रावण का मारीच से मिलना

रावण सीता हरण की योजना बनाते हुए मारीच से सहायता माँगने उसके आश्रम जाता है। मारीच राम के पराक्रम से भयभीत है और रावण को समझाता है कि यह कार्य अत्यंत कठिन है, किंतु रावण के आग्रह और धमकी के कारण वह स्वर्णमृग बनने को तैयार हो जाता है।

विवरण

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड का अंतिम भाग है, जिसमें रावण की कुटिल चाल का आरंभ होता है। रावण, जो सीता के रूप पर मोहित हो चुका है, अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए मारीच की शरण में जाता है। मारीच पूर्व में राम के बाण का घाव झेल चुका है और राम की वीरता से भली-भाँति परिचित है। वह रावण को समझाता है कि राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं; उनसे छल करना सर्वनाशकारी हो सकता है। वह रावण को सीता के प्रति आसक्ति त्यागने की सलाह देता है। किंतु रावण, कामांध और अहंकारी, मारीच की बातों को अनसुना कर देता है और उसे धमकी देता है कि यदि उसने सहायता नहीं की तो वह उसे मार डालेगा। मारीच, रावण के भय से, विवश होकर स्वर्णमृग का रूप धारण करने का वचन देता है, यह जानते हुए भी कि यह उसके और रावण के विनाश का कारण बनेगा।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ८६

(रावण का मारीच से मिलना – षड्यंत्र का आरम्भ)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षडशीतितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम, सीता और लक्ष्मण के पंचवटी में निवास के समय राक्षसों द्वारा उत्पात मचाया जा रहा था। रावण की बहन शूर्पणखा ने राम और लक्ष्मण पर आसक्त होकर उनका अपमान किया, जिसके फलस्वरूप लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान काट दिए। यह सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और बदला लेने की ठानी। साथ ही सीता के रूप पर मोहित होकर वह उसे हरने की योजना बनाने लगा। इसी क्रम में वह अपने पुराने सहयोगी मारीच के पास जाता है, जो राम के बाण से पूर्व में घायल हो चुका था और भयभीत था। यह सर्ग उसी मिलाप का वर्णन करता है।

