रावण का भिक्षुक वेश में आना

इस सर्ग में रावण, सीता के रूप-सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर, उनका हरण करने का कपटपूर्ण निश्चय करता है। वह एक तपस्वी भिक्षुक का वेश धारण करके पंचवटी में राम के आश्रम के समीप पहुँचता है और सीता से भिक्षा माँगने के बहाने उनसे बातचीत करता है।

विवरण

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड के अंतिम चरण का है, जब राम, सीता और लक्ष्मण पंचवटी में निवास कर रहे हैं। रावण की बहन शूर्पणखा, जिसका राम और लक्ष्मण द्वारा अपमान किया गया था, अपने भाई रावण के पास जाकर सीता के अलौकिक सौन्दर्य का वर्णन करती है। शूर्पणखा रावण को उकसाती है कि वह सीता का हरण कर ले। रावण, सीता के रूप-गुणों का वर्णन सुनकर कामातुर हो जाता है और उन्हें पाने की लालसा में वह तुरन्त पंचवटी की ओर प्रस्थान करता है। मायावी रावण एक साधु का वेश धारण करता है – सिर पर जटा, पैरों में पादुका, कंधे पर कमण्डलु और हाथ में त्रिदण्ड लेकर वह भिक्षुक बन जाता है। इस भेष में वह राम के आश्रम पहुँचता है। उस समय राम और लक्ष्मण आश्रम से दूर वन में फल-मूल लाने गए होते हैं। सीता अकेली कुटिया के सामने बैठी राम का ध्यान कर रही होती हैं। रावण उनके सामने प्रकट होता है और विनीत भाव से भिक्षा माँगता है। सीता उसे देखकर सत्कारपूर्वक भिक्षा देती हैं। तब रावण अपना वास्तविक परिचय देता है और सीता से उससे विवाह करने का दुस्साहसिक प्रस्ताव रखता है। सीता क्रोधित होकर उसे धिक्कारती हैं और राम की वीरता का स्मरण दिलाती हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ९९

(रावण का भिक्षुक वेश में आना – छल का आरम्भ)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथैकोनशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम, सीता और लक्ष्मण अब पंचवटी में दण्डकारण्य वन में निवास कर रहे हैं। शूर्पणखा की नाक काटने का प्रसंग बीत चुका है। अपमानित शूर्पणखा ने अपने भाई रावण से जाकर सीता के अद्भुत सौन्दर्य का वर्णन किया। रावण, जो अब तक सीता के विषय में कुछ नहीं जानता था, उस वर्णन को सुनकर काममोहित हो जाता है और सीता को पाने के लिए कुटिल चाल चलने का निश्चय करता है। यह सर्ग उसी कुटिल चाल के आरम्भ का वर्णन करता है।

