राम के राज्याभिषेक की घोषणा

अयोध्याकाण्ड के द्वितीय सर्ग में राजा दशरथ मंत्रिपरिषद एवं नगरवासियों के समक्ष राम के राज्याभिषेक की औपचारिक घोषणा करते हैं। नगर को सजाने और आस-पास के राजाओं को आमंत्रित करने के आदेश दिए जाते हैं।

विवरण

पिछले सर्ग में राजा दशरथ द्वारा राम को युवराज बनाने का निर्णय लेने के बाद, इस सर्ग में वे इसे कार्यान्वित करने के लिए कदम बढ़ाते हैं। राजा सुमंत्र को आदेश देते हैं कि वे तुरंत मंत्रियों, पुरोहितों और नगर के प्रमुख नागरिकों को राजसभा में बुलाएँ। सभा में उपस्थित सभी लोग राजा के निर्णय का अनुमोदन करते हैं। तत्पश्चात राजा वशिष्ठ से पूछते हैं कि अभिषेक के लिए कौन-सा मुहूर्त शुभ है। वशिष्ठ पुष्य नक्षत्र के योग को श्रेष्ठ बताते हैं। राजा अत्यंत प्रसन्न होकर नगरवासियों को सूचित करने, सड़कों, भवनों और मार्गों को सजाने, तथा मित्र राजाओं एवं सामंतों को निमंत्रण भेजने का आदेश देते हैं। नगर में उत्सव का वातावरण छा जाता है और सभी प्रजाजन राम के राज्याभिषेक की बात सुनकर हर्षित होते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग २

(राम के राज्याभिषेक की घोषणा – हर्ष का क्षण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वितीयः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में राजा दशरथ ने राम को युवराज बनाने का निश्चय किया था। अब वे इस निर्णय को सर्वजन-समक्ष घोषित करते हैं और अभिषेक की तैयारियाँ आरम्भ होती हैं। समस्त अयोध्या में उल्लास छा जाता है, मानो सारा नगर उत्सव मना रहा हो। यह सर्ग उस अपूर्व हर्ष का चित्रण करता है जो अगले ही दिन गहरे शोक में बदल जाएगा।

🏛️ सभा का आयोजन और राजा का उद्बोधन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सुमन्त्रमाहूय राजा दशरथः स्वयम् ।
उवाच वचनं राजा सर्वलोकहिते रतः ॥
सुमन्त्र शीघ्रमानीय मन्त्रिणो मन्त्रकोविदान् ।
पुरोहितांश्च धर्मज्ञान् ब्राह्मणांश्च बहुश्रुतान् ॥
सन्धिविग्रहकार्यज्ञान् सामदानविशारदान् ।
आनयस्व महाप्राज्ञ यथाशास्त्र विचक्षणान् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सुमन्त्रम् = सुमंत्र को; आहूय = बुलाकर; राजा = राजा; दशरथः = दशरथ; स्वयम् = स्वयं; उवाच = बोले; वचनम् = वचन; राजा = राजा; सर्वलोकहिते रतः = सब लोगों के हित में रत; सुमन्त्र = हे सुमंत्र; शीघ्रम् = शीघ्र; आनीय = लाकर; मन्त्रिणः = मंत्रियों को; मन्त्रकोविदान् = मंत्र-कुशल; पुरोहितान् = पुरोहितों को; च = और; धर्मज्ञान् = धर्मज्ञ; ब्राह्मणान् = ब्राह्मणों को; च = और; बहुश्रुतान् = बहुश्रुत; सन्धिविग्रहकार्यज्ञान् = संधि-विग्रह के कार्यों को जानने वाले; सामदानविशारदान् = साम और दान में निपुण; आनयस्व = लाओ; महाप्राज्ञ = महाबुद्धिमान; यथाशास्त्र विचक्षणान् = शास्त्रानुसार विचक्षण।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् सब लोकों के हित में रत रहने वाले राजा दशरथ ने स्वयं सुमंत्र को बुलाकर कहा, “हे सुमंत्र! शीघ्र ही मंत्र-कुशल मंत्रियों, धर्मज्ञ पुरोहितों, बहुश्रुत ब्राह्मणों, संधि-विग्रह के ज्ञाताओं और साम-दान में निपुण विद्वानों को शास्त्रानुसार बुला लाओ।”
🔍 व्याख्या : राजा दशरथ का सभी वर्गों के प्रतिनिधियों को बुलाना उनकी लोकतांत्रिक दृष्टि और धर्म-शास्त्र के प्रति आदर को दर्शाता है।
॥ श्लोक ६-१० ॥
सुमन्त्रस्त्वरितं गत्वा समानीय स मन्त्रिणः ।
राज्ञे प्रोवाच तत्सर्वं यथोक्तं राजशासनम् ॥
ततः समेताः सहिता मन्त्रिणो राजशासनात् ।
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यं राजानं प्रतिपूज्य च ॥
यदाज्ञापय राजेन्द्र करिष्यामस्तथा वयम् ।
इत्युक्त्वा राजशार्दूलं विरेमुस्ते नराधिपाः ॥
📖 भावार्थ : सुमंत्र ने शीघ्र जाकर मंत्रियों को एकत्रित किया और राजा के आदेशानुसार उन्हें सभा में उपस्थित किया। तब राजा के आदेश से एकत्रित हुए सभी मंत्रियों ने हाथ जोड़कर राजा की पूजा की और कहा, “हे राजेन्द्र! आप जैसी आज्ञा दें, हम वैसा ही करेंगे।” ऐसा कहकर वे सब राजा के सामने चुप हो गए।

