सुमंत्र द्वारा राम को बुलाना

राजा दशरथ, कैकेयी के कठोर वचनों से व्यथित होकर, सुमंत्र को राम को बुलाने का आदेश देते हैं। सुमंत्र राम के महल जाते हैं और उन्हें राजा के बुलावे की सूचना देते हैं। राम, सीता और लक्ष्मण सहित पिता के दर्शन के लिए तुरंत राजमहल की ओर प्रस्थान करते हैं।

विवरण

यह सर्ग अयोध्या के राजमहल में घटित अत्यंत मार्मिक दृश्य का वर्णन करता है। कैकेयी द्वारा माँगे गए दो वरदानों – राम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक – को सुनकर राजा दशरथ शोक से व्याकुल हो जाते हैं। वे मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं और कैकेयी के आग्रह पर पुनः चेतना प्राप्त करते हैं। अंततः, राजा की आज्ञा से सुमंत्र राम को बुलाने के लिए उनके निवास पर जाते हैं। सुमंत्र विनम्रतापूर्वक राम को सूचित करते हैं कि महाराज उनसे तुरंत मिलना चाहते हैं। राम, इस आकस्मिक बुलावे को किसी शुभ समाचार का सूचक मानकर, सीता और लक्ष्मण के साथ राजमहल की ओर प्रस्थान करते हैं। इस सर्ग में राजा की दयनीय दशा, सुमंत्र की निष्ठा, और राम की पितृभक्ति स्पष्ट झलकती है। यह सर्ग उस दुखद घटनाक्रम की शुरुआत है, जो राम के वनवास की ओर ले जाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग १३

(सुमंत्र द्वारा राम को बुलाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोदशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में कैकेयी ने दो वरदान माँग लिए – राम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक। राजा दशरथ यह सुनकर शोक के सागर में डूब गए। अब कैकेयी के आग्रह पर वे सुमंत्र को राम को बुलाने का आदेश देते हैं। यह सर्ग उस मार्मिक क्षण का वर्णन करता है जब राम को पिता के दर्शन के लिए बुलाया जाता है, बिना यह जाने कि उनके लिए क्या भयावह समाचार प्रतीक्षा कर रहा है।

💔 राजा दशरथ की दयनीय दशा और सुमंत्र को आदेश (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः स राजा दुःखार्तः कैकेय्या वाक्यमब्रवीत् ।
सन्निकृष्टे तदा रामे सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ॥
सुमन्त्र गच्छ त्वरितं रामं सौमित्रिणा सह ।
सीतया चापि सहितं मम वाक्यादिहानय ॥
इत्युक्त्वा स तु राजर्षिर्बाष्पसंदिग्धया गिरा ।
न शशाक तदा वाक्यं समापयितुमातुरः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सः = वह; राजा = राजा; दुःखार्तः = दुःख से पीड़ित; कैकेय्याः = कैकेयी की; वाक्यम् = बात सुनकर; अब्रवीत् = बोले; सन्निकृष्टे = समीप; तदा = तब; रामे = राम के; सुमन्त्रम् = सुमंत्र से; इदम् = यह; अब्रवीत् = कहा; सुमन्त्र = हे सुमंत्र; गच्छ = जाओ; त्वरितम् = शीघ्र; रामम् = राम को; सौमित्रिणा = लक्ष्मण के; सह = साथ; सीतया = सीता के; चापि = और भी; सहितम् = सहित; मम = मेरे; वाक्यात् = वचन से; इह = यहाँ; आनय = ले आओ; इति = ऐसा; उक्त्वा = कहकर; सः = वह; तु = तो; राजर्षिः = राजर्षि; बाष्पसंदिग्धया = आँसुओं से भरी; गिरा = वाणी से; न = नहीं; शशाक = सका; तदा = तब; वाक्यम् = वाक्य; समापयितुम् = समाप्त करने के लिए; आतुरः = व्याकुल।
📖 भावार्थ : तब वे राजा दशरथ, कैकेयी के वचनों से अत्यन्त दुःखी होकर, राम के समीप होने पर भी, सुमंत्र से यह कहने लगे: "हे सुमंत्र! शीघ्र जाओ और राम को लक्ष्मण और सीता सहित मेरे वचन से यहाँ बुला लाओ।" ऐसा कहकर वे राजर्षि आँसुओं से भरी वाणी में आगे कुछ न कह सके और व्याकुल हो गए।
🔍 व्याख्या : राजा की यह अधूरी वाणी उनके हृदय के भारीपन और असहायता को दर्शाती है। वे राम को बुला तो रहे हैं, परंतु उन्हें यह बताने का साहस नहीं कि आगे क्या होने वाला है।
॥ श्लोक ४-१० ॥
सुमन्त्रस्तु तदा राज्ञः प्रियं वाक्यमनुत्तमम् ।
श्रुत्वा प्रहृष्टवदनः प्रत्युवाच महीपतिम् ॥
प्रियं खलु ममाप्येतद्यद्राज्ये राममात्थ वै ।
यौवराज्येन भविता राघवः प्रीतिमांस्तव ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ शीघ्रं यत्र रामः सलक्ष्मणः ।
सीतया सह धर्मात्मा राजपुत्रो महायशाः ॥
📖 भावार्थ : सुमंत्र राजा का यह वचन सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए (क्योंकि वे समझे कि राम के राज्याभिषेक की तैयारी है) और राजा से बोले, "हे राजन्! आपका यह निर्णय मुझे अत्यन्त प्रिय है। राघव के युवराज बनने से आपको बड़ी प्रसन्नता होगी।" ऐसा कहकर वे शीघ्र ही उस स्थान पर गए, जहाँ लक्ष्मण और सीता सहित धर्मात्मा महायशस्वी राजकुमार राम विराजमान थे।
🔍 व्याख्या : सुमंत्र अभी तक राम के राज्याभिषेक की योजना से अवगत हैं और उन्हें लगता है कि राजा ने इसी के लिए राम को बुलाया है। वे प्रसन्नतापूर्वक राम के पास जाते हैं, यह नहीं जानते कि राजमहल में क्या बीत रही है।

