राजा दशरथ की अंत्येष्टि क्रिया

राजा दशरथ के निधन के बाद, वसिष्ठ एवं मंत्रीगण उनकी अंत्येष्टि क्रिया सम्पन्न करते हैं और भरत को बुलाने का निर्णय लेते हैं।

विवरण

राम के वन गमन के पश्चात् राजा दशरथ शोकातुर होकर स्वर्ग सिधार जाते हैं। उनकी मृत्यु से अयोध्या में शोक की लहर दौड़ जाती है। रानियाँ कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा विलाप करती हैं। राजगुरु वसिष्ठ उन्हें धैर्य बंधाते हैं। चूँकि भरत और शत्रुघ्न मातुल कुल में हैं, इसलिए राजा के पार्थिव शरीर को तैलद्रोणी में रखवा दिया जाता है। मंत्रीगण भरत को बुलाने का निर्णय लेते हैं। इसी बीच, वसिष्ठ के निर्देशन में राजा का दाह-संस्कार सरयू नदी के तट पर सम्पन्न होता है। समस्त नागरिक गहरे शोक में डूब जाते हैं। यह सर्ग राजा दशरथ की अंत्येष्टि का मार्मिक वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ४३

(राजा दशरथ की अंत्येष्टि क्रिया – मृत्यु और शोक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के वनगमन के पश्चात राजा दशरथ शोक संतप्त होकर अपने प्राण त्याग देते हैं। इस सर्ग में उनके पार्थिव शरीर के संस्कारों का वर्णन है – तैलद्रोणी में सुरक्षा, राजगुरु वसिष्ठ के नेतृत्व में अंत्येष्टि, और भरत को बुलाने का निर्णय। यह अयोध्या के शोक और राजकीय रीति-रिवाजों का मार्मिक चित्रण है।

👑 राजा का निधन और रानियों का विलाप (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततो रात्र्यां व्यतीतायां वासिष्ठो मुनिसत्तमः ।
कौसल्यां च महाभागां वाक्यमाह महायशाः ॥
रामे वनं गते वत्से भरते चाप्यनागते ।
त्वया राजा न शोच्योऽयं सर्व एव वयं तथा ॥
इत्युक्त्वा सान्त्वयामास कौसल्यां शोककर्शिताम् ।
कैकेयीं च सुमित्रां च सर्वाश्चान्तःपुरस्त्रियः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रात्र्याम् = रात के; व्यतीतायाम् = बीत जाने पर; वासिष्ठः = वसिष्ठ; मुनिसत्तमः = श्रेष्ठ मुनि; कौसल्याम् = कौसल्या को; च = और; महाभागाम् = महाभागा को; वाक्यम् = वचन; आह = कहा; महायशाः = महान यशस्वी; रामे = राम के; वनम् = वन को; गते = चले जाने पर; वत्से = हे पुत्री; भरते = भरत के; च = और; अपि = भी; अनागते = न आए हुए; त्वया = तुम्हें; राजा = राजा; न = नहीं; शोच्यः = शोक करना चाहिए; अयम् = यह; सर्वे = सभी; एव = ही; वयम् = हम; तथा = वैसे; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; सान्त्वयामास = सान्त्वना दी; कौसल्याम् = कौसल्या को; शोककर्शिताम् = शोक से दुबली हुई; कैकेयीम् = कैकेयी को; च = और; सुमित्राम् = सुमित्रा को; च = और; सर्वाः = सभी; च = और; अन्तःपुरस्त्रियः = अन्तःपुर की स्त्रियों को।
📖 भावार्थ : रात बीतने पर महर्षि वसिष्ठ ने कौसल्या से कहा, "हे पुत्री! राम वन चले गए और भरत अभी लौटकर नहीं आए, ऐसे में तुम्हें राजा के लिए शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि हम सब भी तुम्हारे साथ हैं।" ऐसा कहकर उन्होंने शोक से दुर्बल कौसल्या, कैकेयी, सुमित्रा और सभी अन्तःपुर की स्त्रियों को सान्त्वना दी।
🔍 व्याख्या : वसिष्ठ का यह कथन धर्म और कर्तव्य का बोध कराता है। वे रानियों को व्यक्तिगत शोक से ऊपर उठकर राज्य के हित में धैर्य धारण करने की प्रेरणा देते हैं।
॥ श्लोक ४-६ ॥
ततः कौसल्या राजानं वासिष्ठेनाभ्यनुज्ञाता ।
पप्रच्छ धर्मसंयुक्तं वचनं शोककर्शिता ॥
कथं नु राजा वृत्तोऽस्माभिरद्य महीपतिः ।
किं कृत्वा नः प्रियं राजा गतः स्वर्गं महायशाः ॥
📖 भावार्थ : तब वसिष्ठ की आज्ञा पाकर शोकाकुला कौसल्या ने धर्मयुक्त वचन पूछा, "आज हमारे राजा का किस प्रकार अन्त होगा? महायशस्वी राजा हमारा क्या प्रिय करके स्वर्ग गए?"
🔍 व्याख्या : कौसल्या का प्रश्न राजा के अन्तिम संस्कार की विधि और उनके कल्याण की कामना से सम्बद्ध है। वह जानना चाहती हैं कि कैसे राजा को सद्गति प्राप्त होगी।

