🕉️ अयोध्या काण्ड · सर्ग 37

भरत और शत्रुघ्न का अयोध्या लौटना

भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल से लौटते हैं और अयोध्या को उदास एवं सूनी पाते हैं। वे राजमहल में प्रवेश कर माताओं से मिलते हैं और राम के वनवास तथा राजा दशरथ के स्वर्गवास का दुःखद समाचार सुनते हैं।

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37 सर्ग संख्या
33 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल से लौटते हैं और अयोध्या को उदास एवं सूनी पाते हैं। वे राजमहल में प्रवेश कर माताओं से मिलते हैं और राम के वनवास तथा राजा दशरथ के स्वर्गवास का दुःखद समाचार सुनते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

यह सर्ग अयोध्या के वियोग और शोक का मार्मिक चित्रण करता है। भरत एवं शत्रुघ्न जब अपने मामा के घर से लौटते हैं, तो नगरी सूनी और पुरी प्रजा विषण्ण दिखाई देती है। राजमहल में प्रवेश करने पर वे अपनी माताओं को रुदन करते हुए पाते हैं। सर्वप्रथम वे माता कौशल्या से मिलते हैं, जो उन्हें राम के वनवास और राजा दशरथ की मृत्यु का समाचार सुनाती हैं। इसके पश्चात भरत अपनी माता कैकेयी के पास जाते हैं। कैकेयी प्रसन्नतापूर्वक उन्हें राम के वनगमन और उनके स्वयं के राज्याभिषेक की बात बताती हैं, जिससे भरत अत्यन्त क्रोधित और दुःखी होते हैं। वे कैकेयी की निन्दा करते हैं और राम को वापस लाने का दृढ़ संकल्प लेते हैं। यह सर्ग भरत के चरित्र की महानता और राम के प्रति उनके अटूट प्रेम को उजागर करता है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ३७

(भरत और शत्रुघ्न का अयोध्या लौटना – आगमन और शोक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के वनगमन और राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात अयोध्या शोकाकुल है। इसी बीच भरत और शत्रुघ्न अपने मामा के यहाँ से लौटते हैं। नगरी की दुर्दशा देख वे चिंतित हो उठते हैं। राजमहल में प्रवेश कर वे माताओं से मिलते हैं और क्रमशः राम के वनवास और पिता की मृत्यु का समाचार सुनते हैं। यह सर्ग उनके हृदय में उठे शोक, आश्चर्य और क्रोध का अद्भुत चित्रण करता है।

🚩 भरत-शत्रुघ्न का अयोध्या आगमन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततो भरतः संप्राप्तो यानेन रथवर्येण ।
शत्रुघ्नसहितो वीरः पुरीं कोशलवासिनीम् ॥
स राजमार्गमासाद्य ददर्श विजनं तदा ।
नष्टचन्द्रामिव रात्रिं गतसत्त्वामिव स्त्रियम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; भरतः = भरत; संप्राप्तः = आ पहुँचे; यानेन = वाहन से; रथवर्येण = उत्तम रथ द्वारा; शत्रुघ्नसहितः = शत्रुघ्न सहित; वीरः = वीर; पुरीम् = नगरी; कोशलवासिनीम् = कोशल (अयोध्या) में बसी हुई; सः = उन्होंने; राजमार्गम् = राजपथ को; आसाद्य = पाकर; ददर्श = देखा; विजनम् = सुनसान; तदा = तब; नष्टचन्द्राम् = बिना चन्द्रमा की; इव = जैसे; रात्रिम् = रात; गतसत्त्वाम् = शक्तिहीन; इव = जैसे; स्त्रियम् = स्त्री।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् भरत अपने उत्तम रथ पर सवार होकर शत्रुघ्न सहित अयोध्या नगरी में आए। राजमार्ग पर आने पर उन्होंने देखा कि सम्पूर्ण मार्ग सुनसान पड़ा है, मानो चन्द्रमा से रहित रात्रि हो या शक्तिहीन स्त्री।
🔍 व्याख्या : अयोध्या की यह सूनी दशा देख भरत के मन में आशंका उत्पन्न होती है कि कुछ अनिष्ट हुआ है।
॥ श्लोक ३-४ ॥
न प्रहृष्टजनो हर्षान्नृत्यगीतादिकः पुरे ।
ददर्श भरतः शून्यां पितुर्वेश्म तदा प्रियाम् ॥
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भरतः शत्रुघ्नसहितः ।
प्रविवेश गृहं शून्यं ददर्श च पितुः क्षयम् ॥
📖 भावार्थ : भरत ने नगर में कहीं भी प्रसन्न लोगों को नहीं देखा, न हर्ष, न नृत्य-गीत। वे पिता के महल में गए, जो सूना और प्रिय होते हुए भी उदास लग रहा था। उन लोगों के वचन सुनकर भरत ने शत्रुघ्न सहित उस शून्य भवन में प्रवेश किया और पिता के निवास को देखा।

