मारीच द्वारा 'हा लक्ष्मण' का नकली नाद

रावण के कहने पर मारीच 'हा लक्ष्मण' का नकली नाद करता है। यह सुनकर सीता अत्यधिक व्याकुल हो जाती हैं और लक्ष्मण से राम की सहायता के लिए जाने का आग्रह करती हैं। लक्ष्मण के समझाने पर भी वह नहीं मानतीं और अंततः लक्ष्मण को जाना पड़ता है।

विवरण

यह सर्ग रावण की कुटिल चाल का वर्णन करता है। रावण मारीच को समझाता है कि वह राम की आवाज़ की नकल करके 'हा लक्ष्मण' का नाद करे, जिससे सीता भयभीत होकर लक्ष्मण को राम के पास भेज दे। मारीच आरंभ में मना करता है, किंतु रावण के बलपूर्वक आग्रह पर अंततः तैयार हो जाता है। वह आश्रम के समीप जाकर 'हा लक्ष्मण' का भयानक नाद करता है। यह सुनकर सीता अत्यंत चिंतित हो जाती हैं। वह लक्ष्मण से तुरंत राम की सहायता के लिए जाने को कहती हैं। लक्ष्मण उन्हें समझाते हैं कि राम अजेय हैं और कोई संकट नहीं हो सकता, परंतु सीता उन पर दबाव डालती हैं और उन्हें कायर तक कह देती हैं। विवश होकर लक्ष्मण राम की खोज में जाते हैं, जिससे सीता अकेली रह जाती हैं और रावण के लिए अवसर बन जाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ९४

(मारीच द्वारा 'हा लक्ष्मण' का नकली नाद – छल का आरम्भ)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्नवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण मारीच के साथ पंचवटी पहुँच चुका है। मारीच राम के पराक्रम से भयभीत है, किंतु रावण के आग्रह पर वह राम की आवाज़ की नकल करके 'हा लक्ष्मण' का नाद करता है। यह सर्ग उस नकली नाद और उसके परिणामस्वरूप सीता के व्याकुल होने का वर्णन करता है।

👹 रावण का आदेश और मारीच की तैयारी (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः रावणः संध्यामनुप्राप्य मारीचमिदं वचः ।
उवाच परमोदारो रामस्याभिसमीपतः ॥
'गच्छ मारीच दूरस्थो रामस्याश्रमतः शुभात् ।
कुरु नादं महाघोरं सीतायाः प्राणनाशनम् ॥
यथा रामस्य सदृशो भवेस्त्वं तेन नादतः ।
हा लक्ष्मणेति विक्रोशन् सीता येन प्रमुह्यति ॥'
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रावणः = रावण; संध्याम् = सन्ध्या के समय; अनुप्राप्य = पाकर; मारीचम् = मारीच को; इदम् = यह; वचः = वचन; उवाच = बोला; परमोदारः = अत्यन्त उदार (रावण); रामस्य = राम के; अभिसमीपतः = समीप; 'गच्छ = जाओ; मारीच = मारीच; दूरस्थः = दूर रहकर; रामस्य = राम के; आश्रमतः = आश्रम से; शुभात् = पवित्र; कुरु = करो; नादम् = शब्द; महाघोरम् = अत्यन्त भयानक; सीतायाः = सीता के; प्राणनाशनम् = प्राणों का नाश करने वाला; यथा = जैसे; रामस्य = राम की; सदृशः = समान; भवेः = हो; त्वम् = तू; तेन = उस; नादतः = नाद से; हा लक्ष्मण = हा लक्ष्मण; इति = इस प्रकार; विक्रोशन् = चिल्लाता हुआ; सीता = सीता; येन = जिससे; प्रमुह्यति = मोहित हो जाए।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् सन्ध्या के समय रावण मारीच से बोला, "हे मारीच! तुम राम के पवित्र आश्रम से कुछ दूर जाकर अत्यन्त भयानक नाद करो, जो सीता के प्राणों का नाश करने वाला हो। तुम ऐसे नाद से राम के समान प्रतीत हो, हा लक्ष्मण पुकारते हुए, जिससे सीता मोहित हो जाए।"
🔍 व्याख्या : रावण मारीच को राम की आवाज़ की नकल करने का आदेश देता है, जो उसकी कुटिलता को दर्शाता है।
॥ श्लोक ४-७ ॥
मारीचस्तु तदा राज्ञः प्रियं वाक्यमनुत्तमम् ।
श्रुत्वा प्रहृष्टवदनः प्रत्युवाच महीपतिम् ॥
'नाहं त्वां समरे हन्तुं शक्तः सौम्य न संशयः ।
रामस्य भयमुत्पन्नं मम राजन् न संशयः ॥
किन्तु राजन् करिष्यामि तव वाक्यमनुत्तमम् ।
गमिष्यामि द्रुतं तत्र यत्र रामस्य चाश्रमः ॥'
📖 भावार्थ : तब मारीच ने राजा रावण का वह अनुपम प्रिय वचन सुनकर प्रसन्न मुख से कहा, "हे सौम्य! मैं युद्ध में तुम्हें मारने में समर्थ नहीं हूँ, इसमें संदेह नहीं। हे राजन! राम का भय मुझे उत्पन्न हो गया है, इसमें संशय नहीं। किंतु हे राजन! मैं तुम्हारे उत्तम वचन का पालन करूँगा। मैं शीघ्र ही उस स्थान पर जाऊँगा जहाँ राम का आश्रम है।"
🔍 व्याख्या : मारीच भयभीत होते हुए भी रावण के दबाव में आकर सहमत हो जाता है।

