स्वर्णमृग को देखकर सीता का मोह

राम-लक्ष्मण-सीता के पंचवटी निवास के दौरान राक्षस मारीच स्वर्णमृग का रूप धारण कर आता है। उस सुन्दर मृग को देख सीता मोहित हो जाती हैं और राम से उसे पकड़ने का आग्रह करती हैं। लक्ष्मण के मना करने पर भी राम उसे पकड़ने जाते हैं, जो आगे सीता हरण का कारण बनता है।

विवरण

यह सर्ग पंचवटी के वन में घटित एक महत्वपूर्ण घटना का वर्णन करता है। रावण की योजना के तहत मारीच एक मायावी स्वर्णमृग (सुनहरा हिरण) बनकर राम के आश्रम के समीप आता है। उस मृग का शरीर रत्नजड़ित, स्वर्णिम एवं मनोहारी होता है। सीता उसे देखकर मोहित हो जाती हैं और राम से उसे जीवित या मृत पकड़ लाने का आग्रह करती हैं। राम भी उस मृग की अलौकिक सुन्दरता देखकर चकित होते हैं, किंतु लक्ष्मण को इसमें संदेह होता है। वह कहते हैं कि यह मृग साधारण नहीं, बल्कि कोई राक्षस का छलावा हो सकता है। परंतु सीता के हठ और राम के उसे प्रसन्न करने की इच्छा से राम मृग के पीछे जाने को तैयार हो जाते हैं। जाने से पूर्व वे लक्ष्मण को सीता की रक्षा का दायित्व सौंपते हैं और कहते हैं कि यदि देर हो तो वे सीता को अकेला न छोड़ें। राम के जाते ही मारीच दूर जाकर हा लक्ष्मण! हा सीते! चिल्लाता है, जिससे सीता भयभीत होकर लक्ष्मण को राम की सहायता के लिए भेज देती हैं। यह घटना सीता हरण की दिशा में पहला कदम है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ९१

(स्वर्णमृग का आगमन – सीता का मोह)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथैकनवतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पंचवटी में राम, सीता और लक्ष्मण सुखपूर्वक निवास कर रहे हैं। इसी बीच रावण अपने मामा मारीच को भेजता है, जो माया से एक अद्भुत स्वर्णमृग बनकर राम के आश्रम के पास आता है। यह सर्ग उस मृग के दर्शन से सीता के मोह और राम के उसे पकड़ने जाने का वर्णन करता है। यह घटना सीता हरण के दुखद प्रसंग की भूमिका है।

🦌 मायावी स्वर्णमृग का आगमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः कदाचित् पम्पायास्तीरे रामो महायशाः ।
ददर्श मृगमेकान्ते चित्रं काञ्चनभूषणम् ॥
तस्य प्रभा रूपगुणैर्विरराज वनं गता ।
विद्युद्रूपं यथा व्योम्नि तडित्वन्तं बलाहकम् ॥
तं दृष्ट्वा मृगमायान्तं सीता परममोहिता ।
उवाच रामं धर्मज्ञं प्रणयाद् भयशङ्किता ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कदाचित् = किसी समय; पम्पायाः = पम्पा नदी के; तीरे = तट पर; रामः = राम; महायशाः = महान यशस्वी; ददर्श = देखा; मृगम् = मृग को; एकान्ते = एकान्त में; चित्रम् = विचित्र; काञ्चनभूषणम् = सोने के आभूषणों से युक्त; तस्य = उसकी; प्रभा = चमक; रूपगुणैः = रूप के गुणों से; विरराज = शोभित हुआ; वनम् = वन; गता = प्राप्त हुई; विद्युद्रूपम् = बिजली के रूप के समान; यथा = जैसे; व्योम्नि = आकाश में; तडित्वन्तम् = बिजली से युक्त; बलाहकम् = बादल को; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; मृगम् = मृग को; आयान्तम् = आते हुए; सीता = सीता; परममोहिता = अत्यन्त मोहित हुई; उवाच = बोली; रामम् = राम से; धर्मज्ञम् = धर्मज्ञ से; प्रणयात् = प्रेम से; भयशङ्किता = भय से शंकित हुई।
📖 भावार्थ : एक दिन महायशस्वी राम पम्पा सरोवर के तट पर थे। उन्होंने एक अद्भुत, सुनहरे आभूषणों से युक्त मृग को देखा। उसके रूप और चमक ने सम्पूर्ण वन को आलोकित कर दिया, जैसे आकाश में बिजली से युक्त बादल शोभा पाता है। उस मृग को आते देख सीता अत्यन्त मोहित हो गईं और वे धर्मज्ञ राम से प्रेम और शंकित भाव से बोलीं।
॥ श्लोक ४-५ ॥
अद्भुतो रूपसम्पन्नः काञ्चनो मृग उत्तमः ।
आश्चर्यं परमं चैतन्मया दृष्टं नरोत्तम ॥
एनं मृगं महाबाहो जीवग्राहं नयस्व मे ।
क्रीडार्थं चैव सौम्येन वने विचरता सह ॥
📖 भावार्थ : सीता ने कहा, "हे नरोत्तम! यह अद्भुत, रूपसम्पन्न, सुनहरा उत्तम मृग है। यह परम आश्चर्य मैंने देखा है। हे महाबाहो! इस मृग को जीवित ही मेरे लिए पकड़ लाइए। हम इसके साथ वन में विचरण करेंगे और यह हमारे क्रीड़ा का साथी बनेगा।"

