भरत का अयोध्या लौटना और नंदिग्राम में निवास

भरत जब माता कैकेयी से राम के वनवास और पिता की मृत्यु का समाचार सुनते हैं, तो वे अत्यन्त दुखी होते हैं। वे राम को वापस लाने के लिए चित्रकूट जाते हैं, परन्तु राम के अटल निर्णय से वे लौट आते हैं। अयोध्या लौटकर वे राजमहल में प्रवेश न करके नंदिग्राम में निवास करते हैं और राम की पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर राज्य का संचालन करते हैं।

विवरण

यह सर्ग भरत के चरित्र की महानता को दर्शाता है। विनय और कर्तव्यपरायणता के प्रतीक भरत जब अयोध्या लौटते हैं तो नगरी को सूनी और उदास पाते हैं। नगर के सुनसान दृश्य को देखकर वे चिंतित हो उठते हैं। महल में प्रवेश करने पर माता कैकेयी से पिता के निधन और राम के वनवास का समाचार सुनकर वे मूर्छित हो जाते हैं। होश में आने पर वे कैकेयी को धिक्कारते हैं और राम को लाने के लिए तुरंत चित्रकूट जाने का निश्चय करते हैं। सुमंत्र सहित समस्त नगरजनों के साथ वे चित्रकूट जाते हैं और राम से अयोध्या लौटने की प्रार्थना करते हैं। राम के दृढ़ इन्कार के बाद वे उनकी पादुकाएँ प्राप्त कर अयोध्या लौटते हैं। अयोध्या में प्रवेश करने के स्थान पर वे नंदिग्राम में रहने का निर्णय लेते हैं। वे राम की पादुकाओं को राजसिंहासन पर स्थापित करते हैं और स्वयं तपस्वी वेश में रहकर उन पादुकाओं के आदेश से राज्य का संचालन करते हैं। यह सर्ग भरत के राम के प्रति अटूट प्रेम और धर्म के प्रति उनकी निष्ठा को उजागर करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ६१

(भरत का अयोध्या लौटना और नंदिग्राम में निवास)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : चित्रकूट में राम से मिलकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद भरत अयोध्या लौट आए हैं। किंतु राम के बिना अयोध्या उन्हें सूनी लगती है। वे राजमहल में प्रवेश न करके नंदिग्राम में निवास करने का निर्णय लेते हैं। वहाँ वे राम की पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान करके उन्हीं के नाम से राज्य का संचालन करते हैं। यह सर्ग उसी घटना का मार्मिक वर्णन करता है।

🏰 अयोध्या की विषादमयी दशा और भरत का आगमन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रविष्टो नगरं भरतः सह शत्रुहा ।
ददर्श विजनं सर्वं निरानन्दं निरुत्सवम् ॥
वृक्षैः परीतं शून्यं च गतसत्त्वमचेतनम् ।
निर्जनं प्रेतराज्याभं स्त्रीपुमांसविवर्जितम् ॥
तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमान् पुरं पुरुषसत्तमः ।
चिन्ताशोकसमापन्नो भृशमश्रूण्यवर्तयत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रविष्टः = प्रवेश किया; नगरम् = नगर में; भरतः = भरत ने; सह = साथ; शत्रुहा = शत्रुघ्न के; ददर्श = देखा; विजनम् = जनशून्य; सर्वम् = सब कुछ; निरानन्दम् = आनन्दरहित; निरुत्सवम् = उत्सवरहित; वृक्षैः = वृक्षों से; परीतम् = घिरा हुआ; शून्यम् = सूना; च = और; गतसत्त्वम् = सत्त्वहीन; अचेतनम् = चेतनाशून्य; निर्जनम् = निर्जन; प्रेतराज्याभम् = यमलोक के समान; स्त्रीपुमांसविवर्जितम् = स्त्री-पुरुषों से रहित; तम् = उस; दृष्ट्वा = देखकर; भरतः = भरत; श्रीमान् = श्रीमान्; पुरम् = नगर को; पुरुषसत्तमः = पुरुषोत्तम; चिन्ताशोकसमापन्नः = चिन्ता और शोक से व्याप्त; भृशम् = अत्यधिक; अश्रूणि = आँसू; अवर्तयत् = बहाने लगे।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् भरत शत्रुघ्न के साथ अयोध्या नगर में प्रविष्ट हुए। उन्होंने देखा कि सारा नगर जनशून्य, आनन्दहीन और उत्सवरहित है। वह वृक्षों से घिरा हुआ, सूना, चेतनाशून्य, निर्जन, यमलोक के समान और स्त्री-पुरुषों से विहीन प्रतीत हो रहा था। उस नगरी को इस दशा में देखकर पुरुषोत्तम भरत चिन्ता और शोक से व्याप्त हो गए और उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।
🔍 व्याख्या : भरत जब अयोध्या लौटे तो उन्होंने देखा कि जो नगरी कभी उत्साह और उल्लास से भरी रहती थी, वह आज शोकाकुल और सूनी पड़ी है। यह दृश्य उनके हृदय को बेध गया।