😱 'हा लक्ष्मण' का भयानक नाद (श्लोक ८-१५)

॥ श्लोक ८-१२ ॥
स तु गत्वा वनान्ते तु रामस्याश्रमतः शुभात् ।
दूरस्थः प्राणिनां शून्ये चुक्रोश हा लक्ष्मणेति च ॥
सीतया सह रामस्य वधं कृत्वा महात्मनः ।
इति शब्दो महाघोरो वायुना सह चोत्थितः ॥
तं श्रुत्वा निनदं घोरं सीता त्रस्ता भयातुरा ।
प्राधावत तदा दीना लक्ष्मणं प्रति भामिनी ॥
📖 भावार्थ : वह (मारीच) राम के पवित्र आश्रम से दूर वन के अंत में, प्राणियों से शून्य स्थान पर जाकर हा लक्ष्मण पुकारते हुए चिल्लाया। "सीता सहित महात्मा राम का वध कर डाला" – ऐसा अत्यन्त भयानक शब्द वायु के साथ उठा। उस घोर निनाद को सुनकर सीता भय से व्याकुल हो गईं और वे दीन होकर लक्ष्मण के पास दौड़ीं।
॥ श्लोक १३-१५ ॥
उवाच च तदा वाक्यं बाष्पगद्गदया गिरा ।
'गच्छ लक्ष्मण जानीहि रामं शोकेन पीडितम् ॥
एष वै राक्षसैः सार्धं रामो युधि निपातितः ।
हा लक्ष्मणेति विक्रोशन् मया श्रुतो हि निस्वनः ॥
त्वरितं गच्छ भद्रं ते रामं शरणमिच्छति ।
न चेज्जीवति मे नाथो हत्वा स्वं जीवितं त्यजे ॥'
📖 भावार्थ : तब वे आँसुओं से गद्गद वाणी में बोलीं, "हे लक्ष्मण! जाओ, राम को शोक से पीड़ित जानो। निश्चय ही राम राक्षसों के साथ युद्ध में मारे गए हैं। हा लक्ष्मण पुकारते हुए जो निस्वन मैंने सुना है। हे लक्ष्मण! शीघ्र जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, राम तुम्हें शरण चाहते हैं। यदि मेरे नाथ जीवित नहीं रहे तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।"

