🕉️ अयोध्या काण्ड · सर्ग 29

निषादराज गुह का राम से मिलन

राम, लक्ष्मण और सीता गंगा तट पर श्रृंगवेरपुर पहुँचते हैं। निषादराज गुह उनका स्वागत करता है और आतिथ्य प्रदान करता है। राम नगर में प्रवेश न करके वहीं रात बिताते हैं, और गुह उनकी रक्षा करता है।

0 सम्पूर्ण श्लोक
29 सर्ग संख्या
27 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

राम, लक्ष्मण और सीता गंगा तट पर श्रृंगवेरपुर पहुँचते हैं। निषादराज गुह उनका स्वागत करता है और आतिथ्य प्रदान करता है। राम नगर में प्रवेश न करके वहीं रात बिताते हैं, और गुह उनकी रक्षा करता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

यह सर्ग वनवास के आरंभिक चरण का मार्मिक वर्णन करता है। श्रृंगवेरपुर (वर्तमान श्रृंगवेरपुर) में गंगा तट पर पहुँचकर राम, सीता और लक्ष्मण विश्राम करते हैं। निषादराज गुह, जो राम के परम भक्त और मित्र हैं, उनके आगमन की सूचना पाकर तुरंत अपने अनुचरों सहित वहाँ आते हैं। वे अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से राम का स्वागत करते हैं, उन्हें नगर में ठहरने का आग्रह करते हैं और उत्तम भोजन एवं शय्या की व्यवस्था प्रस्तुत करते हैं। किंतु राम, राजा दशरथ की आज्ञा का पालन करते हुए और वनवासी के रूप में अपने धर्म का निर्वाह करते हुए, नगर में प्रवेश करना अस्वीकार कर देते हैं। वे कहते हैं कि वे वन में रहकर ही पिता के वचन को सत्य करेंगे। राम के दृढ़ निश्चय को देख गुह द्रवित हो जाते हैं। तब वे राम के लिए गंगा तट पर ही कुशा के आसन बिछवाते हैं और स्वयं रात भर जागकर, हाथों में धनुष-बाण लेकर, उनकी रक्षा करते हैं। गुह और निषादगण उस रात न तो सोते हैं और न ही आँखें मूँदते हैं। यह सर्ग राम की मर्यादा, गुह की अटूट भक्ति और सच्ची मैत्री का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग २९

(निषादराज गुह का राम से मिलन – मित्रता और मर्यादा का संगम)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : भरत के वापस लौट जाने के पश्चात् राम, लक्ष्मण और सीता वन की ओर चल पड़े हैं। चित्रकूट से आगे बढ़ते हुए वे गंगा के तट पर स्थित श्रृंगवेरपुर नामक नगर में पहुँचते हैं। यहाँ उनकी भेंट निषादराज गुह से होती है, जो राम के परम मित्र हैं। यह सर्ग उस हृदयस्पर्शी मिलन और राम की अटल मर्यादा का वर्णन करता है।

🏞️ गंगा तट पर आगमन (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १ ॥
ततः प्रयाते भरते रामः शत्रुनिबर्हणः ।
गङ्गातीरं समासाद्य श्रृङ्गवेरपुरं ययौ ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रयाते = लौट जाने पर; भरते = भरत के; रामः = राम; शत्रुनिबर्हणः = शत्रुओं का नाश करने वाले; गङ्गातीरम् = गंगा के तट को; समासाद्य = पाकर; श्रृङ्गवेरपुरम् = श्रृंगवेरपुर; ययौ = गए।
📖 भावार्थ : भरत के अयोध्या लौट जाने के बाद, शत्रुओं का संहार करने वाले राम गंगा के तट पर स्थित श्रृंगवेरपुर नगर में पहुँचे।
॥ श्लोक २ ॥
तं दृष्ट्वा निषदाध्यक्षः सुहृदं प्रियदर्शनम् ।
गुहः परमसन्तुष्टः सम्प्रहृष्टतनूरुहः ॥
📖 भावार्थ : उन प्रियदर्शन मित्र राम को देखकर निषादों के राजा गुह अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनके शरीर के रोम-रोम पुलकित हो गए।

