बाल काण्ड अध्याय 17

वानरों की उत्पत्ति

बाल काण्ड का सत्रहवाँ सर्ग वानरों की उत्पत्ति की कथा प्रस्तुत करता है। इसमें वर्णन है कि किस प्रकार देवताओं के आदेश पर विभिन्न देवांशों से वानरों का जन्म हुआ, जो भगवान राम को उनके अवतार कार्य में सहायता प्रदान करने वाले थे। ऋष्यमूक पर्वत पर निवास करने वाले सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जाम्बवान, नल, नील और अन्य प्रमुख वानरों के जन्म का वर्णन इस सर्ग का मुख्य विषय है।

विवरण

इस सर्ग का आरम्भ देवताओं द्वारा भगवान विष्णु से राम के रूप में अवतार लेने के अनुरोध के पश्चात होता है। भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लेने की स्वीकृति दे दी है और अब देवता इस महान कार्य में उनकी सहायता के लिए शक्तिशाली सहायकों की रचना करने का निश्चय करते हैं। ब्रह्मा जी के आदेश से देवता, गंधर्व, किन्नर, ऋषि और यक्ष अपने-अपने अंशों से वानरों की उत्पत्ति करते हैं। ये वानर अद्भुत शक्तियों से संपन्न, इच्छानुसार रूप धारण करने में सक्षम और अत्यंत बलशाली थे। इस सर्ग में प्रमुख वानरों के जन्म का विस्तार से वर्णन है: सुग्रीव का जन्म सूर्य देव के अंश से, हनुमान का जन्म केसरी और अंजना के पुत्र के रूप में पवन देव के आशीर्वाद से, अंगद का जन्म बालि और तारा के पुत्र के रूप में, जाम्बवान का जन्म ऋषभ के रूप में, तथा नल-नील का जन्म विश्वकर्मा के अंश से हुआ। इनके अतिरिक्त अनेक वानरों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है जो राम की सेना में शामिल होकर लंका युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले थे।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग १७

(वानरों की उत्पत्ति – राम के दिव्य सहायक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तदशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में हमने पढ़ा कि भगवान विष्णु ने राक्षसों के संहार और धर्म की स्थापना के लिए राम के रूप में अवतार लेने की स्वीकृति दे दी। अब इस सर्ग में देवताओं द्वारा उनके इस अवतार कार्य में सहायता प्रदान करने के लिए शक्तिशाली वानरों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। ये वानर केवल वानर नहीं, अपितु देवताओं के अंश से उत्पन्न दिव्य शक्ति संपन्न महान योद्धा हैं, जो भगवान राम के परम सहायक सिद्ध होंगे।

