दंडकारण्य की ओर प्रस्थान

भरत के लौट जाने के बाद, राम चित्रकूट से आगे बढ़कर दंडकारण्य वन में प्रवेश करने का निर्णय लेते हैं। सीता और लक्ष्मण सहित वे घने जंगलों और पर्वतों को पार करते हुए ऋषियों के आश्रमों में जाते हैं और वनवास के कठिन दिनों की शुरुआत करते हैं।

विवरण

यह सर्ग अयोध्या नरेश भरत के चित्रकूट से प्रस्थान के बाद का वर्णन करता है। राम, सीता और लक्ष्मण अब चित्रकूट में अकेले रह गए हैं। राम को लगता है कि भरत के आने से अब यह स्थान भीड़-भाड़ वाला हो गया है और वे एकान्त में रहना चाहते हैं। वे लक्ष्मण से कहते हैं कि अब हमें गहरे वन दंडकारण्य की ओर चलना चाहिए, जहाँ महर्षि तपस्या करते हैं और जानवर स्वच्छन्द विचरण करते हैं। लक्ष्मण और सीता सहर्ष सहमत होते हैं। तीनों प्रातःकाल उठकर अपने दैनिक कर्मों से निवृत्त हो, चित्रकूट के सुन्दर आश्रम को छोड़कर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में वे विविध वृक्षों, लताओं, सरोवरों और वन्य प्राणियों को देखते हैं। इस यात्रा में वे अनेक ऋषियों के आश्रमों में रुकते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। अंततः वे दंडकारण्य की विशाल भूमि में प्रवेश करते हैं, जो आगे चलकर उनके अनेक रोमांचक एवं कठिन अनुभवों का साक्षी बनता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ६५

(दंडकारण्य की ओर प्रस्थान – वनवास का द्वितीय चरण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : भरत के अयोध्या लौट जाने के बाद राम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट के सुन्दर आश्रम में कुछ दिनों तक निवास करते हैं। अब उनके समक्ष वनवास के शेष तेरह वर्ष बिताने का प्रश्न है। राम जानते हैं कि चित्रकूट अब बहुत लोगों की पहुँच में आ गया है, इसलिए वे गहन वन दंडकारण्य की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लेते हैं। यह सर्ग उसी यात्रा के आरम्भ का वर्णन करता है।

🌄 निर्णय और प्रस्थान की तैयारी (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रभाते विमले कृतपौर्वाह्णिकक्रियः ।
रामः सीतां पुरस्कृत्य लक्ष्मणेन सहान्वितः ॥
उवाच लक्ष्मणं दान्तो धर्मज्ञो धर्मसंहितम् ।
वचनं वदतां श्रेष्ठः सर्वधर्मविदां वरः ॥
इतो गमिष्ये दण्डारण्यं पुण्यं मुनिसेवितम् ।
चित्रकूटो महेन्द्राभो न मे संतोषकारकः ॥
बहुभिर्दर्शनादस्य संकुलः साधुसेवितः ।
तस्मादद्यैव गच्छामो दण्डकारण्यमाश्रिताः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रभात काल में; विमले = स्वच्छ; कृतपौर्वाह्णिकक्रियः = प्रातःकालीन कृत्यों को करके; रामः = राम; सीताम् = सीता को; पुरस्कृत्य = आगे करके; लक्ष्मणेन = लक्ष्मण के साथ; सहान्वितः = साथ में; उवाच = बोले; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; दान्तः = शान्त; धर्मज्ञः = धर्म जानने वाले; धर्मसंहितम् = धर्मयुक्त; वचनम् = वचन; वदतां श्रेष्ठः = वक्ताओं में श्रेष्ठ; सर्वधर्मविदां वरः = सब धर्मों के जानने वालों में श्रेष्ठ; इति = इस प्रकार; गमिष्ये = जाऊँगा; दण्डारण्यम् = दण्डकारण्य को; पुण्यम् = पवित्र; मुनिसेवितम् = मुनियों द्वारा सेवित; चित्रकूटः = चित्रकूट; महेन्द्राभः = इन्द्र के समान; न = नहीं; मे = मुझे; संतोषकारकः = संतोष देने वाला; बहुभिः = बहुतों से; दर्शनात् = दर्शन के कारण; अस्य = इसका; संकुलः = भीड़-भाड़ वाला; साधुसेवितः = सज्जनों से सेवित; तस्मात् = इसलिए; अद्य = आज; एव = ही; गच्छामः = चलें; दण्डकारण्यम् = दण्डकारण्य; आश्रिताः = आश्रय लेकर।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् स्वच्छ प्रभात काल में प्रातःकालीन कृत्यों से निवृत्त होकर राम, सीता को आगे कर और लक्ष्मण के साथ, लक्ष्मण से धर्मयुक्त वचन बोले। वे बोले, "हे लक्ष्मण! मैं अब यहाँ से पवित्र और मुनियों द्वारा सेवित दण्डकारण्य को जाऊँगा। यह चित्रकूट इन्द्र के समान सुन्दर होते हुए भी मुझे संतोष नहीं देता, क्योंकि बहुत लोगों के दर्शन के कारण यह स्थान अब भीड़-भाड़ वाला हो गया है। इसलिए आज ही हम दण्डकारण्य का आश्रय लेकर चलें।"
🔍 व्याख्या : राम की वनवास में भी एकान्तप्रियता और ऋषियों के सान्निध्य की चाह दिखती है। वे राजमहल के सुखों से दूर होकर भी जनसमूह से बचना चाहते हैं, जो उनके वैराग्य को दर्शाता है।
॥ श्लोक ५-८ ॥
एवमुक्तस्तु लक्ष्मणः प्रत्युवाच महाबलः ।
यथाज्ञापय राम त्वं करिष्यामि तथा प्रभो ॥
अहं च सीता च प्रिया भ्रातस्त्वामनुगच्छतः ।
इत्युक्त्वा राममभ्येत्य लक्ष्मणः प्रत्यपद्यत ॥
ततः सीता च रामश्च लक्ष्मणश्च समाहिताः ।
प्रणम्य चित्रकूटं तं प्रययुर्दण्डकं वनम् ॥
📖 भावार्थ : महाबली लक्ष्मण ने इस प्रकार कहे जाने पर उत्तर दिया, "हे राम! आप जैसी आज्ञा दें, मैं वैसा ही करूँगा। हे भ्रातः! मैं और सीता दोनों आपके पीछे चलेंगे।" ऐसा कहकर लक्ष्मण राम के पास आ गए। तत्पश्चात् सीता, राम और लक्ष्मण, सब ध्यानपूर्वक चित्रकूट को प्रणाम करके दण्डक वन के लिए प्रस्थित हुए।