🙏 गुह का स्वागत और आदर (श्लोक ६-१२)

॥ श्लोक ६ ॥
स तु राजा महाप्राज्ञो गुहो भक्त्या समन्वितः ।
उपस्थायाञ्जलिं कृत्वा रामं वचनमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : वे महाप्राज्ञ निषादराज गुह, भक्ति से परिपूर्ण होकर, हाथ जोड़कर राम के समीप आए और उनसे इस प्रकार बोले।
॥ श्लोक ८-९ ॥
अयोध्यायाः प्रवृत्तिं च कुशलं चापि पृच्छतः ।
रामस्य चरणौ श्रुत्वा मूर्ध्ना ववन्दे स गुहः ॥
स तु राजा महाप्राज्ञो गुहो भक्त्या समन्वितः ।
उपस्थायाञ्जलिं कृत्वा रामं वचनमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : राम ने जब अयोध्या का समाचार और कुशलता पूछी, तब गुह ने राम के चरणों की बात सुनकर (अर्थात् चरणों में मस्तक झुकाकर) उन्हें प्रणाम किया। फिर वे महाप्राज्ञ राजा गुह, भक्ति से युक्त होकर हाथ जोड़कर राम से बोले।
🔍 व्याख्या : गुह का राम के चरणों में मस्तक झुकाना उनकी परम भक्ति को दर्शाता है। यद्यपि वे राजा हैं, फिर भी राम के प्रति उनकी श्रद्धा अटूट है।
॥ श्लोक १० ॥
इदं तवान्नं बहुलं ह्युपस्थितं पयश्च नानारसवत् सुशीतलम् ।
इमे च सेव्यास्तव रत्नभूषिताः प्रयच्छ शय्याश्च सुखाश्च संविश ॥
📖 भावार्थ : (गुह ने कहा) हे प्रभु! आपके लिए यह प्रचुर मात्रा में अन्न उपस्थित है, और यह अनेक रसों से युक्त, अत्यंत शीतल जल भी तैयार है। ये रत्नभूषित स्त्रियाँ आपकी सेवा के लिए उपस्थित हैं। कृपया आप शय्या ग्रहण करें और सुखपूर्वक विश्राम करें।

🚫 राम का नगर-प्रवेश से इन्कार (श्लोक १३-१८)

॥ श्लोक १३ ॥
एवमुक्तस्तु गुहेन रामः सत्यपराक्रमः ।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञं गुहं हर्षयन्निव ॥
📖 भावार्थ : गुह के इस प्रकार कहने पर सत्यपराक्रमी राम ने महाप्राज्ञ गुह को हर्षित करते हुए उत्तर दिया।
॥ श्लोक १४-१५ ॥
सौहृदात् त्वं मयि प्रीतिं दर्शयस्युपवेशनात् ।
शयनादन्नपानाच्च सर्वं चैतत् त्वयोचितम् ॥
पितुर्निदेशं तु मया वर्तितव्यं यथाश्रुतम् ।
न वसेयं पुरं राजन् वनवासे दृढव्रतः ॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा – हे मित्र! तुम मुझसे सौहार्द रखते हो, इसीलिए तुमने आसन, शयन, अन्न-पान आदि से मेरा सत्कार करके अपना प्रेम प्रकट किया है। और यह सब तुम्हारे लिए उचित भी है। किंतु हे राजन्! मुझे पिता की आज्ञा के अनुसार ही चलना है, जैसा कि मैंने सुना है (वनवास का पालन करना है)। मैं दृढ़ व्रत लिए वनवासी हूँ, इसलिए मुझे नगर में नहीं रहना चाहिए।
🔍 व्याख्या : राम का यह कथन उनके धर्मपालन के अटल संकल्प को प्रकट करता है। वे गुह के स्नेह को तो स्वीकार करते हैं, किंतु पिता के वचन को सर्वोपरि मानते हैं।
॥ श्लोक १७ ॥
तस्मादिच्छाम्यहं राजन् वृक्षमूलमुपाश्रितः ।
वस्तुं निशामिमां राजन् सीतया लक्ष्मणेन च ॥
📖 भावार्थ : इसलिए हे राजन्! मैं इस रात को सीता और लक्ष्मण के साथ किसी वृक्ष के नीचे रहकर बिताना चाहता हूँ।

