शरभंग ऋषि से भेंट
अयोध्याकाण्ड के सड़सठवें सर्ग में भगवान राम की सीता एवं लक्ष्मण सहित दण्डकारण्य में स्थित शरभंग ऋषि के आश्रम पर भेंट का वर्णन है। शरभंग ऋषि, जो इंद्र के निमंत्रण पर ब्रह्मलोक जाने को उद्यत थे, राम के दर्शन से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें देखकर ही सशरीर ब्रह्मलोक गमन किया।
विवरण
यह सर्ग राम के वनवास काल के दौरान ऋषियों से संपर्क का प्रथम प्रमुख प्रसंग है। चित्रकूट से प्रस्थान के पश्चात् राम, सीता और लक्ष्मण दण्डकारण्य पहुँचते हैं। वहाँ वे तपस्वी शरभंग के आश्रम पर जाते हैं। शरभंग ऋषि घोर तपस्या में लीन थे। उनके तेज से प्रभावित होकर देवराज इंद्र स्वयं उन्हें ब्रह्मलोक ले जाने आए थे, किंतु शरभंग ने राम के दर्शन की लालसा से इंद्र से प्रतीक्षा की प्रार्थना की। राम को देखकर वे अत्यंत हर्षित हुए और उन्होंने राम की स्तुति की। तत्पश्चात् वे अग्नि में प्रवेश कर सशरीर ब्रह्मलोक चले गए। इससे पूर्व उन्होंने राम को वहाँ के अन्य तपस्वियों के बारे में बताया, जो राम के दर्शन की प्रतीक्षा में हैं। इस सर्ग में साधु-संतों के प्रति राम के आदरभाव और उनके तपोबल का अद्भुत चित्रण है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ६७
(शरभंग ऋषि से भेंट – संतों का आशीर्वाद)
🔆 प्रस्तावना : चित्रकूट से प्रस्थान के पश्चात् प्रभु श्रीराम, सीता और लक्ष्मण सहित दण्डकारण्य की ओर बढ़ते हैं। इस वन में अनेक ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं। उनमें से एक महान तपस्वी हैं शरभंग। इस सर्ग में उनसे भेंट और उनके ब्रह्मलोक गमन का मनोहारी वर्णन है।
🌳 दण्डकारण्य प्रवेश एवं शरभंग आश्रम (श्लोक १-५)
सीतया लक्ष्मणेनापि सहितो भ्रातृवत्सलः ॥
तत्राश्रमपदं रम्यं शरभंगस्य धीमतः ।
ददर्श राघवः श्रीमान्सह ताभ्यां महाबलः ॥
ददर्श रामो धर्मात्मा समन्ताद्भ्राजमानवत् ॥
तमापतन्तं सहसा रामं दृष्ट्वा महातपाः ।
हर्षेण महता युक्तः समुत्थायाभ्यवादयत् ॥
🙏 शरभंग का राम के प्रति आदर और इंद्र का आगमन (श्लोक ६-१२)
स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ॥
अहं त्वभ्यागतो राम शक्रेण सहितः प्रभो ।
ब्रह्मलोकं नयेत्युक्तः शक्रेणामित्रघातिना ॥
प्रतीक्षमाणस्तव च यावदागमनं प्रभो ॥
ततोऽहं त्वामनुप्राप्तं दृष्ट्वा वै रघुनन्दन ।
गमिष्यामि परं लोकं तवानुज्ञापुरःसरम् ॥
🔥 शरभंग का अग्नि प्रवेश और ब्रह्मलोक गमन (श्लोक १३-२०)
ददाह स्वशरीरं स ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥
तं यान्तमन्वयुः सर्वे देवाः सर्षिगणास्तथा ।
ब्रह्मलोकं महात्मानं शरभंगं तपोधनम् ॥
📜 अन्य ऋषियों की प्रतीक्षा और राम का संकल्प (श्लोक २१-२८)
अन्यानृषींस्तपोवृद्धान्ददर्श भृगुनन्दन ॥
तेऽपि रामं समागत्या प्रणम्य च कृताञ्जलिः ।
ऊचुः स्वागतमित्येवं वचनं मधुराक्षरम् ॥
प्रतीक्षामहे ते नाथ चिरादभ्यागतं प्रभो ॥
त्वयि धर्मभृतां श्रेष्ठ गते राज्यं निरत्ययम् ।
अस्माकं विपुला प्रीतिर्दर्शनात्तव राघव ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🧘 संतों की तपःसाधना
शरभंग ऋषि का तपोबल इतना प्रबल है कि देवराज इंद्र स्वयं उन्हें ब्रह्मलोक ले जाने आते हैं। यह दर्शाता है कि सच्ची तपस्या देवताओं को भी आकर्षित करती है।
👁️ राम के दर्शन की महिमा
शरभंग इंद्र के निमंत्रण को टालकर राम के दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि भगवद्दर्शन देवलोक से भी श्रेष्ठ है। संतों के लिए राम ही परम धाम हैं।
🙌 गुरु-शिष्य परंपरा
शरभंग का अग्नि में प्रवेश कर ब्रह्मलोक गमन यह बताता है कि योगी लोग इच्छानुसार शरीर त्याग सकते हैं। यह भारतीय योग परंपरा की ऊँचाई को दर्शाता है।
🌱 वनवास का उद्देश्य
राम का वनागमन ऋषियों के लिए वरदान सिद्ध होता है। वे राम के दर्शन से कृतार्थ होते हैं। यह भागवत धर्म का आधार है कि भगवान भक्तों के लिए ही सब कुछ करते हैं।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन का परम लक्ष्य भगवद्दर्शन है। चाहे हम कितनी भी बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त कर लें, राम की कृपा के बिना मुक्ति संभव नहीं। संतों का सान्निध्य और उनका आशीर्वाद ही जीवन को सफल बनाता है।