भरत द्वारा राम को लौटाने का निश्चय

भरत जब अयोध्या लौटे और राम के वनवास का समाचार पाया, तो वे अत्यन्त दुःखी हुए। उन्होंने कैकेयी को धिक्कारा और राम को वापस लाने का दृढ़ निश्चय किया। वे माताओं और मंत्रियों के साथ चित्रकूट पहुँचकर राम से अयोध्या लौटने का आग्रह करते हैं।

विवरण

यह सर्ग भरत के चित्रकूट में राम से मिलने और उन्हें वापस बुलाने के प्रयास का वर्णन करता है। भरत, माता कैकेयी के षड्यंत्र से अनभिज्ञ, जब वापस अयोध्या आए और राम के वनवास तथा पिता की मृत्यु का समाचार सुना, तो वे शोक और क्रोध से भर गए। उन्होंने कैकेयी को कठोर शब्दों में धिक्कारा और राज्य को त्यागने का निश्चय किया। फिर वे राम को वापस लाने के लिए वन की ओर चल पड़े। चित्रकूट पहुँचकर उन्होंने राम को देखा और उनके चरणों में गिरकर अयोध्या लौटने की प्रार्थना की। राम ने धर्म और पिता की आज्ञा का पालन करने की बात कहकर लौटने से मना कर दिया। भरत ने बहुत प्रयास किया, किंतु राम अडिग रहे। अंत में भरत ने राम की पादुकाएँ लेकर अयोध्या लौटने और उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य करने का निश्चय किया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ४२

(भरत-राम संवाद : लौटने का निश्चय)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात् भरत मातुल के यहाँ से अयोध्या लौटते हैं। माता कैकेयी से राम के वनवास और पिता की मृत्यु का कारण सुनकर वे शोक एवं क्रोध से व्याकुल हो उठते हैं। वे तुरंत राम को वापस लाने का निश्चय करते हैं और समस्त राज-परिवार एवं मंत्रियों के साथ चित्रकूट के लिए प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग उसी मार्मिक मिलन और भरत के अटल निश्चय का वर्णन करता है।

🌲 चित्रकूट में भरत का प्रवेश (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रयाते भरते चित्रकूटं दिदृक्षया ।
न्यवेदयत सुमन्त्रस्तद्रामाय महात्मने ॥
रामस्तु भरतं दृष्ट्वा दूरादेव समागतम् ।
लक्ष्मणं चाब्रवीद्वाक्यं सीतां च मधुरस्वरः ॥
अयं स भरतो भ्राता मातुलायतनादितः ।
आगतः किमियं सेना त्वरयेवाभिवर्तते ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रयाते = जाते हुए; भरते = भरत के; चित्रकूटम् = चित्रकूट को; दिदृक्षया = देखने की इच्छा से; न्यवेदयत = समाचार दिया; सुमन्त्रः = सुमंत्र ने; तत् = वह; रामाय = राम को; महात्मने = महात्मा को; रामः = राम; तु = तो; भरतम् = भरत को; दृष्ट्वा = देखकर; दूरात् = दूर से; एव = ही; समागतम् = आए हुए; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; च = और; अब्रवीत् = बोले; वाक्यम् = वचन; सीताम् = सीता को; च = और; मधुरस्वरः = मधुर स्वर में; अयम् = यह; सः = वह; भरतः = भरत; भ्राता = भाई; मातुलायतनात् = मामा के घर से; इति = इस प्रकार; आगतः = आए हैं; किम् = क्या; इयम् = यह; सेना = सेना; त्वरया = शीघ्रता से; इव = जैसे; अभिवर्तते = आ रही है।
📖 भावार्थ : जब भरत चित्रकूट को देखने की इच्छा से आगे बढ़े, तब सुमंत्र ने जाकर महात्मा राम को उनके आगमन का समाचार दिया। राम ने दूर से ही आते हुए भरत को देखकर लक्ष्मण और सीता से मधुर स्वर में कहा, "यह हमारे भाई भरत हैं जो मामा के घर से आ रहे हैं। परंतु यह सेना इतनी शीघ्रता से क्यों आ रही है?"

🤝 भरत-राम मिलन (श्लोक ७-१५)

॥ श्लोक ७-१२ ॥
ततो भरतः सम्प्रेक्ष्य रामं दीर्घभुजं स्थितम् ।
अभ्यधावत दुःखार्तः स्नेहादश्रुपरिप्लुतः ॥
रामोऽपि भरतं दृष्ट्वा द्रुतमभ्यापतन्तम ।
प्रत्युत्थाय सहस्राक्षो विष्णुः वैकुण्ठमागतम् ॥
परिष्वज्य च बाहुभ्यां बाष्पव्याकुललोचनः ।
उपाविशच्च धर्मज्ञो धर्म्यमासनमुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : तब भरत ने दीर्घबाहु राम को स्थित देखकर दुःख से आर्त और स्नेह से अश्रुपूरित होकर उनकी ओर दौड़े। राम भी भरत को शीघ्र आते देखकर उठ खड़े हुए, जैसे सहस्राक्ष इन्द्र आए हुए विष्णु के लिए उठते हैं। फिर दोनों ने बाहों में परस्पर गले लगाया और उनके नेत्र अश्रुओं से व्याकुल हो गए। तत्पश्चात धर्मज्ञ राम उत्तम आसन पर बैठे।
🔍 व्याख्या : भरत का यह मिलन अत्यन्त भावुकतापूर्ण है। भरत को माता की कुटिलता का ज्ञान है, इसलिए उनकी व्यथा अधिक है।

