लक्ष्मण का सीता को छोड़कर जाना

इस सर्ग में, भगवान राम अपने अनुज लक्ष्मण को वन से फल-मूल लाने के लिए भेजते हैं। लक्ष्मण माता सीता से आज्ञा लेकर प्रस्थान करते हैं। यह प्रसंग तीनों के परस्पर स्नेह और लक्ष्मण की सेवा-निष्ठा को दर्शाता है।

विवरण

यह सर्ग चित्रकूट के सुंदर वन में घटित होता है, जहाँ राम, सीता और लक्ष्मण निवास कर रहे हैं। एक दिन प्रातःकाल, भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा कि वे समीप के वन से ताजे फल, कंद-मूल और मधु लेकर आएँ। लक्ष्मण तुरंत तैयार हो जाते हैं और माता सीता से आज्ञा लेने जाते हैं। सीता जी स्नेहपूर्वक उन्हें शीघ्र लौटने का आदेश देती हैं और उनकी सुरक्षा के लिए मंगलकामना करती हैं। लक्ष्मण विनम्रतापूर्वक उन्हें प्रणाम करके वन की ओर प्रस्थान करते हैं। इस अवसर पर राम और सीता उनके जाने के बाद वन्य जीवों और प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेते हैं। यह सर्ग लक्ष्मण की आज्ञाकारिता, सेवा-भाव और राम-सीता के प्रति उनके अटूट समर्पण का सुंदर चित्रण करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ९८

(लक्ष्मण का सीता को छोड़कर जाना – सेवा का अनुपम उदाहरण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम, लक्ष्मण और सीता चित्रकूट के सुंदर वन में निवास कर रहे हैं। वे फल-मूल खाकर वन्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं। एक दिन प्रभु राम लक्ष्मण को फल लाने की आज्ञा देते हैं। यह सर्ग उसी प्रसंग का वर्णन करता है, जहाँ लक्ष्मण माता सीता से आज्ञा लेकर वन जाते हैं।

🌿 राम की आज्ञा और लक्ष्मण का उत्साह (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रभाते विमले रामः सत्यपराक्रमः ।
लक्ष्मणं प्रियमामन्त्र्य वाक्यमाह महामतिः ॥
'गच्छ सौम्य वनादस्मात्फलानि मधूनि च ।
आनयाशु प्रियार्हाणि सीतायै च तपस्विने ॥
त्वयि याते वनं घोरं सीता मां समुपस्थिता ।
निर्विशेषा भविष्यति त्वदधीना हि जीविका ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रभात काल में; विमले = स्वच्छ; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्य पराक्रम वाले; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; प्रियम् = प्रिय; आमन्त्र्य = बुलाकर; वाक्यम् = वचन; आह = बोले; महामतिः = महान बुद्धिमान; गच्छ = जाओ; सौम्य = सज्जन; वनात् = वन से; अस्मात् = इस; फलानि = फल; मधूनि = मधु (शहद); च = और; आनय = लाओ; आशु = शीघ्र; प्रियार्हाणि = प्रिय के योग्य; सीतायै = सीता के लिए; च = और; तपस्विने = तपस्वी (मेरे लिए); त्वयि = तुम्हारे; याते = चले जाने पर; वनम् = वन; घोरम् = भयानक; सीता = सीता; माम् = मेरे; समुपस्थिता = पास रहेंगी; निर्विशेषा = अविशेष (सुरक्षित); भविष्यति = होंगी; त्वदधीना = तुम पर निर्भर; हि = ही; जीविका = जीविका।
📖 भावार्थ : उसके बाद स्वच्छ प्रभात काल में सत्यपराक्रमी महामति राम ने प्रिय लक्ष्मण को बुलाकर कहा, "हे सौम्य! इस वन से शीघ्र ही फल और मधु ले आओ, जो हमारे लिए उपयुक्त हों। तुम्हारे वन जाने पर सीता मेरे पास रहेंगी और सुरक्षित रहेंगी। हमारी जीविका तुम पर ही निर्भर है।"
🔍 व्याख्या : राम ने लक्ष्मण को उनके सेवाभाव के लिए प्रेरित किया। वे जानते हैं कि लक्ष्मण के बिना वनवास कठिन है।
॥ श्लोक ४-५ ॥
लक्ष्मणस्तु वचः श्रुत्वा रामस्य प्रियकर्मकृत् ।
प्रहृष्टवदनो भूत्वा प्रत्युवाच कृताञ्जलिः ॥
'आज्ञापयस्व मां नाथ करिष्ये तव शासनम् ।
यथाशक्ति गमिष्यामि फलान्यादाय सत्वरम् ॥
📖 भावार्थ : प्रिय कर्म करने वाले लक्ष्मण राम के वचन सुनकर प्रसन्न मुख हुए और हाथ जोड़कर बोले, "हे नाथ! आप मुझे आज्ञा दें, मैं आपका शासन पालन करूंगा। मैं शीघ्र ही यथाशक्ति फल लेकर लौटूंगा।"

