राम का चित्रकूट से प्रस्थान

भरत के लौट जाने के बाद, राम, लक्ष्मण और सीता चित्रकूट से आगे वनों की ओर प्रस्थान करते हैं। वे मन्दाकिनी नदी को पार करते हैं और दण्डक वन की ओर बढ़ते हैं।

विवरण

यह सर्ग राम के चित्रकूट से प्रस्थान का वर्णन करता है। भरत के अयोध्या लौट जाने के पश्चात्, राम को लगता है कि अब चित्रकूट में अधिक लोगों के आने से वह स्थान तपस्या के लिए उपयुक्त नहीं रहा। वे लक्ष्मण और सीता के साथ वहाँ से आगे दण्डक वन की ओर चल पड़ते हैं। वे मन्दाकिनी नदी के तट पर कुछ समय रुकते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं। इस मार्ग में वे विभिन्न ऋषियों के आश्रमों को देखते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। राम इस वन में रहने वाले मुनियों के जीवन से प्रभावित होते हैं और धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करने का संकल्प लेते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ६२

(राम का चित्रकूट से प्रस्थान – वन की ओर अग्रसर)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में भरत के आग्रह पर राम ने उन्हें अपनी पादुका प्रदान की थी। भरत उन पादुकाओं को राजसिंहासन पर स्थापित कर अयोध्या लौट गए। अब चित्रकूट में एकत्रित जनसमूह के कारण वह स्थान तपस्या के लिए उपयुक्त नहीं रहा। राम, लक्ष्मण और सीता अब आगे वनों की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लेते हैं। यह सर्ग उसी प्रस्थान का मार्मिक वर्णन करता है।

🚶 राम का प्रस्थान निर्णय (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १ ॥
ततो रामः महाप्राज्ञः लक्ष्मणं च महाबलम् ।
उवाच धर्मसंयुक्तं वचनं धर्मकांक्षया ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महाप्राज्ञः = अत्यन्त बुद्धिमान; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; च = और; महाबलम् = महान बलशाली; उवाच = बोले; धर्मसंयुक्तम् = धर्मयुक्त; वचनम् = वचन; धर्मकांक्षया = धर्म की इच्छा से।
📖 भावार्थ : उसके बाद महाप्राज्ञ राम ने महाबली लक्ष्मण से धर्म की कामना से धर्मयुक्त वचन कहे।
🔍 व्याख्या : राम हर कार्य धर्म को ध्यान में रखकर करते हैं। यहाँ भी वे लक्ष्मण से विचार-विमर्श करते हैं कि अब आगे कैसे बढ़ा जाए।
॥ श्लोक २-३ ॥
इमे जनपदा रम्या इमे देशाः सुशोभनाः ।
बहवो ब्राह्मणाः सिद्धाः संश्रिता वनवासिनः ॥
अतः परं प्रवेक्ष्यावः सह सीतया दण्डकाः ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं यदि रोचयसेऽनघ ॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा – ये जनपद रमणीय हैं, ये देश अत्यन्त सुन्दर हैं, बहुत से ब्राह्मण और सिद्ध वनवासी इनमें निवास करते हैं। अब हम सीता सहित दण्डक वन में प्रवेश करेंगे। हे अनघ! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि क्या तुम्हें यह उचित लगता है।

🌊 मन्दाकिनी नदी पार (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-८ ॥
ततः प्रयाताः सीतार्थं रामलक्ष्मणपूर्वजाः ।
मन्दाकिनीं नदीं रम्यां शीवालविवर्जिताम् ॥
तां तीर्त्वा सह सीतया रामः सत्यपराक्रमः ।
प्रविवेश महारण्यं नानामृगगणायुतम् ॥
📖 भावार्थ : तब राम और लक्ष्मण अग्रणी होकर सीता के साथ आगे बढ़े। उन्होंने मन्दाकिनी नदी को पार किया, जो रमणीय और शैवाल से रहित थी। उसे पार करके सत्यपराक्रम राम सीता सहित उस महान वन में प्रविष्ट हुए, जो अनेक प्रकार के मृगों के समूहों से युक्त था।
🔍 व्याख्या : मन्दाकिनी चित्रकूट की प्रसिद्ध नदी है। इसे पार करके राम दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं, जो उनके वनवास का मुख्य स्थान है।

🧘 ऋषि-दर्शन एवं आशीर्वाद (श्लोक १३-२०)

