राम का पिता के पास जाना

अयोध्या काण्ड का चौदहवाँ सर्ग राम के अद्वितीय धैर्य और कर्तव्यपरायणता का वर्णन करता है। माता कौशल्या से आज्ञा लेकर राम पिता दशरथ के पास जाते हैं, वहाँ उन्हें मूर्छित पिता का दृश्य देखना पड़ता है, और फिर वे वनवास के लिए प्रस्थान करते हैं।

विवरण

यह सर्ग राम के चरित्र की सबसे बड़ी कसौटी का क्षण है। पूर्व सर्ग में कैकेयी के कक्ष से निकलने के बाद, राम सबसे पहले अपनी माता कौशल्या के पास जाते हैं और उन्हें वनवास की सूचना देते हैं। कौशल्या का हृदय विदीर्ण हो जाता है, किंतु राम उन्हें धैर्य और कर्तव्य का पाठ पढ़ाते हैं। माता का आशीर्वाद लेकर राम अब अपने पिता से मिलने जाते हैं। वहाँ वे राजा दशरथ को शोक से व्याकुल और मूर्छित अवस्था में पाते हैं। राम उन्हें प्रणाम करते हैं और फिर कैकेयी से वनवास की विधिवत आज्ञा लेकर वन जाने की तैयारी करते हैं। इसी बीच लक्ष्मण क्रोधित होकर राज्य पर अधिकार करने की बात कहते हैं, लेकिन राम उन्हें समझाकर शांत करते हैं। सीता भी पति के साथ वन जाने का हठ करती हैं। अंत में, राम, सीता और लक्ष्मण राजमहल से प्रस्थान करने को उद्यत होते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग १४

(राम का पिता के पास जाना – कर्तव्य का मार्ग)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्दशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में राम ने कैकेयी से वनवास का आदेश सुन लिया और अब वे इस दुःखद समाचार को सबसे पहले अपनी माता कौशल्या को बताने गए। कौशल्या के हृदय पर मानो वज्रपात हुआ, किंतु राम ने उन्हें धर्म और कर्तव्य का बोध कराया। अब वे अपने पिता राजा दशरथ के पास जाने को उद्यत हैं, जो इस समय पुत्र-वियोग के शोक में व्याकुल हैं। यह सर्ग करुणा, धैर्य और त्याग का अद्भुत संगम है।