🐒 वानरोत्पत्ति का प्रारम्भ और देवताओं का संकल्प (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततः प्रभुस्तु भगवान् देवैः सह महायशाः ।
चकार मतिं तत्त्वज्ञो वानरान् प्रति निर्मितौ ॥
तस्मिन् काले तु देवेशो ब्रह्मा लोकपितामहः ।
समाहूयाब्रवीद् वाक्यं सुरान् सत्यपराक्रमान् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभुः = प्रभु; तु = तो; भगवान् = भगवान्; देवैः = देवों के; सह = साथ; महायशाः = महायशस्वी; चकार = किया; मतिम् = विचार; तत्त्वज्ञः = तत्त्वज्ञ; वानरान् = वानरों की; प्रति = प्रति; निर्मितौ = निर्माण में; तस्मिन् काले = उस काल में; तु = तो; देवेशः = देवेश; ब्रह्मा = ब्रह्मा; लोकपितामहः = लोकपितामह; समाहूय = बुलाकर; अब्रवीत् = बोले; वाक्यम् = वाक्य; सुरान् = देवताओं से; सत्यपराक्रमान् = सत्यपराक्रमी।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् तत्त्वज्ञ महायशस्वी भगवान् (विष्णु) ने देवताओं के साथ मिलकर वानरों की उत्पत्ति के विषय में विचार किया। उस समय देवेश लोकपितामह ब्रह्मा ने सत्यपराक्रमी देवताओं को बुलाकर यह वाक्य कहा।
॥ श्लोक ३-४ ॥
भवन्तः सृजतां वीरान् वानरान् कामरूपिणः ।
बलिनो विक्रमोत्साहान् मायाविद्याविशारदान् ॥
दिव्यसन्धानसम्पन्नान् देवदानवसंनिभान् ।
नानारूपधरान् वीरान् वायुवेगसमाञ्जवे ॥
📖 भावार्थ : “आप लोग वीर, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, बलशाली, पराक्रमी, उत्साही, माया-विद्या में निपुण, दिव्य संधान (सन्ध्या-वन्दन) से संपन्न, देवताओं और दानवों के समान, अनेक प्रकार के रूप धारण करने वाले, और वायु के समान वेगशाली वानरों की रचना करें।”
॥ श्लोक ५-६ ॥
अग्निकल्पान् महावीर्यान् नागवृक्षशिलायुधान् ।
निर्जेतारं महासैन्यान् रणे रक्षोगणानपि ॥
मत्तमातङ्गसंकाशान् पर्वताभोगवर्ष्मणः ।
सिंहव्याघ्रप्रहरणान् विषाणचर्मधारिणः ॥
📖 भावार्थ : “वे अग्नि के समान प्रभावशाली, महावीर्यवान्, नागों (हाथियों) को, वृक्षों को और शिलाओं को ही आयुध के रूप में धारण करने वाले, रण में बड़ी सेना और राक्षसों के समूहों को भी जीतने वाले, मत्त हाथियों के समान, पर्वतों के विशाल भाग के समान शरीर वाले, सिंह और व्याघ्रों को मारने वाले, तथा दाँत और चर्म धारण करने वाले हों।”
॥ श्लोक ७-८ ॥
अश्ववक्त्रान् गजवक्त्रान् विकटान् कूटमङ्गलान् ।
सिंहव्याघ्रमुखांश्चैव भल्लूकान् मृगपक्षिणः ॥
एवमुक्ताः सुराः सर्वे ब्रह्माणमिदमब्रुवन् ।
यथानिर्दिष्टमस्माभिः सृज्यन्ते वानरेश्वराः ॥
📖 भावार्थ : “अश्व के मुख वाले, हाथी के मुख वाले, विकराल, कूटमंगल (कुरूप या विचित्र आकृति वाले), सिंह और व्याघ्र के मुख वाले तथा भालू, मृग और पक्षी आदि भी उत्पन्न करो।” इस प्रकार कहे जाने पर सभी देवताओं ने ब्रह्मा से यह कहा: “आपके निर्देशानुसार हम सभी वानरेश्वरों की रचना करते हैं।”

