राजा दशरथ का विलाप

अयोध्याकाण्ड के पच्चीसवें सर्ग में राजा दशरथ, राम के वनवास के पश्चात् अत्यन्त शोकाकुल होकर विलाप करते हैं। वे अपनी पत्नी कौशल्या को अपने दुःख का कारण बताते हैं और अपने पूर्वजन्म के एक पाप (श्रवण कुमार की हत्या) का स्मरण करते हैं, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्र-वियोग का दण्ड मिला है। अन्ततः वे अपने प्राण त्याग देते हैं।

विवरण

यह सर्ग हृदयविदारक है। राम के वन जाने के बाद राजा दशरथ की अवस्था अत्यंत दयनीय हो जाती है। वे कौशल्या से कहते हैं कि राम के बिना उन्हें जीवन अब नीरस लगता है। तभी उन्हें अपने बचपन का एक स्मरण हो आता है – कैसे उन्होंने अन्धे माता-पिता के एकमात्र पुत्र श्रवण कुमार की अज्ञातवश बाण मारकर हत्या कर दी थी। श्रवण के माता-पिता ने उन्हें शाप दिया था कि जिस प्रकार वे पुत्र-वियोग में मरे हैं, उसी प्रकार तुम भी पुत्र-वियोग में मरोगे। अब वह शाप सत्य हो रहा है। यह सोचते-सोचते राजा दशरथ का हृदय टूट जाता है और वे रात्रि में ही प्राण त्याग देते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग २५

(राजा दशरथ का विलाप – शाप का स्मरण और मृत्यु)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम, लक्ष्मण और सीता के वन गमन के पश्चात् अयोध्या शोकाकुल है। राजा दशरथ अपने प्रिय पुत्र के वियोग में व्याकुल हैं। उनकी रानी कौशल्या भी अत्यन्त दुःखी हैं। इसी करुणामयी परिस्थिति में राजा दशरथ अपने जीवन की अन्तिम घटनाओं को याद करते हैं और अन्ततः प्राण त्याग देते हैं। यह सर्ग मानवीय संवेदना और कर्मफल के सिद्धान्त का अद्भुत चित्रण करता है।

😢 राजा का विलाप और कौशल्या से संवाद (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रभाते विमले रामं वनगतं नृपः ।
न शशाक स्मितं कर्तुं न च निद्रां न भोजनम् ॥
तमब्रवीत्कौशल्या तु पुत्रशोकेन पीडितम् ।
आर्यपुत्र किमर्थं त्वं नाहारयसि भोजनम् ॥
स तस्याः करुणं वाक्यं श्रुत्वा दशरथो नृपः ।
उवाच परमार्तश्च बाष्पपर्याकुलेक्षणः ॥
न मे भोजनमन्नं च न च निद्रा न जीवितम् ।
रामे वनगते वीरे प्रिये पुत्रे मनस्विनि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रातःकाल; विमले = स्वच्छ; रामम् = राम को; वनगतम् = वन को गये हुए; नृपः = राजा; न शशाक = न कर सके; स्मितम् = मुस्कान; कर्तुम् = करने; न च = और न; निद्राम् = नींद; न = नहीं; भोजनम् = भोजन; तम् = उससे; अब्रवीत् = बोली; कौशल्या = कौशल्या; तु = तो; पुत्रशोकेन = पुत्र के शोक से; पीडितम् = पीड़ित को; आर्यपुत्र = हे आर्यपुत्र; किमर्थम् = किसलिए; त्वम् = तुम; न आहारयसि = ग्रहण नहीं करते; भोजनम् = भोजन; सः = उसने; तस्याः = उसके; करुणम् = करुण; वाक्यम् = वचन; श्रुत्वा = सुनकर; दशरथः = दशरथ; नृपः = राजा; उवाच = बोले; परमार्तः = अत्यन्त दुःखी; च = और; बाष्पपर्याकुलेक्षणः = आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाले; न = नहीं; मे = मुझे; भोजनम् = भोजन; अन्नम् = अन्न; च = और; न = नहीं; निद्रा = नींद; न = नहीं; जीवितम् = जीवन; रामे = राम के; वनगते = वन में चले जाने पर; वीरे = वीर; प्रिये = प्रिय; पुत्रे = पुत्र; मनस्विनि = मनस्वी।
📖 भावार्थ : जब प्रातःकाल हुआ, तो राम के वन जाने के बाद राजा दशरथ न तो मुस्कुरा सके, न नींद ले सके और न भोजन कर सके। पुत्र के शोक से पीड़ित राजा से कौशल्या ने पूछा, "हे आर्यपुत्र! आप भोजन क्यों नहीं करते?" उसके करुण वचन सुनकर अत्यन्त दुःखी राजा दशरथ ने आँसुओं से भरे नेत्रों से कहा, "वीर, प्रिय और मनस्वी पुत्र राम के वन चले जाने पर मुझे न भोजन में रुचि है, न नींद, न जीवन में।"
🔍 व्याख्या : राजा का यह कथन उनकी पुत्र-भक्ति और वियोग की तीव्रता को दर्शाता है। वे जीवन के सभी सुखों से विमुख हो चुके हैं।