🙏 माता कौशल्या का आशीर्वाद और राम का धैर्य (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
स तु राज्ञः प्रतिज्ञाय वनवासं महायशाः ।
कौसल्यामभिवाद्यैव वनं गन्तुं प्रचक्रमे ॥
तमुवाचाथ कौसल्या पुत्र स्नेहेन दुःखिता ।
यदि सत्यप्रतिज्ञो मे भर्ता राजा महातपाः ॥
प्रतिज्ञातं वनं गन्तुं त्यक्त्वा मामसितेक्षण ।
इहैव तावद्वत्स्यामि यावद्रामो वनं गतः ॥
न हि मे जीवितेनार्थो न सुखेन सुखोचिता ।
त्वया विना महाबाहो शोकसागरसंप्लुता ॥
इत्युक्त्वा पतिता देवी भूमौ साश्रुमुखी तदा ।
तामुत्थाप्य ततः श्रीमान् रामः सत्यपराक्रमः ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; तु = तो; राज्ञः = राजा की; प्रतिज्ञाय = प्रतिज्ञा सुनकर; वनवासम् = वनवास; महायशाः = महान यश वाले; कौसल्याम् = कौशल्या को; अभिवाद्य = प्रणाम कर; एव = ही; वनम् = वन को; गन्तुम् = जाने के लिए; प्रचक्रमे = प्रस्थित हुए; तम् = उसे (राम को); उवाच = बोली; अथ = तब; कौसल्या = कौशल्या; पुत्र = हे पुत्र; स्नेहेन = स्नेह से; दुःखिता = दुःखी; यदि = यदि; सत्यप्रतिज्ञः = सत्यप्रतिज्ञ; मे = मेरे; भर्ता = पति; राजा = राजा; महातपाः = महान तपस्वी; प्रतिज्ञातम् = प्रतिज्ञा की; वनम् = वन को; गन्तुम् = जाने के लिए; त्यक्त्वा = त्यागकर; माम् = मुझे; असितेक्षण = सुंदर नेत्रों वाले; इह = यहाँ; एव = ही; तावत् = तब तक; वत्स्यामि = रहूँगी; यावत् = जब तक; रामः = राम; वनम् = वन को; गतः = चले गए; न = नहीं; हि = ही; मे = मेरा; जीवितेन = जीवन से; अर्थः = प्रयोजन; न = नहीं; सुखेन = सुख से; सुखोचिता = सुख भोगने योग्य; त्वया = तुम्हारे; विना = बिना; महाबाहो = महाबाहो; शोकसागर = शोक सागर में; संप्लुता = डूबी हुई; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; पतिता = गिर पड़ी; देवी = देवी; भूमौ = भूमि पर; साश्रुमुखी = अश्रुपूरित मुख वाली; तदा = तब; ताम् = उन्हें; उत्थाप्य = उठाकर; ततः = तब; श्रीमान् = श्रीमान; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्य पराक्रमी।
📖 भावार्थ : राजा की प्रतिज्ञा से वनवास का आदेश सुनकर महायशस्वी राम ने माता कौशल्या को प्रणाम किया और वन जाने के लिए प्रस्थित हुए। तब माता कौशल्या पुत्र-स्नेह से दुःखी होकर बोलीं, "हे पुत्र! यदि मेरे पति महातपस्वी राजा सत्यप्रतिज्ञ हैं और तुम्हें वन भेज रहे हैं, तो मैं यहाँ तभी तक रहूँगी जब तक तुम वन से लौटकर नहीं आ जाते। हे महाबाहो! तुम्हारे बिना मैं शोक-सागर में डूब जाऊँगी, मुझे जीवन और सुख से कोई प्रयोजन नहीं है।" ऐसा कहकर देवी कौशल्या अश्रुपूरित मुख से भूमि पर गिर पड़ीं। तब सत्यपराक्रमी श्रीराम ने उन्हें उठाया।
🔍 व्याख्या : माता कौशल्या का विलाप अत्यंत मार्मिक है। वे पुत्र के वियोग में जीवित न रह पाने की बात कहती हैं, किंतु राम उन्हें धैर्य बंधाते हैं।
॥ श्लोक ६-१० ॥
उवाच चैनां धर्मज्ञो वाक्यं वाक्यविशारदः ।
अनुज्ञाता भव क्षिप्रं गमिष्यामि वनं प्रिये ॥
पितुर्वचनमक्लीबं कर्तुमिच्छामि धर्मतः ।
त्वया चापि वरारोहे आशीर्वादः प्रदीयताम् ॥
सा त्वश्रुपूर्णवदना दुःखोपहतचेतना ।
आशीः प्रयुक्ता कौसल्या पुत्रस्यार्थे यथाविधि ॥
गच्छ पुत्र महाबाहो सुखी भव सदा प्रिय ।
यथाभिलषितं धर्मं प्राप्नुहि त्वमनिन्दित ॥
स तथा मातरं वाक्यमुक्त्वा राजनिवेशनम् ।
प्रविवेश महातेजाः पितरं द्रष्टुमिच्छया ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मज्ञ और वाक्यविशारद राम ने उनसे कहा, "हे माता! मुझे शीघ्र ही वन जाने की आज्ञा दीजिए। मैं धर्मपूर्वक पिता के वचन का पालन करना चाहता हूँ। आप मुझे आशीर्वाद दीजिए।" तब अश्रुपूर्ण मुख और दुःख से व्याकुल माता कौशल्या ने पुत्र के लिए यथाविधि आशीर्वाद दिया, "हे पुत्र महाबाहो! तुम सुखी रहो। तुम धर्म की प्राप्ति करो।" माता से इस प्रकार कहकर महातेजस्वी राम पिता दशरथ से मिलने की इच्छा से राजमहल में प्रविष्ट हुए।
🔍 व्याख्या : राम ने माता को धैर्य बंधाया और उनसे आशीर्वाद लिया। यह दृश्य राम के मातृ-भक्ति और पितृ-आज्ञापालन के बीच संतुलन को दर्शाता है।

