राम को युवराज पद के लिए चुना जाना

अयोध्याकाण्ड के तीसरे सर्ग में राजा दशरथ मंत्रियों और प्रजा की सभा बुलाकर राम को युवराज घोषित करने का आदेश देते हैं। सभी लोग इस निर्णय का हर्षोल्लास से स्वागत करते हैं।

विवरण

यह सर्ग राजा दशरथ द्वारा आयोजित एक महान सभा का वर्णन करता है। राजा ने समस्त मंत्रियों, सामंतों, और अयोध्यावासियों को आमंत्रित किया। सभा में उन्होंने राम के गुणों का वर्णन करते हुए घोषणा की कि वे राम को युवराज बनाना चाहते हैं। प्रजा और मंत्रीगण इस प्रस्ताव का समर्थन करते हैं। राजा तब राम को बुलवाते हैं और उन्हें युवराज पद की सूचना देते हैं। राम पिता की आज्ञा का शिरोधार्य करते हैं। इसके बाद नगरवासी अगले दिन होने वाले अभिषेक की तैयारियों में जुट जाते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ३

(राम को युवराज पद के लिए चुना जाना – सार्वजनिक घोषणा)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ तृतीयः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में राजा दशरथ ने राम के राज्याभिषेक का निश्चय किया और नगर को सजाने का आदेश दिया। अब वे एक विशाल सभा बुलाते हैं, जिसमें समस्त प्रजा, मंत्री और मित्र राजा उपस्थित होते हैं। यह सर्ग उस सभा का वर्णन करता है, जहाँ राम को युवराज पद के लिए सर्वसम्मति से चुना जाता है।

🏛️ सभा का आयोजन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः समेत्य मन्त्रिभ्यः प्रजाभ्यश्च महीपतिः ।
सभां समावहत् श्रेष्ठां रामाभिषेककाम्यया ॥
सुमन्त्रं च समाहूय राजा वचनमब्रवीत् ।
आनयस्व नरश्रेष्ठान् मित्राणि च पृथक् पृथक् ॥
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्चैव समन्ततः ।
सभायां समवेतास्ते शीघ्रमानय सुव्रत ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; समेत्य = एकत्र होकर; मन्त्रिभ्यः = मंत्रियों के साथ; प्रजाभ्यः = प्रजा के साथ; च = और; महीपतिः = राजा; सभाम् = सभा को; समावहत् = आयोजित किया; श्रेष्ठाम् = उत्तम; रामाभिषेककाम्यया = राम के अभिषेक की इच्छा से; सुमन्त्रम् = सुमंत्र को; च = और; समाहूय = बुलाकर; राजा = राजा; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; आनयस्व = लाओ; नरश्रेष्ठान् = नरश्रेष्ठों को; मित्राणि = मित्रों को; च = और; पृथक् पृथक् = अलग-अलग; ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; क्षत्रियान् = क्षत्रियों को; वैश्यान् = वैश्यों को; शूद्रान् = शूद्रों को; च = और; एव = ही; समन्ततः = चारों ओर से; सभायाम् = सभा में; समवेताः = एकत्रित; ते = उन्हें; शीघ्रम् = शीघ्र; आनय = लाओ; सुव्रत = सुमंत्र (सुनिश्चित व्रत वाले)।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् राजा दशरथ ने राम के अभिषेक की इच्छा से मंत्रियों और प्रजा के साथ मिलकर एक उत्तम सभा का आयोजन किया। उन्होंने सुमंत्र को बुलाकर कहा, "हे सुमंत्र! शीघ्र ही समस्त नरश्रेष्ठों, मित्रों तथा ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों को सभा में एकत्रित करो।"
🔍 व्याख्या : राजा दशरथ चाहते हैं कि यह निर्णय सर्वजन समक्ष हो, जिससे राम के प्रति सबका प्रेम और स्वीकृति स्पष्ट हो। यह लोकतांत्रिक तत्व का परिचायक है।
॥ श्लोक ४-५ ॥
सुमन्त्रस्तु तथेत्युक्त्वा राज्ञः शासनमास्थितः ।
आनिनाय नरव्याघ्रो यथोक्तान् सर्व एव तान् ॥
ते समेताः सभामध्ये राजानं पर्यवारयन् ।
देवा इवामरश्रेष्ठं ब्रह्माणं समुपागताः ॥
📖 भावार्थ : सुमंत्र ने तथास्तु कहकर राजा की आज्ञा का पालन किया और उन सभी को, जैसा कहा गया था, सभा में उपस्थित कर दिया। वे सभी सभा के मध्य में राजा के चारों ओर इस प्रकार बैठे, जैसे देवता ब्रह्मा के चारों ओर आकर विराजमान होते हैं।

👑 राजा दशरथ का उद्बोधन (श्लोक ६-१५)

॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः प्राञ्जलयः सर्वे राजानं प्रतिपूज्य च ।
निषेदुः पृथिवीपालमुपास्य ज्वलनं यथा ॥
राजापि तान् सुविधिना पूजयित्वा यथार्हतः ।
उवाच परमप्रीतो रामाभिषवमानसः ॥
श्रूयतां हे महीपाला मन्त्रिणश्च समागताः ।
मम पुत्रो गुणश्रेष्ठो रामः सत्यपराक्रमः ॥
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च वीर्यवान् विजितेन्द्रियः ।
सर्वलोकप्रियो दान्तः सर्वभूतहिते रतः ॥
एतादृशं गुणैर्युक्तं रामं सत्यपराक्रमम् ।
युवराजं करिष्यामि धर्मेण हितकाम्यया ॥
📖 भावार्थ : तब सबने हाथ जोड़कर राजा को प्रणाम किया और अग्नि के समान तेजस्वी राजा के चारों ओर बैठ गए। राजा ने भी उनका यथोचित सम्मान किया और अत्यन्त प्रसन्न होकर राम के अभिषेक की इच्छा से बोले, "हे महीपालो और एकत्रित मंत्रियो! सुनिए। मेरा पुत्र राम गुणों में श्रेष्ठ, सत्यपराक्रमी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, वीर्यवान्, जितेन्द्रिय, सर्वलोकप्रिय, दान्त और सब प्राणियों के हित में रत है। ऐसे गुणों से युक्त राम को, जो सत्यपराक्रमी है, मैं धर्म और हित की इच्छा से युवराज बनाना चाहता हूँ।"
🔍 व्याख्या : राजा ने राम के सभी गुणों का उल्लेख कर यह सिद्ध किया कि वे युवराज पद के एकमात्र अधिकारी हैं।
॥ श्लोक ११-१५ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञः सर्वे ते मन्त्रिणः स्थिताः ।
प्रत्यूचुः प्राञ्जलयो वाक्यं राजानं प्रतिपूज्य च ॥
साधु राजन् त्वया प्रोक्तं यद्रामं यौवराज्यके ।
अभिषेक्तुं महाप्राज्ञं मनो ह्येषां प्रहृष्यति ॥
रामो हि गुणसंपन्नः प्रजानां प्रियकृत् सदा ।
तस्य राज्ये स्थिते सर्वे सुखिनः स्याम नित्यशः ॥
इत्युक्त्वा राजशार्दूलं विरेमुस्ते नराधिपाः ।
हर्षेण महता युक्ता रामाभिषवकांक्षिणः ॥
📖 भावार्थ : राजा का वचन सुनकर सभी मंत्रियों ने हाथ जोड़कर राजा से कहा, "हे राजन्! आपने जो राम को युवराज बनाने की बात कही है, यह बहुत उचित है। महाप्राज्ञ राम के युवराज बनने से हमारा मन अत्यन्त प्रसन्न हो गया है। राम गुणसंपन्न हैं और सदा प्रजा का हित करने वाले हैं। उनके राज्य में रहकर हम सब सदा सुखी रहेंगे।" ऐसा कहकर वे सब राजा के सामने चुप हो गए, परंतु हृदय में राम के अभिषेक की कामना से महान हर्ष से भरे हुए थे।

🚩 राम का सभा में आगमन (श्लोक १६-२२)

॥ श्लोक १६-१८ ॥
ततः सुमन्त्रः सुमुखं रामं दूतो वचोऽब्रवीत् ।
पिता त्वां द्रष्टुमिच्छेत् सभायां सपुरोधसम् ॥
इति श्रुत्वा तु रामस्तु पितुर्वचनमुत्तमम् ।
जगाम सहितो भ्रात्रा लक्ष्मणेन महाबलः ॥
सभां प्रविश्य रामस्तु ददर्श पितरं स्थितम् ।
प्रणम्य शिरसा भूमौ तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः ॥
📖 भावार्थ : तब सुमंत्र ने दूत बनकर राम से कहा, "पिता जी आपको पुरोहित सहित सभा में देखना चाहते हैं।" यह सुनकर महाबली राम लक्ष्मण के साथ वहाँ गए। सभा में प्रवेश कर राम ने पिता को देखा और भूमि पर मस्तक झुकाकर प्रणाम किया तथा हाथ जोड़कर आगे खड़े हो गए।
॥ श्लोक १९-२२ ॥
राजा तमर्घ्यं प्रददौ वसिष्ठश्च महातपाः ।
आशीर्भिरभिनन्द्यैनं रामं सत्यपराक्रमम् ॥
उपविश्य ततः शुभ्रे आसने रामलक्ष्मणौ ।
राजा वचनमाहेदं सर्वलोकस्य शृण्वतः ॥
हे राम त्वं मम प्राणाः प्राणेभ्योऽपि गरीयसः ।
अहं वृद्धश्च राज्ये च त्वं भारं वोढुमर्हसि ॥
यौवराज्येन ते राम अभिषेक्तुं चिकीर्षितः ।
श्वः पुष्ययोगे तु विधिः कर्तव्यो विधिपूर्वकः ॥
📖 भावार्थ : राजा ने राम को अर्घ्य दिया और महातपस्वी वसिष्ठ ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया। फिर राम और लक्ष्मण सुंदर आसनों पर बैठे। राजा ने सबके सामने कहा, "हे राम! तुम मेरे प्राण हो, प्राणों से भी अधिक प्यारे। मैं वृद्ध हूँ, अतः तुम राज्य का भार वहन करो। मैं तुम्हें कल पुष्य नक्षत्र में युवराज पद पर अभिषिक्त करना चाहता हूँ।"
🔍 व्याख्या : पिता का यह कथन राम के प्रति उनके असीम स्नेह और विश्वास को दर्शाता है। राम के लिए यह आज्ञा पितृभक्ति का पालन करने का अवसर है।

