बाल काण्ड अध्याय 19

विश्वामित्र का अनुरोध

बाल काण्ड का उन्नीसवाँ सर्ग महर्षि विश्वामित्र के राजा दशरथ के समक्ष अपने यज्ञ की रक्षा हेतु राम को भेजने के अनुरोध का वर्णन करता है। विश्वामित्र ऋषि राजा दशरथ से कहते हैं कि वे अपने पुत्र राम को उनके साथ भेजें ताकि वे उनके यज्ञ की राक्षसों से रक्षा कर सकें।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ महर्षि विश्वामित्र द्वारा राजा दशरथ से उनके पुत्र राम को यज्ञ की रक्षा हेतु भेजने के अनुरोध से होता है। विश्वामित्र राजा को बताते हैं कि वे एक महान यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं, परंतु दो शक्तिशाली राक्षस – मारीच और सुबाहु – उस यज्ञ में विघ्न डाल रहे हैं। वे यज्ञ की वेदी पर मांस और रक्त की वर्षा कर देते हैं, जिससे यज्ञ भंग हो जाता है। अनेक बार प्रयास करने के बाद भी ऋषि उन राक्षसों का वध नहीं कर पाए हैं क्योंकि वे ब्रह्मास्त्र से सुरक्षित हैं। विश्वामित्र का कहना है कि राम ही उन राक्षसों का वध कर सकते हैं। वे राजा से आग्रह करते हैं कि वे राम को केवल कुछ दिनों के लिए उनके साथ भेज दें। वे यह भी वचन देते हैं कि वे स्वयं राम की रक्षा करेंगे और उन्हें अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र भी प्रदान करेंगे। राजा दशरथ इस अनुरोध को सुनकर व्याकुल हो जाते हैं और आरंभ में राम को भेजने से इनकार कर देते हैं, क्योंकि राम अभी बालक हैं और राक्षसों से युद्ध करने में असमर्थ हैं। किंतु विश्वामित्र के आग्रह और वसिष्ठ के समझाने पर अंततः राजा राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने को सहमत हो जाते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग १९

(विश्वामित्र का अनुरोध – राम के वनगमन का प्रारम्भ)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में राजा दशरथ द्वारा पुत्रकामेष्टि यज्ञ के आयोजन और राम आदि चारों पुत्रों के जन्म का वर्णन हुआ। अब यह सर्ग राम के बाल्यकाल से किशोरावस्था में प्रवेश का प्रारम्भ है। महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आकर राजा दशरथ से राम को अपने यज्ञ की रक्षा के लिए मांगते हैं। यहीं से राम के वनगमन और अनेक राक्षसों के संहार की कथा का सूत्रपात होता है।