🗣️ सीता का हठ और लक्ष्मण का विरोध (श्लोक ६-१२)

॥ श्लोक ६-८ ॥
सीताया वचनं श्रुत्वा रामो दशरथात्मजः ।
मृगस्य गतिसम्पन्नः ससर्ज परमं मनः ॥
ततो लक्ष्मणमानाय्य रामः सत्यपराक्रमः ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं सीतायाः प्रियकाम्यया ॥
अयं मृगो वरारोहे सीते परमशोभनः ।
हत्वा वा जीवतो वापि नेतुमिच्छामि मैथिलि ॥
📖 भावार्थ : सीता के वचन सुनकर राम उस मृग की गति और रूप से अत्यन्त प्रभावित हुए। उन्होंने लक्ष्मण को बुलाया और सीता को प्रसन्न करने की इच्छा से मधुर वचन कहे, "हे मैथिलि! यह मृग अत्यन्त सुन्दर है। मैं इसे मारकर या जीवित ही लाना चाहता हूँ।"
॥ श्लोक ९-१२ ॥
ततो लक्ष्मण संरब्धः प्रत्युवाच महामतिः ।
नूनं राक्षस एवैष मायया मृगतां गतः ॥
न तु काञ्चनसम्भूतो मृगः सम्भवति क्वचित् ।
मायैषा राक्षसस्येति नूनं विद्धि नरोत्तम ॥
राज्यं हि वयमासाद्य वने वसामहे सुखम् ।
नायं मृगः सुखार्थाय राक्षसेनाभिनिर्मितः ॥
तस्मादेनं निहन्म्यद्य मायां मायाविनां वने ।
आश्रमे रक्ष्यतां सीता मया वध्यतु वा मृगः ॥
📖 भावार्थ : तब महामति लक्ष्मण ने संरब्ध होकर उत्तर दिया, "निश्चय ही यह कोई राक्षस है, जो माया से मृग बना हुआ है। ऐसा सुवर्णमय मृग संसार में कहीं नहीं हो सकता। हे नरोत्तम! यह राक्षस की माया है। हम राज्य छोड़कर वन में सुखपूर्वक रह रहे हैं, यह मृग हमारे सुख के लिए नहीं, बल्कि किसी राक्षस ने रचा है। इसलिए मैं इस माया को नष्ट कर देता हूँ। आप आश्रम में सीता की रक्षा कीजिए या फिर मैं इस मृग को मारता हूँ।"
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण की आशंका पूर्णतया सत्य सिद्ध होती है। उनका विवेक और राक्षसी माया को भांप लेने की क्षमता स्पष्ट होती है। परंतु सीता के मोह और राम के प्रेम के कारण यह युक्ति अनसुनी कर दी जाती है।

🏹 राम का मृग का पीछा करना (श्लोक १३-१८)

॥ श्लोक १३-१६ ॥
एवमुक्तस्तु लक्ष्मणो रामेण प्रियमिच्छता ।
उवाच वचनं भूयः सीतां सम्प्रति शोभने ॥
मया सह गमिष्यामि सीते रामो यदिच्छति ।
त्वयैकया वरे रम्ये स्थातव्यं रक्षिता च नः ॥
इत्युक्त्वा राममादाय जगाम मृगमन्वितः ।
सीता तु रहिता तेन शोकमाप दिवानिशम् ॥
📖 भावार्थ : राम के प्रिय इच्छुक लक्ष्मण को इस प्रकार कहने पर राम ने उनसे कहा, "हे लक्ष्मण! तुम यहीं सीता की रक्षा करो, मैं अकेला ही मृग का पीछा करता हूँ।" फिर राम धनुष-बाण लेकर मृग के पीछे चल दिए। सीता उनकी प्रतीक्षा करने लगीं।
॥ श्लोक १७-१८ ॥
गते रामे तु सौमित्रिः सीतया सह राघवः ।
आश्रमस्थो महाप्राज्ञो ररक्ष जनकात्मजाम् ॥
ततो मृगवपुर्धारी मारीचो रावणाज्ञया ।
दूरं गत्वा रघुश्रेष्ठं विव्याध मायया पुनः ॥
📖 भावार्थ : राम के जाने पर महाप्राज्ञ लक्ष्मण सीता के साथ आश्रम में रहकर जनकात्मजा की रक्षा करने लगे। तब रावण की आज्ञा से मृग का रूप धारण किए मारीच दूर जाकर रघुश्रेष्ठ को माया से पुनः आकर्षित करने लगा।

