कौशल्या का राम से मिलना

अयोध्याकाण्ड के छब्बीसवें सर्ग में वनवास जाने से पूर्व श्रीराम अपनी माता कौशल्या से मिलते हैं। माता पुत्र के वियोग में विलाप करती हैं और राम उन्हें धर्म और कर्तव्य का उपदेश देकर सांत्वना देते हैं।

विवरण

राम ने पिता की आज्ञा और माता कैकेयी के वचन का पालन करने के लिए वनवास स्वीकार कर लिया। वे पहले अपनी माता कौशल्या के पास जाते हैं, जिन्हें अभी तक इस समाचार की जानकारी नहीं है। माता को वनवास का समाचार सुनकर गहरा आघात लगता है। वे राम को रोकने का प्रयास करती हैं, विलाप करती हैं, और उनके साथ वन जाने की इच्छा व्यक्त करती हैं। राम माता को धैर्य बंधाते हैं, पितृभक्ति और राजधर्म का पालन करने की सलाह देते हैं। अंत में कौशल्या राम को वनवास के लिए आशीर्वाद देती हैं और उनके सुखद प्रत्यागमन की कामना करती हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग २६

(कौशल्या का राम से मिलना – मातृ-हृदय का विलाप)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षड्विंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राजा दशरथ की आज्ञा और माता कैकेयी के वचनबद्ध होने के कारण राम चौदह वर्ष के वनवास के लिए तैयार हो जाते हैं। वे पहले अपनी माता कौशल्या के पास जाते हैं, जिन्हें अभी तक इस दुःखद समाचार की जानकारी नहीं है। यह सर्ग उस मार्मिक भेंट का वर्णन करता है, जहाँ माता का वात्सल्य और पुत्र का कर्तव्य परस्पर टकराते हैं।

🚪 राम का कौशल्या के महल में प्रवेश (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततो रामो महातेजाः सौमित्रिसहितस्तदा ।
कौशल्याया निवासाय प्रययौ विनयान्वितः ॥
प्रविश्य च महार्हं स कक्ष्यां कक्ष्यां यथाक्रमम् ।
ददर्श जननीं तत्र कौशल्यां तपसि स्थिताम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; सौमित्रिसहितः = लक्ष्मण के साथ; तदा = तब; कौशल्यायाः = कौशल्या के; निवासाय = निवास स्थान को; प्रययौ = गए; विनयान्वितः = विनय सहित; प्रविश्य = प्रवेश करके; च = और; महार्हम् = अत्यन्त सुन्दर; सः = वे; कक्ष्याम्-कक्ष्याम् = एक-एक द्वार; यथाक्रमम् = क्रमशः; ददर्श = देखा; जननीम् = माता को; तत्र = वहाँ; कौशल्याम् = कौशल्या को; तपसि स्थिताम् = तपस्या में लीन।
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम, लक्ष्मण के साथ, अत्यन्त विनम्रतापूर्वक माता कौशल्या के महल में गए। क्रमशः एक-एक द्वार को पार करते हुए उन्होंने अपनी माता कौशल्या को देखा, जो तपस्या में लीन थीं।
॥ श्लोक ३-५ ॥
सा तु दृष्ट्वैव रामं तं पुत्रं प्रणयविह्वला ।
उत्थाय सहसा हर्षात्परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥
कच्चित्स्वस्ति च ते पुत्र कुशलं च निरामयम् ।
यदहं त्वां न पश्यामि दीर्घकालमरिन्दम ॥
कच्चिच्च भरतः सौम्य वर्तते त्वयि सत्कृतः ।
कच्चिद्दशरथो राजा त्वयि प्रीतो न संशयः ॥
📖 भावार्थ : पुत्र को देखते ही माता कौशल्या प्रेमविह्वल हो उठीं। शीघ्रता से उठकर उन्होंने राम को हर्षपूर्वक गले लगा लिया और कहा – हे पुत्र! क्या तुम्हारा कल्याण है? क्या तुम निरोग और सुखी हो? अरे शत्रुओं का दमन करने वाले! मैं तुम्हें बहुत दिनों से नहीं देख पाई हूँ। हे सौम्य! क्या भरत तुम्हारा सम्मान करते हैं? राजा दशरथ तुमसे प्रसन्न तो हैं निस्संदेह?
🔍 व्याख्या : माता का यह प्रश्न उनके अज्ञान को दर्शाता है। वे अभी राजमहल में घटी घटना से अनभिज्ञ हैं।

😢 वनवास का समाचार और माता का विलाप (श्लोक ६-१८)