🙏 सीता से आज्ञा और आशीर्वाद (श्लोक ६-१२)

॥ श्लोक ६-८ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणः श्रीमान् यत्र सीता तपस्विनी ।
तत्र गत्वा महाबाहुः प्रणम्य शिरसा तदा ॥
उवाच मधुरं वाक्यं सीतामुद्दिश्य भक्तितः ।
'आर्ये रामाज्ञया यामि फलान्याहर्तुमद्य वै ॥
आज्ञापय क्षणं मातः शीघ्रमागमनं भवेत् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर श्रीमान् महाबाहु लक्ष्मण जहाँ तपस्विनी सीता थीं, वहाँ गए और शिर से प्रणाम करके भक्तिपूर्वक मधुर वचन बोले, "हे आर्ये! राम की आज्ञा से मैं आज फल लेने जा रहा हूँ। हे मातः! आप आज्ञा दीजिए, मैं शीघ्र लौट आऊँगा।"
॥ श्लोक ९-१२ ॥
सीता तु प्रियमालोक्य लक्ष्मणं प्रियवादिनम् ।
उवाच परमोदारा स्नेहेन परिपूरिता ॥
'गच्छ वत्स यथाकामं रामस्य वचनादनु ।
मा चिरं कुरु सौम्य त्वं शीघ्रमागच्छ लक्ष्मण ॥
त्वद्वियोगेन का शान्तिर्भवेद्रामस्य धीमतः ।
तस्मादाशु समागच्छ वन्यफलैः समन्वितः ॥
रक्षांसि वनचारीणि भवन्ति बहुलानि च ।
तस्माद्गच्छ सदा युक्तः स्मरन् रामस्य शासनम् ॥
📖 भावार्थ : प्रिय बोलने वाले लक्ष्मण को देखकर परम उदार सीता स्नेह से भरकर बोलीं, "हे वत्स! राम के वचन का पालन करते हुए तुम यथाकाम जाओ। हे सौम्य! विलंब मत करो, शीघ्र लौट आओ। तुम्हारे वियोग से धीमान् राम को शांति कैसे मिलेगी? इसलिए वन्य फल लेकर शीघ्र वापस आओ। यहाँ बहुत से राक्षस वन में विचरते हैं, इसलिए सदा सावधान रहकर जाओ और राम की आज्ञा का स्मरण करो।"
🔍 व्याख्या : सीता ने लक्ष्मण के प्रति मातृ-स्नेह प्रकट किया और उनकी सुरक्षा की चिंता की। यहाँ रक्षांसि का उल्लेख आगे के कथानक का संकेत देता है।

🚶 लक्ष्मण का वन प्रस्थान (श्लोक १३-१८)

॥ श्लोक १३-१५ ॥
सीतायाः प्रियमाज्ञाय लक्ष्मणः प्रियदर्शनः ।
तामभिवाद्य विधिवद्रामं चापि ननाम ह ॥
धनुरादाय सशरं खङ्गं च रुचिरप्रभम् ।
प्रययौ वनमुद्दिश्य फलहेतोर्महायशाः ॥
तं यान्तमनुयातौ द्वौ रामसीतौ महाव्रतौ ।
कियद्दूरं ततः सीता रामेण सहिता स्थिता ॥
📖 भावार्थ : सीता के प्रिय वचनों को सुनकर प्रियदर्शन लक्ष्मण ने उन्हें विधिवत् प्रणाम किया और राम को भी नमस्कार किया। फिर धनुष-बाण और सुंदर खड्ग लेकर वे महायशस्वी फल के लिए वन की ओर प्रस्थित हुए। उन्हें जाते देख राम और सीता कुछ दूर तक उनके पीछे गए, फिर सीता राम के साथ वहीं रुक गईं।
॥ श्लोक १६-१८ ॥
लक्ष्मणे गहनं याते रामः सीतां सुमध्यमाम् ।
उवाच प्रेक्ष्य तान् वृक्षान् पुष्पितान् मधुगन्धिनः ॥
'पश्य सीते वनोद्देशं कोकिलैरुपशोभितम् ।
मयूरैर्नृत्यमानैश्च हरिणैश्च मनोरमैः ॥
रमणीयमिदं सर्वं त्वत्समीपे मनोहरम् ।
लक्ष्मणः सत्वरं यातो न चिरादेष्यति ध्रुवम् ॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण के वन में चले जाने पर राम ने सुमध्यमा सीता से कहा, "हे सीते! इस वन प्रदेश को देखो, जो कोयलों से सुशोभित है, नाचते हुए मोरों से और मनोरम हिरणों से सुंदर है। यह सब तुम्हारे समीप अत्यंत मनोहर लग रहा है। लक्ष्मण शीघ्र ही चले गए हैं, निश्चय ही वे शीघ्र लौट आएँगे।"