👹 रावण का संकल्प और भिक्षुक वेश (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
शूर्पणखावचः श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।
चिन्तयामास धर्मात्मा किं करोमीति राघवे ॥
ततः स दुष्टभावेन समुद्यम्य मनोगतम् ।
जगाम पञ्चवट्यां वै यत्र रामः प्रतिष्ठितः ॥
स तु वेषं विधायाजौ भिक्षुरूपं महाबलः ।
जटी मुण्डी च पादाभ्यां खरमूढो ऽभवत् तदा ॥
कमण्डलुधरो दण्डी त्रिदण्डी च विभूषितः ।
उपानहौ च पादाभ्यां धारयामास वीर्यवान् ॥
🔹 पदच्छेद : शूर्पणखावचः = शूर्पणखा के वचन; श्रुत्वा = सुनकर; रावणः = रावण; क्रोधमूर्च्छितः = क्रोध से मूर्छित-सा; चिन्तयामास = विचार करने लगा; धर्मात्मा = (व्यंग में) धर्मात्मा; किं करोमीति = क्या करूँ?; राघवे = राम के विषय में; ततः = तब; सः = वह; दुष्टभावेन = दुष्ट भाव से; समुद्यम्य = उद्यत होकर; मनोगतम् = मन की बात; जगाम = गया; पञ्चवट्याम् = पंचवटी में; वै = निश्चय; यत्र = जहाँ; रामः = राम; प्रतिष्ठितः = स्थित हैं; सः = उसने; तु = तो; वेषम् = वेश; विधाय = बनाकर; अजौ = अजीर्ण (पुराना); भिक्षुरूपम् = भिक्षुक का रूप; महाबलः = महाबली; जटी = जटाधारी; मुण्डी = मुंडित सिर वाला; च = और; पादाभ्याम् = पैरों में; खरमूढः = खर के समान मूर्ख (या खर से प्रेरित); अभवत् = हो गया; तदा = तब; कमण्डलुधरः = कमण्डलु धारण किये; दण्डी = दण्ड धारण किये; त्रिदण्डी = त्रिदण्ड धारण किये; च = और; विभूषितः = सुसज्जित; उपानहौ = पादुकाएँ; च = भी; पादाभ्याम् = पैरों में; धारयामास = धारण की; वीर्यवान् = पराक्रमी।
📖 भावार्थ : शूर्पणखा के वचन सुनकर रावण क्रोध से भर उठा और सोचने लगा कि राम के प्रति क्या करना उचित होगा। फिर उसने अपने मन में दुष्ट भावना धारण कर पंचवटी की ओर प्रस्थान किया, जहाँ राम निवास करते थे। उस महाबली ने भिक्षुक का वेश धारण किया – जटा धारण की, सिर मुंडवा लिया, पैरों में पादुका पहनी, कमण्डलु और दण्ड (त्रिदण्ड) ले लिया और इस प्रकार वह एक साधु के रूप में प्रकट हुआ।
🔍 व्याख्या : रावण ने अत्यंत छलपूर्वक भिक्षुक का वेश धारण किया ताकि सीता पर किसी प्रकार का संदेह न हो। वह अपने बल और पराक्रम के बावजूद कपट का सहारा लेता है, जो उसकी नीचता को दर्शाता है।
॥ श्लोक ५-८ ॥
स तु रामाश्रमं गत्वा ददर्श जनकात्मजाम् ।
तपस्विनीं वनस्थां च देवतामिव निर्मिताम् ॥
तामेकाकीं तदा दीनां रहिते भर्तृभिर्वने ।
उपस्थितां कुटीद्वारि ध्यायन्तीं राममात्मनः ॥
दृष्ट्वा तु रावणः सीतां रूपयौवनशालिनीम् ।
कामबाणाभिसंतप्तो मुमोह च पुनः पुनः ॥
उपेत्य तु तदा भिक्षुर्भिक्षां देहीति चाब्रवीत् ।
सीता तु प्रतिपूज्यैनमिदं वचनमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : रावण राम के आश्रम में पहुँचा और वहाँ उसने जनकनन्दिनी सीता को देखा, जो तपस्विनी के रूप में वन में निवास कर रही थीं, मानो कोई देवी साक्षात प्रकट हुई हो। उस समय वे अकेली थीं, पति राम और लक्ष्मण वन में गए हुए थे। सीता कुटिया के द्वार पर बैठी राम का ध्यान कर रही थीं। रावण ने सीता के रूप और यौवन को देखा तो वह काम के बाणों से पीड़ित होकर बार-बार मोहित होने लगा। तब वह भिक्षुक बने रावण ने पास जाकर कहा, "भिक्षां देहि" (भिक्षा दो)। सीता ने उनका सत्कार करके यह वचन कहा।