॥ श्लोक ६-८ ॥
रामस्तु मातुर्वचनं श्रुत्वा दीनं सुदुःखितम् ।
उवाच परमोदारो वनवासचिकीर्षया ॥
अद्य प्रस्थानमेवाहं करिष्ये जननी पितुः ।
आज्ञया त्वं च मे देही सानुजस्य महावनम् ॥
कैकेय्यै राज्यमद्यैव दत्तं भरत एव च ।
प्रवेक्ष्यामि वनं मातः सीतया लक्ष्मणेन च ॥
📖 भावार्थ : राम ने माता के दीन और दुःखभरे वचन सुनकर वनवास जाने की इच्छा से अत्यन्त उदारतापूर्वक कहा – हे माता! मैं आज ही पिता की आज्ञा से प्रस्थान करूँगा। आप मुझे और मेरे अनुज को महावन जाने की आज्ञा दें। कैकेयी को राज्य दे दिया गया है और भरत युवराज बनेंगे। मैं सीता और लक्ष्मण के साथ वन को प्रस्थान करूँगा।
॥ श्लोक ९-१२ ॥
तच्छ्रुत्वा जननी वाक्यं पुत्रस्य करुणं महत् ।
निपपात महीपृष्ठे विह्वला शोकसंप्लुता ॥
तामुत्थाप्य ततो रामो भृशं शोकपरिप्लुताम् ।
उवाच मातरं वाक्यं धर्मयुक्तमिदं तदा ॥
कौशल्या राममालोक्य शोकसागरमग्नसा ।
उवाच दीनया वाचा बाष्पपर्याकुलेक्षणा ॥
यदि त्वं वनवासाय गच्छसे रघुनन्दन ।
ततो मामपि नेतव्यां सह त्वेन महावने ॥
📖 भावार्थ : पुत्र के करुण वचन सुनकर माता कौशल्या शोक से विह्वल हो धरती पर गिर पड़ीं। राम ने उन्हें उठाया और धर्मयुक्त वचन कहे। किन्तु कौशल्या, आँसुओं से भरी आँखों से, दीन स्वर में बोलीं – हे रघुनन्दन! यदि तुम वन जा रहे हो तो मुझे भी अपने साथ ले चलो।
॥ श्लोक १३-१८ ॥
न त्वां विना रघुश्रेष्ठ क्षणमेकं हि जीवितुम् ।
उत्सहे नृपतेः पत्नी राज्यं वा स्वर्गमेव वा ॥
यथा कैकेय्यहं मन्ये त्वद्वियोगेन दुःखिता ।
तथा मे जीवितं त्यक्तुं यदि त्वं न करिष्यसि ॥
📖 भावार्थ : कौशल्या कहती हैं – हे रघुश्रेष्ठ! तुम्हारे बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती। न राज्य मुझे प्रिय है, न स्वर्ग। जैसे कैकेयी ने राज्य पाकर सुखी होने की कल्पना की है, वैसे ही मैं तुम्हारे वियोग में अत्यन्त दुःखी हूँ। यदि तुम मुझे साथ नहीं ले जाओगे तो मैं प्राण त्याग दूँगी।

🕊️ राम का सांत्वना और धर्मोपदेश (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९-२३ ॥
रामस्तु मातुरार्तवादं श्रुत्वा धर्मार्थकोविदः ।
उवाच मधुरं वाक्यं शोकं संहर्तुमर्हति ॥
मातः पितुर्वचः श्रुत्वा कैकेय्याश्च हितं कृतम् ।
न मिथ्या कर्तुमिच्छामि सत्येन च शपाम्यहम् ॥
धर्म एव परो लोके सत्यं धर्मे प्रतिष्ठितम् ।
पितुर्वचनमास्थाय न मिथ्या कर्तुमुत्सहे ॥
त्वमपि धर्ममास्थाय मा शोकं कर्तुमर्हसि ।
आशीर्वादैश्च मां देहि वनवासाय मातरः ॥
अवश्यं च पितुः कार्यमिदं भवति शोभनम् ।
आश्रमे निवसिष्यामि सुखं वन्येन जीवयन् ॥
📖 भावार्थ : धर्म और अर्थ के ज्ञाता राम ने माता के आर्तनाद को सुनकर उनका शोक दूर करने के लिए मधुर वचन कहे – हे माता! पिता की आज्ञा और कैकेयी के हित के लिए यह निर्णय लिया गया है। मैं इसे असत्य नहीं करना चाहता, सत्य की शपथ है। धर्म ही संसार में सर्वोपरि है और सत्य धर्म पर स्थित है। पिता के वचन का पालन करते हुए मैं इसे मिथ्या नहीं कर सकता। आप भी धर्म का आश्रय लेकर शोक न करें। वनवास के लिए मुझे आशीर्वाद दें। पिता की आज्ञा का पालन करना ही श्रेयस्कर है। मैं वन में सुखपूर्वक रहूँगा और वन्य फलों पर निर्वाह करूँगा।
॥ श्लोक २४-२८ ॥
इति श्रुत्वा वचो रामं कौशल्या भृशदुःखिता ।
न चैनं वारयामास धर्मयुक्तं वचः स्मरा ॥
उवाच चैनं धर्मज्ञा पुत्रस्नेहपरिप्लुता ।
यद्येवं गच्छ काकुत्स्थ सुखी भव निरामयः ॥
पुनरागमनं चैव तव पश्यामि सुव्रत ।
इत्युक्त्वा परिष्वज्य रामं मूर्ध्नि च घ्रापयत् ॥
आशीर्भिश्च यथान्यायं योजयामास भामिनी ।
गच्छ पुत्र महाबाहो वनं धर्मपरायणः ॥
📖 भावार्थ : राम के ये धर्मयुक्त वचन सुनकर अत्यन्त दुःखी कौशल्या उन्हें रोक न सकीं। वे धर्मज्ञा थीं। पुत्रप्रेम में डूबी हुई बोलीं – हे काकुत्स्थ! यदि ऐसा ही है तो जाओ, सुखी रहो और निरोग रहो। हे सुव्रत! मैं तुम्हारे पुनः लौटने की कामना करती हूँ। ऐसा कहकर उन्होंने राम को गले लगाया और सिर सूँघा। फिर विधिपूर्वक आशीर्वाद देते हुए बोलीं – हे महाबाहो पुत्र! धर्मपरायण होकर वन जाओ।