📢 राज्याभिषेक की घोषणा और अनुमोदन (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
राजापि तेषां वाक्येन प्रहृष्टवदनोऽभवत् ।
उवाच भूयो धर्मज्ञो रामाभिषवमानसः ॥
श्वः पुष्ययोगो नियत इति होवाच मन्त्रिणः ।
ततो मन्त्रिगणः सर्वो राजानं वाक्यमब्रवीत् ॥
अद्यप्रभृति लोकोऽयं सुखी भवितुमर्हति ।
यद्राज्ये राममाज्ञप्तुं त्वमिच्छसि नराधिप ॥
📖 भावार्थ : राजा उन सबके वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और राम के अभिषेक की सोचते हुए फिर बोले, “कल पुष्य नक्षत्र का योग निश्चित है।” तब सभी मंत्रियों ने राजा से कहा, “हे नरेश! आज से यह सारा संसार सुखी हो जाएगा, क्योंकि आप राम को राज्य सौंपना चाहते हैं।”
॥ श्लोक १६-२० ॥
राजा वशिष्ठमाहूय कृताञ्जलिरुवाच ह ।
भगवन् पुष्ययोगेन रामं राज्येऽभिषेचय ॥
वशिष्ठस्तु तदा वाक्यं श्रुत्वा राज्ञः स्मयन्निव ।
उवाच परमप्रीतो रामाभिषेकमानसः ॥
श्वः पुष्ययोगो नियत इति होवाच मन्त्रिणः ।
ततो मन्त्रिगणः सर्वो राजानं वाक्यमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : राजा ने वशिष्ठ को बुलाकर हाथ जोड़कर कहा, “हे भगवन्! पुष्य नक्षत्र के योग में राम का राज्याभिषेक कीजिए।” वशिष्ठ ने राजा के वचन सुनकर मुस्कुराते हुए अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा, “कल पुष्य नक्षत्र का योग निश्चित है, इसमें अभिषेक शुभ होगा।”
🔍 व्याख्या : वशिष्ठ का मुस्कुराना इस बात का सूचक है कि वे जानते थे कि यह आयोजन सहज नहीं होगा, अथवा वे राम के योग्य राज्याभिषेक से प्रसन्न थे।

🎉 नगर-सज्जा और निमंत्रण के आदेश (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः सुमन्त्रमाहूय राजा वचनमब्रवीत् ।
सुमन्त्र सर्वमाज्ञप्तं क्रियतां मम शासनम् ॥
नगरं सज्ज्यतां सर्वं पताकाभिरलङ्कृतम् ।
गन्धमाल्यैः सुगन्धैश्च धूपैश्चापि सुशोभितम् ॥
राजमार्गाः प्रकर्तव्या यथावत् सुसमाहिताः ।
उदपानाश्च कूपाश्च पुष्पैः स्रग्भिश्च पूजिताः ॥
प्रासादाश्च विमानानि चत्वराणि सभास्तथा ।
राज्ञां निमन्त्रणं चैव शीघ्रं दूतैः प्रेष्यताम् ॥
📖 भावार्थ : फिर राजा ने सुमंत्र को बुलाकर कहा, “हे सुमंत्र! मेरी आज्ञा के अनुसार सब कार्य किए जाएँ। सम्पूर्ण नगर को पताकाओं से सजाया जाए, गन्ध-माल्य, सुगन्ध और धूप से सुशोभित किया जाए। राजमार्गों को यथावत् सुव्यवस्थित किया जाए। कुओं और बावड़ियों को पुष्प और मालाओं से पूजित किया जाए। प्रासाद, विमान, चौराहे और सभाएँ भी सजाई जाएँ। और राजाओं को निमंत्रण देने के लिए शीघ्र ही दूत भेजे जाएँ।”
॥ श्लोक २६-३० ॥
इत्युक्त्वा सुमन्त्रं राजा विससर्ज महामतिः ।
स चापि सुमहातेजा राममेवान्वचिन्तयत् ॥
ततः प्रभृति सर्वत्र रामाभिषवमुत्तमम् ।
प्रशशंसुर्नराः सर्वे देवाः सर्वे सवासवाः ॥
नगरे जनता सर्वा रामं द्रष्टुं मुदान्विता ।
उत्सुका सम्बभूवाथ राज्ञो दशरथस्य च ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर महामति राजा ने सुमंत्र को विदा किया। और वे स्वयं राम के विषय में ही चिंतन करने लगे। तब से सब लोग राम के उत्तम राज्याभिषेक की प्रशंसा करने लगे, देवता भी इन्द्र सहित प्रसन्न थे। नगर की सारी जनता राम को देखने के लिए उत्सुक थी और राजा दशरथ भी आनन्दित थे।