👑 पिता दशरथ के पास – मूर्छित राजा का दृश्य (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
स ददर्श ततो राज्ञः शयानं पाण्डुरं गृहे ।
व्यसनाभिपरिक्लिष्टं मुह्यमानमचेतनम् ॥
रामं दृष्ट्वा तु राजेन्द्रः प्रियं पुत्रमचेतनम् ।
उत्थातुमैच्छद्वेगेन न शशाक च मूर्छितः ॥
तं दृष्ट्वा पितरं रामो दीनं शोकपरिप्लुतम् ।
अभ्यधावत वेगेन प्रगृह्य च पपात ह ॥
स राजपुत्रः पितरं प्रणम्य च महायशाः ।
उवाच वचनं धीमान् किमिदानीं करोमि भोः ॥
त्वया नियुक्तो राजेन्द्र वनं गच्छामि मानद ।
किं त्वन्यदनुशास्त्वां वै करवाणि तथेति ह ॥
📖 भावार्थ : वहाँ राम ने राजा दशरथ को महल में पड़े हुए देखा। वे व्याकुल, मूर्छित और अचेत से हो रहे थे। राजेन्द्र ने अपने प्रिय पुत्र राम को देखा, किंतु मूर्छा के कारण वे वेग से उठना चाहते हुए भी न उठ सके। राम ने पिता को दीन और शोक से व्याकुल देखा। वे वेग से उनके पास दौड़े और उन्हें पकड़कर गिर पड़े। महायशस्वी राजपुत्र राम ने पिता को प्रणाम किया और धीमान् वचन बोले, "हे भोः! मैं अब क्या करूँ? हे राजेन्द्र! हे मानद! आपने जैसा आदेश दिया है, वैसे ही मैं वन जा रहा हूँ। क्या आप मुझे कोई अन्य आज्ञा देना चाहते हैं?"
🔍 व्याख्या : यहाँ राम ने पिता की दशा देखकर भी धैर्य नहीं खोया और विनम्रतापूर्वक उनसे आज्ञा माँगी। यह उनके अद्वितीय संयम और कर्तव्यपरायणता का प्रमाण है।
॥ श्लोक १६-२० ॥
इत्युक्त्वा वचनं रामो राजानं पुनरब्रवीत् ।
कैकेयीमभिवाद्यैव गमिष्यामि वनं प्रति ॥
स तु राजा महातेजाः पुत्रशोकेन पीडितः ।
नोवाच किंचिद्रामं तु व्रीडितो दुःखितस्तदा ॥
तमुवाच ततः रामः कैकेयीमिदमादरात् ।
अनुजानीहि मां देवि गमिष्यामि वनं प्रति ॥
यथानुशिष्टा वैदेही लक्ष्मणश्च महाबलः ।
गमिष्यन्ति मया सार्धं वनं सुमहदद्भुतम् ॥
तमुवाच ततः कैकेयी गच्छ राम यथासुखम् ।
यावद्वर्षाणि नव च पञ्च चैव नरोत्तम ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर राम ने राजा से पुनः कहा, "कैकेयी को प्रणाम करके ही मैं वन जाऊँगा।" किंतु महातेजस्वी राजा पुत्र-शोक से पीड़ित होने के कारण लज्जा और दुःख से कुछ भी न बोल सके। तब राम ने आदरपूर्वक कैकेयी से कहा, "हे देवि! मुझे आज्ञा दीजिए, मैं वन जा रहा हूँ। आपके कहने के अनुसार वैदेही सीता और महाबली लक्ष्मण भी मेरे साथ उस अद्भुत महान वन को जाएँगे।" तब कैकेयी ने कहा, "हे नरोत्तम राम! तुम चौदह वर्षों के लिए यथासुख वन जाओ।"

