ ॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायणमनुत्तमम् ।
गङ्गावतरणं पुण्यं शृण्वन्ति ये समाहिताः ॥
ते यान्ति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचते ।
पुण्यात्मानो महात्मानो भक्त्या परमया युताः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार वाल्मीकि द्वारा रचित उत्तम रामायण में गंगावतरण की पुण्य कथा का वर्णन हुआ। जो इसे एकाग्रचित्त होकर सुनते हैं, वे पुण्यात्मा और महात्मा होकर परम भक्ति से युक्त होकर उस परम स्थान को प्राप्त होते हैं, जहाँ जाकर शोक नहीं होता।
॥ श्लोक २९-३० ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुत्र्यं पापप्रणाशनम् ।
गङ्गावतरणं नित्यं यः पठेत् सुसमाहितः ॥
सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते ।
इत्येतत् कथितं सर्वं गङ्गायाश्चरितं महत् ॥
📖 भावार्थ : यह कथा धन्य करने वाली, यशस्वी, आयु बढ़ाने वाली, पुत्र देने वाली और पापों का नाश करने वाली है। जो नित्य एकाग्रचित्त होकर इस गंगावतरण का पाठ करता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है और विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। इस प्रकार गंगा का महान चरित्र कहा गया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 भगीरथ का तप – पितृऋण और संकल्प का प्रतीक

भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए हजारों वर्षों तक कठोर तप किया। यह दर्शाता है कि पितृऋण चुकाने के लिए व्यक्ति को असंभव को भी संभव करना चाहिए। उनके नाम पर ही गंगा भागीरथी कहलाती हैं।

🌊 गंगा का अवतरण – दिव्यता और क्षमा का संगम

गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर आना दिव्यता के धरातल पर उतरने का प्रतीक है। शिव द्वारा उन्हें जटाओं में धारण करना उनके वेग को नियंत्रित करने का प्रतिनिधित्व करता है – अर्थात् सृष्टि के प्रचंड प्रवाह को भी ईश्वरीय कृपा से नियंत्रित किया जा सकता है।

🙏 गंगा और शिव का संबंध

शिव ने गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया, इसलिए गंगा शिव की शक्ति का भी प्रतीक बनीं। यह अर्धनारीश्वर के स्त्री-पुरुष समन्वय की भी झलक देता है।

🌟 सगर पुत्रों का मोक्ष – कर्म और कृपा का फल

सगर पुत्रों का भस्म होना उनके अहंकार का दण्ड था, परंतु भगीरथ के तप और गंगा के स्पर्श से उन्हें मोक्ष मिला। यह सिखाता है कि संतान के सत्कर्मों से पूर्वजों का उद्धार संभव है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि सच्चे संकल्प और अटूट तप से देवता भी प्रसन्न होते हैं और असंभव कार्य संभव हो जाते हैं। पितृऋण और धर्म के पालन में कोई बाधा बड़ी नहीं होती। गंगा का अवतरण केवल एक नदी का आगमन नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी शक्ति का धरती पर अवतरण है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।