बाल काण्ड अध्याय 27

दिव्य अस्त्रों की शिक्षा

बाल काण्ड का सत्ताईसवाँ सर्ग विश्वामित्र द्वारा श्रीराम को दिव्य अस्त्रों के दान का वर्णन करता है। ताटका वध से संतुष्ट होकर विश्वामित्र राम को सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं, जिनके प्रभाव से वे देवताओं, असुरों, गन्धर्वों और नागों को भी पराजित कर सकते हैं।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ ताटका वन में रात्रि विश्राम के पश्चात होता है। महायशस्वी विश्वामित्र, राम के ताटका वध से अत्यंत प्रसन्न होकर, उन्हें सभी दिव्य अस्त्र प्रदान करने का निश्चय करते हैं। वे राम से कहते हैं कि इन अस्त्रों के बल पर वे देवताओं, असुरों, गन्धर्वों और नागों को भी युद्ध में परास्त कर सकेंगे। तत्पश्चात विश्वामित्र स्नान एवं शुद्ध होकर पूर्वाभिमुख बैठते हैं और जप आरम्भ करते हैं। उनके जप मात्र से ही सभी दिव्यास्त्र स्वतः प्रकट होकर श्रीराम के समक्ष उपस्थित हो जाते हैं और हाथ जोड़कर उनकी सेवा में निवेदन करते हैं कि वे उनके सेवक हैं। राम अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उन अस्त्रों को ग्रहण कर उनसे अपने मन में निवास करने का अनुरोध करते हैं। तदनन्तर वे विश्वामित्र को प्रणाम कर आगे की यात्रा प्रारम्भ करते हैं। इस सर्ग में विश्वामित्र द्वारा प्रदत्त अस्त्रों की एक लम्बी सूची का वर्णन है, जिनमें दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, ऐन्द्रचक्र, वज्रास्त्र, शैव त्रिशूल, ब्रह्मशिर, ऐषीकास्त्र, ब्रह्मास्त्र, मोदकी और शिखरी गदाएँ, धर्मपाश, कालपाश, वरुणपाश, शुष्क-आर्द्र अशनियाँ, पिनाकास्त्र, नारायणास्त्र, आग्नेयास्त्र, वायव्यास्त्र, हयशिरा, क्रौञ्चास्त्र, शक्तियाँ, कङ्काल, मूसल, कपाल, किङ्किणी, नन्दनास्त्र, सम्मोहन, प्रस्वापन, प्रशमन, सौम्य, वर्षण, शोषण, संतापन, विलापन, मादन, मानवास्त्र, मोहनास्त्र, तामस, सौमन, संवर्त, दुर्जय, मौसल, सत्य, मायामय, तेजःप्रभ, शिशिर, त्वाष्ट्र, भास्वर एवं शीतेषु जैसे अनेक दिव्य अस्त्र सम्मिलित हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २७

(दिव्य अस्त्रों की शिक्षा – विश्वामित्र का श्रीराम को दिव्यास्त्र दान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में श्रीराम ने ताटका नामक भयंकर राक्षसी का वध करके ऋषियों की रक्षा की थी। इस सर्ग में महर्षि विश्वामित्र उनकी वीरता और आज्ञापालन से अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें समस्त दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्रदान करते हैं। यह सर्ग अस्त्र-विद्या के सम्पूर्ण ज्ञान और श्रीराम के परमात्मा स्वरूप को प्रकट करने वाला है [citation:1][citation:2]।