🙏 विश्वामित्र का राजा दशरथ के समक्ष अनुरोध (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततस्तु राजा धर्मात्मा विश्वामित्रं महामुनिम् ।
उपचक्राम सत्कारैः सह पुत्रैः समन्वितः ॥
उपविष्टाय स तदा राजा दशरथः स्वयम् ।
पूजामकरत प्रीत्या विश्वामित्राय धीमते ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; तु = तो; राजा = राजा; धर्मात्मा = धर्मात्मा; विश्वामित्रम् = विश्वामित्र को; महामुनिम् = महामुनि; उपचक्राम = सेवा की; सत्कारैः = सत्कारों से; सह = साथ; पुत्रैः = पुत्रों के; समन्वितः = सहित; उपविष्टाय = बैठे हुए को; सः = वह; तदा = तब; राजा = राजा; दशरथः = दशरथ; स्वयम् = स्वयं; पूजाम् = पूजा; अकरोत् = की; प्रीत्या = प्रेम से; विश्वामित्राय = विश्वामित्र की; धीमते = बुद्धिमान की।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् धर्मात्मा राजा दशरथ अपने पुत्रों के साथ महामुनि विश्वामित्र की सत्कारपूर्वक सेवा करने लगे। राजा दशरथ ने स्वयं बैठे हुए बुद्धिमान विश्वामित्र की प्रेमपूर्वक पूजा की।
🔍 व्याख्या : राजा का स्वयं पूजा करना अतिथि के प्रति उनके अगाध सम्मान को दर्शाता है।
॥ श्लोक ३-४ ॥
सत्कृतस्तु तदा राज्ञा विश्वामित्रो महातपाः ।
उवाच वचनं राज्ञः समीपे सर्वबन्धुषु ॥
राघवं पुत्रमुख्यं तु काकुत्स्थ कुलनन्दनम् ।
आनयस्व महाबाहुं रामं सत्यपराक्रमम् ॥
📖 भावार्थ : राजा द्वारा सत्कृत महातपस्वी विश्वामित्र ने राजा के सभी बंधुओं की उपस्थिति में कहा – “हे काकुत्स्थ कुल के नंदन! अपने पुत्रों में श्रेष्ठ, महाबाहु, सत्यपराक्रमी राम को मेरे पास भेजिए।”
🔍 व्याख्या : विश्वामित्र ने राम के लिए विशेषण प्रयोग किए हैं – पुत्रमुख्य, महाबाहु, सत्यपराक्रमी। यह दर्शाता है कि वे राम के गुणों से भलीभांति परिचित हैं।
॥ श्लोक ५-६ ॥
यज्ञरक्षार्थमेवास्य काकुत्स्थस्य महात्मनः ।
सुबाहुं च मारीचं च राक्षसौ कामरूपिणौ ॥
हन्तुमिच्छामि रामेण संग्रामे कृतनिश्चयः ।
न च मे शकितः कर्तुं मन्त्रैरन्यैः कथंचन ॥
📖 भावार्थ : “मैं यज्ञ की रक्षा के लिए इस महात्मा काकुत्स्थ (राम) के द्वारा सुबाहु और मारीच नामक कामरूपी राक्षसों को संग्राम में मारना चाहता हूँ। मैंने यह निश्चय किया है। अन्य मंत्रों द्वारा किसी भी प्रकार यह कार्य मेरे द्वारा नहीं किया जा सकता।”
॥ श्लोक ७-८ ॥
दशरथस्तु तच्छ्रुत्वा विश्वामित्रस्य भाषितम् ।
वचनं प्रत्युवाचेदं सरोषमिव भारत ॥
नैतच्छ्रुतपूर्वं नः कदाचित् यदि वा श्रुतम् ।
यदहं बालिशो भूत्वा पुत्रं दद्यामहं तव ॥
📖 भावार्थ : (भरतवंशी राजा) दशरथ ने विश्वामित्र के उस कथन को सुनकर कुछ रोषपूर्वक यह वचन कहा – “हमने ऐसा पहले कभी नहीं सुना है। यदि सुना भी हो तो मैं मूर्ख बनकर अपने पुत्र को आपको कैसे दे सकता हूँ?”
🔍 व्याख्या : राजा का पुत्रवात्सल्य उभर आता है। वे राम को राक्षसों से युद्ध के लिए भेजने के लिए तैयार नहीं हैं।

⚔️ राजा दशरथ का विरोध और विश्वामित्र का आग्रह (श्लोक ९-१६)

॥ श्लोक ९-१० ॥
अहमेव गमिष्यामि ससैन्यो महता बलात् ।
योत्स्यामि तै राक्षसैः सार्धं सुबाहुबलदर्पितैः ॥
नाहं रामं प्रदास्यामि युवानं रणमूर्धनि ।
राक्षसैर्युधि घोरैस्तु बाहुभिः समवस्थितम् ॥
📖 भावार्थ : “मैं स्वयं महान् सेना के साथ जाऊँगा और उन सुबाहु आदि बल एवं दर्प से युक्त राक्षसों से युद्ध करूँगा। मैं राम को नहीं दूँगा जो युवा हैं और रणभूमि में घोर युद्ध करने वाले राक्षसों से युद्ध करेंगे।”
🔍 व्याख्या : राजा स्वयं राक्षसों से युद्ध करने को तैयार हैं, लेकिन अपने पुत्र को नहीं भेजना चाहते।
॥ श्लोक ११-१२ ॥
विश्वामित्रस्तु तच्छ्रुत्वा राज्ञो वचनमीदृशम् ।
चुकोप च महातेजाः प्रजज्वाल च तेजसा ॥
तस्य क्रुद्धस्य तेजो हि त्रैलोक्यमपि दह्यत ।
तदा निर्वापयामास वसिष्ठो वै स्वयं तदा ॥
📖 भावार्थ : विश्वामित्र ने राजा का ऐसा वचन सुनकर क्रोध किया और महातेजा होने के कारण अपने तेज से प्रज्वलित हो गए। उनके क्रुद्ध होने पर त्रैलोक्य भी जल सकता था, तब स्वयं वसिष्ठ ने उस तेज को शांत किया।
॥ श्लोक १३-१४ ॥
ततः प्रसन्नवदनो वसिष्ठो राजमन्त्रवित् ।
उवाच वचनं राज्ञः सान्त्वपूर्वमिदं तदा ॥
नैषा प्रथा त्वया राजन् कर्तव्या कुलनन्दन ।
अवश्यं ते प्रदातव्यो रामो विश्वामित्रेण सह ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न मुख वाले राजमंत्री वसिष्ठ ने राजा से सांत्वनापूर्वक यह वचन कहा – “हे राजन्! आपको ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए। आपको अवश्य ही राम को विश्वामित्र के साथ भेजना चाहिए।”
॥ श्लोक १५-१६ ॥
नैनं शक्नोति को वीरो हर्तुं विश्वामित्रादपि ।
स्वयमप्यहमिच्छामि यदेष मुनिपुंगवः ॥
तस्माद्ददस्व रामं त्वं विश्वामित्राय धीमते ।
मा च संशयमापन्नः कुरु राजन् वचो मम ॥
📖 भावार्थ : “कोई भी वीर इन राम को विश्वामित्र से छीन नहीं सकता। मैं स्वयं भी यही चाहता हूँ कि ये मुनिश्रेष्ठ (राम को ले जाएँ)। इसलिए आप बुद्धिमान विश्वामित्र को राम को दे दीजिए। संशय में न पड़कर मेरा वचन मानिए।”