🌳 मार्ग का वर्णन और वन्य जीवन (श्लोक ९-२५)

॥ श्लोक ९-१५ ॥
ते गच्छन्तो महारण्यं नानावृक्षसमाकुलम् ।
ददृशुर्विविधान् वृक्षान् पुष्पितान् फलितांस्तथा ॥
नदीः प्रसन्नसलिलाः पुलिनैरुपशोभिताः ।
नानापक्षिगणाकीर्णाः पद्मिनीः सम्प्रफुल्लिताः ॥
पर्वतांश्चित्रसंस्थानान् निर्झरप्रवणान् बहून् ।
गह्वराणि च दुर्गाणि सिंहव्याघ्रनिषेवितान् ॥
तथाऽन्यान् मृगयूथांश्च वराहान् महिषांस्तथा ।
वानरान् गवयान् सिंहान् व्याघ्रान् रुरुकृतान् बहून् ॥
एवं गच्छन् ददर्शाथ रामो दण्डकमण्डलम् ।
तपोवनसमाकीर्णं मुनिभिर्धर्मचिन्तकैः ॥
🔹 पदच्छेद : ते = वे; गच्छन्तः = जाते हुए; महारण्यम् = महान वन में; नानावृक्षसमाकुलम् = अनेक प्रकार के वृक्षों से भरे; ददृशुः = देखा; विविधान् = अनेक प्रकार के; वृक्षान् = वृक्षों को; पुष्पितान् = पुष्पित; फलितान् = फलित; तथा = तथा; नदीः = नदियों को; प्रसन्नसलिलाः = स्वच्छ जल वाली; पुलिनैः = बालू के टीलों से; उपशोभिताः = सुशोभित; नानापक्षिगणाकीर्णाः = अनेक पक्षियों के समूहों से भरी; पद्मिनीः = कमलिनियों को; सम्प्रफुल्लिताः = पूर्ण खिली हुई; पर्वतान् = पर्वतों को; चित्रसंस्थानान् = विचित्र आकार वाले; निर्झरप्रवणान् = झरनों से युक्त; बहून् = अनेक; गह्वराणि = गुफाएँ; च = और; दुर्गाणि = दुर्गम स्थान; सिंहव्याघ्रनिषेवितान् = सिंह और बाघों से सेवित; तथा = तथा; अन्यान् = अन्य; मृगयूथान् = मृगों के झुण्ड; वराहान् = सूअर; महिषान् = भैंसे; तथा = तथा; वानरान् = बन्दर; गवयान् = गवय (जंगली भैंसे); सिंहान् = सिंह; व्याघ्रान् = बाघ; रुरुकृतान् = रुरु मृग; बहून् = अनेक; एवम् = इस प्रकार; गच्छन् = जाते हुए; ददर्शाथ = फिर देखा; रामः = राम ने; दण्डकमण्डलम् = दण्डक मण्डल को; तपोवनसमाकीर्णम् = तपोवनों से भरा; मुनिभिः = मुनियों से; धर्मचिन्तकैः = धर्मचिन्तक।
📖 भावार्थ : वे महान वन में जाते हुए अनेक प्रकार के पुष्पित-फलित वृक्षों को देखते हैं। स्वच्छ जल वाली नदियाँ, बालू के टीलों से सुशोभित, अनेक पक्षियों से भरी, खिली हुई कमलिनियाँ, विचित्र आकार वाले पर्वत, झरनों से युक्त अनेक गुफाएँ और दुर्गम स्थान, जहाँ सिंह-बाघ निवास करते हैं। साथ ही मृगों के झुण्ड, सूअर, भैंसे, बन्दर, गवय, सिंह, बाघ और बहुत से रुरु मृगों को देखते हैं। इस प्रकार जाते हुए राम ने दण्डक मण्डल को देखा, जो धर्मचिन्तक मुनियों के तपोवनों से भरा था।
॥ श्लोक १६-२५ ॥
तत्राश्रमपदं दिव्यं मुनिभिः समलङ्कृतम् ।
अगस्त्यभ्रातरं नाम प्राप्य रामो ययौ मुदा ॥
स तेन मुनिना सत्कृतो रामः सीता च लक्ष्मणः ।
उषित्वा रजनीमेकां प्रययौ दण्डकं वनम् ॥
इत्यार्षे वाल्मीकीये रामायणे अयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥
📖 भार्थ : वहाँ उन्होंने मुनियों से सुशोभित दिव्य आश्रम देखा। अगस्त्य के भ्राता (नामक मुनि) के पास पहुँचकर राम प्रसन्न हुए। उन मुनि द्वारा सत्कृत राम, सीता और लक्ष्मण ने वहाँ एक रात्रि बिताई और फिर दण्डक वन को प्रस्थान किया।
🔍 व्याख्या : इस सर्ग में वाल्मीकि ने प्रकृति के सौन्दर्य और वन्य जीवन का अत्यन्त रमणीय वर्णन किया है। राम का दण्डकारण्य प्रवेश वनवास के नए अध्याय की शुरुआत है।