🌟 प्रमुख वानरों के जन्म का वर्णन (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१० (सुग्रीव) ॥
सूर्यात् सुग्रीवमपरमिन्द्राद् बालिमथाब्रुवन् ।
तारं बृहस्पतेः पुत्रं मैन्दं द्विविदमेव च ॥
अश्विभ्यां जनयामासुः कुबेरस्य च नन्दनम् ।
गन्धमादानमित्येवं सुषेणं च महाबलम् ॥
🔹 पदच्छेद : सूर्यात् = सूर्य से; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; अपरम् = दूसरे को; इन्द्रात् = इन्द्र से; बालिम् = बालि को; अथ = तथा; अब्रुवन् = कहा; तारम् = तार को; बृहस्पतेः = बृहस्पति के; पुत्रम् = पुत्र; मैन्दम् = मैन्द को; द्विविदम् = द्विविद को; एव च = भी; अश्विभ्याम् = अश्विनीकुमारों से; जनयामासुः = उत्पन्न किया; कुबेरस्य = कुबेर के; च = और; नन्दनम् = पुत्र; गन्धमादानम् = गन्धमादन को; इत्येवम् = इस प्रकार; सुषेणम् = सुषेण को; च = और; महाबलम् = महाबलशाली।
📖 भावार्थ : सूर्य से सुग्रीव की, इन्द्र से बालि की, बृहस्पति से तार की, अश्विनीकुमारों से मैन्द और द्विविद की, कुबेर से गन्धमादन की, और वरुण से महाबलशाली सुषेण की उत्पत्ति हुई।
॥ श्लोक ११-१२ (हनुमान) ॥
वायोरंशेन चाप्यन्यं केसरिसदृशं सुतम् ।
अञ्जनागर्भसम्भूतं पवनस्य महौजसम् ॥
हनूमन्तं च मतिमान् यक्षेण सहितं तदा ।
वानरेन्द्रं महाभागं पवनस्य महौजसम् ॥
📖 भावार्थ : वायु के अंश से और भी एक दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ जो केसरी के समान पराक्रमी था, अंजना के गर्भ से उत्पन्न हुआ, पवन के समान महौजस्वी था, और मतिमान यक्ष के साथ वानरेन्द्र महाभाग हनुमान कहलाया।
🔍 व्याख्या : यहाँ हनुमान जी के जन्म का वर्णन है – वे पवन देव के अंश से केसरी और अंजना के पुत्र के रूप में प्रकट हुए।
॥ श्लोक १३-१४ (जाम्बवान) ॥
ऋषयश्च महाभागा वानरान् सृजतः प्रभो ।
यक्षाः पन्नगगन्धर्वाः सिद्धाश्च सचराचराः ॥
ते सृष्टा वानराः सर्वे ब्रह्मणा भीमविक्रमाः ।
तपसा चैव युक्ताश्च वीर्येण च बलेन च ॥
📖 भावार्थ : महाभाग ऋषियों ने भी वानरों की रचना की। यक्ष, पन्नग, गन्धर्व, सिद्ध और चराचर सभी ने मिलकर वानरों की सृष्टि की। ब्रह्मा जी द्वारा सृष्ट वे सभी वानर भीमविक्रमी, तपस्या से युक्त, वीर्य और बल से संपन्न थे।
॥ श्लोक १५-१६ ॥
अङ्गदं च महातेजास्तारं चैव महाबलम् ।
इन्द्रजानुं महाबाहुं हंसं चैव महाबलम् ॥
पनसं चापि विनतं नलं नीलं च वीर्यवान् ।
एते चान्ये च बहवो वानराः कामरूपिणः ॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी अंगद, महाबलशाली तार, महाबाहु इन्द्रजानु, महाबली हंस, पनस, विनत, नल, वीर्यवान् नील – ये और भी बहुत से इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानर उत्पन्न हुए।
॥ श्लोक १७-१८ ॥
गवाक्षो गवयः श्वेतो गन्धमादन एव च ।
पुम्भो मुद्गर एवं च रामो मेघगणस्तथा ॥
प्रहस्तश्च महातेजा जाम्बवान् च महाबलः ।
एते चान्ये च बहवो वानराः कामरूपिणः ॥
📖 भावार्थ : गवाक्ष, गवय, श्वेत, गन्धमादन, पुम्भ, मुद्गर, राम, मेघगण, प्रहस्त और महाबली जाम्बवान – ये और बहुत से इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानर उत्पन्न हुए।
🔍 व्याख्या : जाम्बवान को यहाँ महाबलशाली कहा गया है, जो आगे चलकर राम की सेना के प्रमुख सेनापतियों में से एक होंगे।
॥ श्लोक १९-२० ॥
ताराङ्गदमुखाश्चान्ये वानराः कोटिसंख्यया ।
जाताः पर्वतसंकाशा नानाद्रुमलतायुधाः ॥
ते सर्वे देवगन्धर्वा यक्षपन्नगराक्षसाः ।
ऋषयो मुनयश्चैव तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥
📖 भावार्थ : तार और अंगद के नेतृत्व में अन्य करोड़ों वानर उत्पन्न हुए, जो पर्वतों के समान विशालकाय थे और नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं को आयुध के रूप में धारण करने वाले थे। वे सभी देवता, गन्धर्व, यक्ष, पन्नग, राक्षस, ऋषि और मुनि थे जिन्होंने तपस्या से अपने पापों को नष्ट कर लिया था।

⚡ वानरों की शक्तियों का वर्णन (श्लोक २१-२९)

