बाल काण्ड अध्याय 26

ताड़का का वध

बाल काण्ड के षड्विंश सर्ग में महर्षि विश्वामित्र के आदेश पर श्रीराम द्वारा भयानक राक्षसी ताड़का के वध का वर्णन है। विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को लेकर जब घोर वन में पहुँचते हैं, तब ताड़का उन पर आक्रमण करती है। राम उसे मारने में संकोच करते हैं क्योंकि वह स्त्री है, किंतु विश्वामित्र के उपदेश से वे उसका वध कर देते हैं।

विवरण

यह सर्ग महर्षि विश्वामित्र द्वारा राम और लक्ष्मण को ताड़का के वध के लिए प्रेरित करने की कथा प्रस्तुत करता है। विश्वामित्र अपने यज्ञ की रक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को साथ लेकर चलते हैं। मार्ग में एक भयंकर निर्जन वन आता है, जो ताड़का नामक राक्षसी के आतंक से त्रस्त है। विश्वामित्र राम से उसे मारने का आग्रह करते हैं। राम स्त्री-वध के कारण कुछ संकोच में पड़ते हैं, तब विश्वामित्र उन्हें धर्म-अधर्म का उपदेश देते हुए बताते हैं कि आततायी स्त्री का वध भी उचित है। तब राम धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर ताड़का पर बाण चलाते हैं। ताड़का क्रोधित होकर प्रचंड रूप धारण करती है, किंतु राम का बाण उसे मार गिराता है। देवता पुष्पवर्षा करते हैं और विश्वामित्र राम की प्रशंसा करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २६

(ताड़का का वध – राम का प्रथम राक्षस संहार)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षड्विंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को साथ लेकर अपने आश्रम की ओर चलते हैं। मार्ग में एक भयंकर वन पड़ता है, जो राक्षसी ताड़का के आतंक से सूना पड़ा है। विश्वामित्र राम को उस राक्षसी के वध का आदेश देते हैं। यह सर्ग राम के धर्मसंकट और उसके समाधान का अद्भुत वर्णन करता है।

🌲 विश्वामित्र का आदेश और ताड़का का परिचय (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततः प्रविश्य तं देशं घोरं सत्त्वसमाकुलम् ।
विश्वामित्रो महातेजा रामं वचनमब्रवीत् ॥
एतद्वनं महाभाग यक्षराक्षससेवितम् ।
ताड़का नाम दैतेयी बलेनाप्रतिमा भुवि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रविश्य = प्रवेश करके; तम् = उस; देशम् = प्रदेश में; घोरम् = भयंकर; सत्त्वसमाकुलम् = जीवों से व्याप्त; विश्वामित्रः = विश्वामित्र; महातेजाः = महातेजस्वी; रामम् = राम से; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; एतत् = यह; वनम् = वन; महाभाग = महाभाग; यक्षराक्षससेवितम् = यक्षों और राक्षसों से सेवित; ताड़का = ताड़का; नाम = नाम; दैतेयी = दैत्य स्त्री; बलेन = बल में; अप्रतिमा = अतुलनीय; भुवि = पृथ्वी पर।
📖 भावार्थ : उस भयंकर, जीवों से भरे हुए प्रदेश में प्रवेश करके महातेजस्वी विश्वामित्र ने राम से कहा – “हे महाभाग! यह वन यक्षों और राक्षसों से सेवित है। यहाँ ताड़का नाम की दैत्य स्त्री रहती है, जो पृथ्वी पर बल में अतुलनीय है।”
॥ श्लोक ३-४ ॥
सुन्दस्य भार्या दैत्यस्य मारीचस्य च मातरम् ।
ताड़कां नाम दुर्धर्षां राम त्वं निहनिष्यसि ॥
इयं हि बलसम्पन्ना विघ्नं कर्तुं समागता ।
यज्ञस्य मम काकुत्स्थ तस्मादेनां निहन्तु अर्हसि ॥
📖 भावार्थ : “यह सुन्द नामक दैत्य की पत्नी और मारीच की माता है। दुर्धर्षा ताड़का का हे राम, तुम वध करोगे। यह बलसम्पन्ना मेरे यज्ञ में विघ्न डालने के लिए आई है, इसलिए हे काकुत्स्थ, तुम इसका वध करने योग्य हो।”
॥ श्लोक ५-६ ॥
इत्युक्त्वा स महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः ।
तूष्णीमासीद्धनुष्पाणी रामौ तौ समवस्थितौ ॥
ताड़का चापि संक्रुद्धा दृष्ट्वा तौ पुरुषर्षभौ ।
अभ्यधावत वेगेन महामेघस्वना तदा ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गए। धनुष धारण किए हुए वे दोनों राम-लक्ष्मण स्थित हो गए। ताड़का ने भी उन दोनों पुरुषश्रेष्ठों को देखकर क्रुद्ध होकर, महामेघ के समान गर्जना करते हुए वेग से उन पर आक्रमण किया।

