अत्रि ऋषि का आश्रम और अनसूया से सीता का मिलन

राम, लक्ष्मण और सीता का अत्रि ऋषि के आश्रम में आगमन, अत्रि और अनसूया द्वारा सत्कार, अनसूया द्वारा सीता को पतिव्रता धर्म का उपदेश, दिव्य आभूषण और चन्दन प्रदान करना, और रात्रि विश्राम के बाद प्रस्थान।

विवरण

यह सर्ग वनवास के दौरान राम, सीता और लक्ष्मण की अत्रि ऋषि के आश्रम यात्रा का वर्णन करता है। महर्षि अत्रि और उनकी पतिव्रता पत्नी अनसूया उनका अत्यंत आदर और सत्कार करते हैं। अनसूया सीता को पतिव्रता धर्म की महिमा बताती हैं और उन्हें दिव्य माल्य, आभूषण, वस्त्र तथा चन्दन प्रदान करती हैं। सीता भी उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करती हैं। राम अत्रि ऋषि से आशीर्वाद लेकर अगले दिन प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग स्त्री-धर्म, आश्रम जीवन की मर्यादा और अतिथि सत्कार का आदर्श प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ६३

(अत्रि ऋषि का आश्रम और अनसूया से सीता का मिलन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वनवास के दौरान राम, सीता और लक्ष्मण ऋषियों के आश्रमों में भ्रमण करते हुए चित्रकूट से आगे बढ़ते हैं। वे महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचते हैं। अत्रि ऋषि और उनकी पत्नी अनसूया उनका अतिथि सत्कार करते हैं। विशेष रूप से अनसूया सीता को पतिव्रता धर्म का उपदेश देती हैं और उन्हें दिव्य आभूषण एवं लेप प्रदान करती हैं। यह सर्ग स्त्री-धर्म और आश्रम जीवन की मर्यादा को दर्शाता है।

🏕️ अत्रि आश्रम में राम-सीता-लक्ष्मण का आगमन (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततस्ते प्रययू राजन् दण्डकारण्यमाश्रिताः ।
गत्वा चिरस्य संप्राप्ता अत्रेराश्रममद्भुतम् ॥
तत्र ते मुनिशार्दूलं ददृशुर्वन्नमस्कृतम् ।
अत्रिं ज्वलन्तं ब्रह्मर्षिं दीप्यमानमिव श्रिया ॥
तमासीनं महाभागं शिष्यैः परिवृतं तदा ।
अभिगम्याब्रुवन् रामा वचनं विनयान्विताः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = वे (राम आदि); प्रययुः = गए; राजन् = हे राजन्; दण्डकारण्यम् = दण्डकारण्य को; आश्रिताः = आश्रय लेकर; गत्वा = जाकर; चिरस्य = बहुत समय बाद; संप्राप्ताः = पहुँचे; अत्रेः = अत्रि के; आश्रमम् = आश्रम में; अद्भुतम् = अद्भुत; तत्र = वहाँ; ते = उन्होंने; मुनिशार्दूलम् = मुनिश्रेष्ठ को; ददृशुः = देखा; वनम् = वन में; नमस्कृतम् = (जिन्हें) नमस्कार किया गया; अत्रिम् = अत्रि को; ज्वलन्तम् = तपते हुए; ब्रह्मर्षिम् = ब्रह्मर्षि; दीप्यमानम् = दीप्तिमान; इव = समान; श्रिया = कान्ति से; तम् = उन; आसीनम् = बैठे हुए; महाभागम् = महाभाग; शिष्यैः = शिष्यों से; परिवृतम् = घिरे; तदा = तब; अभिगम्य = पास जाकर; अब्रुवन् = बोले; रामाः = राम; वचनम् = वचन; विनयान्विताः = विनय से युक्त।
📖 भावार्थ : हे राजन्! तदनन्तर वे दण्डकारण्य की ओर चल पड़े और बहुत दिनों बाद अद्भुत अत्रि आश्रम पहुँचे। वहाँ उन्होंने उस वन में निवास करने वाले, अपनी शोभा से दीप्तिमान ब्रह्मर्षि अत्रि को देखा। उन महाभाग मुनि को शिष्यों से घिरा देख, राम ने विनयपूर्वक उनसे वार्तालाप किया।
॥ श्लोक ४-७ ॥
अत्रिस्तु तानभिप्रेक्ष्य धर्मात्मानो यशस्विनः ।
प्रत्युवाच महातेजा वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
स्वागतं वां महाभागौ राम लक्ष्मण सीतया ।
कच्चित् स्वस्ति वनवासे वां निर्दोषं तप आप्नुवन् ॥
📖 भावार्थ : अत्रि ने उन धर्मात्मा यशस्वी राम आदि को देखकर वाक्यविशारद होने के कारण महातेजस्वी वचन कहे – "हे राम-लक्ष्मण! सीता सहित आप दोनों का स्वागत है। क्या वनवास में कुशलपूर्वक और निर्दोष तप कर रहे हो?"