🧘 वसिष्ठ का उपदेश और राजा की सहमति (श्लोक १७-२४)

॥ श्लोक १७-१८ ॥
वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा राजा दशरथस्तदा ।
प्रहर्षमतुलं लेभे प्रशस्य मुनिपुंगवम् ॥
यथेष्टं गम्यतां ब्रह्मन् रामो यातु त्वया सह ।
युध्यतां राक्षसैः सार्धं सुबाहुबलदर्पितैः ॥
📖 भावार्थ : वसिष्ठ के वचन सुनकर राजा दशरथ ने अतुल हर्ष प्राप्त किया और मुनिश्रेष्ठ (विश्वामित्र) की प्रशंसा की। “हे ब्रह्मन्! आप जैसा चाहें वैसा कीजिए। राम आपके साथ जाएँ। वे सुबाहु आदि बल एवं दर्प से युक्त राक्षसों से युद्ध करें।”
🔍 व्याख्या : वसिष्ठ के समझाने पर राजा सहमत हो जाते हैं। यहाँ राजा के मन में आदर और विश्वास दोनों कार्य कर रहे हैं।
॥ श्लोक १९-२० ॥
ततो राजा समाहूय रामं सत्यपराक्रमम् ।
लक्ष्मणं च महात्मानं प्रेषयामास तत्परः ॥
ऋषिणा सह धर्मज्ञौ गच्छतं मुनिपुंगवौ ।
यज्ञरक्षां कुरुष्वेह विश्वामित्रस्य धीमतः ॥
📖 भावार्थ : तब राजा ने सत्यपराक्रमी राम और महात्मा लक्ष्मण को बुलाकर उन्हें शीघ्र भेजा। “हे धर्मज्ञों! तुम दोनों मुनिश्रेष्ठ के साथ जाओ और बुद्धिमान विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करो।”
॥ श्लोक २१-२२ ॥
ततस्तौ रामलक्ष्मणौ पितुर्वचनमादरात् ।
शिरसा प्रतिगृह्यैव विश्वामित्रमुपस्थितौ ॥
प्रतस्थाते महावीर्यौ धनुष्पाणी महाबलौ ।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य यज्ञरक्षणतत्परौ ॥
📖 भावार्थ : तब राम और लक्ष्मण ने पिता के वचनों का आदरपूर्वक शिरोधार्य किया और विश्वामित्र के समीप उपस्थित हुए। फिर वे दोनों महावीर्य, महाबलशाली, धनुष धारण किए हुए, यज्ञ की रक्षा में तत्पर होकर विश्वामित्र को आगे करके प्रस्थित हुए।
॥ श्लोक २३-२४ ॥
ततस्तौ रामलक्ष्मणौ धनुष्पाणी महाबलौ ।
विश्वामित्रं पुरस्कृत्य ययतू रघुनंदनौ ॥
अयोध्यायां नरव्याघ्रौ गच्छन्तौ रघुनंदनौ ।
ददृशाते महात्मानौ विश्वामित्रं तपोधनम् ॥
📖 भावार्थ : तब वे राम-लक्ष्मण, धनुष धारण किए, महाबलशाली, रघुनंदन, विश्वामित्र को आगे करके चल पड़े। अयोध्या से जाते हुए उन नरव्याघ्रों ने उस तपोधन महात्मा विश्वामित्र को देखा।