🏹 रावण का आगमन और मारीच का आश्रम (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः रावणः क्रोधान्धः सीतारूपमनोहरः ।
जगाम मारीचाश्रमं राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥
ददर्श तत्र मारीचं तपस्यन्तं महावने ।
विवर्णवदनं भीतं रामबाणप्रपीडितम् ॥
स रावणं समायान्तं दृष्ट्वा मारीचराक्षसः ।
उत्थायाभ्यर्चयामास पूजां चक्रे यथाविधि ॥
कुशलं परिपप्रच्छ रावणस्य महात्मनः ।
किमर्थमागतं ब्रूहि राजन्दशरथात्मजम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रावणः = रावण; क्रोधान्धः = क्रोध से अंधा हुआ; सीतारूपमनोहरः = सीता के मनोहर रूप से मोहित; जगाम = गया; मारीचाश्रमम् = मारीच के आश्रम को; राक्षसेन्द्रः = राक्षसों के राजा; प्रतापवान् = प्रतापी; ददर्श = देखा; तत्र = वहाँ; मारीचम् = मारीच को; तपस्यन्तम् = तपस्या करते हुए; महावने = महान वन में; विवर्णवदनम् = विवर्ण मुख वाले; भीतम् = भयभीत; रामबाणप्रपीडितम् = राम के बाण से पीड़ित; सः = वह; रावणम् = रावण को; समायान्तम् = आते हुए; दृष्ट्वा = देखकर; मारीचराक्षसः = मारीच राक्षस; उत्थाय = उठकर; अभ्यर्चयामास = पूजा की; पूजाम् = पूजा; चक्रे = की; यथाविधि = विधि के अनुसार; कुशलम् = कुशलक्षेम; परिपप्रच्छ = पूछा; रावणस्य = रावण का; महात्मनः = महान आत्मा वाले; किमर्थम् = किसलिए; आगतम् = आए; ब्रूहि = बताओ; राजन् = हे राजन्; दशरथात्मजम् = दशरथ के पुत्र (राम) के विषय में? (यहाँ संदर्भ भिन्न हो सकता है) |
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् क्रोध से अंधे हुए और सीता के मनोहर रूप पर मोहित राक्षसराज रावण मारीच के आश्रम में गया। वहाँ उसने महान वन में तपस्या करते हुए मारीच को देखा, जिसका मुँह विवर्ण था और जो राम के बाण से पीड़ित होकर भयभीत था। मारीच ने रावण को आते देखकर उठकर विधिपूर्वक उसका स्वागत और पूजा की तथा कुशलक्षेम पूछा। फिर उसने पूछा, "हे राजन्! आप किसलिए पधारे हैं?"
🔍 व्याख्या : मारीच पहले ही राम के बाण का कष्ट भोग चुका था, इसलिए वह सदा भयभीत रहता था। रावण का आना उसके लिए और भी चिंता का विषय बन गया।
॥ श्लोक ५-८ ॥
ततः रावणः संरम्भी मारीचं प्रत्युवाच ह ।
श्रूयतां मे महाबाहो कार्यमत्यर्थमद्भुतम् ॥
रामो दाशरथिर्वीरः पत्नी सीता मनस्विनी ।
तां हर्तुमिच्छे मारीच साहाय्यं क्रियतां मम ॥
त्वं कुरुष्व महारूपं मृगस्य सुविभूषितम् ।
सीता येन विमुह्येत रामलक्ष्मणयोः पुरः ॥
अहं तु तां हरिष्यामि सीतां जनकनन्दिनीम् ।
इत्युक्त्वा राक्षसेन्द्रस्तु विरराम महाबलः ॥
📖 भावार्थ : तब क्रोधित रावण ने मारीच से कहा, "हे महाबाहो! मेरी अत्यंत अद्भुत बात सुनो। राम दशरथ के वीर पुत्र हैं, और उनकी पत्नी सीता अत्यंत मनस्विनी हैं। हे मारीच! मैं उन सीता का हरण करना चाहता हूँ। तुम मेरी सहायता करो। तुम अत्यंत सुंदर स्वर्णमृग का रूप धारण करो, जिससे सीता मोहित हो जाए और राम-लक्ष्मण उसके पीछे चले जाएँ। उस समय मैं जनकनंदिनी सीता का हरण कर लूँगा।" ऐसा कहकर महाबली राक्षसेन्द्र रावण चुप हो गया।

⚠️ मारीच की चेतावनी और राम के पराक्रम का वर्णन (श्लोक ९-२४)

