भरत को अयोध्या बुलाना
इस सर्ग में राजा दशरथ, राम के वनगमन के पश्चात् अत्यंत दुःखी होकर अपने प्रिय पुत्र भरत को बुलाने का निर्णय लेते हैं। वे अपने मंत्री सुमंत्र को भरत और शत्रुघ्न को लाने के लिए उनके ननिहाल (कैकेयी के पिता के यहाँ) भेजते हैं।
विवरण
राम के वन जाने के बाद राजा दशरथ का हृदय विदीर्ण हो जाता है। वे शोक से व्याकुल होकर रात में निद्रा त्याग देते हैं। प्रातःकाल वे सुमंत्र को बुलाते हैं और उनसे कहते हैं कि राम के वन चले जाने के बाद अयोध्या सूनी लगती है। उन्हें भरत के दर्शन की तीव्र इच्छा होती है। राजा न केवल पुत्र-प्रेम से प्रेरित हैं, बल्कि उन्हें यह भी भय है कि कहीं माता कैकेयी की योजना के बारे में सुनकर भरत उनसे (दशरथ से) रुष्ट न हो जाएँ। वे सुमंत्र से कहते हैं कि भरत और शत्रुघ्न को तुरंत अयोध्या लाया जाए। सुमंत्र शीघ्र ही रथ लेकर कैकेय के राज्य के लिए प्रस्थान करते हैं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ३६
(भरत को अयोध्या बुलाना – पुत्र-वियोग में राजा का विलाप)
🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में राम के वनगमन का वर्णन था। अब राजा दशरथ, पुत्र-वियोग की अग्नि में जल रहे हैं। रात्रि का समय उनके लिए असहनीय हो गया है। वे अपने प्रिय पुत्रों भरत और शत्रुघ्न को बुलाने का निर्णय लेते हैं। यह सर्ग एक पिता के करुण विलाप और उसकी व्याकुलता का मार्मिक चित्रण है।
🌑 शोक में डूबा प्रभात (श्लोक १-५)
राजा दशरथः श्रीमान् सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ॥
सुमन्त्र ये मम सुता भरतः शत्रुघ्नस्तथा ।
तौ मातुलकुले वृत्तौ कैकेयस्य महात्मनः ॥
तावानयस्व वेगेन रथेन हयसत्तमैः ।
शीघ्रं पश्यामि तौ वीरौ रामे वनमुपागते ॥
रामं वनगतं श्रुत्वा नित्यं परमदुःखितः ॥
अपश्यतस्तु तौ वीरौ भरतं शत्रुघ्नं तथा ।
न मे प्राणाः प्रणश्येयुरिति मे निश्चिता मतिः ॥
🏃 सुमंत्र का शीघ्र प्रस्थान (श्लोक ६-१२)
एवमस्त्विति तं राज्ञा प्रत्युक्त्वा प्रययौ ततः ॥
स रथं हयसम्पन्नमारुह्य त्वरितस्तदा ।
ययौ कैकेयराजस्य नगरं राजसम्मतः ॥
अश्वैः सुतीव्रवेगैस्तु प्रापद्वै कैकेयं पुरम् ॥
ततः प्रविश्य नगरं ददर्श भरतं तदा ।
शत्रुघ्नसहितं वीरं केकयेषु महारथम् ॥
🤝 भरत से भेंट और राज-संदेश (श्लोक १३-२०)
हर्षेण महताविष्टः प्रणम्येदमुवाच ह ॥
राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति सुमन्त्रवचनात्त्वरन् ।
आगच्छ भरत शीघ्रं त्वं शत्रुघ्नसहायवान् ॥
इत्युक्त्वा भरतं वाक्यं सुमन्त्रः प्रत्युवाच ह ।
यथाज्ञप्तं नरेन्द्रेण तथा कर्तुमिहार्हसि ॥
ऊचतुः प्राञ्जली भूत्वा किमाज्ञापयति नः पिता ॥
एवमुक्तस्तु सुमन्त्रो भरतेन महात्मना ।
प्रत्युवाच तदा वाक्यं भरतं शुभलक्षणम् ॥
नाहं जानामि ते वत्स यदर्थं प्रेषितो नृपः ।
शीघ्रमागम्यतामिति राज्ञो वाक्यमिदं मम ॥
🚩 भरत की शंका और अयोध्या के लिए प्रस्थान (श्लोक २१-२५)
मातामहं समासाद्य वचनं चेदमब्रवीत् ॥
सुमन्त्रवचनाच्छ्रुत्वा राज्ञा सम्प्रेषितो ह्यहम् ।
गमने मे मतिं कुरु यद्यनुज्ञातुमर्हसि ॥
ततः स राजा कैकेयो भरतं प्रत्युवाच ह ।
गच्छ वत्स यथाकामं सर्वे त्वां कुशलिनो गृहे ॥
गम्यतामिति तं दृष्ट्वा ययौ तूर्णं रथोत्तमम् ॥
ततस्तावश्विनौ युक्तौ रथे सूर्यसमप्रभे ।
आस्थाय प्रययौ वीरौ मुदा परमया युतौ ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👴 पिता का हृदय
इस सर्ग में राजा दशरथ केवल एक शासक नहीं, बल्कि एक वात्सल्यमय पिता के रूप में दिखते हैं। राम के वियोग ने उन्हें तोड़ दिया है। भरत को बुलाना उनकी मानसिक व्यथा और सांत्वना की खोज को दर्शाता है।
⚡ नियति का सूत्रपात
यह सर्ग आगामी त्रासदी की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण कड़ी है। राजा का भरत को बुलाना, उनकी स्वयं की मृत्यु और राम के वनवास की अंतिम घटना को गति प्रदान करता है।
🤔 भरत की अज्ञानता
भरत का यह न जानना कि उन्हें क्यों बुलाया गया है, नाटकीय विडंबना (dramatic irony) उत्पन्न करता है। पाठक जानता है कि अयोध्या में दुःख का साम्राज्य है, जबकि भरत प्रसन्नतापूर्वक उसी ओर बढ़ रहे हैं।
📜 राजदूत का कर्तव्य
सुमंत्र का चरित्र आदर्श राजदूत का उदाहरण है। वे बिना प्रश्न किए राजा की आज्ञा का पालन करते हैं और संदेश का यथावत् प्रसारण करते हैं, भले ही वे स्वयं उसका कारण न जानते हों।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मानवीय संबंध, विशेषकर पुत्र-प्रेम, कितना गहरा और अटूट होता है। विपत्ति के समय परिवार ही एकमात्र सहारा होता है। साथ ही, यह भी कि जीवन में कभी-कभी हम सुखद यात्रा पर निकलते हैं, लेकिन गंतव्य पर हमें अप्रत्याशित दुःख मिलता है।