ऋष्यशृंग और अंग देश
बाल काण्ड का दशम सर्ग ऋष्यशृंग के अंग देश में आगमन, राजा रोमपाद द्वारा उनका स्वागत, उनके तपोबल से वर्षा होने और अन्ततः राजा दशरथ से उनके सम्बन्ध की स्थापना का वर्णन करता है। यह सर्ग ऋष्यशृंग की कथा को पूर्ण करता है और उन्हें राजा दशरथ के अश्वमेध यज्ञ से जोड़ता है।
विवरण
यह सर्ग ऋष्यशृंग की कथा का उत्तरार्ध है। पूर्व सर्ग में हमने देखा कि कैसे वेश्याओं ने ऋष्यशृंग को मोहित कर अंग देश लाया। अब इस सर्ग में उनके अंग देश पहुँचने का वर्णन है। राजा रोमपाद ने ऋष्यशृंग का अत्यन्त आदर-सत्कार किया। उनके लिए भव्य आवास की व्यवस्था की गई। ऋष्यशृंग के आगमन मात्र से अंग देश में मूसलाधार वर्षा हुई, जिससे अकाल समाप्त हुआ और सम्पूर्ण राज्य में हरियाली छा गई। राजा रोमपाद अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी पुत्री शांता का विवाह ऋष्यशृंग से कर दिया। कुछ समय पश्चात् राजा दशरथ अपने मित्र रोमपाद से मिलने अंग देश आए। वहाँ उन्होंने ऋष्यशृंग और शांता को देखा। राजा दशरथ ने ऋष्यशृंग का सम्मान किया और उनसे अपनी राजधानी अयोध्या चलने का अनुरोध किया। ऋष्यशृंग राजा दशरथ के व्यवहार से अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनके साथ अयोध्या गए। यहीं से राजा दशरथ और ऋष्यशृंग के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध की स्थापना हुई, जो आगे चलकर अश्वमेध यज्ञ के रूप में फलीभूत हुआ। इस प्रकार यह सर्ग ऋष्यशृंग को अयोध्या से जोड़ता है और राम-जन्म की भूमिका को पूर्ण करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग १०
(ऋष्यशृंग और अंग देश – आगमन, वर्षा, विवाह और दशरथ-सम्बन्ध)
🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में हमने ऋष्यशृंग के चमत्कारिक जन्म, उनके वन में पालन-पोषण और वेश्याओं द्वारा उन्हें मोहित कर अंग देश लाने की कथा सुनी। अब इस दशम सर्ग में उनके अंग देश पहुँचने के बाद की घटनाओं का वर्णन है – कैसे उनके आगमन मात्र से अकालग्रस्त अंग देश में मूसलाधार वर्षा हुई, कैसे राजा रोमपाद ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शांता का विवाह उनसे कर दिया, और कैसे राजा दशरथ के साथ उनका सम्बन्ध स्थापित हुआ। यह सर्ग ऋष्यशृंग की कथा का सुखद समापन है और उन्हें रामायण की मुख्य कथा से जोड़ता है।
👑 ऋष्यशृंग का अंग देश में आगमन और राजा रोमपाद द्वारा स्वागत (श्लोक १-७)
ऋष्यशृङ्गमृषिं दृष्ट्वा प्रहर्षमतुलं ययौ ॥ १-१०-१ ॥
पूजयामास धर्मात्मा यथावत्प्रतिपूजनम् ॥
पाद्यार्घ्याचमनीयैश्च गन्धमाल्यैरनुत्तमैः ।
वासोभिर्भूषणैश्चैव यानैः शय्यासनैस्तथा ॥
राजा दशरथो धीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥
कच्चित्सुखं तपो राजन्कच्चित्क्षेमं गुरोः सदा ।
कच्चित्ते वर्तते राजन्सर्वं कुशलमग्रतः ॥
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं राजानं रघुनन्दनम् ।
ऋष्यशृङ्गो महातेजाः सर्वं कुशलमग्रतः ॥
🌧️ ऋष्यशृंग के आगमन से मूसलाधार वर्षा और अकाल की समाप्ति (श्लोक ८-१५)
यथा सागरपारे तु वृष्ट्या भरतसत्तम ॥ १-१०-८ ॥
सस्यानि च समृद्धानि बभूवुः सर्वतो दिशम् ॥
हृष्टपुष्टजनाकीर्णा नगरी जनपास्तथा ।
बभूवुर्विगतशोकाश्च नित्यं प्रमुदिताः सदा ॥
प्रहर्षमतुलं लेभे बाष्पपूर्णेक्षणोऽभवत् ॥
