भरत का गुह से मिलन

भरत जब राम को वापस लाने के लिए अयोध्या से चित्रकूट जाते हैं, तब गंगा तट पर निषादराज गुह से उनका मिलन होता है। गुह भरत का स्वागत करते हैं और राम के वनगमन का वृत्तांत सुनाते हैं।

विवरण

अयोध्या काण्ड के छियालीसवें सर्ग में भरत के गंगा तट पर पहुँचने और निषादराज गुह से भेंट का मार्मिक वर्णन है। माता कैकेयी के कठोर निर्णय से दुखी भरत, राम को लौटाने के दृढ़ संकल्प के साथ अयोध्या से चल पड़े हैं। उनके साथ शत्रुघ्न, माताएँ, गुरु वशिष्ठ और विशाल सेना है। गंगा के तट पर श्रृंगवेरपुर पहुँचकर भरत ने सेना सहित विश्राम करना चाहा। निषादराज गुह को जब भरत के आगमन की सूचना मिली, तो वे अपने मंत्रियों और अनुचरों के साथ भरत का स्वागत करने आए। उन्होंने भरत को प्रणाम किया और अत्यंत आदर से उनके ठहरने की व्यवस्था की। गुह ने भरत को फल-मूल और मधु आदि भेंट किए, किंतु भरत ने विनम्रता पूर्वक स्वीकार किया और गुह से राम के विषय में पूछा। तब गुह ने भरत को राम के वनगमन की सारी कथा सुनाई – कैसे उन्होंने राम, सीता और लक्ष्मण को गंगा पार कराया, कैसे राम ने उनका आतिथ्य स्वीकार किया और कैसे वे वट वृक्ष के नीचे सोए। यह सुनकर भरत अत्यंत दुखी हुए और वहीं गंगा तट पर रात्रि विश्राम किया, अगले दिन गुरु वशिष्ठ से आज्ञा लेकर गंगा पार करने की योजना बनाई।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ४६

(भरत का गुह से मिलन – भाई के प्रेम की गाथा)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के वनगमन के पश्चात् राजा दशरथ का स्वर्गवास हो जाता है। भरत को माता कैकेयी ने अयोध्या लौटने के लिए बुलवाया। अयोध्या लौटकर जब उन्हें समस्त वृत्तांत ज्ञात होता है, तो वे राम को वापस लाने का निश्चय कर चित्रकूट की ओर प्रस्थान करते हैं। उनके साथ माताएँ, मंत्रीगण, गुरु वशिष्ठ और विशाल सेना है। गंगा तट पर स्थित श्रृंगवेरपुर में निषादराज गुह का राज्य है। गुह राम के परम भक्त हैं। भरत के आगमन की सूचना पाकर वे उनसे मिलने आते हैं। यह सर्ग उसी मिलन की अद्भुत व्याख्या करता है।