📿 विश्वामित्र की संतुष्टि और अस्त्र दान की घोषणा (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १ ॥
अथ तां रजनीमुष्य विश्वामित्रो महायशाः ।
प्रहस्य राघवं वाक्यमुवाच मधुराक्षरम् ॥
🔹 पदच्छेद : अथ = तत्पश्चात्; ताम् = उस; रजनीम् = रात्रि को; उष्य = बिताकर; विश्वामित्रः = विश्वामित्र; महायशाः = महायशस्वी; प्रहस्य = हँसकर; राघवम् = राघव (श्रीराम) से; वाक्यम् = वचन; उवाच = बोले; मधुराक्षरम् = मीठे अक्षरों वाला।
📖 भावार्थ : उस ताटका वन में रात्रि बिताकर महायशस्वी विश्वामित्र ने प्रातःकाल हँसते हुए मीठे वचनों में श्रीराम से कहा [citation:1][citation:2]।
॥ श्लोक २ ॥
परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते राजपुत्र महायशः ।
प्रीत्या परमया युक्तो ददाम्यस्त्राणि सर्वशः ॥
📖 भावार्थ : "महायशस्वी राजकुमार! मैं तुमसे अत्यंत संतुष्ट हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। परम प्रीति के साथ मैं तुम्हें सभी अस्त्र प्रदान करता हूँ [citation:1][citation:2]।"
॥ श्लोक ३-४ ॥
देवासुरगणान्वापि सगन्धर्वोरगान्भुवि ।
यैरमित्रान्प्रसह्याजौ वशीकृत्य जयिष्यसि ॥
तानि दिव्यानि भद्रं ते ददाम्यस्त्राणि सर्वशः ।
📖 भावार्थ : "जिन अस्त्रों के द्वारा तुम देवताओं, असुरों, गन्धर्वों और नागों को भी युद्ध में परास्त कर सकोगे, वे सभी दिव्य अस्त्र मैं तुम्हें प्रदान करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो [citation:1]।"
॥ श्लोक ५-६ ॥
दण्डचक्रं महद्दिव्यं तव दास्यामि राघव ।
धर्मचक्रं ततो वीर कालचक्रं तथैव च ॥
विष्णुचक्रं तथात्युग्रमैन्द्रं चक्रं तथैव च ।
वज्रमस्त्रं नरश्रेष्ठ शैवं शूलवरं तथा ॥
अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैव ऐषीकमपि राघव ।
ददामि ते महाबाहो ब्राह्ममस्त्रमनुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : "रघुनन्दन! मैं तुम्हें दिव्य महान दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, अत्युग्र ऐन्द्रचक्र, नरश्रेष्ठ! वज्रास्त्र, शिव का श्रेष्ठ त्रिशूल, ब्रह्मशिर अस्त्र, ऐषीकास्त्र और परम उत्तम ब्रह्मास्त्र प्रदान करता हूँ [citation:1][citation:2][citation:3]।"

🔥 अस्त्रों की विस्तृत सूची (श्लोक ७-२१)