🌅 प्रतीक्षा और प्रकृति-दर्शन (श्लोक १९-२५)

॥ श्लोक १९-२२ ॥
एवं वदति रामे तु सीता प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
'आश्चर्यं वनसौन्दर्यं त्वया सार्धं सुखप्रदम् ॥
लक्ष्मणोऽपि महातेजाः कुशली शीघ्रमेष्यति ।
न चिन्ता विद्यते मह्यं त्वयि सुप्ते जगत्पते ॥
इतिश्चिन्तयतोस्तत्र व्यतीता सा त्रियामिका ।
प्रभाते पुनरायातो लक्ष्मणः फलसंचयैः ॥
दृष्ट्वा तौ प्रीतिमन्तौ च रामसीतौ तदाभवत् ।
लक्ष्मणं प्रीतिसंयुक्तौ परिष्वज्योपतस्थतुः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार राम के कहने पर सीता ने हाथ जोड़कर कहा, "वन का यह सौंदर्य आश्चर्यजनक है, और आपके साथ होने से सुखदायक है। महातेजस्वी लक्ष्मण कुशलपूर्वक शीघ्र ही लौट आएँगे। हे जगत्पते! आपके होते हुए मुझे कोई चिंता नहीं है।" ऐसा विचार करते हुए उनकी वह रात्रि व्यतीत हो गई। प्रभात काल में लक्ष्मण फलों का संचय करके लौट आए। उन्हें देखकर राम और सीता अत्यंत प्रसन्न हुए और प्रेमपूर्वक उनसे मिले।
॥ श्लोक २३-२५ ॥
ततः फलानि रामाय सीतायै च न्यवेदयत् ।
तैः फलैः सहिताः सर्वे न्यवसन्मुनिवत्सदा ॥
इति वाल्मीकिकाव्येऽस्मिन् रामस्य चरितं शुभम् ।
लक्ष्मणस्य च सीतायाः प्रीतिवर्धनमुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : तब लक्ष्मण ने वे सब फल राम और सीता को समर्पित किए। उन फलों से युक्त होकर वे सभी सदा मुनियों के समान वहाँ निवास करते रहे। इस प्रकार वाल्मीकि के इस काव्य में राम, लक्ष्मण और सीता का यह उत्तम प्रीतिवर्धक शुभ चरित्र वर्णित है।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार एक साधारण दिनचर्या का प्रसंग भी तीनों के अटूट प्रेम और लक्ष्मण के समर्पण को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙇 लक्ष्मण की सेवा-निष्ठा

इस सर्ग में लक्ष्मण की आज्ञापालन और सेवा-भावना स्पष्ट दिखती है। वे बिना किसी प्रश्न के राम की आज्ञा का पालन करते हैं और सीता से आशीर्वाद लेना नहीं भूलते। यह उनके चरित्र की विनम्रता और शिष्टाचार को दर्शाता है।

👸 सीता का मातृ-स्नेह

सीता ने लक्ष्मण को वत्स कहकर संबोधित किया और उनकी सुरक्षा की चिंता की। यह उनके वात्सल्य भाव और परिवार के प्रति समर्पण को दर्शाता है। वे लक्ष्मण को केवल देवर नहीं, पुत्र-समान स्नेह करती हैं।

🌳 प्रकृति-प्रेम

राम और सीता का वन-सौंदर्य का आनंद लेना उनके प्रकृति-प्रेम और सादगीपूर्ण जीवन को दर्शाता है। वन में रहते हुए भी वे प्रसन्न हैं, क्योंकि वे एक-दूसरे के साथ हैं।

🛡️ रक्षाओं का संकेत

सीता द्वारा राक्षसों के भय का उल्लेख आगे आने वाली घटनाओं (सूर्पनखा प्रसंग) की ओर इशारा करता है। यह वाल्मीकि की कथाकुशलता का परिचायक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें परिवार के सदस्यों के प्रति प्रेम, आज्ञाकारिता और सेवा-भाव की शिक्षा मिलती है। लक्ष्मण का समर्पण हमें सिखाता है कि बड़ों की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन करना ही सच्चा धर्म है। साथ ही, सीता का आशीर्वाद और राम का स्नेह यह बताता है कि पारिवारिक संबंध कितने महत्वपूर्ण होते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे अष्टनवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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