🔥 लक्ष्मण का क्रोध और सीता का समर्पण (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु लक्ष्मणः क्रोधसंरक्तलोचनः ।
उवाच परुषं वाक्यं कैकेयीं प्रति वीर्यवान् ॥
न त्वं स्त्रीति सुकेशीति कुलं ह्यस्मद्वशे स्थितम् ।
यद्राज्यमिच्छसे प्राप्तुं रामे वनमुपस्थिते ॥
न च शक्ष्यसि कल्याणि राज्यं प्राप्तुं कथंचन ।
यदि रामो वनं याति मया सार्धं महाबलः ॥
अहमद्यैव ते दर्पं नयामि सबलानुगः ।
हत्वा त्वां सह भर्त्रा ते राज्यं प्राप्स्याम्यहं ध्रुवम् ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणः क्रोधात्कैकेयीं प्रति वीर्यवान् ।
धनुरादाय सबलः प्रतस्थे राममन्तिकात् ॥
📖 भावार्थ : यह सुनकर लक्ष्मण के नेत्र क्रोध से लाल हो गए और उन्होंने कैकेयी के प्रति कठोर वचन कहे, "हे सुकेशि! तुम स्त्री हो, इसलिए (तुम्हें नहीं मारता) किंतु हमारा कुल तुम्हारे वश में नहीं है। क्या तुम राम के वन जाने पर राज्य पाना चाहती हो? हे कल्याणि! यदि महाबली राम मेरे साथ वन जाएँगे, तो तुम राज्य कदापि नहीं पा सकोगी। मैं आज ही अपने बल और सेना के साथ तुम्हारा दर्प चूर कर दूँगा। तुम्हें और तुम्हारे पति (भरत) को मारकर मैं निश्चित ही राज्य प्राप्त करूँगा।" ऐसा कहकर वीरवर लक्ष्मण क्रोध से धनुष उठाकर राम के पास से प्रस्थान करने लगे।
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण का क्रोध अन्याय के प्रति उनके विद्रोह को दर्शाता है। वे राम के प्रति अपने असीम प्रेम और समर्पण के कारण कैकेयी के षड्यंत्र को सहन नहीं कर पाते।
॥ श्लोक २६-३० ॥
तमुवाच ततो रामः सान्त्वपूर्वं महायशाः ।
न लक्ष्मण त्वया युक्तमिदानीं कर्तुमीदृशम् ॥
धर्ममेवाभिरक्षस्व पितुर्वचनमेव च ।
सत्येन च शपे लक्ष्मण धर्म एव हि मे गतिः ॥
न ह्यहं कामये राज्यं सुखं वा जीवितमेव वा ।
यदि धर्मं न पालयेयं पितुर्वचनमेव च ॥
एवमुक्त्वा तु धर्मज्ञो लक्ष्मणं रघुनन्दनः ।
सीतामुवाच धर्मज्ञां वैदेहीं जनकात्मजाम् ॥
📖 भावार्थ : तब महायशस्वी राम ने सांत्वनापूर्वक कहा, "हे लक्ष्मण! तुम्हें ऐसा करना उचित नहीं है। तुम धर्म की रक्षा करो और पिता के वचन का पालन करो। हे लक्ष्मण! मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ कि धर्म ही मेरी गति है। यदि मैं धर्म और पिता के वचन का पालन न करूँ, तो मुझे राज्य, सुख और जीवन भी नहीं चाहिए।" धर्मज्ञ रघुनंदन राम ने ऐसा कहकर धर्मज्ञा जनकात्मजा वैदेही सीता से कहा।
🔍 व्याख्या : राम ने लक्ष्मण के क्रोध को शांत किया और उन्हें धर्म और पितृवाक्यपालन का महत्व समझाया। यह राम के आदर्श चरित्र का सर्वोत्तम उदाहरण है।

🌸 सीता का पति के साथ वन जाने का निर्णय (श्लोक ३१-३८)

