बाल काण्ड अध्याय 20

दशरथ की अनिच्छा

बाल काण्ड का विश्वामित्र राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को अपने साथ यज्ञ की रक्षा के लिए भेजने का अनुरोध करते हैं। राजा दशरथ पुत्रों के बाल्यावस्था और असमर्थता का हवाला देकर उन्हें भेजने में अनिच्छा प्रकट करते हैं। वे स्वयं सेना सहित राक्षसों से युद्ध करने का प्रस्ताव रखते हैं।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ महर्षि विश्वामित्र के अयोध्या आगमन और राजा दशरथ द्वारा उनका भव्य स्वागत करने के पश्चात होता है। विश्वामित्र राजा से कहते हैं कि वे एक यज्ञ करना चाहते हैं, किंतु राक्षस मारीच और सुबाहु उसमें विघ्न डालते हैं। वे राम और लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए माँगते हैं। राजा दशरथ यह सुनकर व्याकुल हो जाते हैं। उन्हें राम और लक्ष्मण अभी बालक ही लगते हैं, युद्ध-कौशल से अनभिज्ञ। वे विश्वामित्र से विनती करते हैं कि वे किसी और वरदान की माँग करें, यहाँ तक कि वे स्वयं चलकर राक्षसों से युद्ध करेंगे। वे राम-लक्ष्मण की आयु, कोमलता और युद्ध की असमर्थता का वर्णन करते हैं। विश्वामित्र राजा की अनिच्छा को समझते हैं, किंतु वे अपने निर्णय पर अटल रहते हैं। वे कहते हैं कि राम में असीम शक्ति है, वे राक्षसों का वध कर सकते हैं, और उनके साथ रहने से राम का कल्याण ही होगा। राजा दशरथ अंततः गुरु वसिष्ठ के परामर्श पर विश्वामित्र के अनुरोध को स्वीकार कर लेते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २०

(दशरथ की अनिच्छा – राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने में संकोच)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ विंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में विश्वामित्र का अयोध्या में भव्य स्वागत हुआ। अब वे अपने आगमन का प्रयोजन बताते हैं। वे राजा दशरथ से राम और लक्ष्मण को अपने साथ यज्ञ-रक्षा हेतु भेजने का अनुरोध करते हैं। यह सुनते ही राजा दशरथ के हृदय में पुत्र-प्रेम का वेग उमड़ पड़ता है और वे पुत्रों को भेजने में अपनी गहरी अनिच्छा प्रकट करते हैं। यह सर्ग पिता के हृदय की करुणा, पुत्रों के प्रति ममता, और कर्तव्य-पालन के मध्य द्वन्द्व का अद्भुत चित्रण करता है।

