अयोध्या में दशरथ का स्वर्गवास

अयोध्याकाण्ड का तैंतीसवाँ सर्ग राजा दशरथ के स्वर्गवास का वर्णन करता है। राम के वन गमन के पश्चात् शोकातुर दशरथ को अपने पूर्वकृत पाप (श्रवण कुमार के श्राप) की याद आती है और वे पुत्र-वियोग में ही प्राण त्याग देते हैं।

विवरण

राम के वन जाने के बाद अयोध्या में शोक छा जाता है। राजा दशरथ राम के बिना अपने जीवन को शून्य समझते हैं। वे रात में जागते हुए राम का ही चिन्तन करते हैं। उन्हें एक प्राचीन घटना याद आती है – जब उन्होंने अनजाने में श्रवण कुमार को बाण मार दिया था और उसके माता-पिता ने उन्हें श्राप दिया था कि वे भी पुत्र-वियोग में मरेंगे। अब वह श्राप फलित होता है। वे कौसल्या से अपनी वेदना साझा करते हैं और अन्ततः राम-राम कहते हुए प्राण त्याग देते हैं। उनकी मृत्यु के बाद अयोध्या में कोहराम मच जाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ३३

(राजा दशरथ का स्वर्गवास – पुत्र-वियोग में देहत्याग)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के वनगमन के पश्चात् अयोध्या शोकाकुल है। राजा दशरथ राम के बिना प्राण धारण करने में असमर्थ हैं। रात्रि के समय वे राम का ही चिन्तन करते हैं और उन्हें अपने पूर्वजन्म के उस पाप की याद आती है, जिसके कारण उन्हें यह दुःख भोगना पड़ रहा है। यह सर्ग राजा दशरथ के स्वर्गारोहण का वर्णन करता है।

😢 दशरथ का हृदय-विदारक विलाप (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-२ ॥
हा राम रामेति तदा विलप्य स राजा सत्यव्रतः ।
निमेषान्तरमात्रेण प्राणांस्तत्याज दुःखितः ॥
हा राम हा महाबाहो हा लक्ष्मण सुदुःखितः ।
हा सीते क्व गता स्थैते इति शोकाकुलो ऽभवत् ॥
🔹 पदच्छेद : हा = अहो (दुःखसूचक); राम = राम; इति = इस प्रकार; तदा = तब; विलप्य = विलाप करके; सः = वह; राजा = राजा; सत्यव्रतः = सत्यप्रतिज्ञ; निमेषान्तरमात्रेण = पलक झपकते ही; प्राणान् = प्राणों को; त्याजितः = त्याग दिया; दुःखितः = दुःखी होकर; हा राम = हाय राम; हा महाबाहो = हाय महाबाहो; हा लक्ष्मण = हाय लक्ष्मण; सुदुःखितः = अत्यन्त दुःखी; हा सीते = हाय सीता; क्व = कहाँ; गताः = गए; स्थः = हो; इति = ऐसा; शोकाकुलः = शोक से व्याकुल; अभवत् = हो गए।
📖 भावार्थ : हाय राम! हाय राम! – इस प्रकार विलाप करते हुए सत्यप्रतिज्ञ राजा दशरथ ने अत्यन्त दुःख में पलक झपकते ही प्राण त्याग दिए। हाय महाबाहो राम! हाय अत्यन्त दुःखी लक्ष्मण! हाय सीते! तुम सब कहाँ चले गए? – इस प्रकार वे शोक से व्याकुल हो गए।
🔍 व्याख्या : ये श्लोक दशरथ की अवस्था को दर्शाते हैं कि वे राम के वियोग में कितने व्याकुल हो उठे और अन्ततः प्राण त्याग दिए।

👸 कौसल्या का विलाप और दशरथ की चेतना (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-८ ॥
ततः कौसल्या राजानं विलपन्तमचेतनम् ।
ददर्श सहसा दीना पतिं शोकपरिप्लुता ॥
सा दृष्ट्वा पतितं भूमौ राजानं दीनवत्सला ।
उवाच परमायस्ता हा राजन्निति दुःखिता ॥
📖 भावार्थ : तब कौसल्या ने विलाप करते हुए अचेतन राजा को देखा। वह दीना पत्नी शोक में डूबी हुई अचानक अपने पति के पास आई। उसने राजा को भूमि पर गिरा देखकर, दीनवत्सला, अत्यन्त व्याकुल होकर, दुःखी होकर कहा – हाय राजन्! ...

🏹 श्रवण कुमार का श्राप – दशरथ का आत्मालाप (श्लोक १३-२०)

॥ श्लोक १३-१४ ॥
स्मरामि यत्पुरा वृत्तं मया पापमकारिणा ।
श्रवणकुमारो नाम्ना वने यो मृगयां चरन् ॥
तस्याहं निशितं बाणं मुमोच जलकाङ्क्षिणः ।
ततः स शोकसंतप्तः पितरं मातरं च सः ॥
📖 भावार्थ : राजा दशरथ कहते हैं – मुझे याद आ रहा है कि पूर्वकाल में मैंने एक पाप किया था। श्रवणकुमार नाम का एक तपस्वी वन में मृगया (शिकार) करते समय ... उस पर मैंने तीक्ष्ण बाण चला दिया, जो जल लेने गया था। तब वह शोक से संतप्त होकर अपने माता-पिता के पास ... (आगे श्राप की कथा) ...

💔 अन्तिम क्षण : प्राणों का परित्याग (श्लोक २१-२४)

॥ श्लोक २१-२२ ॥
एवमुक्त्वा तु राजर्षिः कौसल्यां शोककर्शितः ।
तूष्णीमासीत मुहूर्तं च पुनः प्राणानत्याजयत् ॥
तस्मिन्नन्तर्गते प्राणे राज्ञः सत्यपराक्रमे ।
हाहाकारो महानासीत् सर्वस्यान्तःपुरस्य च ॥
📖 भावार्थ : शोक से कृश हुए राजर्षि दशरथ ने कौसल्या से ऐसा कहकर कुछ क्षणों के लिए मौन धारण किया और फिर प्राण त्याग दिए। उस सत्यपराक्रमी राजा के प्राण निकलते ही समस्त अन्तःपुर में हाहाकार मच गया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ कर्म का सिद्धान्त

इस सर्ग में दशरथ के श्राप की कथा से यह सिद्ध होता है कि कर्म कभी निष्फल नहीं होता। राजा दशरथ ने अनजाने में जो पाप किया, उसका फल उन्हें भोगना पड़ा। यह जीवन में सावधानी का संदेश देता है।

👨‍👧‍👦 पितृ-पुत्र प्रेम की मर्मान्तक व्यथा

दशरथ का राम के प्रति प्रेम इतना गहरा था कि उनके वियोग में वे प्राण त्याग बैठे। यह मानवीय सम्बन्धों की सच्ची भावना को उजागर करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने कर्मों के प्रति सचेत रहना चाहिए, और परिवार के प्रति प्रेम एवं कर्तव्यनिष्ठा का पालन करना चाहिए। साथ ही, यह भी कि भगवान राम के विरह में दशरथ जैसे महान राजा का भी देह त्यागना, भगवान की महिमा को दर्शाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।