👩‍👦 माताओं से भेंट और पिता-वियोग का शोक (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
स राजमार्गमासाद्य ददर्श विजनं तदा ।
रथात् समवरुह्याथ भरतः पृथिवीपतिः ॥
पद्भ्यामेवान्वगच्छद्वै शत्रुघ्नसहितस्तदा ।
प्रविश्य च गृहं मातुः कैकेय्या भरतस्तदा ॥
ददर्श तां नरश्रेष्ठः पितुः पादावुपासतीम् ।
स दृष्ट्वा पितरं वृत्तं रामं च वनमाश्रितम् ॥
विललाप स धर्मात्मा भरतः शोककर्शितः ।
📖 भावार्थ : राजमार्ग पर आकर उन्होंने उसे भी सूना पाया। तब वे रथ से उतर पड़े और शत्रुघ्न सहित पैदल ही आगे बढ़े। फिर माता कैकेयी के भवन में प्रवेश करके उन्होंने देखा कि वह पिता के चरणों में बैठी हैं (अर्थात् पिता का शोक कर रही हैं)। पिता की मृत्यु और राम के वनवास का समाचार पाकर वे धर्मात्मा भरत अत्यन्त शोकाकुल हो गए और विलाप करने लगे।
🔍 व्याख्या : यहाँ भरत की दशा अत्यन्त करुण है। एक ओर पिता का निधन, दूसरी ओर प्रिय भाई का वन जाना – दोहरे आघात से वे व्याकुल हो उठते हैं।

🌳 नंदिग्राम में निवास का निर्णय और पादुकापूजन (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९-२४ ॥
स तु राज्याभिषेकाय कृतबुद्धिररिंदमः ।
न चैच्छद् राज्यमव्यग्रः प्राणानपि च राघवे ॥
गुर्विणीमात्मनो मातुः कैकेय्या याचितस्तदा ।
प्रत्याख्यातवचाः श्रीमान् भरतः सत्यविक्रमः ॥
ततः समेत्य धर्मज्ञः सर्वानेव सुहृत्तदा ।
उवाच परमप्रीतो रामपादावनेन सः ॥
इमे पादुके रामस्य राज्यं शास्तु जगत्पतेः ।
अहं तु नन्दिग्रामे वै तपश्चर्यां करोम्युत ॥
📖 भार्थ : अरिंदम भरत का हृदय राज्याभिषेचन के लिए तैयार था, किंतु वे राम के अभाव में राज्य ग्रहण नहीं करना चाहते थे। उन्होंने माता कैकेयी के अनुरोध को भी ठुकरा दिया। तब धर्मज्ञ भरत ने समस्त मित्रों और परिजनों को बुलाकर राम की पादुकाओं का पूजन किया और कहा, 'ये राम की पादुकाएँ अब इस राज्य का शासन संभालें। मैं नंदिग्राम में जाकर तपस्या करूँगा।'
🔍 व्याख्या : भरत ने स्पष्ट कर दिया कि वे राज्य के स्वामी नहीं, केवल राम के प्रतिनिधि हैं। नंदिग्राम में रहकर वे तपस्वी की भाँति जीवन बिताएँगे, जब तक राम वापस नहीं आते।