॥ श्लोक ९-१५ ॥
मारीचस्तु वचः श्रुत्वा रावणस्य दुरात्मनः ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वाक्यमाह सुदुःखितः ॥
न मे प्रियं वचो राजन् ब्रूयां त्वां हितकांक्षया ।
रामेण सह विग्रहः कथं स्याद्राक्षसेश्वर ॥
अनेन सह योद्धुं त्वं न शक्यो रावण रघुवीरम् ।
बाल्येऽपि रामो दुर्धर्षः कोपितश्चक्षुषा निहन् ॥
अहं पुरा तपश्चीर्त्वा रामबाणप्रपीडितः ।
मुक्तो दण्डकवनं प्राप्तः कथंचित्प्राणधारकः ॥
न रामः साधारणमनुष्यः साक्षाद्विष्णुः सनातनः ।
तस्य सीता महालक्ष्मीः सर्वदेवमयी शिवा ॥
📖 भावार्थ : मारीच ने दुरात्मा रावण के वचन सुनकर दुःखी होकर हाथ जोड़कर कहा, "हे राजन्! मैं आपका हित चाहने वाला हूँ, इसलिए मैं ऐसा वचन नहीं कहना चाहता जो आपको अप्रिय लगे, किंतु राम से विग्रह कैसे किया जा सकता है, हे राक्षसेश्वर! आप उस रघुवीर से युद्ध करने में समर्थ नहीं हैं। बाल्यकाल में भी राम दुर्धर्ष थे; वे क्रोधित होकर आँखों ही आँखों से शत्रु का नाश कर सकते हैं। मैंने पूर्व में तपस्या करते समय राम के बाण से पीड़ित होकर किसी प्रकार प्राण बचाए थे और दण्डक वन में आकर शरण ली थी। राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं; वे साक्षात् सनातन विष्णु हैं। उनकी पत्नी सीता महालक्ष्मी हैं, जो सर्वदेवमयी और शिवा हैं।"
🔍 व्याख्या : मारीच राम के दिव्य स्वरूप को पहचानता है। वह जानता है कि राम से छल करना आत्मघाती है। वह रावण को सचेत करता है, परंतु रावण अहंकार के कारण उसकी बात नहीं मानता।
॥ श्लोक १६-२४ ॥
रावणस्तु तदा क्रोधात् प्रत्युवाच दुरासदः ।
मारीच मा भयं गच्छ रामात्तस्मान्न किंचन ॥
अहं रामं रणे हत्वा सीतां हृत्वा सुखी भवे ।
त्वं तु मद्वचनात्क्षिप्रं मृगरूपं कुरुष्व ह ॥
नो चेत्प्राणांस्त्यजेस्त्वं हि मम क्रोधाग्नितापितः ।
इत्युक्त्वा राक्षसेन्द्रस्तु खड्गमुद्यम्य वेगितः ॥
तदा मारीचस्त्रस्तः प्राञ्जलिः प्रणतोऽभवत् ।
करिष्ये तव वाक्यं वै रामवैरं न कामये ॥
विनाशायैव तत्सर्वं भविष्यति न संशयः ।
इत्युक्त्वा स तदा मारीचो मृगरूपं चकार ह ॥
📖 भावार्थ : तब दुर्जय रावण ने क्रोध से कहा, "हे मारीच! तुम राम से भय मत करो। मैं युद्ध में राम को मारकर सीता का हरण कर सुखी हो जाऊँगा। तुम मेरे वचन से शीघ्र ही मृग का रूप धारण करो। यदि नहीं किया तो मेरे क्रोधाग्नि में तुम्हारे प्राण नष्ट हो जाएँगे।" ऐसा कहकर राक्षसेन्द्र ने तलवार निकाल ली। तब भयभीत मारीच हाथ जोड़कर झुक गया और बोला, "मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा, यद्यपि मैं राम से वैर नहीं चाहता। यह सब हमारे विनाश के लिए ही होगा, इसमें संदेह नहीं है।" ऐसा कहकर मारीच ने मृग का रूप धारण कर लिया।

🦌 स्वर्णमृग का निर्माण और षड्यंत्र की सिद्धि (श्लोक २५-३८)