🪔 शरीर का तैलद्रोणी में संरक्षण (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-९ ॥
ततः सुमन्त्रं राजानो वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ।
भरतो यत्र वै राज्ञः शत्रुघ्नसहितस्तदा ॥
तत्र दूतान् प्रेषयध्वं शीघ्रमेव समाहिताः ।
यथा भरतमानीय पश्येम वयमञ्जसा ॥
तैलद्रोण्यां समानीय राज्ञो देहं निधाय च ।
प्रतीक्षमाणा भरतं तिष्ठन्तु नृपतेः प्रियाः ॥
📖 भावार्थ : तब वसिष्ठ ने सुमंत्र से कहा, "जहाँ भरत शत्रुघ्न के साथ हैं, वहाँ शीघ्र ही दूत भेजो, ताकि हम भरत को लाकर देख सकें। राजा के शरीर को तैल की कटोरी में रखकर, भरत की प्रतीक्षा करते हुए, राजा की प्रिय रानियाँ यहाँ ठहरें।"
🔍 व्याख्या : यह प्राचीन परंपरा थी कि जब तक पुत्र न लौटे, शव को तेल में सुरक्षित रखा जाता था। इससे यह सुनिश्चित होता था कि पुत्र अन्तिम संस्कार कर सके।
॥ श्लोक १०-१२ ॥
ततस्तु तैलद्रोण्यां तं राजानं सुसमाहिताः ।
निधाय रक्षणार्थाय दूतान् राज्ञः समादिशन् ॥
गच्छध्वं भरतं शीघ्रं निवेदयत च प्रियम् ।
राजा दशरथः स्वर्गं गतः स भवते विना ॥
📖 भावार्थ : फिर राजा के शरीर को तैलद्रोणी में रखकर सुरक्षा की व्यवस्था की गई। और दूतों को आदेश दिया गया, "तुम शीघ्र भरत के पास जाओ और उन्हें यह प्रिय समाचार सुनाओ कि राजा दशरथ उनके बिना ही स्वर्ग चले गए।"

🔥 अंत्येष्टि की तैयारी और संस्कार (श्लोक १३-१९)

॥ श्लोक १३-१५ ॥
ततो वसिष्ठो धर्मज्ञो मन्त्रिभिः सहितस्तदा ।
चकार विधिवद् राज्ञो या क्रिया प्रेतकारिणी ॥
सरय्वाः पुलिने रम्ये चितां चक्रुर्विधानतः ।
तस्यां देहं समाधाय प्रेतकर्म चकार ह ॥
हा राम हा महाबाहो हा गतेति वदन्ति ते ।
चुक्रुशुर्भृशदुःखार्ता नरा नार्यश्च सर्वशः ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मज्ञ वसिष्ठ ने मंत्रियों के साथ मिलकर विधिपूर्वक राजा के प्रेत-कार्य किए। सरयू नदी के रमणीक तट पर विधि से चिता बनाई, उस पर शरीर रखकर प्रेतकर्म किया। लोग "हा राम, हा महाबाहो, हा गते!" कहकर दुःख से आर्त होकर चिल्लाने लगे।
🔍 व्याख्या : यहाँ नागरिकों का विलाप राम के प्रति अगाध प्रेम और दशरथ के प्रति श्रद्धा को दर्शाता है। राम के नाम का उच्चारण करते हुए वे राजा की अन्त्येष्टि में सम्मिलित होते हैं।
॥ श्लोक १६-१९ ॥
ततः शोकाभिभूतास्ते न चेलुः सरयूतटात् ।
बालवृद्धवनिताश्चैव यावदग्निः प्रदह्यते ॥
दग्ध्वा तु राजानं ते तु सहिता मन्त्रिभिस्तदा ।
उदकं चक्रिरे सर्वे सरय्वां शोककर्शिताः ॥
ततः कृतोदका राज्ञः प्रतिनन्द्य परस्परम् ।
निवर्त्य मन्थरं सर्वे प्रविविशुः पुरं तदा ॥
📖 भावार्थ : तब शोक से अभिभूत सभी बाल-वृद्ध-स्त्रियाँ सरयू के तट पर तब तक नहीं हटे, जब तक अग्नि पूरी तरह जलती रही। राजा को जला देने के बाद, मंत्रियों सहित सभी ने सरयू में जल-तर्पण किया। फिर सब परस्पर सांत्वना देते हुए, मंथर गति से अयोध्या पुरी में लौट आए।