👑 पादुकाओं का राजसिंहासन पर अभिषेक (श्लोक २९-३८)

॥ श्लोक २९-३८ ॥
ततः प्रभाते विमले पुष्येण सहितो नृपः ।
पादुके ते समादाय यत्र रामस्य मन्दिरम् ॥
तत्र राज्याभिषेकार्थं ब्राह्मणैः समितैर्द्विजैः ।
न्यासभूते इवाधाय सिंहासनमथार्चयत् ॥
प्रगृह्य पादुके राजा शिरसा चापि धारयन् ।
ऊचिवान् वचनं चेदं भरतः शत्रुतापनः ॥
यावद्रामो निवर्तेत पुनरयोध्यां महायशाः ।
तावदिमे पादुके राज्यं कारयिष्ये न संशयः ॥
इत्युक्त्वा भरतः श्रीमान् नन्दिग्राममुपागमत् ।
तत्रैव न्यवसद् धीमान् वाल्कलाजिनसंवृतः ॥
📖 भार्थ : फिर प्रातःकाल पुष्य नक्षत्र में भरत ने राम की पादुकाओं को लेकर उनके मन्दिर में प्रवेश किया। ब्राह्मणों द्वारा मन्त्रोच्चार के बीच उन्होंने उन पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान किया और उनका पूजन किया। पादुकाओं को सिर पर धारण कर भरत ने कहा, 'जब तक महायशस्वी राम पुनः अयोध्या नहीं लौट आते, तब तक ये पादुकाएँ ही राज्य का संचालन करेंगी – इसमें कोई संदेह नहीं।' ऐसा कहकर वे नंदिग्राम चले गए और वहीं वल्कल वस्त्र धारण करके निवास करने लगे।
🔍 व्याख्या : यह दृश्य भरत की रामभक्ति का परम उत्कर्ष है। उन्होंने स्वयं राज्य नहीं संभाला, बल्कि राम की पादुकाओं को ही सम्राट मानकर उनके आदेश से शासन किया। यह त्याग और समर्पण का अनुपम उदाहरण है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙏 भरत का आदर्श चरित्र

इस सर्ग में भरत के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे राज्य के प्रति आसक्त नहीं हैं। उनके लिए राम का प्रेम और धर्म सबसे बड़ा है। वे राज्य को भोग की वस्तु न समझकर सेवा का माध्यम मानते हैं।

👣 पादुकाओं का प्रतीकात्मक महत्त्व

राम की पादुकाएँ उनकी अनुपस्थिति में उनके अधिकार और कर्तव्य का प्रतीक बन जाती हैं। यह संकेत है कि सच्चा राजा वही है जो धर्म और जनता के प्रति समर्पित हो, भले ही वह सिंहासन पर विराजमान न हो।

⛲ नंदिग्राम – त्याग की तपोभूमि

नंदिग्राम वह स्थान है जहाँ भरत ने चौदह वर्षों तक तपस्वी का जीवन बिताया। यह स्थान त्याग, सेवा और धैर्य की तपोभूमि के रूप में सदा स्मरणीय रहेगा।

⚖️ राज्य का दार्शनिक स्वरूप

यह सर्ग यह भी दर्शाता है कि राज्य केवल भोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है, जिसे धर्म के अनुसार निभाना चाहिए। भरत ने उस उत्तरदायित्व को राम के प्रति अपने समर्पण से निभाया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा प्रेम और समर्पण ही मनुष्य को महान बनाता है। भरत ने राज्य, भोग और सुख का त्याग करके केवल राम के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया। यह हमें बताता है कि भाईचारे और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए भौतिक सुखों का मोह त्यागना आवश्यक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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