😱 मारीच की चीत्कार (श्लोक १९-२४)

॥ श्लोक १९-२२ ॥
स तु रामेण संयुक्तो मृगो विप्रद्रुतो वने ।
सीतायाः शृण्वतीनादं चुक्रोशोच्चैः सुदारुणम् ॥
हा लक्ष्मण महाबाहो हा सीते जनकात्मजे ।
इति श्रुत्वा तु निनदं सीता लक्ष्मणमब्रवीत् ॥
गच्छ लक्ष्मण जानीहि कच्चिद्रामो न शातितः ।
एष वै राक्षसी माया मृगरूपेण भाषते ॥
📖 भावार्थ : राम द्वारा बाण मारे जाने पर वह मृग अपने वास्तविक रूप में आकर ऊँचे स्वर में दारुण चीत्कार करने लगा – "हा लक्ष्मण! हा सीते!" यह चीत्कार सुनकर सीता व्याकुल हो गईं और लक्ष्मण से बोलीं, "हे लक्ष्मण! जाओ, देखो कहीं राम को कोई कष्ट तो नहीं। यह निश्चय ही राक्षसी माया है जो मृग के रूप में बोल रही है।"
🔍 व्याख्या : यहाँ सीता का व्याकुल होना स्वाभाविक है, लेकिन यही उनके हरण का कारण बनता है। लक्ष्मण के समझाने पर भी वे राम की चिंता में लक्ष्मण को भेज देती हैं।
॥ श्लोक २३-२४ ॥
लक्ष्मणस्तु वचः श्रुत्वा सीताया भयशङ्कितः ।
उवाच परमोद्विग्नो न च गन्तुं मनो दधे ॥
मा भैषीस्त्वं वरारोहे न च रामस्य राक्षसाः ।
प्रभविष्यन्ति दुर्धर्षा मयि जीवति मैथिलि ॥
इत्युक्त्वा सीतया सार्धं रुरोद च जगाम च ।
इति वाल्मीकिरचिते रामायणे सर्ग उच्यते ॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण ने सीता के भयभीत वचन सुनकर अत्यन्त उद्विग्न होकर कहा, "हे मैथिलि! डरो मत। मेरे जीवित रहते कोई भी दुर्धर्ष राक्षस राम का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" ऐसा कहकर भी वे सीता के आग्रह पर उन्हें अकेला छोड़कर राम की खोज में चले गए। इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦌 माया और मोह

यह सर्ग माया के प्रभाव और मोह के वशीभूत होने की मानवीय प्रवृत्ति को दर्शाता है। सीता का स्वर्णमृग के प्रति आकर्षण और राम का उनकी इच्छा पूरी करने का निर्णय, दोनों ही माया के शिकार बनते हैं।

🧠 विवेक की पहचान

लक्ष्मण का संदेह और सतर्कता विवेक का प्रतीक है। वे तुरंत पहचान लेते हैं कि यह मृग साधारण नहीं है। उनका तर्क है कि राज्य त्याग कर वन में आए हुए लोगों के लिए ऐसा अलौकिक मृग सुख का साधन नहीं, बल्कि संकट का कारण हो सकता है।

👂 चीत्कार का छल

मारीच की हा लक्ष्मण! हा सीते! की चीत्कार राम की आवाज की नकल है, जो सीता को धोखा देने के लिए की गई। यह छल सफल होता है और सीता लक्ष्मण को भेज देती हैं।

💔 आपदा का आरम्भ

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड के अंत और आरण्यकाण्ड की प्रमुख घटना सीता हरण का प्रवेश द्वार है। यहाँ से रामायण का दुःखद भाग आरम्भ होता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मोह और आसक्ति व्यक्ति को विवेक से भटका देती है। दिखावटी वस्तुओं के प्रति आकर्षण और उन्हें प्राप्त करने की लालसा बड़ी समस्याओं को जन्म दे सकती है। साथ ही, किसी संकट की आशंका होने पर विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए, न कि भावनाओं में बहकर।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे एकनवतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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