🚶 राम-लक्ष्मण का विश्वामित्र के साथ प्रस्थान (श्लोक २५-३०)

॥ श्लोक २५-२६ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे विश्वामित्रपुरोगमाः ।
रामलक्ष्मणयोर्वीर्यं दृष्ट्वा परमविस्मिताः ॥
प्रशशंसुर्महात्मानो राघवौ रणपण्डितौ ।
विश्वामित्रं च राजर्षिं धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥
📖 भावार्थ : तब विश्वामित्र के अग्रगामी सभी मुनियों ने राम-लक्ष्मण के वीर्य (पराक्रम) को देखकर परम आश्चर्यचकित होकर उन रणपण्डित राघवों की प्रशंसा की और धर्मज्ञ सत्यवादी राजर्षि विश्वामित्र की भी प्रशंसा की।
॥ श्लोक २७-२८ ॥
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा रामं दृष्ट्वा महाबलम् ।
प्रहृष्टवदनो राजन् प्रययौ शीघ्रविक्रमः ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे विश्वामित्रपुरोगमाः ।
रामलक्ष्मणयोर्वीर्यं दृष्ट्वा परमविस्मिताः ॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा विश्वामित्र ने महाबलशाली राम को देखकर प्रसन्न मुख हुए और शीघ्रगामी होकर चल पड़े। तब विश्वामित्र के अग्रगामी सभी मुनियों ने राम-लक्ष्मण के वीर्य को देखकर परम आश्चर्यचकित हुए।
॥ श्लोक २९-३० ॥
एतद्वः सर्वमाख्यातं यथा रामो महाबलः ।
विश्वामित्रेण सहितो जगाम मुनिभिः सह ॥
श्वः प्रभाते तु यत्कार्यं तद्वदिष्यामि सुव्रताः ।
तत्सर्वं संविदानोऽसौ यथावदनुपृच्छत ॥
📖 भावार्थ : “तुम सबको यह सब कुछ बता दिया गया है कि किस प्रकार महाबलशाली राम विश्वामित्र और अन्य मुनियों के साथ गए। हे सुव्रतो! कल प्रातःकाल जो कार्य करना है, वह बताऊँगा। वह सब कुछ जानकर तुम यथावत् पूछो।”
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोक इस सर्ग का सार प्रस्तुत करता है और आगे के वर्णन का सूत्र देता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 विश्वामित्र का महत्व

विश्वामित्र केवल एक ऋषि ही नहीं, बल्कि राम के जीवन के प्रथम गुरु हैं। वे ही राम को दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं और उन्हें राक्षसों से युद्ध की शिक्षा देते हैं।

👪 पिता-पुत्र का द्वंद्व

राजा दशरथ का पुत्रवात्सल्य और ऋषि के प्रति आदर के बीच द्वंद्व इस सर्ग का मुख्य विषय है। वे पिता के रूप में राम की सुरक्षा चाहते हैं, किंतु धर्म के प्रति आस्था उन्हें राम को भेजने के लिए बाध्य करती है।

🙏 गुरु की महिमा

वसिष्ठ का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि गुरु का स्थान राजा से भी ऊपर होता है। उनके समझाने पर ही राजा सहमत होते हैं। यह गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को उजागर करता है।

🌟 राम के वनगमन का प्रारम्भ

यह सर्ग राम के वनगमन की पहली यात्रा है। यद्यपि यह अल्पकालिक है, किंतु यहीं से राम के वनवास की लंबी यात्रा का प्रारंभ होता है। यह यात्रा उन्हें सीता से मिलाने और रावण वध तक ले जाएगी।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी अपने प्रियजनों को भी जोखिम में डालना पड़ता है। राजा दशरथ का पुत्रवात्सल्य स्वाभाविक है, किंतु ऋषियों के यज्ञ की रक्षा करना भी उनका कर्तव्य है। वसिष्ठ के मार्गदर्शन में वे सही निर्णय लेते हैं। यह सिखाता है कि गुरु के मार्गदर्शन में लिया गया निर्णय ही सर्वश्रेष्ठ होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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