🤔 राम का संशय और गुरु का उपदेश (श्लोक ९-१६)

॥ श्लोक ७-८ ॥
तामापतन्तीं दृष्ट्वैव रामः परमधार्मिकः ।
चकार मतिं तस्यां वै वधाय च निहन्तवे ॥
लक्ष्मणं चाब्रवीद्वीरः पश्य वीर्यं रिपोर्मम ।
इमां दुष्टां महाकायां नाशयिष्ये न संशयः ॥
📖 भावार्थ : उस आक्रमणकारिणी को देखकर परम धार्मिक राम ने उसके वध का निश्चय किया। और वीर राम ने लक्ष्मण से कहा – “हे वीर, मेरे शत्रु के वीर्य को देखो। इस दुष्टा महाकाया राक्षसी को मैं नष्ट कर दूँगा, इसमें संशय नहीं।”
॥ श्लोक ९-१० ॥
ततः स संशयं कृत्वा स्त्रीत्वे धर्मविनिश्चयम् ।
न चैनां हन्तुमिच्छामि स्त्री स्वभावेन दारुणाम् ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महातपाः ।
उवाच रामं धर्मज्ञं धर्म्यं वचनमर्थवत् ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने स्त्री-हत्या के धर्म-विनिश्चय को लेकर संशय किया और सोचा – “स्त्री होते हुए भी यह दारुण है, फिर भी मैं इसका वध नहीं करना चाहता।” उनके उस वचन को सुनकर महातपस्वी विश्वामित्र ने धर्मज्ञ राम से धर्मयुक्त और अर्थपूर्ण वचन कहे।
॥ श्लोक ११-१२ ॥
पुरा कृतयुगे राम राजा नाम नरेश्वरः ।
मान्धाता चक्रवर्ती स बालं स्त्रियमवासृजत् ॥
यदा तु धर्मसंयुक्तं वधं स्त्रीणां न विद्यते ।
तदा पापीयसीः सर्वाः स्त्रियो हन्तुं न संशयः ॥
📖 भावार्थ : “हे राम, पूर्व कृतयुग में मान्धाता नामक चक्रवर्ती राजा ने भी स्त्री-बालकों का वध किया था। जब स्त्रियाँ धर्म से च्युत हो जाती हैं और पापाचरण करती हैं, तो उनका वध करना उचित ही है, इसमें संशय नहीं।”
॥ श्लोक १३-१४ ॥
तस्मात्त्वमपि काकुत्स्थ निहंस्त्वेनां न संशयः ।
आततायिनमायान्तं हन्यादेव न संशयः ॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा विश्वामित्रस्य धीमतः ।
रामः परमधर्मज्ञो जघान ताड़कां तदा ॥
📖 भावार्थ : “इसलिए हे काकुत्स्थ, तुम भी निःसंदेह इसका वध करो। आततायी को आया देखकर उसे मार डालना ही उचित है।” धीमान् विश्वामित्र के इस वचन को सुनकर परम धर्मज्ञ राम ने ताड़का का वध कर दिया।

🏹 ताड़का का वध और देवताओं की पुष्पवर्षा (श्लोक १७-२४)