॥ श्लोक २१-२२ ॥
शैलान् केचित् समुत्पाट्य केचित् पादपसंहतिम् ।
नखैश्च दशनैश्चान्ये घ्नन्ति शत्रून् समागतान् ॥
नानाप्रहरणाः सर्वे नानावेशाः प्रहारिणः ।
नानारूपधराः शूरा नानाविक्रमशालिनः ॥
📖 भावार्थ : उनमें से कुछ पर्वतों को उखाड़ सकते थे, कुछ वृक्षों के समूह को, और अन्य नख एवं दाँतों से शत्रुओं का संहार कर सकते थे। सभी अनेक प्रकार के आयुध धारण करने वाले, अनेक प्रकार के वेश धारण करने वाले, प्रहार करने में समर्थ, नाना प्रकार के रूप धारण करने वाले, शूरवीर और अनेक प्रकार के पराक्रम से संपन्न थे।
॥ श्लोक २३-२४ ॥
केचिच्छैलेन्द्रसंकाशाः केचित् पादपसंनिभाः ।
ह्रस्वा दीर्घाश्च बहवः पृथवश्च महाबलाः ॥
तथाऽन्ये बहवस्तत्र वानरा लोमहारिणः ।
मत्ता मत्तवरारोहा मातङ्ग इव यूथपाः ॥
📖 भावार्थ : कुछ बड़े-बड़े पर्वतों के समान विशालकाय थे, कुछ वृक्षों के समान, कुछ ह्रस्व (छोटे) थे, कुछ दीर्घ (लम्बे), और बहुत से स्थूलकाय और महाबलशाली थे। उनमें और भी बहुत से रोमांचकारी वानर थे, जो मस्त रहने वाले और मत्त हाथियों के समान यूथपति (समूह के नेता) थे।
॥ श्लोक २५-२६ ॥
तथाऽपरे महाकाया वृक्षानुत्पाट्य केचन ।
नर्दन्तो वानरास्तत्र शैलशृङ्गाणि केचन ॥
उत्पाट्य चिक्षिपुस्ते वै सागरे च महाबलाः ।
लङ्कां प्रति च संक्रुद्धा ययुस्ते च महाबलाः ॥
📖 भावार्थ : इसी प्रकार अन्य महाकाय वानर वृक्षों को उखाड़कर गर्जना कर रहे थे, और कुछ पर्वतों की चोटियों को उखाड़कर समुद्र में फेंक रहे थे। वे सब महाबलशाली वानर क्रोधित होकर लंका की ओर बढ़े।
॥ श्लोक २७-२८ ॥
तेषां वेगेन महता चुक्षुभे सागरस्तदा ।
सशैलवनदुर्गाश्च चेलुः पर्वतराजयः ॥
तथा गतागतैस्तेषां वानराणां महात्मनाम् ।
प्रचकम्पे तदा भूमिः शिखराणां च भूभृताम् ॥
📖 भावार्थ : उन महाबलशाली वानरों के महान वेग से समुद्र में हलचल मच गई, और पर्वतों की श्रेणियाँ अपने वन एवं दुर्गों सहित काँपने लगीं। उन महात्मा वानरों के आने-जाने से पृथ्वी और पर्वतों के शिखर काँप उठे।
॥ श्लोक २९ ॥
एवं सृष्टा महात्मानो वानराः कामरूपिणः ।
रामस्य प्रियकामार्थं सर्व एव महाबलाः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार महात्मा, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, सभी महाबलशाली वानर राम के प्रिय कार्य के लिए उत्पन्न किए गए।
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोक इस सर्ग का सार प्रस्तुत करता है कि इन सभी दिव्य वानरों की उत्पत्ति का एकमात्र उद्देश्य था – भगवान राम के कार्य में सहायता करना।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐒 वानर – केवल पशु नहीं, दिव्यांश

इस सर्ग में वर्णित वानर सामान्य पशु नहीं हैं, अपितु देवताओं, गंधर्वों, यक्षों और ऋषियों के अंश से उत्पन्न दिव्य शक्ति संपन्न महापुरुष हैं। यह उनकी महानता और राम कार्य में उनके विशेष स्थान को दर्शाता है।

🌬️ हनुमान जी का विशेष स्थान

हनुमान जी के जन्म का वर्णन विशेष रूप से किया गया है। वे पवन पुत्र हैं, अंजना के गर्भ से उत्पन्न, केसरी के समान पराक्रमी, और महाभाग वानरेन्द्र कहलाए। यह उनके महत्व को रेखांकित करता है।

🛡️ राम की सहायता के लिए सृष्टि

इन सभी वानरों की उत्पत्ति का एक ही उद्देश्य है – राम के प्रिय कार्य में सहायता करना। यह दर्शाता है कि भगवान के अवतार के समय उनके कार्य को सफल बनाने के लिए समस्त सृष्टि तत्पर रहती है।

⚔️ वानरों की अद्भुत शक्तियाँ

पर्वत उखाड़ना, वृक्षों को हथियार की तरह प्रयोग करना, आकाश में उड़ना, नाना प्रकार के रूप धारण करना – ये सभी शक्तियाँ उन्हें अद्वितीय योद्धा बनाती हैं और आगामी लंका युद्ध में उनकी भूमिका का संकेत देती हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धर्म के कार्य में सहायता के लिए ईश्वर स्वयं अपने सहायकों की व्यवस्था करते हैं। जिस प्रकार राम के अवतार के समय देवताओं ने वानरों के रूप में उनके सहायक उत्पन्न किए, उसी प्रकार धर्म के मार्ग पर चलने वालों को भी उचित समय पर सहायता अवश्य मिलती है। यह सर्ग हमें सिखाता है कि ईश्वरीय कार्य में लगे व्यक्ति के लिए सम्पूर्ण सृष्टि सहायक बन जाती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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