🏰 राजमहल में प्रवेश और माताओं से भेंट (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१० ॥
स मातरं कौसल्यां ददर्श शोककर्शिताम् ।
अभिवाद्य च भरतः पप्रच्छ कुशलं तदा ॥
सा तं दृष्ट्वैव भरतं बाष्पपूर्णेक्षणा तदा ।
न शशाक वचः कर्तुं बाष्पोपहतया गिरा ॥
📖 भावार्थ : भरत ने माता कौसल्या को देखा जो शोक से कृश हो गई थीं। उन्हें प्रणाम कर भरत ने कुशल पूछी। कौसल्या ने भरत को देखकर आँखों में आँसू भर लिए और उनसे बोलने में असमर्थ हो गईं, उनकी वाणी रुद्ध हो गई।
॥ श्लोक ११-१२ ॥
सा तु संधार्य वै भर्तुः कैकेय्याः सुतमब्रवीत् ।
रामो वनं गतः पुत्र लक्ष्मणेन सहानुजः ॥
पिता ते निधनं प्राप्तः शोकेन महता वृतः ।
रामस्य व्यसनं श्रुत्वा सत्यधर्मपरायणः ॥
📖 भावार्थ : फिर धीरज धरकर कौसल्या ने कैकेयी के पुत्र भरत से कहा: "हे पुत्र! राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ वन को चले गए हैं। और तुम्हारे पिता, जो सत्य और धर्म के परायण थे, राम के इस दुःख को सुनकर शोक के कारण स्वर्ग सिधार गए।"
🔍 व्याख्या : इस प्रकार कौसल्या ने भरत को दोनों दुःखद समाचार दे दिए।
॥ श्लोक १३-१४ ॥
ततः सुमित्रां भरतः शत्रुघ्नसहितस्तदा ।
ददर्श शोकसंतप्तां वैदेहीमिव दुःखिताम् ॥
सा चैनं बाष्पपूर्णाक्षी प्रत्यगृह्णाद्वराङ्गना ।
शत्रुघ्नं च परिष्वज्य रुरोद भृशदुःखिता ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् भरत ने शत्रुघ्न सहित सुमित्रा को देखा, जो शोक से तप्त हो रही थीं और वैदेही (सीता) की भाँति दुःखी थीं। उन्होंने आँसू भरी आँखों से भरत का स्वागत किया और शत्रुघ्न को गले लगाकर अत्यन्त दुःखी होकर रोने लगीं।

🔥 भरत का कैकेयी से संवाद और क्रोध (श्लोक १९-३०)

॥ श्लोक १९-२० ॥
अथ कैकेय्यपि प्रीता भरतं दृष्ट्वा नन्दनम् ।
प्रत्यगृह्णाद्यथान्यायं हर्षेण महता युता ॥
सा तु पुत्रमुपासीनमुवाच वचनं शुभम् ।
राज्यं त्वमिह भुङ्क्ष्वाद्य यथार्थं पितुराज्ञया ॥
📖 भावार्थ : तब कैकेयी भी अपने पुत्र भरत को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं और यथान्याय उनका स्वागत किया। फिर वे पास बैठे पुत्र से बोलीं: "हे पुत्र! तुम अब इस राज्य का भोग करो, क्योंकि पिता की आज्ञा से यह तुम्हारा ही अधिकार है।"
॥ श्लोक २१-२२ ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भरतः शोककर्शितः ।
उवाच परमक्रुद्धो मातरं मातृवत्सलः ॥
किमिदं कृतवत्यस्मि यन्मे राज्यं प्रदीयते ।
किं वा पापमहं कुर्यां येन मां नाभिषेचयेत् ॥
📖 भावार्थ : कैकेयी के उन वचनों को सुनकर भरत, जो शोक से कृश थे, अत्यन्त क्रोधित होकर मातृवत्सल होते हुए भी अपनी माता से बोले: "मैंने ऐसा कौन-सा कर्म किया है कि मुझे राज्य दिया जा रहा है? अथवा मैं कौन-सा पाप करूँगा जिसके कारण मेरा अभिषेक नहीं होना चाहिए?"
॥ श्लोक २३-२४ ॥
तामुवाच ततः कैकेयी भरतं प्रियदर्शनम् ।
पित्रा ते राममुद्दिश्य दत्तो राज्यं सनातनम् ॥
स तु वनं गतो रामः प्रतिज्ञां पालयन् पितुः ।
त्वं च राज्यमिदं प्राप्तो वरदानेन मे सुत ॥
📖 भावार्थ : तब कैकेयी ने प्रियदर्शन भरत से कहा: "तुम्हारे पिता ने राम के लिए राज्य निश्चित किया था, परन्तु मेरे वरदान के कारण राम वन चले गए और तुम यह राज्य प्राप्त कर चुके हो।"
॥ श्लोक २५-२६ ॥
ततः श्रुत्वा भरो दुःखाद्वाक्यं मातुरनर्थकम् ।
उवाच परमामर्षी धिग्बलं राज्यकाम्यया ॥
न त्वं माता न चैवासि कुलघ्नी पापनिश्चया ।
यया रामो वनं दुष्ट प्रेषितो धर्मवत्सलः ॥
📖 भावार्थ : यह सुन भरत अत्यन्त दुःख और क्रोध से भर गए। उन्होंने कहा: "धिक्कार है उस बल को जो राज्य की कामना से प्रेरित है। तू माता नहीं है, तू तो कुलघ्नी और पापनिश्चया है, जिसके कारण धर्मात्मा राम को वन जाना पड़ा।"
🔍 व्याख्या : भरत ने अपनी माता को उसके कुकर्म के लिए फटकार लगाई और स्पष्ट किया कि वे इस राज्य को स्वीकार नहीं करेंगे।