॥ श्लोक १३-१५ ॥
तत्राश्रमपदं रम्यं ददर्शुर ऋषिसेवितम् ।
बहुपुष्पफलं वृक्षैः शीतच्छायं मनोरमम् ॥
तत्र सिद्धाश्च बहवः संप्रहृष्टा महाव्रताः ।
प्रत्यूचुः सहिता रामं धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ॥
स्वागतं ते महाभाग धर्मज्ञ सत्यवादिने ।
अस्माकं भवनं राम सीतया सहितस्य च ॥
📖 भावार्थ : वहाँ उन्होंने ऋषियों से सेवित रमणीय आश्रम देखे, जो बहुत से फल-फूलों से युक्त वृक्षों से शीतल छाया वाले और मनोरम थे। वहाँ अनेक सिद्ध महाव्रती ऋषि एकत्रित होकर धर्मज्ञ और सत्यवादी राम से बोले – हे महाभाग! हे धर्मज्ञ! हे सत्यवादी! आपका स्वागत है। हे राम! सीता सहित आपके लिए हमारा यह घर है (अर्थात् आप हमारे आश्रम में पधारें)।
॥ श्लोक १८-२० ॥
तानुवाच ततो रामो वचनं धर्मसंहितम् ।
भवन्तो बहवो धन्या मयि स्नेहपुरःसराः ॥
अहं तु भवतां वाक्यादाश्रमेषु वसामि वै ।
यथाकामं प्रवेक्ष्यामि दण्डकानि तपोधनाः ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने धर्मसंहित वचन कहे – आप सब बहुत धन्य हैं, जो मुझ पर स्नेह रखते हैं। मैं आपके वचन से आश्रमों में निवास करूँगा। हे तपोधनों! मैं दण्डक वन में आपकी इच्छानुसार प्रवेश करूँगा।

🪷 वनवास का संकल्प (श्लोक २१-२४)

॥ श्लोक २१-२२ ॥
इत्युक्त्वा ते तपःसिद्धा रामं धर्मपरायणम् ।
आशीर्भिरभ्यनन्दंश्च प्रतस्थे च नरर्षभः ॥
सीतया लक्ष्मणेनापि धर्मज्ञो धर्मचारिणौ ।
अनुज्ञातः स तैर्विप्रैः प्रययौ यत्र दण्डकाः ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर उन तपःसिद्ध ऋषियों ने धर्मपरायण राम को आशीर्वाद दिए और वे नरर्षभ (राम) आगे बढ़े। धर्मज्ञ राम धर्माचरण करने वाली सीता और लक्ष्मण के साथ, उन विप्रों से अनुज्ञा लेकर जिधर दण्डक वन था, उधर चल दिए।
॥ श्लोक २३-२४ ॥
ते गत्वा दण्डकान् रम्यान् रामो लक्ष्मणसीतया ।
विवेश वनमासाद्य यत्र श्रृङ्गवेरपुरम् ॥
तत्र ते न्यवसन् राजन् रममाणा वने वने ।
ऋषीणां चैव देवानां पितॄणां चैव धर्मतः ॥
📖 भावार्थ : वे राम, लक्ष्मण और सीता ने रमणीय दण्डकों में जाकर उस वन में प्रवेश किया, जहाँ शृंगवेरपुर स्थित था। हे राजन! वे वन-वन में विचरते हुए ऋषियों, देवताओं और पितरों के धर्मानुसार आनन्दपूर्वक निवास करने लगे।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार राम दण्डकारण्य में प्रवेश करके वनवास के अगले चरण की शुरुआत करते हैं। आगे के सर्गों में अत्रि ऋषि एवं अन्य ऋषियों के आश्रमों का वर्णन आएगा।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🚩 आदर्श वनवासी

राम का चित्रकूट से प्रस्थान और दण्डकारण्य में प्रवेश यह दर्शाता है कि वे वनवास के नियमों का पालन करते हुए भी ऋषियों के सान्निध्य में रहकर धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं। वे कहीं भी रहें, धर्म ही उनका मार्गदर्शक है।

🌿 प्रकृति और मानव का सामंजस्य

इस सर्ग में वन, नदी, ऋषि-आश्रमों का जो वर्णन है, वह प्रकृति और मानव के बीच अटूट संबंध को दर्शाता है। राम वन को अपना घर बनाकर वहाँ के नियमों का पालन करते हैं और सभी प्राणियों से स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हैं।

🙏 गुरुजनों का आदर

राम का ऋषियों से वार्तालाप और उनसे आज्ञा लेना उनकी विनम्रता और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा को प्रकट करता है। यही कारण है कि समस्त ऋषि उनका स्वागत करते हैं और उन्हें आशीर्वाद देते हैं।

⏳ वनवास का दूसरा चरण

यह सर्ग वनवास के दूसरे चरण की शुरुआत है। अब राम चित्रकूट जैसे सुंदर स्थान को छोड़कर अधिक घने और कठिन वनों में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। यह आगामी घटनाओं की भूमिका तैयार करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में कभी भी परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन हमें अपने धर्म और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। राम की तरह हर नई परिस्थिति में भी हमें विनम्रता, धैर्य और सत्पुरुषों के आदर का भाव नहीं छोड़ना चाहिए। प्रकृति के सान्निध्य में रहकर हम आत्मिक शांति प्राप्त कर सकते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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