🌸 अनसूया का सीता से मिलन और उपदेश (श्लोक ८-१८)

॥ श्लोक ८-१० ॥
अत्रेस्तु भार्या अनसूया महर्षेः संशितव्रता ।
ददर्श तां वरारोहां रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥
तस्यै प्रदातुं वैदेह्या माल्यं चन्दनमेव च ।
अभिगम्याब्रवीद्वाक्यं स्नेहात्परमया मुदा ॥
अनसूया उवाच – वत्से सीते! बहुकल्याणि! वैदेहि! शृणु मे वचः ।
पतिव्रतानां धर्मेण यथा त्वं भर्तृदेवता ॥
🔹 पदच्छेद : अत्रेः तु = अत्रि की; भार्या = पत्नी; अनसूया = अनसूया; महर्षेः = महर्षि की; संशितव्रता = कठोर व्रत वाली; ददर्श = देखा; ताम् = उस; वरारोहाम् = सुन्दर कटि वाली; रामपत्नीम् = राम की पत्नी; यशस्विनीम् = यशस्विनी को; तस्यै = उसे; प्रदातुम् = देने के लिए; वैदेह्यै = वैदेही को; माल्यम् = माला; चन्दनम् = चन्दन; एव = ही; च = और; अभिगम्य = पास जाकर; अब्रवीत् = बोली; वाक्यम् = वचन; स्नेहात् = स्नेह से; परमया मुदा = परम हर्ष के साथ; अनसूया उवाच = अनसूया बोलीं; वत्से = हे पुत्री; सीते = हे सीता; बहुकल्याणि = बहुत कल्याणकारिणी; वैदेहि = हे वैदेही; शृणु = सुनो; मे = मेरा; वचः = वचन; पतिव्रतानाम् = पतिव्रताओं के; धर्मेण = धर्म के अनुसार; यथा = जैसे; त्वम् = तुम; भर्तृदेवता = पति ही देवता जिनके।
📖 भावार्थ : महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूया, जो कठोर व्रत का पालन करती हैं, ने उस सुन्दरी रामपत्नी यशस्विनी सीता को देखा। वे सीता को माला और चन्दन देने के लिए पास आईं और अत्यंत स्नेह एवं हर्ष से बोलीं – "हे पुत्री सीते! हे कल्याणकारिणी वैदेही! मेरा वचन सुनो। पतिव्रताओं के धर्म से तुम अपने पति की देवता के समान पूजा करती हो।"
॥ श्लोक ११-१५ ॥
धन्या त्वं सीते! कल्याणि! या त्वं रामं महाबलम् ।
पतिं प्राप्य वरेण्यं त्वं पतिव्रतपरायणा ॥
न केवलं पतिं प्राप्य सौभाग्यं तव विद्यते ।
यत्त्वं वनं प्रविष्टापि भर्तृव्यसनकर्शिता ॥
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्यै दिव्यं माल्यं विभूषणम् ।
दिव्यानि चैव वासांसि चन्दनानि च सर्वशः ॥
अनसूया महाभागा सीतां प्रीतिपुरस्कृता ।
तान्यादाय च वैदेही प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि ॥
📖 भावार्थ : "धन्य हो तुम, हे कल्याणि सीते! जो महाबली राम जैसे श्रेष्ठ पति को पाकर भी पतिव्रता धर्म में स्थित हो। तुम्हारा सौभाग्य केवल पति पाने में ही नहीं, वरन् वन में भी उनके साथ रहकर उनके दुःखों को साझा करने में है।" ऐसा कहकर अनसूया ने सीता को दिव्य माल्य, आभूषण, वस्त्र और चन्दन दिए। महाभागा अनसूया से प्रेमपूर्वक दी गई वे वस्तुएँ सीता ने विधिपूर्वक ग्रहण कीं।
॥ श्लोक १६-१८ ॥
ततः सीता प्रसन्नान्ता अनसूयां तपस्विनीम् ।
उवाच वचनं साध्वी कृतार्थास्मि त्वया मुने ॥
अनसूया प्रसन्ना सा सीतां दृष्ट्वा कृताञ्जलिम् ।
आशीर्भिरभिनन्द्यैनां पुनः पुनरुदैक्षत ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न हृदया सीता ने उस तपस्विनी अनसूया से कहा – "हे मुनि पत्नी! मैं आपसे कृतार्थ हो गई।" अनसूया भी प्रसन्न होकर हाथ जोड़े सीता को देखकर बारंबार आशीर्वाद देती रहीं।