⚡ भरत का संकल्प और निष्कर्ष (श्लोक ३१-३४)

॥ श्लोक ३१-३२ ॥
न मे राज्येन कार्यं हि न जीवितसुखेन च ।
विना रामं महाप्राज्ञं पितरं च तपोधनम् ॥
गमिष्यामि वनं क्षिप्रं यत्र रामो महाद्युतिः ।
तमानयिष्ये धर्मज्ञं राज्यं चास्मै प्रदास्यति ॥
📖 भावार्थ : भरत ने कहा: "मुझे राज्य की इच्छा नहीं, न ही जीवन और सुख की, जब तक कि महाप्राज्ञ राम और पिता (उनकी आत्मा) मुझसे वियुक्त हैं। मैं शीघ्र ही उस वन को जाऊँगा जहाँ महातेजस्वी राम हैं। उन धर्मज्ञ को वापस लाऊँगा और उन्हें राज्य सौंप दूँगा।"
॥ श्लोक ३३-३४ ॥
एवमुक्त्वा भरः क्रुद्धः शत्रुघ्नसहितस्तदा ।
निश्चक्राम गृहात्तूर्णं मातुर्वचनगौरवात् ॥
ततः समेत्य मन्त्रिभ्यो वसिष्ठाय च धीमते ।
शशंस सकलं वृत्तं रामवन्धुवियोगजम् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर क्रोधित भरत शत्रुघ्न सहित माता के घर से तुरंत बाहर निकल आए। फिर उन्होंने मंत्रियों और धीमान् वसिष्ठ से सारा वृत्तांत कहा, जो राम के वियोग से उत्पन्न हुआ था।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार भरत ने राज्य को अस्वीकार किया और राम की वापसी के लिए आग्रह प्रकट किया। आगे वे राम को मनाने वन जाएंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 भरत का आदर्श चरित्र

इस सर्ग में भरत का मातृभक्त और धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व उभरकर आता है। वे अपनी माता के कुकर्म से घृणा करते हैं, फिर भी उनका सत्कार करते हैं। राज्य का लोभ त्यागकर वे राम के प्रति अपने अटूट प्रेम और कर्तव्य का निर्वाह करते हैं।

💔 शोक और धर्म का संघर्ष

अयोध्या की सूनी दशा, माताओं का रुदन, पिता का देहावसान – सब भरत के हृदय को विदीर्ण कर देते हैं। किन्तु वे धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होते। यह सर्ग बताता है कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म की रक्षा करनी चाहिए।

🤱 कैकेयी का पश्चात्ताप?

हालाँकि इस सर्ग में कैकेयी प्रसन्न दिखती है, परन्तु भरत के तिरस्कार से उसे अपनी भूल का आभास होता है। यह एक माता के रूप में उसके पतन का चित्रण है, जो आगे चलकर उसके पश्चात्ताप का कारण बनेगा।

🌳 वन की ओर प्रस्थान का संकल्प

भरत का वन जाने का निश्चय राम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति को दर्शाता है। यह आगामी घटनाओं की भूमिका तैयार करता है – भरत का राम से मिलना और उनके पादुकाओं का राज्याभिषेक।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा पुत्र वही है जो माता-पिता के अधर्मपूर्ण कार्यों का समर्थन न करे। भरत की तरह हमें भी सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए, चाहे वह हमारे अपनों के विरुद्ध ही क्यों न जाए। धर्म ही सर्वोपरि है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।

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