॥ श्लोक ३१-३५ ॥
सीता तु वचनं श्रुत्वा रामस्य प्रियकाम्यया ।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा यथार्हं प्रतिभाषिणी ॥
यदि त्वं वनमुद्दिश्य गन्तुं तात प्रधारितः ।
अहमपि त्वया सार्धं गमिष्यामि वनं प्रति ॥
न मां विहातुमर्हसि वनं गच्छन्नरोत्तम ।
धर्म एव हि मे नाथो नान्यो नाथस्त्वया विना ॥
यथा पितृगृहे नित्यं तथा राजकुले अपि ।
वत्स्यामि त्वयि धर्मज्ञे न मे कश्चिद्विशेषणः ॥
त्वया हीनां तु मां नूनं शोकसागरपीडिताम् ।
न कश्चित्परिपश्येत धर्म एव हि मे गतिः ॥
📖 भावार्थ : सीता ने राम के प्रिय की इच्छा से उनका वचन सुनकर हाथ जोड़कर यथोचित उत्तर दिया, "हे तात! यदि आप वन जाने का निश्चय कर चुके हैं, तो मैं भी आपके साथ वन जाऊँगी। हे नरोत्तम! वन जाते समय आप मुझे छोड़ने योग्य नहीं हैं। आपके बिना मेरा कोई नाथ नहीं, केवल धर्म ही मेरा नाथ है। जैसे मैं पितृगृह में रहती थी, वैसे ही राजकुल में रहूँगी, क्योंकि आप धर्मज्ञ हैं, मुझमें कोई भेद नहीं है। आपसे हीन मुझे शोकसागर से पीड़ित देखकर कोई नहीं बचा सकता, धर्म ही मेरी गति है।"
🔍 व्याख्या : सीता का यह कथन पतिव्रता धर्म का उत्कृष्ट उदाहरण है। वे पति के सुख-दुःख की सहभागिनी बनने को कटिबद्ध हैं।
॥ श्लोक ३६-३८ ॥
इत्युक्त्वा सा तदा सीता रोदनं चक्रे दुःखिता ।
तामुवाच ततः रामः सीतां सान्त्वपूर्वकम् ॥
यथा त्वमुक्तवती देवि तथा कर्तास्मि नान्यथा ।
अद्यैव वनं गच्छावः सुमन्त्रस्त्वरयान्वितः ॥
इत्युक्त्वा राघवः सीतां सुमन्त्रं पुनरब्रवीत् ।
शीघ्रमानय वाहिन्यः सज्जीभवन्तु मा चिरम् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर सीता दुःखी होकर रोने लगीं। तब राम ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, "हे देवि! तुमने जैसा कहा है, वैसा ही करूँगा, अन्यथा नहीं। आज ही हम वन चलें। सुमंत्र शीघ्रता करें।" ऐसा कहकर राघव ने सुमंत्र से फिर कहा, "शीघ्र ही रथ ले आओ, सब तैयार हो जाएँ, देर न हो।"
🔍 व्याख्या : राम ने सीता के साथ चलने का निर्णय स्वीकार कर लिया और सुमंत्र को रथ लाने का आदेश दिया। अब वनवास का प्रस्थान निकट है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👪 पितृ-भक्ति और मातृ-भक्ति का संतुलन

इस सर्ग में राम ने माता कौशल्या के प्रति करुणा और पिता दशरथ के प्रति आज्ञाकारिता का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत किया। वे माता के आशीर्वाद से पिता के पास जाते हैं और उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। यह एक आदर्श पुत्र का चरित्र है।

⚡ लक्ष्मण का क्रोध और राम का धैर्य

लक्ष्मण का क्रोध और राम का धैर्य दो विपरीत भावनाओं को दर्शाता है। लक्ष्मण अन्याय के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक हैं, जबकि राम धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर अडिग रहते हैं। राम लक्ष्मण को समझाते हैं कि धर्म का पालन ही सर्वोपरि है।

💖 सीता का पतिव्रता धर्म

सीता का पति के साथ वन जाने का निर्णय उनके पतिव्रता धर्म और समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है। वे कहती हैं कि पति के बिना उनका कोई नाथ नहीं। यह भारतीय नारी के आदर्श चरित्र का प्रतीक है।

🎭 करुण रस का पराकाष्ठा

इस सर्ग में करुण रस अपने चरम पर है। माता कौशल्या का विलाप, पिता दशरथ की मूर्छा, और राम-सीता-लक्ष्मण का वनवास के लिए प्रस्थान पाठक के हृदय को द्रवित कर देता है। यह अयोध्याकाण्ड के सर्वाधिक मार्मिक क्षणों में से एक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में कर्तव्य का पालन सबसे ऊपर है। राम ने राज्य, सुख और आराम का त्याग करके पिता के वचन का पालन किया। हमें भी अपने कर्तव्यों से विचलित नहीं होना चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों। साथ ही, परिवार के प्रति प्रेम और समर्पण भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जैसा सीता और लक्ष्मण ने दिखाया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।