🕊️ दण्डकारण्य में प्रवेश

॥ श्लोक २६-३८ ॥
प्रविश्य दण्डकारण्यं रामः सीतां ददर्श ह ।
घोरं महद्वनं रम्यं नानाश्वपदसेवितम् ॥
ततस्तु राघवो धीमान् लक्ष्मणं प्रत्यभाषत ।
पश्य लक्ष्मण दण्डारण्यं पुण्यं मुनिनिषेवितम् ॥
अत्र प्रविश्य वत्स्यामः कतिचित्समाः सुखम् ।
इत्युक्त्वा स महातेजाश्चकार निलयं ततः ॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं रामायणमनुत्तमम् ।
श्रृण्वन् पापैः प्रमुच्यते सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥
📖 भावार्थ : दण्डकारण्य में प्रवेश करके राम ने सीता को दिखाया – घोर, महान्, रम्य और अनेक वन्य प्राणियों से सेवित उस वन को। तब बुद्धिमान राघव ने लक्ष्मण से कहा, "हे लक्ष्मण, इस पवित्र दण्डारण्य को देखो, जो मुनियों द्वारा सेवित है। यहाँ प्रवेश करके हम कुछ वर्ष सुखपूर्वक रहेंगे।" ऐसा कहकर महातेजस्वी राम ने वहाँ अपना निवास बनाया।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार राम, सीता और लक्ष्मण दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं, जहाँ आगे चलकर उनकी भेंट शूर्पणखा से होगी, और जो राम-रावण युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करेगा।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌱 त्याग और तपस्या का प्रतीक

यह सर्ग राम के त्यागमय जीवन का एक और पड़ाव है। चित्रकूट जैसे सुन्दर स्थान को छोड़कर वे घोर वन में चले जाते हैं, यह दर्शाता है कि उनके लिए राजसी सुख नहीं, बल्कि पिता के वचन का पालन ही सर्वोपरि है।

🐘 वन्य जीवन का यथार्थ चित्रण

वाल्मीकि ने इस सर्ग में भारतीय वनों की जैव विविधता का अद्भुत वर्णन किया है – विभिन्न वृक्ष, नदियाँ, पक्षी, पशु – जो उस समय के पर्यावरण का जीवन्त दस्तावेज है।

🧘 आश्रमों का महत्व

मार्ग में ऋषियों के आश्रमों का मिलना और उनका सत्कार प्राचीन भारत में वनों और ऋषि-आश्रमों के सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है।

🚪नये अध्याय की शुरुआत

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड के अन्तिम चरण का द्वार खोलता है। अब राम लंबे समय तक दण्डकारण्य में रहेंगे और यहीं से उनका सम्पर्क राक्षसों से होगा।

🎯 शिक्षा : जीवन में जब एक स्थान पर चैन न मिले, तो निडर होकर आगे बढ़ना चाहिए। राम की भाँति हमें भी परिस्थितियों के अनुसार ढलना और नए वातावरण में भी धैर्यपूर्वक रहना सीखना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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