🏃 सुमंत्र का राम के महल में आगमन (श्लोक ११-१८)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
स गत्वा राघवं प्राप्य सुमन्त्रो वाक्यमब्रवीत् ।
राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति त्वरितं रघुनन्दन ॥
सीतया सहितं वीर लक्ष्मणेन च धीमता ।
इत्युक्त्वा प्रणिपत्याथ सुमन्त्रो विरराम ह ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं सुमन्त्रस्य महात्मनः ।
सीतया सहितः श्रीमान् लक्ष्मणेन च धीमता ॥
प्रययौ त्वरितो राज्ञः सकाशं रघुनन्दनः ।
📖 भावार्थ : वहाँ जाकर सुमंत्र ने राम से कहा, "हे रघुनन्दन! राजा आपको शीघ्र देखना चाहते हैं, सीता और लक्ष्मण सहित।" ऐसा कहकर सुमंत्र ने प्रणाम किया और चुप हो गए। राम ने महात्मा सुमंत्र के वचन सुनकर, सीता और लक्ष्मण के साथ शीघ्र ही राजा के पास जाने के लिए प्रस्थान किया।
॥ श्लोक १६-१८ ॥
प्रविश्य च महातेजा राजभवनमातुरः ।
ददर्श पितरं वृद्धं यान्तं शोकपरायणम् ॥
रामः सीता च लक्ष्मणः प्रणेमुश्चरणौ गुरोः ।
न चैनं प्रत्यगृह्णात्तु राजा दशरथः स्वयम् ॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी राम ने राजभवन में प्रवेश किया और अपने वृद्ध पिता को अत्यन्त शोकाकुल देखा। राम, सीता और लक्ष्मण ने गुरु के चरणों में प्रणाम किया, परंतु राजा दशरथ उन्हें ग्रहण नहीं कर सके (वे इतने व्याकुल थे)।
🔍 व्याख्या : राजा की यह स्थिति बताती है कि उनका हृदय कितना भारी है। वे अपने प्रिय पुत्र को देखकर भी उसका अभिनंदन नहीं कर पा रहे, क्योंकि उन्हें पता है कि अब वे उसे वन भेजने वाले हैं।