✨ सीता का अनसूया के प्रति कृतज्ञता निवेदन (श्लोक १९-२२)

॥ श्लोक १९-२२ ॥
ततः सीता महाभागा प्राञ्जलिः प्रणता स्थिता ।
उवाच वचनं साध्वी अनसूयां तपस्विनीम् ॥
अनसूये! महाभागे! पतिव्रतपरायणे!
त्वयाहं सत्कृता योगात् कृतार्था च विशेषतः ॥
तव प्रसादाद् धर्मिष्ठे! सर्वकामसमृद्धयः ।
भविष्यन्तीति मे नित्यं भक्तिस्त्वयि सदाऽनघे ॥
📖 भावार्थ : तब सीता ने हाथ जोड़कर उस तपस्विनी अनसूया से विनम्रता से कहा – "हे अनसूये! हे महाभागे! हे पतिव्रत धर्म में तत्पर! आपने मुझे सत्कार से युक्त किया और विशेष रूप से कृतार्थ किया। हे धर्मिष्ठे! आपकी कृपा से मेरी सभी कामनाएँ सिद्ध होंगी। मेरी आपमें नित्य भक्ति बनी रहेगी।"
॥ श्लोक २३-२४ ॥
इति सीतावचः श्रुत्वा अनसूया प्रहर्षिता ।
प्रत्युवाच महाभागा धर्म्यं वचनमर्थवत् ॥
तया सम्पूजिता सीता रात्रिं तत्र समावसत् ।
प्रभाते च ततः रामः प्रतस्थे सह लक्ष्मणः ॥
📖 भावार्थ : सीता के इन वचनों को सुनकर अनसूया अत्यधिक प्रसन्न हुईं और उन्होंने धर्मयुक्त एवं अर्थपूर्ण वचन कहे। अनसूया द्वारा सम्मानित सीता उस आश्रम में रात्रि को रुकीं। प्रभात होने पर राम लक्ष्मण सहित आगे के लिए प्रस्थान कर गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👩‍🦰 स्त्री-धर्म का आदर्श

इस सर्ग में अनसूया और सीता के माध्यम से पतिव्रता धर्म का उत्कृष्ट चित्रण है। अनसूया स्वयं दस हजार वर्षों तक पतिव्रत धर्म का पालन करके तपस्विनी हुई हैं। सीता उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करती हैं। यह स्त्री की पातिव्रत्य और पति के प्रति समर्पण की मर्यादा को रेखांकित करता है।

🙏 ऋषियों का आतिथ्य

भारतीय संस्कृति में अतिथि देवो भव: की भावना इस सर्ग में स्पष्ट दिखती है। अत्रि और अनसूया ने वनवासी राम-सीता-लक्ष्मण का सत्कार किया, उन्हें आश्रम में ठहराया और यथायोग्य दान दिया।

🌺 अनसूया का सीता को दिया वरदान

अनसूया ने सीता को दिव्य आभूषण और चन्दन दिए, जो अजर-अमर हैं और सीता के सौभाग्य को बढ़ाने वाले हैं। यह वरदान आगे चलकर सीता के जीवन में सहायक सिद्ध होता है।

🚩 राम की विनयशीलता

राम ने अत्रि ऋषि के प्रति अत्यंत विनम्रता दिखाई। वे अपने राजपुत्र होने का अभिमान नहीं रखते, बल्कि ऋषियों के प्रति आदर भाव रखते हैं। यह उनके चरित्र की महानता को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीखने को मिलता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और मर्यादा का पालन करना चाहिए। स्त्री-पुरुष दोनों के लिए पातिव्रत्य और एकनिष्ठता महत्वपूर्ण है। साथ ही, ऋषियों और बड़ों का आशीर्वाद जीवन में सदैव सफलता दिलाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।