॥ श्लोक २५-३० ॥
मारीचो मायया रौद्र्या मृगरूपमकल्पयत् ।
चित्रवर्णं महाकायं रत्नभूषणभूषितम् ॥
स चचार वने रम्ये सीताया मोहनाय वै ।
रावणोऽपि तदा हृष्टः स्वाश्रमं प्रति जग्मिवान् ॥
मारीचमब्रवीद्वाक्यं गच्छ त्वं मृगरूपधृक् ।
रामाश्रमसमीपं वै सीतादर्शनलालसः ॥
ततः स मृगरूपेण जगाम रामसन्निधिम् ।
तं दृष्ट्वा सीता विमना राममाह सुदुःखिता ॥
📖 भावार्थ : मारीच ने अपनी भयंकर माया से स्वर्णमृग का रूप रचा, जो अत्यंत चित्रवर्ण, विशाल शरीर और रत्नों से सुशोभित था। वह सीता को मोहित करने के लिए रम्य वन में विचरने लगा। रावण भी प्रसन्न होकर अपने आश्रम को लौट गया। उसने मारीच से कहा, "तुम इस मृगरूप में राम के आश्रम के समीप जाओ, सीता के दर्शन की लालसा रखते हुए।" तब वह मृगरूप धारण किए राम के समीप गया। उसे देखकर सीता मोहित हो गईं और दुःखी होकर राम से बोलीं।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार रावण का षड्यंत्र आरम्भ हुआ। मारीच ने आपत्ति करते हुए भी रावण के भय से यह कार्य किया, यह जानते हुए कि यह सब उनके विनाश का कारण बनेगा।
॥ श्लोक ३१-३८ ॥
एष मृगो महार्हो मे देहि राम मम प्रियम् ।
आनयस्व महाबाहो क्रीडार्थं धरणीतले ॥
इति सीतावचः श्रुत्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
पश्य लक्ष्मण सीताया मोहनं राक्षसीकृतम् ॥
रामस्तु मृगमालक्ष्य बाणमेकं धनुष्यधात् ।
तं दृष्ट्वा मारीचः क्रोधाद्राममाह सुदुःखितः ॥
हा सीते लक्ष्मणेत्युच्चैश्चुक्रोश मृगरूपधृक् ।
रामबाणेन विद्धोऽसौ मारीचो व्यथितोऽपतत् ॥
📖 भावार्थ : सीता ने राम से कहा, "हे राम! यह अत्यंत सुंदर मृग मुझे चाहिए। हे महाबाहो! कृपया इसे पकड़कर मेरे लिए लाइए, ताकि मैं इससे क्रीड़ा कर सकूँ।" सीता के वचन सुनकर राम ने लक्ष्मण से कहा, "हे लक्ष्मण! देखो, सीता को मोहित करने के लिए यह राक्षसी माया है।" राम ने मृग को देखकर धनुष पर बाण चढ़ाया। उसे देखकर मारीच ने क्रोधित होकर राम से कहा और दुःखी होकर ऊँचे स्वर में "हे सीता! हे लक्ष्मण!" चिल्लाया। राम के बाण से विद्ध होकर वह मारीच व्यथित होकर गिर पड़ा।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👿 रावण का अहंकार और कामांधता

इस सर्ग में रावण का अहंकार और सीता के प्रति उसका अनुचित आकर्षण स्पष्ट रूप से उभरकर आता है। वह मारीच की चेतावनियों को अनसुना कर देता है, जो उसके विनाश की नींव रखता है।

🙏 मारीच की विवशता और भय

मारीच राम की वास्तविक शक्ति को जानता है, लेकिन रावण के अत्याचारी स्वभाव के कारण वह विवश होकर उसकी आज्ञा का पालन करता है। यह दर्शाता है कि दुष्ट के साथ सहयोग करना अपने पतन को निमंत्रण देना है।

🦌 स्वर्णमृग का प्रतीकात्मक अर्थ

स्वर्णमृग माया और मोह का प्रतीक है। सीता का उस पर मोहित होना यह दर्शाता है कि माया के आकर्षण में फँसकर मनुष्य अपने कर्तव्य से विमुख हो सकता है।

⚡ राम की सतर्कता

राम तुरंत समझ जाते हैं कि यह कोई साधारण मृग नहीं, बल्कि राक्षसी माया है। यह उनके दिव्य ज्ञान और सतर्कता को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि काम, क्रोध और अहंकार के वशीभूत होकर लिए गए निर्णय विनाशकारी होते हैं। साथ ही, बुरे लोगों की संगति में रहकर हम अपनी इच्छा के विरुद्ध भी अनैतिक कार्यों में लिप्त हो सकते हैं, जिसका परिणाम भुगतना पड़ता है। राम की भाँति हमें माया और मोह से सावधान रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे षडशीतितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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