🗣️ भरत का आग्रह और राम का उत्तर (श्लोक १६-२८)

॥ श्लोक १६-२१ ॥
भरतस्तु ततः प्रह्वः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।
त्वया हीनो नरव्याघ्र राज्येन न च कामये ॥
प्रसीद भरतं राम मयि धर्मं निवेशय ।
अहं त्वामनुगच्छामि यत्र यत्र गमिष्यसि ॥
इमाः प्रकृतयः सर्वा राज्ञश्चास्य महात्मनः ।
तव चैवानुगच्छन्ति मातरश्च तपस्विनः ॥
📖 भार्थ : तब भरत ने हाथ जोड़कर विनीत भाव से कहा, "हे नरव्याघ्र! आपसे रहित मैं राज्य की इच्छा नहीं करता। हे राम! मुझ भरत पर कृपा करें, मुझे धर्म में स्थापित करें। आप जहाँ जाएँगे, मैं भी आपके पीछे-पीछे चलूँगा। ये समस्त प्रकृतिजन और महात्मा राजा की माताएँ भी आपके साथ आ रही हैं।"
॥ श्लोक २२-२८ ॥
रामस्तु धर्ममास्थाय पितुर्वाक्यमनुस्मरन् ।
प्रत्युवाच ततो भरतं धर्मज्ञो धर्मसंहितम् ॥
न शक्यं पितुरादेशं प्रमाद्यितुमहं प्रभो ।
सत्येन ते शपे भरत नान्यद्वक्ष्यामि कर्हिचित् ॥
यावद्भूमिर्धरिष्यामि तावद्वत्स्यामि कानने ।
इति मे निश्चयो भ्रातस्त्वं राज्यं प्रशाधि ह ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने पिता के वचनों का स्मरण करते हुए धर्म का आश्रय लेकर भरत को धर्मयुक्त उत्तर दिया, "हे प्रभो! मैं पिता की आज्ञा की उपेक्षा नहीं कर सकता। हे भरत! मैं तुमसे सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ – जब तक पृथ्वी धारण करेगी, तब तक मैं वन में निवास करूँगा। यह मेरा निश्चय है। तुम राज्य का शासन करो।"

👣 भरत का निश्चय और पादुका ग्रहण (श्लोक २९-३५)

॥ श्लोक २९-३५ ॥
ततः भरतः संरम्भात्पुनः प्रोवाच राघवम् ।
यदि त्वं दाशरथे राज्यं न प्रतिच्छसि धर्मतः ॥
आज्ञापय मया कार्यं किं करोमि तवानघ ।
इमे हि ते पादुके स्वर्णचित्रे मया धृते ॥
एते राज्ये नियोक्तव्ये भविष्यतस्तवाज्ञया ।
एवमुक्त्वा तु ते पादुके प्रतिगृह्याभिवाद्य च ॥
भरतः शिरसा कृत्वा प्रतस्थे नगरं प्रति ।
📖 भावार्थ : तब भरत ने पुनः राघव से कहा, "यदि आप धर्मपूर्वक राज्य ग्रहण नहीं करते, तो आज्ञा दीजिए कि मैं आपके लिए क्या करूँ? ये आपकी स्वर्ण-खचित पादुकाएँ मेरे द्वारा धारण की गई हैं। आपकी आज्ञा से ये राज्य पर नियुक्त होंगी।" ऐसा कहकर भरत ने उन पादुकाओं को प्रणाम किया और सिर पर धारण कर नगर की ओर प्रस्थान किया।
🔍 व्याख्या : भरत ने राम के चरण-चिह्नों को ही राज-चिह्न मान लिया। यह भारतीय संस्कृति में प्रतीक-पूजा और भ्रातृप्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙏 भरत का त्याग

इस सर्ग में भरत का सर्वोच्च बलिदान दिखता है। वे राज्य को तुच्छ समझकर केवल राम के सान्निध्य की कामना करते हैं। यह त्याग और भ्रातृप्रेम भरत को रामायण का एक आदर्श पात्र बनाता है।

📜 राम की प्रतिज्ञा

राम का पितृवाक्य पर अडिग रहना धर्म के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है। वे सुख-सुविधाओं के लोभ में नहीं पड़ते, बल्कि सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलते हैं।

👞 पादुका प्रसंग

पादुकाओं को राज्य पर आसीन करना यह सूचित करता है कि भरत ने राम को ही सच्चा राजा माना। वे केवल प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाना स्वीकार करते हैं।

💧 करुण रस

यह सम्पूर्ण सर्ग करुण रस से परिपूर्ण है। माताओं का विलाप, भरत का दुःख, और राम का वैराग्य – सब मिलकर हृदय को द्रवित कर देते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा प्रेम और धर्म सदैव स्वार्थ से ऊपर होते हैं। भरत का त्याग और राम की प्रतिज्ञा हमें जीवन में कर्तव्यपालन और भाईचारे का महत्व सिखाते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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