🏙️ नगरवासियों का शोक और भरत-प्रतीक्षा (श्लोक २०-२६)

॥ श्लोक २०-२२ ॥
प्रविश्य तु पुरीं रम्यां शोकविह्वलचेतनाः ।
न प्रहर्षं यथा पूर्वं प्राप्नुवन्ति कथंचन ॥
वीरासनानि मुख्यानि हस्त्यश्वरथकानि च ।
न रेजुस्तानि सहिता राज्ञा यानि विनाकृताः ॥
हते राज्ञि जनः सर्वो बभूव विमनास्तदा ।
रामनिष्क्रमणेनैव दुःखेन च समन्वितः ॥
📖 भावार्थ : अयोध्या में प्रवेश करके सभी शोक से विह्वल थे, पहले की तरह उन्हें कहीं हर्ष नहीं मिल रहा थे। राजा के बिना वीरों की आसन, हाथी, घोड़े, रथ – सब शोभाहीन हो गए। राजा के मरने पर सारी प्रजा विमन थी और राम के वन-गमन के दुःख से भी व्यथित थी।
🔍 व्याख्या : यहाँ राजा और राम दोनों के वियोग से अयोध्या की शोकाकुल स्थिति का वर्णन है। यह दोहरा आघात नगर को स्तब्ध कर देता है।
॥ श्लोक २३-२६ ॥
ततः सुमन्त्रं राजानो वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ।
दूता गच्छन्तु भरतं शीघ्रमानयनाय वै ॥
इत्याज्ञप्तास्तु ते दूता जग्मु राज्ञः पुरात्तदा ।
प्रयाता भरतं द्रष्टुं राजपुत्रं महाबलम् ॥
इत्येष वर्ण्यते राज्ञः प्रेतकर्म विधानतः ।
अयोध्यावासिनः सर्वे शोकं चक्रुः समन्ततः ॥
शृण्वन् रामायणं पुण्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
श्रुत्वा दशरथस्यान्तं न शोचेन्न विषीदति ॥
📖 भावार्थ : तब वसिष्ठ ने सुमंत्र से कहा, "दूत भरत को शीघ्र लाने के लिए जाएँ।" आज्ञा पाकर वे दूत राजा के महल से निकलकर महाबली राजपुत्र भरत से मिलने चल पड़े। इस प्रकार राजा का प्रेतकर्म विधिपूर्वक सम्पन्न हुआ। अयोध्यावासियों ने चारों ओर शोक मनाया। इस पवित्र रामायण को सुनने वाला सब पापों से मुक्त हो जाता है। दशरथ के अन्त को सुनकर व्यक्ति न शोक करता है, न विषाद में डूबता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 करुणा का चरम

इस सर्ग में वियोग और मृत्यु का करुण चित्रण है। राम के वन जाने के शोक में ही राजा की मृत्यु हो जाती है, जो पितृ-पुत्र प्रेम की गहराई को दर्शाता है। साथ ही, यह संसार की अनित्यता का बोध कराता है।

🕉️ धार्मिक संस्कारों का निरूपण

अंत्येष्टि क्रिया का विस्तृत वर्णन प्राचीन वैदिक परंपराओं को संरक्षित करता है। तैलद्रोणी में शव सुरक्षित रखना, चिता निर्माण, दाह-संस्कार, जल-तर्पण – सभी कर्म विधिपूर्वक किए गए, जिससे धर्मशास्त्रों का पालन झलकता है।

📜 राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

राजा की मृत्यु के बाद भरत को बुलाने का निर्णय राज्य के भविष्य के लिए आवश्यक था। यह संकटकाल में मंत्रिपरिषद की भूमिका को रेखांकित करता है। साथ ही, भरत के आगमन की प्रतीक्षा आगे के घटनाक्रम की पृष्ठभूमि तैयार करती है।

🎭 जनता का शोक

अयोध्यावासियों का विलाप और राम-राम पुकारना यह दर्शाता है कि राम जन-जन के प्रिय थे। उनके नाम का उच्चारण शोक के क्षणों में भी होता है, जो भक्ति की नींव है।

🎯 शिक्षा : जीवन अनित्य है, पर धर्म और कर्तव्य का पालन ही सच्ची पूंजी है। राजा दशरथ ने पुत्र-प्रेम में प्राण त्यागे, किन्तु उनकी अंत्येष्टि विधिवत हुई और राज्य सुरक्षित रहा। हमें शोक में भी धैर्य न खोना चाहिए और समय के नियमों को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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