🤷 लक्ष्मण का संदेह और सीता का कठोर वचन (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १६-२० ॥
लक्ष्मणस्तु तदा वाक्यं श्रुत्वा सीताय भामिनि ।
उवाच परमप्रीतो रामस्याभिसमीपतः ॥
'नास्ति शक्तिर्हि रक्षांसि रामं युद्धे निपातितुम् ।
न चैवं भाषितुं युक्तं त्वया देवि वरानने ॥
रावणो मायया देवि मारीचेन सहैव च ।
कुरुते नादमेतं वै सीतायाः प्राणनाशनम् ॥
न च रामः परिश्रान्तो न च व्यसनमागतः ।
त्वया मिथ्या न बोद्धव्यं मा भैस्त्वं वरवर्णिनि ॥'
📖 भावार्थ : तब लक्ष्मण ने सीता के उस वचन को सुनकर राम के समीप से ही (सोचते हुए) कहा, "हे देवि! राक्षसों में राम को युद्ध में मारने की शक्ति नहीं है। हे वरानने! तुम्हारे द्वारा ऐसा कहना उचित नहीं है। हे देवि! रावण अपनी माया से मारीच के साथ मिलकर यह नाद कर रहा है, जो सीता के प्राणों का नाश करने वाला है। राम न तो थके हैं और न ही किसी संकट में हैं। तुम्हें मिथ्या नहीं समझना चाहिए। हे वरवर्णिनि! तुम भय मत करो।"
॥ श्लोक २१-२५ ॥
सीता तु कोपताम्राक्षी लक्ष्मणं प्रत्यभाषत ।
'किमिदं कथ्यते सौम्य यद्रामो मम वल्लभः ॥
न त्वं रामस्य सौहार्दादागतोऽसि वनं प्रति ।
रामेण सह संयुक्तः किं नु द्रक्ष्यसि मां प्रियाम् ॥
गच्छ लक्ष्मण मा भूस्त्वं विलम्बः क्रियतां मम ।
यदि जीवति मे नाथो न चेज्जीवाम्यहं ध्रुवम् ॥
त्वं तु कापुरुषो मूढो रामस्यार्थे न तिष्ठसि ।
हा नाथेति च विक्रोशन् भर्तारं परिदेवये ॥'
📖 भावार्थ : सीता क्रोध से ताम्र नेत्र होकर लक्ष्मण से बोलीं, "हे सौम्य! यह तुम क्या कह रहे हो, कि राम मेरे वल्लभ हैं? तुम राम के सौहार्द से वन में नहीं आए हो। राम के साथ रहकर क्या तुम मुझे प्रिय देखोगे? हे लक्ष्मण! जाओ, मेरे लिए विलम्ब मत करो। यदि मेरे नाथ जीवित हैं तो ठीक है, अन्यथा मैं निश्चित रूप से जीवित नहीं रहूँगी। तुम तो कापुरुष और मूढ़ हो, जो राम के लिए नहीं जाते। हा नाथ पुकारती हुई मैं अपने भर्ता के लिए विलाप कर रही हूँ।"
🔍 व्याख्या : सीता का यह कठोर वचन लक्ष्मण को विवश कर देता है। वह अपने कर्तव्य और सीता की आज्ञा के बीच उलझ जाते हैं।

🚶 लक्ष्मण का प्रस्थान और सीता का अकेलापन (श्लोक २६-३५)

