बाल काण्ड अध्याय 21

वशिष्ठ का परामर्श

बाल काण्ड का एकविंशतितम सर्ग राजा दशरथ को गुरु वशिष्ठ द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण परामर्श का वर्णन करता है। इसमें वशिष्ठ राजा को श्रृंगवेरपुर के राजा गुह से मित्रता करने और गंगा नदी पार करने की योजना बनाने की सलाह देते हैं। यह सर्ग राजा दशरथ के विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को भेजने के निर्णय की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ राजा दशरथ द्वारा ऋषि विश्वामित्र को राम और लक्ष्मण सौंपने के बाद उत्पन्न चिंता और वैराग्य भाव से होता है। पुत्रों के वियोग में व्याकुल राजा दशरथ को गुरु वशिष्ठ सांत्वना देते हैं और धैर्य धारण करने का उपदेश देते हैं। वशिष्ठ राजा को समझाते हैं कि विश्वामित्र परम तेजस्वी ऋषि हैं और उनकी सुरक्षा में राम-लक्ष्मण का कोई अहित नहीं हो सकता। वशिष्ठ राजा को यह भी सलाह देते हैं कि अब अयोध्या लौटने की तैयारी करनी चाहिए और मार्ग में श्रृंगवेरपुर के निषाद राज गुह से भेंट कर उनसे मित्रता स्थापित करनी चाहिए। गुह की सहायता से गंगा नदी को सुरक्षित पार किया जा सकता है। वशिष्ठ के इस परामर्श से राजा दशरथ को कुछ शांति मिलती है और वे अयोध्या लौटने की तैयारी करते हैं। यह सर्ग राजा के पितृवात्सल्य और गुरु के शीतल एवं कुशल मार्गदर्शन का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है, जो आगामी घटनाओं का मार्ग प्रशस्त करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २१

(वशिष्ठ का परामर्श – पितृवियोग और गुरु का मार्गदर्शन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में ऋषि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए अपने आश्रम ले गए। अब यह सर्ग पुत्रों के वियोग में व्याकुल राजा दशरथ की मनःस्थिति और गुरु वशिष्ठ द्वारा दिए गए मार्गदर्शन का वर्णन करता है। वशिष्ठ न केवल राजा को सांत्वना देते हैं, बल्कि उन्हें एक कुशल राजनीतिज्ञ की भाँति भविष्य की राह भी सुझाते हैं। यह सर्ग पितृहृदय की करुणा और गुरु के ज्ञान का अद्भुत समन्वय है।

😢 पुत्र-वियोग में राजा का विलाप (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततो रामे गते राजा दशरथः सहानुजे ।
विललाप स दुःखार्तो वैदेहीव विवासिता ॥
गते तु तस्मिन्मेधावी कुशलो धर्मसंहितः ।
विश्वामित्रो महातेजा रामेण सह लक्ष्मणः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामे = राम के; गते = चले जाने पर; राजा = राजा; दशरथः = दशरथ; सहानुजे = अनुज (लक्ष्मण) सहित; विललाप = विलाप करने लगे; सः = वे; दुःखार्तः = दुःख से आर्त; वैदेहीव = जैसे वैदेही (सीता); विवासिता = वनवास को भेज दी गयी हो। गते तु = चले जाने पर; तस्मिन् = उस (राम के); मेधावी = बुद्धिमान; कुशलः = कुशल; धर्मसंहितः = धर्मयुक्त; विश्वामित्रः = विश्वामित्र; महातेजाः = महातेजस्वी; रामेण = राम के; सह = साथ; लक्ष्मणः = लक्ष्मण थे।
📖 भावार्थ : लक्ष्मण सहित राम के चले जाने पर राजा दशरथ दुःख से व्याकुल होकर ऐसे विलाप करने लगे जैसे वनवास को भेजी गयी वैदेही (सीता) विलाप करती है। उस बुद्धिमान, धर्मज्ञ महातेजस्वी विश्वामित्र के राम और लक्ष्मण के साथ चले जाने पर राजा को अत्यन्त दुःख हुआ।
🔍 व्याख्या : यहाँ सीता के दृष्टांत से राम के वियोग में राजा की दशा का वर्णन अत्यंत मार्मिक है। राजा का हृदय पुत्र-प्रेम से विह्वल है।
॥ श्लोक ३-४ ॥
न चैनमार्तं संप्रेक्ष्य राजानं दीनमानसम् ।
उवाच वचनं कश्चित् तूष्णीमासन् सुमन्त्रिणः ॥
तान् बाष्पकलया वाचा राजा दशरथोऽब्रवीत् ।
यथा गतस्तत्र मुनिर्यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥
📖 भावार्थ : उस आर्त, दीनमानस राजा को देखकर मंत्रीगण भी कुछ न बोल सके, वे सब चुप हो गए। तब राजा दशरथ ने बाष्पयुक्त वाणी से कहा – “वे मुनि जहाँ राम और लक्ष्मण को ले गए, मैं भी वहीं जाऊँगा।”
🔍 व्याख्या : राजा की व्याकुलता इतनी बढ़ जाती है कि वे स्वयं भी उनके पीछे जाने की बात कहते हैं। यह उनके असीम पुत्रप्रेम को दर्शाता है।
॥ श्लोक ५-६ ॥
विना रामं सुमित्राया वत्सं लक्ष्मणमेव च ।
न क्षणमपि जीवेयमहमद्येति चिन्तयन् ॥
तं विलपन्तं राजानं दृष्ट्वा दीनमनाः सुतः ।
वशिष्ठो वाक्यमश्रौषीद्धितं सत्यं हितं तदा ॥
📖 भावार्थ : राम और सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण के बिना मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता – ऐसा सोचते हुए राजा विलाप कर रहे थे। उन्हें इस प्रकार विलाप करते देख दीनमना वशिष्ठ जी ने उस समय हितकारी और सत्य वचन कहे।