॥ श्लोक ७-८ ॥
गदे द्वे चैव काकुत्स्थ मोदकी शिखरी शुभे ।
प्रदीप्ते नरशार्दूल प्रयच्छामि नृपात्मज ॥
धर्मपाशमहं राम कालपाशं तथैव च ।
वारुणं पाशमस्त्रं च ददाम्यहमनुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : "काकुत्स्थ! मैं तुम्हें दो शुभ और प्रदीप्त गदाएँ - मोदकी और शिखरी प्रदान करता हूँ। राम! मैं तुम्हें धर्मपाश, कालपाश, वरुणपाश और अनुत्तम वरुणास्त्र भी देता हूँ [citation:1][citation:2][citation:6]।"
॥ श्लोक ९-१० ॥
अशनी द्वे प्रयच्छामि शुष्कार्द्रे रघुनन्दन ।
ददामि चास्त्रं पैनाकमस्त्रं नारायणं तथा ॥
आग्नेयमस्त्रं दयितं शिखरं नाम नामतः ।
वायव्यं प्रथमं नाम ददामि तव चानघ ॥
📖 भावार्थ : "रघुनन्दन! मैं शुष्क और आर्द्र नामक दो अशनियाँ प्रदान करता हूँ। पिनाकास्त्र और नारायणास्त्र भी देता हूँ। अनघ! मैं तुम्हें अग्नि का प्रिय शिखर नामक आग्नेयास्त्र और प्रथम नामक वायव्यास्त्र भी देता हूँ [citation:1][citation:2][citation:3]।"
॥ श्लोक ११-१३ ॥
अस्त्रं हयशिरो नाम क्रौञ्चमस्त्रं तथैव च ।
शक्तिद्वयं च काकुत्स्थ ददामि तव राघव ॥
कङ्कालं मुसलं घोरं कापालमथ किङ्किणीम् ।
वधार्थं राक्षसां यानि ददाम्येतानि सर्वशः ॥
नन्दनं नाम विख्यातं विद्याधरमहास्त्रकम् ।
ददामि ते महाबाहो खड्गं सुवरमेव च ॥
📖 भावार्थ : "काकुत्स्थ राघव! मैं तुम्हें हयशिरा नामक अस्त्र, क्रौञ्चास्त्र और दो शक्तियाँ प्रदान करता हूँ। राक्षसों के वध के लिए घोर कङ्काल, मूसल, कापाल और किङ्किणी नामक अस्त्र भी तुम्हें देता हूँ। महाबाहो! विख्यात नन्दन नामक विद्याधर महास्त्र और उत्तम खड्ग भी तुम्हें प्रदान करता हूँ [citation:2][citation:3][citation:6]।"
॥ श्लोक १४-१७ ॥
सम्मोहनं रघुनन्द प्रस्वापनमथो तथा ।
प्रशमनं सौम्यमस्त्रं तथैव च प्रदापये ॥
वर्षणं शोषणं चैव संतापनविलापने ।
मादनं चैव काकुत्स्थ कामरूपं तथैव च ॥
मानवास्त्रं गान्धर्वं प्रस्वापनमथो तथा ।
प्रशमनं सौम्यमस्त्रं पैशाचं मोहनं तथा ॥
📖 भावार्थ : "रघुनन्दन! मैं तुम्हें सम्मोहन, प्रस्वापन, प्रशमन, सौम्य, वर्षण, शोषण, संतापन, विलापन, मादन, कामरूप, मानवास्त्र, गान्धर्व, प्रस्वापन, प्रशमन, सौम्य और पैशाच मोहन नामक अस्त्र प्रदान करता हूँ [citation:2][citation:3]।"
॥ श्लोक १८-२१ ॥
तामसं सौमनं चैव संवर्तं च महाबलम् ।
दुर्जयं मौसलं चैव सत्यमस्त्रं तथैव च ॥
मायामयं तथा चान्यत्सौरं तेजःप्रभं तथा ।
शिशिरं सोममस्त्रं च त्वाष्ट्रं चैव महाबलम् ॥
वैष्णवं भास्वरं चैव शीतेषुं च महाबलम् ।
एतानि सर्वाण्यस्त्राणि महाबलपराक्रमः ॥
आयान्तु सहसा राम मम जप्येन चोदिताः ।
गृहाणैतानि भद्रं ते राघवेन्द्र महाबल ॥
📖 भावार्थ : "महाबलशाली तामस, सौमन, संवर्त, दुर्जय, मौसल, सत्य, मायामय, सूर्य का तेजःप्रभ, सोम का शिशिर, त्वाष्ट्र, वैष्णव, भास्वर और शीतेषु - ये सभी अस्त्र मेरे जप से प्रेरित होकर तुम्हारे समक्ष आएँगे। महाबलशाली राघवेन्द्र! इन्हें ग्रहण करो। तुम्हारा कल्याण हो [citation:2][citation:3]।"

🙏 अस्त्रों का प्राकट्य और श्रीराम के प्रति समर्पण (श्लोक २२-२८)