🙏 कौशल्या का आशीर्वाद और राम का प्रस्थान (श्लोक २९-३५)

॥ श्लोक २९-३२ ॥
ये धर्मा धार्मिकेण त्वं राज्ञा दशरथेन च ।
आचरिष्यसि तान्पुत्र सत्यधर्मपरायणः ॥
अद्रोहेण च भूतानां वर्तस्व रघुनन्दन ।
शिवेन च पथा गच्छ पुनरेहि शिवेन च ॥
यथा ते राघवा सर्वे धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ।
तथा त्वं धर्ममास्थाय वनवासं समाप्नुहि ॥
इत्युक्त्वा जननी रामं पुनः पुनरभाषत ।
गच्छ पुत्र महाबाहो स्वस्ति ते अस्तु वनाय च ॥
📖 भावार्थ : कौशल्या ने कहा – हे पुत्र! जो धर्म धार्मिक राजा दशरथ ने तुम्हें सिखाए हैं, उनका पालन करो। सत्य और धर्म के परायण रहो। सभी प्राणियों के प्रति अद्रोह रखो। हे रघुनन्दन! कल्याणमय मार्ग से जाओ और कल्याणपूर्वक लौटो। जैसे तुम्हारे पूर्वज राघव धर्मज्ञ और सत्यवादी थे, वैसे ही तुम धर्म का आश्रय लेकर वनवास पूरा करो। माता ने बार-बार राम से कहा – हे महाबाहो पुत्र! जाओ, तुम्हारा और वन का कल्याण हो।
॥ श्लोक ३३-३५ ॥
एवमाशीर्भिरभ्यर्च्य माता पुत्रमरिंदमम् ।
सिषिचे नयनैस्तोयैर्धैर्ययुक्ता च भामिनी ॥
रामोऽपि मातुर्वचनं श्रुत्वा धर्मसमीरितम् ।
चकार मातरं भक्त्या प्रदक्षिणमरिंदमः ॥
ततो रामो महातेजाः सीतया लक्ष्मणेन च ।
निश्चक्राम गृहात्तस्मात्कौशल्याशीर्वदं गिरा ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार आशीर्वाद देकर धैर्यवती माता ने पुत्र राम को नेत्रों के जल से (अश्रुओं से) अभिषिक्त कर दिया। राम ने भी धर्मपूर्ण माता के वचन सुनकर भक्तिपूर्वक माता की प्रदक्षिणा की। तत्पश्चात् महातेजस्वी राम सीता और लक्ष्मण के साथ माता के आशीर्वाद को सिर पर धारण करते हुए वहाँ से निकल पड़े।
🔍 व्याख्या : कौशल्या का अश्रुपूरित आशीर्वाद मातृ-हृदय की अटूट श्रद्धा और वात्सल्य का प्रतीक है। राम की प्रदक्षिणा उनकी मातृभक्ति को दर्शाती है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👵 मातृ-वात्सल्य की पराकाष्ठा

इस सर्ग में कौशल्या का विलाप और राम के प्रति उनका अनन्य प्रेम मातृत्व के उच्चतम आदर्श को प्रस्तुत करता है। पुत्र के वियोग में माता की व्याकुलता हृदय को विदीर्ण कर देती है।

⚖️ धर्म और कर्तव्य का बोध

राम का अपनी माता को धर्म का उपदेश देना उनके कर्तव्यपरायणता और सत्यनिष्ठा को दर्शाता है। वे माता के प्रति प्रेम रखते हुए भी पितृवचन को सर्वोपरि मानते हैं।

🌿 त्याग और समर्पण

कौशल्या अंततः राम को वनवास के लिए आशीर्वाद देती हैं, जो उनके महान त्याग और पुत्र के कर्तव्य के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

💧 अश्रुओं का आशीर्वाद

माता के अश्रु ही उनका आशीर्वाद बन जाते हैं। यह दृश्य रामायण के सबसे करुण और मार्मिक क्षणों में गिना जाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि कर्तव्य और धर्म के मार्ग पर चलते समय प्रियजनों का वियोग भी सहना पड़ता है, किन्तु माता-पिता का आशीर्वाद ही सबसे बड़ी शक्ति है। राम की मातृभक्ति और कौशल्या का त्याग हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम कभी बाधक नहीं बनता, बल्कि कर्तव्यपथ पर प्रेरित करता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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