🌲 श्रवण कुमार की कथा : पूर्वजन्म का पाप (श्लोक ९-२४)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
स्मरामि चापि तत्कर्म बाल्ये मे यदृच्छया ।
कृतं पापं महाराज्ञि तन्मां दहति साम्प्रतम् ॥
अन्धस्य पितुरर्थाय मातुश्चैव तपस्विनः ।
मया सलिलमादातुं गतस्य च यदृच्छया ॥
तस्याहं श्रूयमाणस्य सलिलस्य समीपतः ।
निशम्य निनदं घोरं श्रावितं वनचारिणा ॥
अहं तु मृगमित्येव मत्वा तत्र समन्ततः ।
शरं विसृष्टवानेकं नद्याः समीपतः ॥
📖 भावार्थ : राजा दशरथ कहते हैं, "हे महारानी! मुझे अपने बचपन में किया गया एक पाप स्मरण हो रहा है, जो मुझे अब जला रहा है। एक बार मैं आखेट के लिए गया था। सरयू नदी के तट पर मैंने जल का शब्द सुना। अन्धे माता-पिता के लिए जल लेने आये उनके पुत्र (श्रवण कुमार) के जल भरने की आवाज़ को मैंने हाथी का शब्द समझा और उस दिशा में बाण चला दिया।"
🔍 व्याख्या : यह प्रसिद्ध श्रवण कुमार प्रसंग है, जहाँ राजा अज्ञातवश एक तपस्वी कुमार की हत्या कर बैठते हैं।
॥ श्लोक २०-२४ ॥
तस्य तच्छ्रुत्वा वचनं मातापित्रोः सुदुःखितः ।
प्रेतकार्याणि सर्वाणि चकार स यथाविधि ॥
ततः समिद्धे हुतभुजि प्रविष्टौ तौ समुद्विजौ ।
ददतुर्मे महच्छापं पुत्रशोकेन पीडितौ ॥
यथा वयं पुत्रशोकेन त्वया हीना विपश्चितः ।
त्वमपि त्वां प्रजाः सर्वाः पुत्रशोकेन धक्ष्यति ॥
तदिदं साम्प्रतं राज्ञि शापस्यान्तं युगे युगे ।
स्मरामि चापि तत्कर्म यदहं तेन पाप्मना ॥
📖 भावार्थ : उन माता-पिता ने पुत्र के मरने पर अत्यन्त दुःखी होकर यथाविधि अन्त्येष्टि की। फिर वे दोनों अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत हुए और मुझे शाप दिया, "जिस प्रकार हम पुत्र-शोक से पीड़ित होकर मर रहे हैं, उसी प्रकार तुम भी पुत्र-शोक में ही मरोगे।" हे रानी! आज वही शाप मुझे भोगना पड़ रहा है। मैं उस पाप को स्मरण कर रहा हूँ।

🕊️ राजा का प्राणत्याग (श्लोक २५-३३)

॥ श्लोक २५-३३ ॥
इत्युक्त्वा राजशार्दूलो विलप्य करुणं बहु ।
प्राणांस्तत्याज दुःखार्तः पुत्रशोकेन पीडितः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार राजर्षि दशरथ ने बहुत करुण विलाप करके, पुत्र-शोक से पीड़ित होकर, दुःखार्त अवस्था में अपने प्राण त्याग दिये।

🔍 व्याख्या : राजा की मृत्यु केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी है। वे पुत्र-वियोग सहन न कर सके और अपने कर्मों के फलस्वरूप यह दुःख भोगा। उनकी मृत्यु के पश्चात् अयोध्या में शोक की लहर दौड़ जाती है और आगे के घटनाक्रम का मार्ग प्रशस्त होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ कर्मफल का सिद्धान्त

इस सर्ग में कर्मफल का सिद्धान्त स्पष्ट रूप से उभरकर आता है। राजा दशरथ ने अनजाने में जो पाप किया था, उसका फल उन्हें वर्षों बाद पुत्र-वियोग के रूप में भोगना पड़ा। यह संदेश देता है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है, चाहे वह कितने भी समय बाद क्यों न हो।

💔 करुण रस का चरमोत्कर्ष

राजा दशरथ का विलाप और श्रवण कुमार के माता-पिता की दशा – ये दोनों प्रसंग करुण रस के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। वाल्मीकि जी ने यहाँ मानवीय संवेदनाओं का अत्यन्त मार्मिक चित्रण किया है, जो पाठक के हृदय को द्रवित कर देता है।

👨‍👦 पितृ-प्रेम की पराकाष्ठा

राजा दशरथ का राम के प्रति असीम प्रेम इस सर्ग में उनकी मृत्यु का कारण बनता है। वे पुत्र के वियोग में जीवित नहीं रह सके। यह पितृ-प्रेम की वह ऊँचाई है, जहाँ पुत्र ही पिता के जीवन का केन्द्र बिन्दु होता है।

📜 इतिवृत्तात्मक शैली

इस सर्ग में राजा दशरथ स्वयं अपनी कथा सुना रहे हैं, जो इसे और अधिक प्रामाणिक और हृदयस्पर्शी बनाता है। यह एक आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया प्रसंग है, जो रामायण की विशिष्टता है।

🎯 शिक्षा : हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने कर्मों के प्रति सदा सावधान रहना चाहिए। छोटी-सी भूल भी बड़ा दुःख दे सकती है। साथ ही, माता-पिता का अपने पुत्र के प्रति प्रेम असीम होता है, और उस वियोग की कल्पना भी दुःसह है। अतः हमें अपने माता-पिता की सेवा में सदा तत्पर रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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