॥ श्लोक २२-२३ ॥
इत्युक्त्वा स महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
जपयज्ञं समारेभे स्नात्वा नियममास्थितः ॥
ततो जप्येन विधिवद्विश्वामित्रो महातपाः ।
प्रादादस्त्राणि रामाय प्रीतिमान्सुसमाहितः ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र ने स्नान कर नियमपूर्वक जपयज्ञ आरम्भ किया। तत्पश्चात महातपस्वी विश्वामित्र ने विधिपूर्वक जप द्वारा प्रसन्न होकर श्रीराम को वे सभी अस्त्र प्रदान कर दिए [citation:2][citation:3]।
॥ श्लोक २४-२५ ॥
तानि दिव्यानि सर्वाणि विश्वामित्रः प्रतापवान् ।
जपयज्ञेन विधिवद्रामाय सुमहात्मने ॥
उपतस्थुर्महात्मानं राघवं समरुद्धम् ।
प्रणम्य शिरसा रामं कृताञ्जलिपुटाः स्थिताः ॥
📖 भावार्थ : उन सभी दिव्यास्त्रों ने विधिपूर्वक जपयज्ञ करते हुए प्रतापी विश्वामित्र से प्रेरित होकर महात्मा श्रीराम के समक्ष उपस्थित होकर उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गए [citation:2][citation:3]।
॥ श्लोक २६-२७ ॥
प्राञ्जलिश्च तदा राममूचुरस्त्राणि सर्वशः ।
इमे स्म किङ्करा राम प्रभूताः प्रभवस्व नः ॥
तथेति च प्रतिज्ञाय रामः प्रहसन्निव ।
मनसा चिन्तयामास गृहाणेति च तानि वै ॥
📖 भावार्थ : तब उन अस्त्रों ने हाथ जोड़कर श्रीराम से कहा - "हे राम! हम आपके सेवक हैं। हम पर आपकी पूर्ण सत्ता है।" राम ने मुस्कुराते हुए "तथास्तु" कहकर स्वीकार किया और मन ही मन उन्हें ग्रहण कर लिया [citation:2][citation:3]।
॥ श्लोक २८ ॥
ततस्तान्यस्त्रवर्याणि रामः प्रहसन्निव ।
प्रतिगृह्य महातेजा विश्वामित्रमपूजयत् ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात महातेजस्वी श्रीराम ने मुस्कुराते हुए उन सर्वोत्तम अस्त्रों को ग्रहण करके विश्वामित्र का पूजन किया और आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान किया [citation:2][citation:3]।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है। अगले सर्ग (अट्ठाईसवें) में इन अस्त्रों के उपसंहार (निवारण) की विधि बताई जाएगी [citation:1]।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 शस्त्र और अस्त्र का भेद

इस सर्ग के अन्तर्गत विश्वामित्र श्रीराम को दो प्रकार के आयुध प्रदान करते हैं - शस्त्र (हाथ में पकड़कर चलाए जाने वाले) और अस्त्र (मंत्रों द्वारा चलाए जाने वाले दिव्य प्रक्षेपास्त्र) [citation:1]।

✨ अस्त्रों का स्वतः प्राकट्य

अस्त्रों का स्वयं प्रकट होकर श्रीराम को सेवक भाव में समर्पित करना यह दर्शाता है कि श्रीराम स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं, जिनके समक्ष समस्त शक्तियाँ नतमस्तक होती हैं [citation:2][citation:3]।

🙏 विश्वामित्र का गुरु धर्म

विश्वामित्र न केवल श्रीराम को अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं, अपितु उनके चरित्र से संतुष्ट होकर उन्हें सम्पूर्ण विद्या का दान करते हैं। यह गुरु-शिष्य के आदर्श सम्बन्ध को दर्शाता है [citation:1][citation:2]।

🌟 अस्त्रों की संख्या और विविधता

इस सर्ग में लगभग ५० से अधिक अस्त्रों के नाम गिनाए गए हैं, जो उस समय की अस्त्र-विद्या की समृद्ध परम्परा का द्योतक है। प्रत्येक अस्त्र किसी न किसी देवता से सम्बद्ध है और उसका विशिष्ट प्रभाव है [citation:2][citation:3][citation:6]।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची सिद्धियाँ और शक्तियाँ योग्यता एवं निष्ठा के समक्ष स्वयं उपस्थित होती हैं। श्रीराम ने गुरु की आज्ञा का पालन किया और ताटका जैसे भयंकर राक्षस का वध किया, जिससे गुरु प्रसन्न हुए और उन्होंने समस्त विद्या का दान कर दिया। यह दर्शाता है कि गुरु-सेवा और धर्मपालन ही सबसे बड़ी सिद्धि है [citation:1][citation:2][citation:3]।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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