🧘 गुरु वशिष्ठ का धैर्योपदेश और आश्वासन (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-८ ॥
मा शुचः पुरुषव्याघ्र नैष दोषस्तवानघ ।
विश्वामित्रो महातेजाः सर्वैः संपूजितो गुणैः ॥
बलवान् मेधवी शूरः सर्वविद्याविशारदः ।
वेदवेदाङ्गविच्छ्रेष्ठो ब्रह्मर्षिः संशितव्रतः ॥
📖 भावार्थ : गुरु वशिष्ठ ने कहा – हे पुरुषव्याघ्र! शोक मत कीजिए। हे अनघ! यह आपका दोष नहीं है। महातेजस्वी विश्वामित्र सभी गुणों से संपूजित हैं। वे बलवान्, बुद्धिमान्, शूरवीर, सर्वविद्या में निष्णात, वेद-वेदांग के ज्ञाता, श्रेष्ठ और कठोर व्रत धारण करने वाले ब्रह्मर्षि हैं।
॥ श्लोक ९-१० ॥
तेन सार्धं गतौ वीरौ रामलक्ष्मणवीर्यौ ।
न तयोर्भयमस्तीह न चापि विपदं गतौ ॥
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा राजा दशरथोऽब्रवीत् ।
न मे तुष्टिर्महाप्राज्ञ विश्वामित्रे महात्मनि ॥
📖 भावार्थ : उन्हीं के साथ राम और लक्ष्मण गए हैं, अत: उन दोनों वीरों को कोई भय नहीं है और न ही वे किसी विपदा में पड़ सकते हैं। विश्वामित्र के वचन सुनकर राजा दशरथ ने कहा – हे महाप्राज्ञ! मुझे महात्मा विश्वामित्र पर कोई संतोष नहीं है (मेरा मन असंतुष्ट है)।
॥ श्लोक ११-१२ ॥
बालौ तौ न च संप्राप्तौ कामार्थौ न च तेजसी ।
कथं तौ धारयिष्येते तपोवननिवासिनौ ॥
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा वेदिता सर्वधर्मणाम् ।
रक्षिता च वधे चापि न तयोर्भयमस्ति वै ॥
📖 भावार्थ : राजा ने कहा – वे दोनों बालक हैं और अभी पूर्ण रूप से काम एवं तेज को प्राप्त नहीं हुए हैं। तपोवन में रहकर वे कैसे धारण कर पाएँगे? वशिष्ठ ने उत्तर दिया – विश्वामित्र धर्मात्मा हैं और सभी धर्मों के ज्ञाता हैं। वे उनकी रक्षा करेंगे और यदि वध का प्रसंग भी आया तो वे स्वयं समर्थ हैं। अतः उन दोनों को कोई भय नहीं है।
🔍 व्याख्या : राजा की आशंका स्वाभाविक है। वशिष्ठ पुनः विश्वामित्र के सामर्थ्य का वर्णन कर राजा को आश्वस्त करते हैं।

🗺️ अयोध्या प्रत्यावर्तन और निषादराज गुह से मित्रता का परामर्श (श्लोक १३-१९)