🙏 नगरवासियों का हर्ष और राम के दर्शन की लालसा (श्लोक ३१-३८)

॥ श्लोक ३१-३५ ॥
कौतूहलसमाविष्टा नार्यो वृद्धाश्च मानवाः ।
रामस्य रूपगुणवतो द्रष्टुकामाः समागताः ॥
अलङ्कृतं नगरं दृष्ट्वा राममातुः सुखोदयम् ।
कौसल्या च यशस्विनी स्नुषाभिः सहिता तदा ॥
सीता च रामं ध्यायन्ती सुमुखी सुव्रता शुभा ।
राज्ञश्च वचनं श्रुत्वा रामाभिषवमुत्तमम् ॥
📖 भार्थ : कौतूहल से भरी हुई स्त्रियाँ और वृद्ध लोग रूप और गुणों से सम्पन्न राम के दर्शन के लिए एकत्र होने लगे। सजे हुए नगर को देखकर राम की माता कौसल्या भी अपनी पुत्रवधुओं सहित प्रसन्न हुईं। सीता भी राम का ध्यान करती हुई, सुमुखी, सुव्रता एवं शुभ थीं, और राजा द्वारा राम के उत्तम राज्याभिषेक की घोषणा सुनकर अत्यन्त हर्षित हुईं।
॥ श्लोक ३६-३८ ॥
एवं सर्वं समाज्ञप्तं राज्ञा दशरथेन तु ।
रामाभिषेकार्थं तदा नगरे सर्वसम्मते ॥
निवेद्य रामाय स्वयं राजा पुत्रस्नेहाकुलस्तदा ।
आगामि कार्यमाह स्म सुमन्त्रं पुनरेव च ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार राजा दशरथ ने राम के राज्याभिषेक के लिए नगर में सब कुछ आज्ञप्त कर दिया। फिर पुत्र-स्नेह से आकुल राजा ने राम को स्वयं बुलाकर आगामी कार्य की सूचना दी और पुनः सुमंत्र को आदेश दिया।
🔍 व्याख्या : यहाँ पुत्रस्नेहाकुल शब्द महत्वपूर्ण है – राजा का हृदय पुत्र के प्रति प्रेम से व्याकुल है, मानो आने वाले दुःख की ओर संकेत कर रहा हो।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏯 अयोध्या का वैभव

इस सर्ग में अयोध्या की सजावट और उत्सव का वर्णन नगर की समृद्धि और राम के प्रति जनता के प्रेम को दर्शाता है। यह चित्रण आने वाले वनवास के शोक को और अधिक मार्मिक बनाता है।

🤝 राजा और मंत्रिपरिषद

राजा का मंत्रियों और पुरोहितों से परामर्श करना प्राचीन भारतीय राजनीति में सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित करता है। राजा निरंकुश न होकर सबके सुझावों का स्वागत करते हैं।

⏳ काल-चक्र का संकेत

वशिष्ठ का मुस्कुराना और पुत्रस्नेहाकुल जैसे शब्द इस ओर इशारा करते हैं कि यह आनन्द क्षणभंगुर है। यह विरोधाभास ही अयोध्याकाण्ड की त्रासदी का मूल है।

👸 सीता और कौसल्या की प्रसन्नता

इस सर्ग में माता कौसल्या और सीता के हर्ष का वर्णन है, जो आगे चलकर राम के वनवास पर उनके दुःख को और अधिक हृदयविदारक बना देगा।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि जीवन के सुखद क्षणों का पूरे मन से स्वागत करना चाहिए, पर यह भी जानना चाहिए कि परिस्थितियाँ बदल सकती हैं। अयोध्यावासियों की तरह हमें भी अपने आदर्शों के प्रति प्रेम और समर्पण रखना चाहिए, क्योंकि सच्चा सुख आदर्शों की स्थापना में है, न कि भौतिक आयोजनों में।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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