गंगा पार करना और चित्रकूट की ओर प्रस्थान

राम, लक्ष्मण और सीता गंगा नदी के तट पर पहुँचते हैं, जहाँ निषादराज गुह उनका स्वागत करते हैं। वे रात्रि विश्राम करते हैं और अगले दिन गंगा पार करके चित्रकूट पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं।

विवरण

यह सर्ग राम के वनगमन के मार्ग का वर्णन करता है। अयोध्या से निकलने के बाद, राम, सीता और लक्ष्मण गंगा के तट पर पहुँचते हैं। वहाँ निषादराज गुह, जो राजा दशरथ के मित्र हैं, उनकी अगवानी करते हैं। गुह राम को राजसी सत्कार देना चाहते हैं, परन्तु राम वनवासी के रूप में साधारण भोजन और शयन ही स्वीकार करते हैं। रात्रि में लक्ष्मण जागरण करते हैं, जबकि राम और सीता भूमि पर सोते हैं। प्रातःकाल वे गुह की सहायता से गंगा पार करते हैं। नदी पार करने के बाद, वे घने वनों से होते हुए चित्रकूट पर्वत की ओर बढ़ते हैं। मार्ग में वे विविध वृक्षों, पुष्पों और वन्य प्राणियों को देखते हैं। अन्ततः वे चित्रकूट के मनोरम प्रदेश में पहुँचते हैं, जहाँ वे एक पर्णकुटी बनाकर निवास करने का निर्णय लेते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ४७

(गंगा पार करना और चित्रकूट की ओर प्रस्थान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में राम, लक्ष्मण और सीता ने श्रृंगवेरपुर (आधुनिक सरायमोहना) पहुँचकर गंगा के तट पर डेरा डाला। अब वे निषादराज गुह से मिलते हैं, जो उनके स्वागत को आतुर हैं। यह सर्ग गंगा पार करने और चित्रकूट की यात्रा का मनोरम वर्णन करता है।

🏞️ गंगा तट पर आगमन और निषादराज गुह (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततस्ते श्रान्तवाहनाः श्रान्तपदातयः ।
गङ्गाकूले निवेशं तु चक्रुः परमशोभनम् ॥
तं दृष्ट्वा निषधाधिपः प्रीत्या समागतः ।
गुहो नाम महाबलो रामं वचनमब्रवीत् ॥
स्वागतं ते महाबाहो राजपुत्र यशस्विनि ।
इदं राज्यं ममाद्यैव त्वदधीनं न संशयः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = वे (राम आदि); श्रान्तवाहनाः = थके हुए वाहनों वाले; श्रान्तपदातयः = थके हुए पैदल सैनिकों वाले; गङ्गाकूले = गंगा के किनारे; निवेशम् = शिविर; तु = तो; चक्रुः = किया; परमशोभनम् = अत्यन्त सुन्दर; तम् = उन्हें; दृष्ट्वा = देखकर; निषधाधिपः = निषादों का राजा; प्रीत्या = प्रेम से; समागतः = आया; गुहः = गुह; नाम = नाम से; महाबलः = महान बलशाली; रामम् = राम से; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोला; स्वागतम् = स्वागत है; ते = आपका; महाबाहो = हे महाबाहो; राजपुत्र = राजपुत्र; यशस्विनि = यशस्वी; इदम् = यह; राज्यम् = राज्य; मम = मेरा; अद्यैव = आज ही; त्वदधीनम् = आपके अधीन; न संशयः = कोई संशय नहीं।
📖 भावार्थ : तब वे (राम, लक्ष्मण और सीता) थके हुए वाहनों और पैदल सैनिकों के साथ गंगा के तट पर पहुँचे और एक अत्यन्त सुन्दर शिविर बनाया। उन्हें देखकर निषादराज गुह, जो महान बलशाली हैं, प्रेमपूर्वक वहाँ आए और राम से बोले, "हे महाबाहो, हे यशस्वी राजपुत्र! आपका स्वागत है। मेरा यह राज्य आज से आपके अधीन है, इसमें कोई संशय नहीं।"
🔍 व्याख्या : गुह राजा दशरथ के मित्र थे, इसलिए वे राम को अपना स्वामी मानते हैं और सारी सुविधाएँ अर्पित करते हैं।
॥ श्लोक ६-१० ॥
इत्युक्त्वा प्रियमकरोत् पाद्यार्घ्यासनवन्दनैः ।
रामस्य सहितो भ्रात्रा सीतया च महात्मना ॥
रामस्तु प्रतिजग्राह वन्यमाहारमात्मवान् ।
न चकामयत राज्यं न च राज्योपभोग्यकम् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर गुह ने राम, लक्ष्मण और सीता का पाद्य, अर्घ्य, आसन और वन्दन द्वारा सत्कार किया। परन्तु राम ने केवल वन्य आहार (जो वन में मिले) स्वीकार किया; उन्होंने राज्य या राजभोग्य वस्तुओं की इच्छा नहीं की।