🌙 गुह की सेवा और रात्रि-जागरण (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९ ॥
एवमुक्तस्तु गुहेन रामः सत्यपराक्रमः ।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञं गुहं हर्षयन्निव ॥
📖 भावार्थ : राम के ऐसा कहने पर गुह ने उनके लिए कुशा के आसन बिछवा दिए, और स्वयं धनुष-बाण धारण करके रात भर उनके निकट खड़े रहे।
ततः कुशमयीं शय्यां कल्पयित्वा महायशाः ।
धनुरादाय सज्यं च निषसाद गुहस्तदा ॥
📖 भावार्थ : तब महायशस्वी गुह ने कुशा की शैया बनवाई और स्वयं धनुष चढ़ाकर वहाँ बैठ गए।
॥ श्लोक २५ ॥
ते च सर्वे महात्मानो रामस्यैव हिते रताः ।
अशपन्त प्रतिज्ञाय रामं सत्यपराक्रमम् ॥
📖 भावार्थ : वे सभी महात्मा निषादगण राम के हित में तत्पर थे। उन्होंने प्रतिज्ञा करके शपथ ली कि वे रात्रि में जागकर सत्यपराक्रमी राम की रक्षा करेंगे।
॥ श्लोक २७ ॥
ततः प्रभाते विमले कृताह्निक उपस्थिते ।
रामः सुखोपविष्टस्तु गङ्गाकूले समाहितः ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् प्रातःकाल स्वच्छ होने पर और दैनिक क्रियाएँ समाप्त करके राम गंगा के तट पर स्थित होकर ध्यानमग्न हो गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 सच्ची मित्रता का आदर्श

गुह और राम का संवाद सच्ची मित्रता का अनुपम उदाहरण है। गुह बिना किसी स्वार्थ के, केवल प्रेम और भक्ति के कारण राम की सेवा में तत्पर हो जाता है। वह न तो वनवास के कारण उनसे दूर होता है, न ही राजा होने का अभिमान रखता है।

🕉️ मर्यादा का पालन

राम ने यहाँ स्पष्ट किया कि मर्यादा का पालन ही सर्वोपरि है। चाहे गुह का स्नेह कितना भी गहरा क्यों न हो, वे पितृवाक्य को तोड़कर नगर-सुख स्वीकार नहीं कर सकते। यह राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप का उत्कर्ष है।

⚔️ सेवा का स्वरूप

गुह ने रात भर जागकर राम की रक्षा की। यह केवल शारीरिक सेवा ही नहीं, अपितु भावनात्मक समर्पण भी है। वे अपने समस्त निषाद समुदाय के साथ राम की सुरक्षा में जुट जाते हैं।

🌊 गंगा का महत्त्व

इस सर्ग में गंगा तट का वर्णन पवित्रता और संयम के प्रतीक के रूप में हुआ है। राम का गंगा तट पर रात बिताना और प्रातः काल स्नान आदि करना, नदी की पावनता को भी रेखांकित करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि मित्रता का सच्चा अर्थ सेवा और समर्पण है। साथ ही, धर्म के मार्ग पर चलने के लिए कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों का पालन करना चाहिए, जैसा राम ने किया। गुह की भक्ति हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम किसी भी सामाजिक स्तर पर संभव है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।

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