📿 विश्वामित्र का प्रस्ताव – राम-लक्ष्मण की माँग (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततो विश्वामित्रः प्राह राजानं दशरथं वचः ।
राज्ञां वंशविभूतानां कीर्तिमन्तं महायशाः ॥
यज्ञो मे क्रियते राजन् द्विविधो रक्षसां वधे ।
तत्र मां विघ्नकर्तारौ द्वौ राक्षसौ बलोत्कटौ ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; विश्वामित्रः = विश्वामित्र ने; प्राह = कहा; राजानम् = राजा को; दशरथम् = दशरथ; वचः = वचन; राज्ञाम् = राजाओं में; वंशविभूतानाम् = वंश की विभूति वालों में; कीर्तिमन्तम् = कीर्तिमान्; महायशाः = महायशस्वी; यज्ञः = यज्ञ; मे = मेरा; क्रियते = किया जाता है; राजन् = हे राजन्; द्विविधः = दो प्रकार का; रक्षसाम् = राक्षसों के; वधे = वध के लिए; तत्र = वहाँ; माम् = मुझे; विघ्नकर्तारौ = विघ्न करने वाले; द्वौ = दो; राक्षसौ = राक्षस; बलोत्कटौ = अत्यधिक बलवान्।
📖 भावार्थ : तब महायशस्वी विश्वामित्र ने राजा दशरथ से कहा – हे राजन्! राजाओं में कीर्तिमान और वंश की विभूति से युक्त! मैं एक यज्ञ कर रहा हूँ जो राक्षसों के वध के लिए दो प्रकार से किया जाता है। उस यज्ञ में दो अत्यन्त बलशाली राक्षस (मारीच और सुबाहु) मुझे विघ्न डालते हैं।
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र सीधे अपनी समस्या बताते हैं। वे राजा की कीर्ति और वंश की प्रशंसा कर उन्हें सहायता के लिए तैयार करना चाहते हैं।
॥ श्लोक ३-४ ॥
तौ राक्षसौ मारीचश्च सुबाहुश्च महाबलौ ।
यज्ञघ्नौ मम नित्यं तौ त्वं निहन्तुं समर्हसि ॥
न हि मे यज्ञनिर्विघ्नः सिद्धिमेति नराधिप ।
त्वं हि शक्तो नरश्रेष्ठ तौ निहन्तुं महाबलौ ॥
📖 भावार्थ : वे दो राक्षस हैं – मारीच और सुबाहु, महाबलवान्। वे नित्य मेरे यज्ञ का विघ्न करते हैं। आप उनका वध करने योग्य हैं। हे नराधिप! मेरा यज्ञ विघ्नरहित होकर सिद्ध नहीं हो पाता। हे नरश्रेष्ठ! आप उन दोनों महाबलवान् राक्षसों का वध करने में समर्थ हैं।
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र राजा को उनकी शक्ति का स्मरण दिलाते हैं। वे जानते हैं कि राजा सैन्यबल से राक्षसों को हरा सकते हैं, लेकिन उनकी इच्छा राम-लक्ष्मण को ले जाने की है।
॥ श्लोक ५-६ ॥
अहं तु तपसा युक्तो ब्रह्मर्षिरिति विश्रुतः ।
न च मे विद्यते राजन् क्रोधो युद्धेषु कर्हिचित् ॥
तस्माद्रामं महात्मानं लोकरामं सुतं तव ।
दातुमर्हसि धर्मज्ञ यज्ञरक्षार्थमच्युतम् ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्! मैं तो तपस्या में लीन ब्रह्मर्षि हूँ और युद्ध में क्रोध करना मेरे लिए उचित नहीं है। इसलिए हे धर्मज्ञ! आप अपने महात्मा पुत्र राम को, जो लोकप्रिय हैं, यज्ञ की रक्षा के लिए मुझे देने योग्य हैं।
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र अपनी ब्रह्मर्षि स्थिति का हवाला देते हुए स्वयं युद्ध न करने का कारण बताते हैं और सीधे राम की माँग करते हैं।
॥ श्लोक ७ ॥
राम एव हि वीर्येण तौ राक्षसौ निहन्त्स्यति ।
नात्र कार्या विचारणा त्वया नरपते विभो ॥
📖 भावार्थ : राम ही अपने वीर्य से उन दोनों राक्षसों का वध करेंगे। हे नरपते! इसमें आपको किसी प्रकार का विचार नहीं करना चाहिए।

😢 राजा दशरथ की अनिच्छा – पुत्र-प्रेम का द्वन्द्व (श्लोक ८-१५)

॥ श्लोक ८-९ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राजा विश्वामित्रस्य धीमतः ।
प्रहर्षमतुलं लेभे न चैव प्रत्यपद्यत ॥
स चिन्तयामास तदा पुत्रस्नेहसमन्वितः ।
कथं मे राममादाय गच्छेदृषिर्महातपाः ॥
📖 भावार्थ : विश्वामित्र के वचन सुनकर राजा ने अतुल हर्ष तो प्राप्त किया, किंतु वे तुरंत सहमत नहीं हुए। वे पुत्र-स्नेह से युक्त होकर सोचने लगे – कैसे यह महातपस्वी ऋषि मेरे राम को ले जा सकता है?
🔍 व्याख्या : राजा का मन दुविधा में है – एक ओर विश्वामित्र जैसे महर्षि का सम्मान, दूसरी ओर पुत्रों के प्रति असीम स्नेह।
॥ श्लोक १०-११ ॥
स तु राजा महातेजा विश्वामित्रं महामुनिम् ।
कृताञ्जलिरुवाचेदं प्रणम्य भरतर्षभः ॥
अबालो बाल एवायं न युद्धयोग्यः सुतो मम ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा बालेनाप्राप्तयौवनः ॥
📖 भावार्थ : वे महातेजस्वी राजा, भरतश्रेष्ठ, हाथ जोड़कर महामुनि विश्वामित्र को प्रणाम करके बोले – मेरा यह पुत्र अभी बालक ही है, युवावस्था को प्राप्त नहीं हुआ है, लक्ष्मण के साथ युद्ध के योग्य नहीं है।
॥ श्लोक १२-१३ ॥
बालौ च सुखसंवृद्धौ न युद्धेषु परिश्रमौ ।
न चापि रक्षसां योग्या युद्धे तौ बालकौ मम ॥
अहं चतुर्दश सहस्रा हस्त्यारोहाः प्रहारिणः ।
अनुयास्यन्ति मां भृत्याः सर्वे युद्धविशारदाः ॥
📖 भावार्थ : वे दोनों बालक सुखपूर्वक पले-बढ़े हैं, युद्ध में परिश्रम नहीं किया है। वे राक्षसों से युद्ध के योग्य नहीं हैं। मैं स्वयं चौदह हजार हाथी-सवार, युद्धकुशल भृत्यों के साथ आपके साथ चलूँगा।
॥ श्लोक १४-१५ ॥
अहमेव गमिष्यामि रामं रक्षितुमाहवे ।
न हि मे विद्यते कश्चिद्रामादतिरथो नृप ॥
एते वै सर्वसैन्यानां कोट्यो विंशतिरग्रतः ।
स्थिता युद्धविशारद्या मया सह महर्षिभिः ॥
📖 भावार्थ : मैं स्वयं युद्ध में राम की रक्षा के लिए जाऊँगा। मुझसे बढ़कर कोई रथी नहीं है। ये बीस करोड़ सैनिक युद्धविशारद मेरे साथ हैं।