॥ श्लोक २६-३० ॥
लक्ष्मणस्तु वचः श्रुत्वा सीतायाः परिदेवितम् ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा प्रत्युवाच शुचिस्मिताम् ॥
'यदि मां गन्तुमिच्छन्ती भवानीयं प्रबोधयेत् ।
तथापि न मया त्याज्या रामस्य परिपालनम् ॥
किन्तु त्वद्वाक्यबद्धोऽहं गमिष्यामि न संशयः ।
रक्ष त्वमात्मानं देवि यावदागमनं मम ॥
अद्य मे सुमहद् भीतिः सीते त्वयि न संशयः ।
रावणो मायया कश्चिदागच्छेदिह साम्प्रतम् ॥'
📖 भावार्थ : लक्ष्मण सीता के विलाप को सुनकर, हाथ जोड़कर उन शुचिस्मिता से बोले, "यदि भवानी (सीता) मुझे जाने की इच्छा करती हैं, तो भी मुझे राम की रक्षा का कार्य नहीं छोड़ना चाहिए। किंतु मैं तुम्हारे वचनों में बँधकर निश्चय ही जाऊँगा। हे देवि! जब तक मैं लौटकर न आऊँ, तुम अपनी रक्षा स्वयं करो। आज मुझे तुम्हारे लिए अत्यधिक भय है, हे सीते! इसमें संदेह नहीं कि रावण किसी माया से अब यहाँ आ सकता है।"
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणो देवीं प्रदक्षिणमकल्पयत् ।
प्रस्थितो राममन्वेष्टुं सीतया समुदीरितः ॥
गते तु लक्ष्मणे सीता रुदती शोककर्शिता ।
चिन्तयामास वैदेही रामं हतमिति प्रभुम् ॥
ततो रावण आगम्य भिक्षुरूपेण सुन्दरीम् ।
सीतां विवासयामास रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥
📖 भार्थ : ऐसा कहकर लक्ष्मण ने देवी की प्रदक्षिणा की और राम की खोज में प्रस्थान किया, सीता द्वारा प्रेरित होकर। लक्ष्मण के जाने पर सीता रोती हुई, शोक से कृश होकर विचार करने लगीं कि प्रभु राम मारे गए हैं। तब रावण भिक्षु के वेश में आकर उस सुन्दरी, यशस्विनी सीता, राम की पत्नी, को हर ले गया।
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण के जाते ही रावण सीता हरण कर लेता है। यह पूरे रामायण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मोड़ है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🎭 छल और माया का प्रयोग

रावण सीधे युद्ध के स्थान पर छल का सहारा लेता है, जो उसके अधर्मी स्वभाव को दर्शाता है। मारीच के नकली नाद से वह सीता को धोखा देता है, जो राक्षसी प्रवृत्ति का परिचायक है।

💔 सीता का करुण क्रंदन

सीता का पति के प्रति अगाध प्रेम और व्याकुलता उनके स्त्री-धर्म और पतिव्रत धर्म को उजागर करती है। वह लक्ष्मण को कठोर वचन कहकर भी अंततः रावण के हाथों पीड़ित होती हैं, जो नारी की विवशता को दर्शाता है।

⚖️ लक्ष्मण की विवशता

लक्ष्मण का संदेह सही था, फिर भी वह सीता के आग्रह पर जाते हैं। यह उनके अनुज धर्म और भाई के प्रति समर्पण को दर्शाता है, साथ ही यह भी कि कभी-कभी सही निर्णय भी दूसरों के दबाव में बदल जाते हैं।

📆 घटनाक्रम का मोड़

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड के अंत और आरण्यकाण्ड के आरम्भ का संधि-बिंदु है। यहाँ से सीता हरण की घटना प्रारम्भ होती है, जो आगे चलकर राम-रावण युद्ध का कारण बनती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि छल और माया से प्राप्त विजय क्षणिक होती है और अंततः धर्म की ही जीत होती है। साथ ही, हमें अपने संदेह पर दृढ़ रहना चाहिए और दूसरों के दबाव में आकर गलत निर्णय नहीं लेने चाहिए। सीता का पतिव्रत धर्म और लक्ष्मण का अनुज धर्म दोनों ही आदर्श हैं, किंतु उनकी परिस्थितियाँ उन्हें दुखद परिणाम की ओर ले जाती हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे चतुर्नवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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