🌙 रात्रि-विश्राम और लक्ष्मण का जागरण (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
रात्रौ तु गुहः स्वयमार्येण सहितो धीमता ।
लक्ष्मणेन कथा विचित्राः कुर्वन् सुष्वाप राघवः ॥
सीता तु भूमौ सुष्वाप रामस्योत्सङ्गमाश्रिता ।
लक्ष्मणस्तु धनुष्पाणिः सर्वतोऽभ्यचरद्वनम् ॥
📖 भावार्थ : रात्रि में गुह ने स्वयं धीमान् लक्ष्मण के साथ रहकर विविध कथाएँ कीं। राम (जमीन पर) सो गए। सीता ने राम की गोद में सिर रखकर भूमि पर शयन किया। लक्ष्मण धनुष धारण किए सारी रात वन में चारों ओर पहरा देते रहे।
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण का यह जागरण उनके अटूट समर्पण और भक्ति का प्रतीक है।

⛵ गंगा पार करना (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः प्रभाते विमले गुहो नाव उपाहरत् ।
आरुरोह ततो रामः सीता लक्ष्मण एव च ॥
अवतार्य च तान् पारे गुहः पुनरुवाच ह ।
अनुजानीहि मां राजन् गमिष्यामि पुरीं प्रति ॥
📖 भावार्थ : फिर प्रातःकाल स्वच्छ प्रकाश में गुह ने नावें लाकर दीं। तब राम, सीता और लक्ष्मण नाव पर सवार हुए। उन्हें पार उतारकर गुह ने पुनः कहा, "हे राजन्! मुझे आज्ञा दीजिए, मैं नगर (श्रृंगवेरपुर) को लौट जाऊँ।"
॥ श्लोक २६-३० ॥
रामस्तु गुहमाश्लिष्य स्नेहाद्वचनमब्रवीत् ।
गच्छ त्वं सुहृदां मुख्य सुखी भव सदा प्रिय ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ रामः सीतया सह लक्ष्मणः ।
चित्रकूटं प्रति महत् सुमनोहरकाननम् ॥
📖 भावार्थ : राम ने गुह को स्नेह से आलिंगन करके कहा, "हे मुख्य सुहृद्! तुम जाओ, सदा सुखी रहो।" ऐसा कहकर राम सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़े, जहाँ बड़े मनोहर वन हैं।

🌲 चित्रकूट की ओर यात्रा और उसका वर्णन (श्लोक ३१-३५)

॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ते गच्छन्तो ददृशुर्वनं नानामृगसमाकुलम् ।
नानापुष्पफलोपेतं नानाद्विजनिषेवितम् ॥
चित्रकूटं गिरिं दृष्ट्वा रामो वचनमब्रवीत् ।
एष भ्रातर्यथा स्वर्गः पृथिव्यां प्रतिभाति मे ॥
इह वत्स्यामहे सर्वे कृत्वा परमशोभनाम् ।
पर्णशालां सुखार्थं वै यथा कालो न बाधते ॥
📖 भावार्थ : चलते-चलते उन्होंने अनेक मृगों से भरे, नाना प्रकार के फूल-फलों से युक्त और अनेक पक्षियों से सेवित वन को देखा। चित्रकूट पर्वत को देखकर राम ने कहा, "हे भ्राता! यह पर्वत मुझे पृथ्वी पर स्वर्ग के समान प्रतीत होता है। यहीं हम सब लोग एक अति सुन्दर पर्णशाला बनाकर निवास करेंगे, ताकि काल (वनवास का समय) हमें कष्ट न दे।"
🔍 व्याख्या : चित्रकूट की प्राकृतिक छटा राम को मोहित कर लेती है और वे यहीं निवास करने का निर्णय लेते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 आदर्श मित्रता

गुह और राम का सम्बन्ध निष्काम प्रेम और भक्ति का उदाहरण है। गुह राज्य अर्पित करने को तत्पर है, राम केवल वन्य आहार ग्रहण करते हैं। यह दर्शाता है कि सच्चा स्नेह भौतिक सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि हृदय के जुड़ाव में है।

🛡️ लक्ष्मण का त्याग

लक्ष्मण सारी रात जागकर अपने बड़े भाई और भाभी की रक्षा करते हैं। यह उनके समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा का चरमोत्कर्ष है।

🌄 चित्रकूट का महत्व

चित्रकूट वह स्थान है जहाँ राम ने अपना अधिकांश वनवास बिताया। यह स्थान आज भी रामभक्तों के लिए प्रमुख तीर्थ है। यहाँ का वर्णन प्रकृति के सौन्दर्य और आध्यात्मिक शान्ति का अद्भुत संगम है।

⛵ गंगा का प्रतीकात्मक अर्थ

गंगा को पार करना राम के लिए अयोध्या के राजसी जीवन से पूर्ण त्याग और वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश का प्रतीक है। यह उनके वनवास का वास्तविक आरम्भ है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और विनम्रता नहीं छोड़नी चाहिए। मित्रता का सच्चा अर्थ है आपत्तिकाल में साथ देना। राम ने गुह का सत्कार स्वीकार किया, पर राजसी ठाठ-बाट को त्याग दिया, यह उनके संतोष और संयम का प्रतीक है। लक्ष्मण का जागरण हमें कर्तव्यपालन की प्रेरणा देता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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