॥ श्लोक १५-१६ ॥
ततः कृत्वा महत्कर्म रामः परबलार्दनः ।
ताड़कां निहतां दृष्ट्वा विश्वामित्रमथाब्रवीत् ॥
इयं हता महाभाग राक्षसी भीमदर्शना ।
यज्ञविघ्नकरी घोरा मुनिशापभयावहा ॥
📖 भावार्थ : तब परबल का नाश करने वाले राम ने वह महान् कर्म किया। ताड़का के मारे जाने पर विश्वामित्र से कहा – “हे महाभाग! यह भीमदर्शना, यज्ञविघ्नकारिणी, घोर राक्षसी मारी गई, जो मुनियों के शाप के समान भयावह थी।”
॥ श्लोक १७-१८ ॥
ततो देवाः समागम्य सिद्धाश्च परमर्षयः ।
प्रशशंसुर्महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ॥
दिव्यैः पुष्पैः सुगन्धैश्च ववृषुस्तं नभस्तलात् ।
वाद्यान्यवादयन् हृष्टा गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥
📖 भावार्थ : तब देवता, सिद्ध और परमर्षि वहाँ एकत्र हुए और सत्यपराक्रमी महात्मा राम की प्रशंसा की। उन पर आकाश से दिव्य सुगन्धित पुष्पों की वर्षा की। गन्धर्व और अप्सराओं के समूहों ने हर्षित होकर वाद्य बजाए।
॥ श्लोक १९-२० ॥
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा रामं परमधार्मिकम् ।
उवाच परमप्रीतो वत्स यज्ञः समृध्यताम् ॥
त्वया निहतया राम यज्ञविघ्नो विनाशितः ।
इमं देशं सुराः सर्वे सदा निवसन्तु वै ॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा विश्वामित्र अत्यन्त प्रसन्न होकर परमधार्मिक राम से बोले – “हे वत्स! तुम्हारे द्वारा इसके मारे जाने से यज्ञ का विघ्न नष्ट हो गया। अब इस देश में सभी देवता सदा निवास करें।”
॥ श्लोक २१-२२ ॥
इत्युक्त्वा तं समाश्वास्य रामं सत्यपराक्रमम् ।
जगाम सहसा तत्र यत्राश्रमपदं महत् ॥
ततः प्रभृति तं देशं शिवं निर्विघ्नमेव च ।
चक्रुः सर्वे महात्मानो रामस्य च महात्मनः ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर उन्होंने सत्यपराक्रमी राम को आश्वस्त किया और शीघ्र ही उस स्थान की ओर प्रस्थान किया जहाँ उनका बड़ा आश्रम था। तब से उस प्रदेश को सभी महात्माओं ने शिव और निर्विघ्न कर दिया, महात्मा राम के प्रभाव से।
॥ श्लोक २३-२४ ॥
एतद्वः सर्वमाख्यातं यथा वधमथाब्रुवन् ।
ताड़काया महाबाहो रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥
ब्रह्मघ्नी ब्राह्मणैः सार्धं यज्ञविघ्नकरी च या ।
सा हता रामवीर्येण ताड़का पापकारिणी ॥
📖 भावार्थ : हे महाबाहो! इस प्रकार तुम सबको बता दिया गया कि किस प्रकार अक्लिष्टकर्मा राम ने ताड़का का वध किया। जो ब्रह्मघ्नी थी, ब्राह्मणों के साथ द्वेष रखती थी, यज्ञविघ्नकारिणी थी, वह पापकारिणी ताड़का राम के वीर्य से मारी गई।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ धर्मसंकट और समाधान

राम का स्त्री-वध में संकोच उनकी धर्मपरायणता दर्शाता है। विश्वामित्र का उपदेश ‘आततायी’ के लक्षण बताते हुए उसे मारने का समर्थन करता है। यह आगे रावण-वध में भी काम आता है।

🌳 ताड़का का चरित्र

ताड़का असुर सुन्द की पत्नी और मारीच की माता है। उसके आतंक से पूरा वन उजड़ गया था। उसका वध वन को पुनः सुरक्षित बनाता है और यज्ञ की सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

🙏 गुरु का महत्त्व

विश्वामित्र के निर्देश पर ही राम ताड़का का वध करते हैं। यह दर्शाता है कि गुरु के आदेश का पालन ही परम धर्म है। राम गुरुवाक्य का पालन करके धर्म की रक्षा करते हैं।

🌟 राम की वीरता

ताड़का का वध राम के बाल्यकाल का प्रथम महान् कार्य है। यह उनके असाधारण बल और धनुर्विद्या में निपुणता को प्रकट करता है। देवताओं की पुष्पवर्षा उनके दिव्यत्व की पुष्टि करती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धर्म के मार्ग पर चलते हुए भी कभी-कभी कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। आततायी का वध करना धर्मसम्मत है। गुरु के आदेश का पालन करते हुए राम ने अपने कर्तव्य का पालन किया, और उन्हें देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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