भरत और शत्रुघ्न का अयोध्या लौटना
भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल से लौटते हैं और अयोध्या को उदास एवं सूनी पाते हैं। वे राजमहल में प्रवेश कर माताओं से मिलते हैं और राम के वनवास तथा राजा दशरथ के स्वर्गवास का दुःखद समाचार सुनते हैं।
विवरण
यह सर्ग अयोध्या के वियोग और शोक का मार्मिक चित्रण करता है। भरत एवं शत्रुघ्न जब अपने मामा के घर से लौटते हैं, तो नगरी सूनी और पुरी प्रजा विषण्ण दिखाई देती है। राजमहल में प्रवेश करने पर वे अपनी माताओं को रुदन करते हुए पाते हैं। सर्वप्रथम वे माता कौशल्या से मिलते हैं, जो उन्हें राम के वनवास और राजा दशरथ की मृत्यु का समाचार सुनाती हैं। इसके पश्चात भरत अपनी माता कैकेयी के पास जाते हैं। कैकेयी प्रसन्नतापूर्वक उन्हें राम के वनगमन और उनके स्वयं के राज्याभिषेक की बात बताती हैं, जिससे भरत अत्यन्त क्रोधित और दुःखी होते हैं। वे कैकेयी की निन्दा करते हैं और राम को वापस लाने का दृढ़ संकल्प लेते हैं। यह सर्ग भरत के चरित्र की महानता और राम के प्रति उनके अटूट प्रेम को उजागर करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ३७
(भरत और शत्रुघ्न का अयोध्या लौटना – आगमन और शोक)
🔆 प्रस्तावना : राम के वनगमन और राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात अयोध्या शोकाकुल है। इसी बीच भरत और शत्रुघ्न अपने मामा के यहाँ से लौटते हैं। नगरी की दुर्दशा देख वे चिंतित हो उठते हैं। राजमहल में प्रवेश कर वे माताओं से मिलते हैं और क्रमशः राम के वनवास और पिता की मृत्यु का समाचार सुनते हैं। यह सर्ग उनके हृदय में उठे शोक, आश्चर्य और क्रोध का अद्भुत चित्रण करता है।
🚩 भरत-शत्रुघ्न का अयोध्या आगमन (श्लोक १-८)
शत्रुघ्नसहितो वीरः पुरीं कोशलवासिनीम् ॥
स राजमार्गमासाद्य ददर्श विजनं तदा ।
नष्टचन्द्रामिव रात्रिं गतसत्त्वामिव स्त्रियम् ॥
ददर्श भरतः शून्यां पितुर्वेश्म तदा प्रियाम् ॥
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भरतः शत्रुघ्नसहितः ।
प्रविवेश गृहं शून्यं ददर्श च पितुः क्षयम् ॥
🏰 राजमहल में प्रवेश और माताओं से भेंट (श्लोक ९-१८)
अभिवाद्य च भरतः पप्रच्छ कुशलं तदा ॥
सा तं दृष्ट्वैव भरतं बाष्पपूर्णेक्षणा तदा ।
न शशाक वचः कर्तुं बाष्पोपहतया गिरा ॥
रामो वनं गतः पुत्र लक्ष्मणेन सहानुजः ॥
पिता ते निधनं प्राप्तः शोकेन महता वृतः ।
रामस्य व्यसनं श्रुत्वा सत्यधर्मपरायणः ॥
ददर्श शोकसंतप्तां वैदेहीमिव दुःखिताम् ॥
सा चैनं बाष्पपूर्णाक्षी प्रत्यगृह्णाद्वराङ्गना ।
शत्रुघ्नं च परिष्वज्य रुरोद भृशदुःखिता ॥
🔥 भरत का कैकेयी से संवाद और क्रोध (श्लोक १९-३०)
प्रत्यगृह्णाद्यथान्यायं हर्षेण महता युता ॥
सा तु पुत्रमुपासीनमुवाच वचनं शुभम् ।
राज्यं त्वमिह भुङ्क्ष्वाद्य यथार्थं पितुराज्ञया ॥
उवाच परमक्रुद्धो मातरं मातृवत्सलः ॥
किमिदं कृतवत्यस्मि यन्मे राज्यं प्रदीयते ।
किं वा पापमहं कुर्यां येन मां नाभिषेचयेत् ॥
पित्रा ते राममुद्दिश्य दत्तो राज्यं सनातनम् ॥
स तु वनं गतो रामः प्रतिज्ञां पालयन् पितुः ।
त्वं च राज्यमिदं प्राप्तो वरदानेन मे सुत ॥
उवाच परमामर्षी धिग्बलं राज्यकाम्यया ॥
न त्वं माता न चैवासि कुलघ्नी पापनिश्चया ।
यया रामो वनं दुष्ट प्रेषितो धर्मवत्सलः ॥
⚡ भरत का संकल्प और निष्कर्ष (श्लोक ३१-३४)
विना रामं महाप्राज्ञं पितरं च तपोधनम् ॥
गमिष्यामि वनं क्षिप्रं यत्र रामो महाद्युतिः ।
तमानयिष्ये धर्मज्ञं राज्यं चास्मै प्रदास्यति ॥
निश्चक्राम गृहात्तूर्णं मातुर्वचनगौरवात् ॥
ततः समेत्य मन्त्रिभ्यो वसिष्ठाय च धीमते ।
शशंस सकलं वृत्तं रामवन्धुवियोगजम् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 भरत का आदर्श चरित्र
इस सर्ग में भरत का मातृभक्त और धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व उभरकर आता है। वे अपनी माता के कुकर्म से घृणा करते हैं, फिर भी उनका सत्कार करते हैं। राज्य का लोभ त्यागकर वे राम के प्रति अपने अटूट प्रेम और कर्तव्य का निर्वाह करते हैं।
💔 शोक और धर्म का संघर्ष
अयोध्या की सूनी दशा, माताओं का रुदन, पिता का देहावसान – सब भरत के हृदय को विदीर्ण कर देते हैं। किन्तु वे धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होते। यह सर्ग बताता है कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म की रक्षा करनी चाहिए।
🤱 कैकेयी का पश्चात्ताप?
हालाँकि इस सर्ग में कैकेयी प्रसन्न दिखती है, परन्तु भरत के तिरस्कार से उसे अपनी भूल का आभास होता है। यह एक माता के रूप में उसके पतन का चित्रण है, जो आगे चलकर उसके पश्चात्ताप का कारण बनेगा।
🌳 वन की ओर प्रस्थान का संकल्प
भरत का वन जाने का निश्चय राम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति को दर्शाता है। यह आगामी घटनाओं की भूमिका तैयार करता है – भरत का राम से मिलना और उनके पादुकाओं का राज्याभिषेक।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा पुत्र वही है जो माता-पिता के अधर्मपूर्ण कार्यों का समर्थन न करे। भरत की तरह हमें भी सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए, चाहे वह हमारे अपनों के विरुद्ध ही क्यों न जाए। धर्म ही सर्वोपरि है।