🚪 राम, सीता और लक्ष्मण का राजमहल में प्रवेश (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९-२३ ॥
ततो रामो महातेजाः पितरं दीनमानसः ।
उवाच वचनं धीमान् भक्तिमान् प्रियदर्शनः ॥
किमर्थं नाभिनन्दामि तात मां प्रति साम्प्रतम् ।
प्रसादं चापि न करोषि मयि स्नेहसमन्विते ॥
अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ।
यदहं त्वां प्रपश्यामि प्रसन्नं वदनं तव ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम, जो अत्यन्त भक्त और प्रियदर्शी थे, अपने दीन-हीन पिता से बोले, "हे तात! आज आप मेरा अभिनंदन क्यों नहीं कर रहे? स्नेह से भरे हुए मेरे प्रति आप प्रसन्नता क्यों नहीं दिखा रहे? आज मेरा जन्म सफल है, आज मेरा तप सफल है, क्योंकि मैं आपके प्रसन्न मुख को देख रहा हूँ।"
🔍 व्याख्या : राम अभी अनजान हैं; वे पिता की दशा देखकर चिंतित हैं, परंतु यह नहीं जानते कि उनके पिता का हृदय किस वेदना से भरा है।
॥ श्लोक २४-२८ ॥
राजा तु वचनं श्रुत्वा रामस्य प्रियदर्शिनः ।
बाष्पपूर्णमुखो दीनो न किंचित्प्रत्यभाषत ॥
ततो रामो महातेजाः पितरं दीनमानसः ।
उवाच वचनं धीमान् भक्तिमान् प्रियदर्शनः ॥
किमर्थं नाभिनन्दामि तात मां प्रति साम्प्रतम् ।
प्रसादं चापि न करोषि मयि स्नेहसमन्विते ॥
अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ।
यदहं त्वां प्रपश्यामि प्रसन्नं वदनं तव ॥
📖 भावार्थ : राजा ने राम के ये प्रिय वचन सुनकर भी, आँसुओं से भरे मुख से दीन होकर कुछ उत्तर नहीं दिया। तब राम ने पुनः कहा, "हे तात! क्या मुझसे कोई अपराध हुआ है? यदि हाँ, तो कृपया क्षमा करें। आप मौन क्यों हैं? आपके इस मौन से मेरा हृदय व्याकुल हो रहा है।"

🔮 रहस्यमय मौन – अगले सर्ग की ओर

॥ श्लोक २९-३४ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
राजा दशरथो दीनो विललाप सुदुःखितः ॥
न चैनं प्रत्यभाषिष्ट शोकेनाभिपरिप्लुतः ।
ततो रामः पुनर्वाक्यं सुमन्त्रं प्रत्यभाषत ॥
किमर्थं पितरं दीनं न जानामि महामते ।
ब्रूहि मे सर्वमेव त्वं यदर्थमिह चागतः ॥
📖 भावार्थ : राम के इन वचनों को सुनकर भी राजा दशरथ, शोक से आक्रांत होकर, कुछ नहीं बोल सके। तब राम ने सुमंत्र से पूछा, "हे महामते! पिताजी इस प्रकार दीन क्यों हैं? मैं कुछ नहीं समझ पा रहा। आप ही बताइए, आप किस उद्देश्य से मुझे लेने आए थे?"
🔍 व्याख्या : राम की यह जिज्ञासा और राजा का मौन, अगले सर्ग (१४) में कैकेयी के कठोर वचनों के माध्यम से टूटेगा। यह सर्ग इसी रहस्य और व्याकुलता के साथ समाप्त होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 पितृहृदय का विलाप

इस सर्ग में राजा दशरथ का मौन ही उनकी सबसे बड़ी पीड़ा का प्रतीक है। वे राम से कह नहीं पा रहे कि उनके साथ क्या अन्याय होने वाला है। यह मौन उनकी असहायता और पुत्र-प्रेम का चरम उदाहरण है।

🚩 राम की पितृभक्ति

राम का पिता के प्रति अगाध प्रेम और आदर इस सर्ग में स्पष्ट है। वे बिना किसी संदेह के पिता के बुलावे पर तुरंत चल देते हैं और उनके मौन को देखकर व्याकुल हो जाते हैं, यह सोचकर कि कहीं उनसे कोई गलती तो नहीं हुई।

📜 सुमंत्र की निष्ठा

सुमंत्र, राजा के परम विश्वासपात्र मंत्री हैं। वे बिना किसी प्रश्न के आज्ञा का पालन करते हैं और राम को लेने जाते हैं। उनकी निष्ठा और कर्तव्यपरायणता राजसेवक के आदर्श को दर्शाती है।

🌗 अज्ञात का भय

यह सर्ग रहस्य और अनिश्चितता के वातावरण का निर्माण करता है। राम, सीता और लक्ष्मण राजमहल की ओर बढ़ रहे हैं, यह नहीं जानते कि वहाँ उनके लिए क्या रखा है। यही अज्ञात भविष्य की ओर संकेत करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि जीवन में कभी-कभी परिस्थितियाँ हमारे हाथ से बाहर हो जाती हैं। राजा दशरथ की भाँति हम भी किसी स्थिति को बदलने में असमर्थ हो सकते हैं, लेकिन राम की भाँति हमें धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा से अपने मार्ग पर चलते रहना चाहिए। पिता के प्रति सम्मान और आज्ञाकारिता का यह अद्वितीय उदाहरण हमें प्रेरणा देता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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