🙏 राम की स्वीकृति और उल्लास (श्लोक २३-२८)

॥ श्लोक २३-२५ ॥
रामः पितुर्वचः श्रुत्वा प्राञ्जलिः प्रणतोऽभवत् ।
उवाच विनयाद्वाक्यं नियम्य प्रणतात्मवान् ॥
यथा भवान् प्रशास्ति मां तथा कर्तुं प्रति उद्यतः ।
पितुर्वचनमक्लिष्टं शिरसा धारयाम्यहम् ॥
इत्युक्त्वा राघवो वाक्यं विरराम कृताञ्जलिः ।
ततः प्रहर्षो लोकानामभवत् सुमहान् क्षणात् ॥
📖 भावार्थ : पिता के वचन सुनकर राम ने हाथ जोड़े और विनयपूर्वक कहा, "आप मुझे जैसी आज्ञा देते हैं, मैं वैसा ही करने के लिए तैयार हूँ। पिता के वचनों का मैं शिरोधार्य करता हूँ।" ऐसा कहकर राम चुप हो गए। तब सभी प्रजाजनों में अपार हर्ष छा गया।
॥ श्लोक २६-२८ ॥
नगरे च पुरे चैव हर्षः समभवन्महान् ।
चित्रमाल्याम्बरधरा जनाः प्रीतियुता अभूत् ॥
रामं युवराजं दृष्ट्वा प्रजाः सर्वाः सुखं ययुः ।
ततः सम्पूजयामासुः पितरं राघवं च ते ॥
इति सर्वं समाकर्ण्य राजा दशरथः सुखी ।
उवाच मन्त्रिणः सर्वान् श्वः प्रभातेऽभिषेचयेत् ॥
📖 भावार्थ : नगर और गाँवों में सब जगह महान हर्ष फैल गया। लोग रंग-बिरंगे वस्त्र और मालाएँ धारण कर प्रसन्न हो गए। राम को युवराज बनता देख सारी प्रजा सुखी हुई। उन्होंने राजा और राम की पूजा की। यह सब सुनकर राजा दशरथ अत्यन्त प्रसन्न हुए और मंत्रियों से कहा, "कल प्रभात में अभिषेक करो।"
🔍 व्याख्या : इस प्रकार राम के युवराज पद के चयन की घोषणा सार्वजनिक रूप से हो गई। अब अगले दिन अभिषेक की तैयारियाँ प्रारम्भ होंगी, जो अगले सर्ग में वर्णित हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 जनता का समर्थन

इस सर्ग में प्रजा और मंत्रियों द्वारा राम के युवराज पद का उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया है। यह दर्शाता है कि राम कितने लोकप्रिय हैं और उनका शासन कितना वांछित है।

📜 पितृभक्ति का आदर्श

राम का पिता की आज्ञा को शिरोधार्य करना और विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना पुत्र के कर्तव्य का उत्तम उदाहरण है। यही भाव आगे चलकर वनवास स्वीकार करने में भी दिखेगा।

🤝 राजा और प्रजा का संवाद

राजा दशरथ ने निर्णय लेने से पूर्व प्रजा और मंत्रियों की राय ली, जो एक कुशल शासक के लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।

🌅 सुखद घटनाक्रम का शिखर

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड के सुखद भाग का चरम है। इसके बाद मंथरा और कैकेयी के षड्यंत्र से कथा दुखद मोड़ ले लेती है। इस प्रकार यह सर्ग आगामी त्रासदी के लिए विरोधाभास का काम करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि एक योग्य उत्तराधिकारी का चयन करते समय उसके गुणों और जनता की राय का सम्मान करना चाहिए। राम के गुण हमें बताते हैं कि सच्चा नेता वही है जो विनम्र, कर्तव्यनिष्ठ और जनप्रिय हो। साथ ही, किसी भी शुभ कार्य को आरम्भ करने से पूर्व सबकी स्वीकृति लेना एक सफल शासन का मूल मंत्र है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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