🏹 गंगा तट पर भरत का आगमन और गुह का स्वागत (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रभाते विमले कृताह्निकपुरःसरः ।
भरतः शत्रुघ्नसहितो जगाम सह मन्त्रिभिः ॥
स राजपुत्रो ववृधे प्रयातः पितुराश्रमम् ।
सिंह इव गिरेर्गह्वरात् प्रवृद्धो मदमूर्च्छितः ॥
स गङ्गां प्राप्य काकुत्स्थः श्रृङ्गवेरपुरे तदा ।
निषादराजं गुहं ददर्श सह बान्धवैः ॥
गुहोपि दृष्ट्वा भरतं प्रणाममकरोत्तदा ।
अर्घ्यं पाद्यं च रम्यं च आतिथ्यं च यथाविधि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रातःकाल; विमले = स्वच्छ; कृताह्निक = स्नान आदि से निवृत्त होकर; पुरःसरः = आगे बढ़ते हुए; भरतः = भरत; शत्रुघ्नसहितः = शत्रुघ्न के साथ; जगाम = गए; सह = साथ; मन्त्रिभिः = मंत्रियों के; सः = वह; राजपुत्रः = राजकुमार; ववृधे = बढ़े; प्रयातः = जाते हुए; पितुः = पिता के; आश्रमम् = आश्रम की ओर; सिंहः = सिंह; इव = जैसे; गिरेः = पहाड़ से; गह्वरात् = गुफा से; प्रवृद्धः = निकलकर; मदमूर्च्छितः = मद से मत्त; सः = वह; गङ्गाम् = गंगा को; प्राप्य = प्राप्त कर; काकुत्स्थः = ककुत्स्थवंशी भरत; श्रृङ्गवेरपुरे = श्रृंगवेरपुर में; तदा = तब; निषादराजम् = निषादराज; गुहम् = गुह को; ददर्श = देखा; सह = सहित; बान्धवैः = बन्धुओं के; गुहः = गुह; अपि = भी; दृष्ट्वा = देखकर; भरतम् = भरत को; प्रणामम् = नमस्कार; अकरोत् = किया; तदा = तब; अर्घ्यम् = अर्घ्य; पाद्यम् = पाद्य; च = और; रम्यम् = सुन्दर; च = और; आतिथ्यम् = आतिथ्य; च = और; यथाविधि = विधिपूर्वक।
📖 भावार्थ : फिर प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर भरत शत्रुघ्न और मंत्रियों सहित आगे बढ़े। वे राजकुमार पिता के आश्रम की ओर ऐसे बढ़ रहे थे मानो पर्वत की गुफा से निकला हुआ मदमत्त सिंह। गंगा को प्राप्त कर वे श्रृंगवेरपुर पहुँचे। वहाँ उन्होंने निषादराज गुह को अपने बांधवों के साथ देखा। गुह ने भी भरत को देखकर उन्हें प्रणाम किया और विधिपूर्वक अर्घ्य, पाद्य तथा सुन्दर आतिथ्य प्रदान किया।
🔍 व्याख्या : गुह का भरत के प्रति यह आदर राम के प्रति उनके प्रेम के कारण भी है और भरत के स्वयं के व्यक्तित्व के कारण भी। वे जानते हैं कि भरत धर्मात्मा और बड़ों का आदर करने वाले हैं।
॥ श्लोक ५-७ ॥
भरतस्तु प्रतिग्रह्य अर्घ्यं पाद्यं च सत्कृतम् ।
गुहेन सह संगम्य पप्रच्छ कुशलं तदा ॥
अपि स्वस्ति गुह तुभ्यं कुशलं ते निवेशने ।
अपि सर्वं समृद्धं ते राष्ट्रं च धनधान्यतः ॥
अपि रामः कुशली राजपुत्रः सलक्ष्मणः ।
अपि सीता च वैदेही कुशली जनकात्मजा ॥
📖 भावार्थ : भरत ने अर्घ्य और पाद्य को ग्रहण कर, गुह के साथ संगम करके उनका कुशल पूछा – "हे गुह! क्या तुम कुशलपूर्वक हो? क्या तुम्हारे निवास में कुशल है? क्या तुम्हारा राष्ट्र धन-धान्य से समृद्ध है? और क्या राम, लक्ष्मण तथा वैदेही सीता (जनकात्मजा) कुशलपूर्वक हैं?"
🔍 व्याख्या : भरत की प्रथम चिंता राम के कुशल की है। यह उनके अगाध स्नेह और वात्सल्य को दर्शाता है।

🌳 गुह द्वारा राम के वनगमन का वर्णन (श्लोक ८-१६)

॥ श्लोक ८-१२ ॥
गुहः प्रत्यब्रवीद्वाक्यं भरतं प्रियवादिनम् ।
शृणु राजीवपत्राक्ष यथा वृत्तं नरर्षभ ॥
रामः सीता च लक्ष्मणश्च सर्वे कुशलिनः सुखम् ।
यथा मया च सत्कारः कृतस्तेषां नरर्षभ ॥
यदा समुद्यतां सेनां दृष्ट्वा रामो महायशाः ।
उवाच वचनं रामो गुहमभ्यागतं तदा ॥
अरण्ये वसतां राज्ञां किं कार्यमुपपद्यते ।
इत्युक्त्वा राघवः श्रीमान् गुहं वचनमब्रवीत् ॥
गुह त्वं कुरु सेनाया अन्नपानं समन्ततः ।
यथाकालं यथायोगं यथाबलं यथावयः ॥
📖 भावार्थ : गुह ने प्रियवादी भरत से कहा, "हे राजीवलोचन (कमलनयन)! सुनिए कैसे वृत्तांत हुआ। राम, सीता और लक्ष्मण सभी कुशल और सुखी हैं। मैंने उनका यथोचित सत्कार किया। जब मैं सेना को एकत्रित देखकर राम के पास गया, तो उन महायशस्वी राम ने मुझसे कहा – वन में रहने वाले राजाओं (हमारे) के लिए क्या कर्तव्य है? ऐसा कहकर श्रीमान् राघव ने मुझसे आगे कहा – हे गुह! तुम इस सेना के लिए समय, योग्यता, बल और आयु के अनुसार सब ओर से अन्न-पान की व्यवस्था करो।"
🔍 व्याख्या : गुह ने राम के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। राम का यह कथन दर्शाता है कि वे कितने व्यावहारिक और प्रजावत्सल हैं।
॥ श्लोक १३-१६ ॥
ततोहं प्रत्यगृह्णं तद्वचनं रघुनन्दन ।
अन्नं च बहु सोढं च भक्ष्यं च विविधं बहु ॥
रामस्तु सीतया सार्धं लक्ष्मणेन च धीमता ।
उपविष्टो महार्हेषु विश्रान्तः सह तैस्तदा ॥
ततः कतिपयाहस्य रामो दाशरथिर्वनम् ।
प्रययौ सह वैदेह्या लक्ष्मणेन च धीमता ॥
इत्युक्त्वा भरतं गुहः प्ररुदन् वाक्यमब्रवीत् ।
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा वृत्तं नरर्षभ ॥
📖 भावार्थ : "हे रघुनन्दन! तब मैंने उनके वचन का पालन किया और बहुत सा अन्न, सूप और विविध भक्ष्य पदार्थ एकत्रित किए। तब राम सीता और धीमान लक्ष्मण के साथ बैठे और उन सबके साथ विश्राम किया। तत्पश्चात कुछ दिनों बाद दशरथपुत्र राम वैदेही और धीमान लक्ष्मण के साथ वन को चले गए।" ऐसा कहकर गुह रोते हुए भरत से बोले – "हे नरश्रेष्ठ! तुम्हें सब कुछ वैसा ही बता दिया जैसा घटित हुआ।"