🕉️ विश्वामित्र का आग्रह और वसिष्ठ का मार्गदर्शन (श्लोक १६-२०)

॥ श्लोक १६-१७ ॥
विश्वामित्रस्तु तच्छ्रुत्वा राज्ञो वचनमुत्तमम् ।
प्रत्युवाच महातेजा राजानं दशरथं तदा ॥
नैषा त्वयि विधातव्या बुद्धिर्विक्लवतां गता ।
राममेवानयस्वेह यदि धर्मं चिकीर्षसि ॥
📖 भावार्थ : विश्वामित्र ने राजा के उत्तम वचन सुनकर उत्तर दिया – हे राजन्! तुम्हें ऐसी विकल बुद्धि नहीं करनी चाहिए। यदि तुम धर्म का पालन करना चाहते हो तो राम को ही मेरे साथ भेजो।
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र धर्म का हवाला देकर राजा को सहमत होने के लिए प्रेरित करते हैं। वे राम के बल में अटूट विश्वास रखते हैं।
॥ श्लोक १८ ॥
ततः सुमन्त्रं राजा तु प्राहिणोत् त्वरितस्तदा ।
वसिष्ठमानयस्वेति सर्वशास्त्रविशारदम् ॥
📖 भावार्थ : तब राजा ने शीघ्र ही सुमन्त्र को भेजा – “सर्वशास्त्रविशारद वसिष्ठ को ले आओ।”
॥ श्लोक १९-२० ॥
स तु राज्ञः समादेशं सुमन्त्रः प्रतिपूज्य च ।
जगाम सहसा तत्र यत्रासौ तपसि स्थितः ॥
तमानयद्वसिष्ठं च राज्ञे प्रतिननाम च ।
राजा ववन्दे धर्मज्ञो वसिष्ठं जपतां वरम् ॥
📖 भावार्थ : सुमन्त्र ने राजा की आज्ञा का पालन किया और जहाँ वे तपस्या में स्थित थे, वहाँ गए। वे वसिष्ठ को ले आए और राजा ने उन्हें प्रणाम किया। राजा ने जप करने वालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ को प्रणाम किया।
॥ श्लोक २१-२२ ॥
वसिष्ठस्तु महातेजा राजानं दशरथं तदा ।
उवाच परमप्रीतो निशम्य वचनं तदा ॥
त्वया संकल्पितो राजन् यज्ञो मुनिवरैः सह ।
किं नु ते व्यवसायेन वर्तते वद सुव्रत ॥
📖 भावार्थ : वसिष्ठ ने राजा के वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा – हे राजन्! तुमने मुनिश्रेष्ठों के साथ यज्ञ का संकल्प किया है। हे सुव्रत! बताओ, तुम्हारे मन में क्या संकल्प है?

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

❤️ पिता-पुत्र स्नेह का चरमोत्कर्ष

इस सर्ग में राजा दशरथ का राम के प्रति असीम स्नेह और ममता देखने को मिलती है। वे राम को बालक समझते हैं, युद्ध में असमर्थ – यह पिता के हृदय की स्वाभाविक व्याकुलता है।

🧘 गुरु का महत्व

विश्वामित्र का आग्रह और वसिष्ठ का मार्गदर्शन दिखाता है कि राजा के लिए गुरुजनों की आज्ञा का पालन कितना आवश्यक है। अंततः धर्म की जीत होती है।

⚔️ राम के वीरत्व की पहली झलक

यद्यपि राम अभी बालक हैं, विश्वामित्र उनके भीतर छिपे वीरत्व और दैवीय शक्ति को पहचानते हैं। यह आगामी घटनाओं का पूर्वाभास है।

🙏 राजा का कर्तव्य-संकट

राजा दशरथ एक ओर अतिथि-धर्म और ऋषि के प्रति सम्मान, दूसरी ओर पुत्र-मोह। यह संकट उन्हें असमंजस में डालता है, किंतु वसिष्ठ के उपदेश से वे सही निर्णय ले पाते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कभी-कभी हमें अपने स्नेह और मोह से ऊपर उठकर कर्तव्य और धर्म का पालन करना होता है। राजा दशरथ का राम के प्रति प्रेम स्वाभाविक है, किंतु विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा और राक्षसों के वध का कार्य अधिक महत्वपूर्ण है। गुरुजनों का मार्गदर्शन हमें सही निर्णय लेने में सहायता करता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे विंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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