शान्तां नाम सुतां राज्ञे दशरथाय दत्तवान् ।
ऋष्यशृङ्गाय धर्मज्ञः शान्तां दत्त्वा महीपतिः ॥
💒 ऋष्यशृंग और शांता का वैवाहिक जीवन (श्लोक १६-२२)
रेमे परमया प्रीत्या पितुर्वचनमास्थितः ॥
तस्यामुत्पादयामास पुत्रं चारुविभूषितम् ।
अजमीढं महात्मानं सुतं चैव महाबलम् ॥
ऋष्यशृङ्गं पुरस्कृत्य यज्ञं चक्रे महामतिः ॥
तस्य यज्ञस्य महतः प्रभावात्तु महात्मनः ।
पुत्राश्चत्वार आजग्मुः कुलस्य वर्धनाः प्रभो ॥
रामो लक्ष्मण इत्येव भरतः शत्रुघ्नस्तथा ।
चत्वारः पुत्र आजग्मुः कुलस्य वर्धनाः प्रभो ॥
🤝 राजा दशरथ का ऋष्यशृंग से सम्बन्ध और अयोध्या आमन्त्रण (श्लोक २३-३०)
ऋष्यशृङ्गमृषिं प्रीत्या वचनं चेदमब्रवीत् ॥
भगवन् पुत्रकामोऽहं तवाद्य शरणं गतः ।
तद्भवाननुगृह्णातु पुत्रान्मे प्रापयस्व ह ॥
प्रत्युवाच महातेजा यज्ञं कर्तुमिहार्हसि ॥
अश्वमेधं महायज्ञं कुरु त्वं राजसत्तम ।
यस्मिन्नृषयः कल्पन्ते ब्रह्माणं च प्रपेदिरे ॥
इति दत्त्वा वरं राज्ञे ऋष्यशृङ्गो महातपाः ॥
अनुज्ञाप्य महाराजं जगाम सह सूत्रिणा ।
ततो राजा दशरथः प्रीतः परमया मुदा ॥
ऋष्यशृङ्गं पुरस्कृत्य यथाशास्त्रं यथाविधि ॥
एवं तस्य महातेजा ऋष्यशृङ्गो महातपाः ।
सम्बन्धमगमद्राज्ञा दशरथेन धीमता ॥
✨ ऋष्यशृंग की महिमा और यज्ञ-सफलता की घोषणा (श्लोक ३१-३५)
पुत्राश्चत्वार आजग्मुः कुलस्य वर्धनाः प्रभो ॥
रामो लक्ष्मण इत्येव भरतः शत्रुघ्नस्तथा ।
चत्वारः पुत्र आजग्मुः कुलस्य वर्धनाः प्रभो ॥
प्रीतियुक्ता जनाः सर्वे बभूवुर्विगतज्वराः ॥
राजा दशरथश्चैव प्रीतः परमया मुदा ।
बभूव सह पुत्रैश्च प्रजाश्च परिपालयन् ॥
ऋष्यशृङ्गस्य चरितं राज्ञश्च दशरथस्य ह ॥ १-१०-३५ ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🌧️ तपोबल का प्रभाव
ऋष्यशृंग के आगमन मात्र से अकालग्रस्त अंग देश में मूसलाधार वर्षा होना यह दर्शाता है कि सच्चे तपस्वियों के आशीर्वाद से प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है। तपोबल भौतिक शक्तियों से परे होता है।
👰 राजकन्या का सम्मान
राजा रोमपाद ने ऋष्यशृंग के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अपनी पुत्री शांता का विवाह उनसे कर दिया। यह दर्शाता है कि प्राचीन काल में राजकन्याओं का विवाह योग्य वरों से करने की परम्परा थी, चाहे वे आश्रम में रहने वाले ऋषि ही क्यों न हों।
🤝 राजा-ऋषि सम्बन्ध
राजा दशरथ का ऋष्यशृंग के प्रति सम्मान और उन्हें अयोध्या आमन्त्रित करना राजा और ऋषि के पारस्परिक सम्बन्ध को दर्शाता है। राजा ऋषियों का आशीर्वाद लेते थे और ऋषि राजा को धर्म-मार्ग पर चलाने में सहायक होते थे।
🌟 राम-जन्म की पूर्णता
यह सर्ग ऋष्यशृंग की कथा को राम-जन्म से जोड़ता है। ऋष्यशृंग द्वारा किए गए यज्ञ के फलस्वरूप ही राम का जन्म हुआ। अतः यह सर्ग रामायण की मुख्य कथा के लिए अनिवार्य पृष्ठभूमि है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चे तपस्वियों का सम्मान और उनका आशीर्वाद व्यक्ति और समाज दोनों के लिए कल्याणकारी होता है। ऋष्यशृंग के आशीर्वाद से अंग देश का अकाल समाप्त हुआ और राजा दशरथ को पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। हमें भी साधु-संतों का सम्मान करना चाहिए और उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख-शान्ति प्राप्त करनी चाहिए।