💔 भरत का दुःख और रात्रि विश्राम (श्लोक १७-२४)

॥ श्लोक १७-२० ॥
तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं गुहस्य प्रियकर्मणः ।
भृशं दुःखपरीतात्मा विललाप सुदुःखितः ॥
हा राम भ्रातः सीते च हा लक्ष्मण सुदुःखितः ।
इति विलप्य बहुधा निपपात महीतले ॥
तमुत्थाप्य गुहो वाक्यं शत्रुघ्नश्च महाबलः ।
आश्वासयामास तदा भरतं शोककर्शितम् ॥
भरतः शोकसंतप्तो गुहं वचनमब्रवीत् ।
आनयिष्ये पुन रामं न चेद्यास्यामि जीवितुम् ॥
📖 भावार्थ : प्रिय कर्म करने वाले गुह के उन वचनों को सुनकर भरत अत्यन्त दुःख से परिपूर्ण हो गए और बहुत विलाप किया – "हा राम भ्राता! हा सीते! हा लक्ष्मण! मैं अत्यन्त दुःखी हूँ।" इस प्रकार बहुत विलाप करके वे भूमि पर गिर पड़े। तब गुह और महाबली शत्रुघ्न ने उन्हें उठाया और शोक से कृश हुए भरत को सांत्वना दी। शोक से संतप्त भरत ने गुह से कहा, "मैं राम को वापस लाऊँगा, नहीं तो जीवित नहीं रहूँगा।"
🔍 व्याख्या : भरत का यह दृढ़ संकल्प उनके राम के प्रति अनन्य प्रेम और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
॥ श्लोक २१-२४ ॥
ततः स रजनीं तत्र गुहेन सह भारत ।
उवास नियतः श्रीमान् शत्रुघ्नसहितस्तदा ॥
प्रभाते तु गुरुं वशिष्ठं पूजयित्वा विधानतः ।
गङ्गामुत्तीर्य धर्मात्मा जगाम सह सेनया ॥
इत्येष वः समाख्यातः सर्गः षट्चत्वारिंशः प्रियः ।
भरतस्य गुहेनाथ संवादो धर्मवर्धनः ॥
शृण्वन् पठन् च यो नित्यं भरतस्य व्रतं महत् ।
प्राप्नोति परमं लोकं रामभक्तिं च शाश्वतीम् ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात श्रीमान भरत वहाँ गुह के साथ शत्रुघ्न सहित नियमपूर्वक रात्रि को रुके। प्रभात में उन्होंने गुरु वशिष्ठ की विधिवत् पूजा की और गंगा पार करके सेना सहित आगे बढ़े। इस प्रकार आपको भरत और गुह का यह धर्मवर्धक संवाद कहा गया। जो नित्य इस महान व्रत (भरत के व्रत) को सुनता या पढ़ता है, वह परम लोक को प्राप्त करता है और राम की शाश्वत भक्ति पाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 गुह का चरित्र

गुह, निषाद जाति के होते हुए भी, धर्म और मर्यादा के प्रति अद्भुत निष्ठा रखते हैं। वे राम के परम भक्त हैं और भरत में भी वही गुण देख उनका आदर करते हैं। यह दर्शाता है कि रामायण में जाति नहीं, गुण प्रधान है।

👬 भरत का आदर्श प्रेम

भरत का राम के लिए विलाप और उन्हें लौटाने का दृढ़ संकल्प, भ्रातृप्रेम का परम उदाहरण है। वे राम के वनगमन को अपना ही दुःख मानते हैं और उनके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते।

🙏 मर्यादा का पालन

भरत ने गंगा पार करने से पूर्व गुरु वशिष्ठ की आज्ञा ली और विधिपूर्वक पूजा की। यह उनकी विनम्रता और मर्यादा के प्रति आग्रह को प्रदर्शित करता है।

🌊 गंगा का महत्व

गंगा को पार करना यहाँ एक महत्वपूर्ण संक्रमण बिंदु है। यह अयोध्या के राजसी जीवन से वन के तपस्वी जीवन की ओर का प्रतीकात्मक मार्ग है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें भ्रातृप्रेम, कर्तव्यपरायणता और विनम्रता की शिक्षा मिलती है। गुह और भरत दोनों ही राम के प्रति अपने प्रेम में एक समान हैं, फिर भी अपने-अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं। हमें अपने प्रियजनों के प्रति ऐसा ही समर्पण और उनके कल्याण की चिंता करनी चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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