🗣️ सीता और रावण का संवाद (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
स्वागतं ते महाभाग पूजां गृहाण मे प्रियाम् ।
भिक्षा च विधिवद्दत्ता गृहाण त्वं द्विजोत्तम ॥
इत्युक्त्वा सा तदा सीता प्रक्षाल्य चरणौ ततः ।
आसने चोपवेश्यैनं भिक्षामादाय सत्कृताम् ॥
तस्यै दत्त्वा ततः सीता पप्रच्छ कुशलं वने ।
क्व वासस्ते द्विजश्रेष्ठ किमर्थमिह चागमः ॥
रावणस्त्वब्रवीद्वाक्यं शृणु देवि वचो मम ।
नाहं द्विजो न च भिक्षुः किं तु राक्षसपुङ्गवः ॥
रावणो नाम भद्रं ते लोकत्रयभयङ्करः ।
तव रूपेण कामार्तस्त्वामिच्छामि वरानने ॥
मां भजस्व मया सार्धं भार्या भव सुमध्यमे ।
रामस्त्यक्त्वा वनं दूरं न त्वां प्राप्स्यति कर्हिचित् ॥
📖 भावार्थ : सीता ने कहा, "हे महाभाग! आपका स्वागत है। कृपया मेरी पूजा ग्रहण करें। हे द्विजोत्तम! यह भिक्षा विधिपूर्वक दी गई है, आप इसे ग्रहण करें।" ऐसा कहकर सीता ने उनके चरण धोए, आसन पर बिठाया और सत्कारपूर्वक भिक्षा दी। फिर सीता ने पूछा, "हे द्विजश्रेष्ठ! वन में आपका कुशल तो है? आपका निवास कहाँ है और आप यहाँ क्यों आए हैं?" तब रावण ने कहा, "हे देवि! मेरी बात सुनो। मैं न तो द्विज हूँ और न ही भिक्षुक, बल्कि राक्षसों में श्रेष्ठ हूँ। मेरा नाम रावण है, जो तीनों लोकों में भय उत्पन्न करने वाला है। हे वरानने! तुम्हारे रूप पर मैं मोहित हूँ और तुम्हें चाहता हूँ। मुझे स्वीकार करो, मेरे साथ चलो और मेरी भार्या बनो। राम ने वन त्याग दिया है, दूर चला गया है, वह तुम्हें कभी नहीं पा सकेगा।"
🔍 व्याख्या : रावण की माया और छल अब समाप्त हो जाता है। वह अपना वास्तविक परिचय देकर सीता के सामने अपनी कामुकता और अहंकार प्रकट करता है।
॥ श्लोक १५-२० ॥
तच्छ्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्य सीता क्रोधसमन्विता ।
भ्रुकुटीं कुटिलां कृत्वा रावणं प्रत्यभाषत ॥
कथं मां राक्षसश्रेष्ठ रामपत्नीं पतिव्रताम् ।
याचसेऽधर्मसंयुक्तं वाक्यमुग्रं विगर्हितम् ॥
नूनं त्वं मृत्युमासाद्य रामबाणार्दितो भृशम् ।
न चिराद्विनशिष्यसि दुष्टात्मन्नीतिमानिव ॥
रामो धर्मभृतां श्रेष्ठः सत्यवान् विजितेन्द्रियः ।
तस्य भार्या स्थिता पादौ कथं त्वां याचितुं क्षमा ॥
इत्युक्त्वा वेपमाना सा सीता दुःखेन मोहिता ।
प्रविवेश कुटीं शीघ्रं रुदती रामचिन्तया ॥
📖 भावार्थ : राक्षसराज रावण के उन वचनों को सुनकर सीता क्रोध से भर गईं। उन्होंने भौंहें टेढ़ी करके रावण से कहा, "हे राक्षसश्रेष्ठ! तुम मुझे, जो राम की पत्नी और पतिव्रता हूँ, कैसे माँग सकते हो? तुम्हारा यह अधर्मयुक्त, उग्र और निन्दित वचन है। निश्चय ही तुम शीघ्र ही राम के बाणों से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त होगे, हे दुष्टात्मन्! राम धर्म का धारण करने वालों में श्रेष्ठ, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं। उनकी भार्या होने के कारण मैं उनके चरणों में स्थित हूँ, फिर मैं तुम्हारे याचना को कैसे सहन कर सकती हूँ?" ऐसा कहकर सीता, जो काँप रही थीं और दुःख से मोहित थीं, राम का ध्यान करती हुई रोती हुई शीघ्र ही कुटिया में चली गईं।

🚩 रावण का प्रस्थान और आगे का संकेत (श्लोक २१-२८)