॥ श्लोक १३-१४ ॥
तस्मात् त्वमद्य राजेन्द्र गुरुकार्यमनुत्तमम् ।
कुरुष्व विधिवद् राजन् मा चिरं याहि मा चिरम् ॥
श्रृङ्गवेरपुरे राजा गुहो नाम महाबलः ।
सखा ते सत्यसन्धोऽयमुपयास्यति धार्मिकः ॥
📖 भावार्थ : वशिष्ठ ने कहा – अत: हे राजेन्द्र! आप आज ही इस उत्तम गुरुकार्य (विश्वामित्र की सहायता) को विधिपूर्वक करें। हे राजन्! शीघ्र ही (अयोध्या को) प्रस्थान करें, विलम्ब न करें। श्रृंगवेरपुर में गुह नामक महाबली राजा है। वह आपका सखा है, सत्यसन्ध है और धार्मिक है। वह आपसे मिलने आएगा।
🔍 व्याख्या : वशिष्ठ का यह परामर्श अत्यन्त दूरदर्शितापूर्ण है। वे राजा को तत्काल अयोध्या लौटने की सलाह देते हैं और मार्ग में निषादराज गुह से मित्रता का लाभ उठाने को कहते हैं।
॥ श्लोक १५-१६ ॥
स ते सहायो राजेन्द्र गंगाकच्छे वसन् सदा ।
सुखं त्वमवगाह्यैनां गंगां सागरगामिनीम् ॥
तत्राश्रमपदे रम्ये गुहस्य भरतस्य च ।
वत्स्यामः सुखमद्यैव मा चिरं याहि मा चिरम् ॥
📖 भावार्थ : हे राजेन्द्र! वह गंगा के तट पर सदा निवास करने वाला आपका सहायक है। आप सुखपूर्वक इस सागरगामिनी गंगा में उतरिए (पार कीजिए)। वहाँ गुह और भरत के रम्य आश्रम पद में हम आज ही सुखपूर्वक रहेंगे। अत: शीघ्र चलिए, विलम्ब न कीजिए।
🔍 व्याख्या : यहाँ भरत शब्द से अभिप्राय दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत से है, जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।
॥ श्लोक १७-१८ ॥
एवमुक्त्वा तु राजानं वशिष्ठो भगवानृषिः ।
विरराम महातेजाः स राजा वाक्यमब्रवीत् ॥
यथा वशिष्ठो भगवान् प्राह मां पुरुषर्षभः ।
तत्करिष्ये न मे विघ्नः कर्तव्यो धर्मसंहितः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार राजा से कहकर भगवान् महातेजस्वी ऋषि वशिष्ठ रुक गए। तब राजा ने कहा – जैसे भगवान् पुरुषर्षभ वशिष्ठ ने मुझसे कहा है, वैसा ही मैं करूँगा। इस धर्मयुक्त कार्य में मेरे लिए कोई विघ्न नहीं होना चाहिए।
॥ श्लोक १९ ॥
इत्युक्त्वा राजशार्दूलः प्रययौ सह मन्त्रिभिः ।
वशिष्ठेन च धर्मज्ञः श्रृङ्गवेरपुरं प्रति ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर धर्मज्ञ राजशार्दूल दशरथ मंत्रियों और वशिष्ठ के साथ श्रृंगवेरपुर की ओर प्रस्थित हुए।
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोक राजा द्वारा गुरु के परामर्श को पूर्णतः स्वीकार कर तुरंत कार्यवाही करने को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👨‍👦 पितृवात्सल्य की पराकाष्ठा

इस सर्ग में राजा दशरथ का पुत्रों के प्रति प्रेम अत्यंत मार्मिक रूप में प्रकट हुआ है। उनका विलाप, उनकी व्याकुलता और उनका असंतोष पितृहृदय की सच्ची अभिव्यक्ति है।

🧘 गुरु का कर्तव्य और मार्गदर्शन

वशिष्ठ केवल धार्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि एक कुशल राजनीतिज्ञ और मार्गदर्शक भी हैं। वे राजा की मानसिक व्यथा को समझते हैं और उचित दिशा-निर्देश देते हैं।

🤝 निषादराज गुह से मित्रता की नींव

वशिष्ठ का यह परामर्श अत्यन्त दूरदर्शितापूर्ण है। गुह से मित्रता का यह सुझाव आगे चलकर वनवास के समय राम के लिए अत्यन्त सहायक सिद्ध होता है। यह राजनीति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

🌟 भविष्य की घटनाओं का संकेत

इस सर्ग में जहाँ राम-लक्ष्मण के जीवन की अगली यात्रा का मार्ग प्रशस्त होता है, वहीं गुह के उल्लेख से आगामी वनवास काल की घटनाओं की ओर भी संकेत मिलता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में दुःख और वियोग के समय धैर्य धारण करना चाहिए और गुरुजनों के मार्गदर्शन का पालन करना चाहिए। राजा दशरथ की तरह हमें भी कठिन परिस्थितियों में विवेक और धैर्य नहीं खोना चाहिए। गुरु वशिष्ठ का परामर्श यह भी सिखाता है कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए उचित योजना और मित्रता का निर्माण कैसे करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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