॥ श्लोक २१-२८ ॥
सीताया वचनं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।
प्रगृहीतशरश्चापं मुहूर्तं समचिन्तयत् ॥
न हन्मि तामहं सद्यो रामपत्नी पतिव्रताम् ।
किं मे हतया तस्माद् रामं हत्वा गमिष्यति ॥
इति संचिन्त्य मनसा प्रतस्थे रावणस्तदा ।
आश्रमात् स तु दुष्टात्मा यत्र रामो महाबलः ॥
स तु दृष्ट्वा वने रामं लक्ष्मणं च महाबलम् ।
दूरतश्चिन्तयामास किं करोमीति राक्षसः ॥
न युद्धं राघवेणेह संभावयति मे मनः ।
तस्मादुपायतः सीतां हरिष्ये नात्र संशयः ॥
इति निश्चित्य मनसा जगाम स्वपुरं प्रति ।
रावणो राक्षसश्रेष्ठः सीतां ध्यायन् मुहुर्मुहुः ॥
📖 भावार्थ : सीता के वचन सुनकर रावण क्रोध से व्याकुल हो गया। उसने धनुष उठाया और कुछ क्षण विचार किया, "मैं अभी सीता को मार नहीं सकता, क्योंकि वह राम की पतिव्रता पत्नी है। उसे मारने से क्या लाभ? राम को मारकर ही वह प्राप्त होगी।" ऐसा सोचकर दुष्टात्मा रावण आश्रम से निकल पड़ा और उसने वन में राम और लक्ष्मण को देखा। दूर से देखकर वह सोचने लगा, "मैं क्या करूँ? राम के साथ युद्ध मेरे मन को उचित नहीं लगता। इसलिए किसी उपाय से सीता का हरण करूँगा, इसमें संशय नहीं।" ऐसा निश्चय करके राक्षसश्रेष्ठ रावण बार-बार सीता का ध्यान करता हुआ अपनी नगरी की ओर चला गया।
🔍 व्याख्या : रावण ने सीता के हरण के लिए युद्ध के स्थान पर छल को चुना, जो उसके कायरतापूर्ण और कुटिल स्वभाव को दर्शाता है। यह अगले काण्ड में होने वाली घटनाओं का सूत्रपात है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🎭 छल और सत्य का संघर्ष

इस सर्ग में रावण का भिक्षुक वेश धारण करना उसके छल और कपट को उजागर करता है। दूसरी ओर सीता का पतिव्रता धर्म पर अडिग रहना और राम के प्रति निष्ठा सत्य और धर्म की विजय का संकेत है। यह संघर्ष आगे चलकर महाभारत का रूप धारण करता है।

👸 सीता का आदर्श चरित्र

सीता ने अकेले होते हुए भी रावण के प्रलोभन और भय से विचलित हुए बिना उसे धिक्कारा। उनका यह साहस और पतिव्रता धर्म भारतीय नारी के आदर्श का प्रतीक है। वे केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि आत्मिक रूप से भी अत्यंत बलवती हैं।

⚔️ रावण का अहंकार और उसका पतन

रावण का यह प्रयास उसके अहंकार और कामुकता का परिणाम है। वह बलशाली होते हुए भी सीता को पाने के लिए छल का सहारा लेता है, जो उसके पतन का मूल कारण बनता है। उसका यह कृत्य अधर्म के मार्ग पर चलने का द्योतक है।

🌳 अयोध्याकाण्ड का समापन

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड का 99वाँ और अंतिम सर्ग (कुछ संस्करणों में 119वाँ) है। यहाँ रावण का आगमन और सीता के प्रति उसका दुराग्रह अगले काण्ड – अरण्यकाण्ड – की घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार करता है। यह एक सेतु का कार्य करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि छल और कपट से प्राप्त की गई वस्तु क्षणिक होती है, जबकि सत्य और धर्म पर आरूढ़ व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता। सीता के समान हमें भी विषम परिस्थितियों में धैर्य और साहस नहीं खोना चाहिए और सदा धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। रावण का उदाहरण हमें अहंकार और कामुकता से दूर रहने की प्रेरणा देता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे एकोनशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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