दशरथ का मोह और पश्चाताप
अयोध्याकाण्ड के बारहवें सर्ग में राजा दशरथ के करुण विलाप और उनके द्वारा किए गए पाप (श्रवण कुमार वध) के स्मरण का वर्णन है। पुत्र वियोग में व्याकुल राजा रात्रि में रानी कौशल्या से अपनी व्यथा बताते हैं और अंततः प्राण त्याग देते हैं।
विवरण
यह सर्ग अत्यंत मार्मिक है। राम के वन गमन के पश्चात् राजा दशरथ शोक में डूब जाते हैं। रात्रि के समय वे रानी कौशल्या के पास जाते हैं और उनसे अपने हृदय की वेदना साझा करते हैं। वे बताते हैं कि उन्हें एक प्राचीन पाप का स्मरण हो रहा है – जब वे युवा थे, तब उन्होंने अंधकूप में श्रवण कुमार को सरयू नदी के तट पर जल लेते समय भूल से बाण मार दिया था। श्रवण कुमार के वृद्ध माता-पिता ने उन्हें श्राप दिया था कि वे भी पुत्र-वियोग में ही मरेंगे। अब वह श्राप सत्य हो रहा है। इस प्रकार पुत्र-शोक और श्राप की स्मृति से व्यथित होकर राजा दशरथ का प्राणान्त हो जाता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग १२
(दशरथ का मोह और पश्चाताप – पुत्र-वियोग में अंतिम साँसें)
🔆 प्रस्तावना : राम, लक्ष्मण और सीता वन को चले गए हैं। नगर में शोक छाया है। राजा दशरथ का हृदय पुत्र-वियोग में व्याकुल है। रात्रि के समय वे रानी कौशल्या के पास जाते हैं और अपनी वेदना प्रकट करते हैं। इसी दौरान उन्हें युवावस्था में किए गए एक पाप का स्मरण होता है – श्रवण कुमार की हत्या का प्रसंग। यह सर्ग उस करुण कथा और राजा की अंतिम घड़ियों का वर्णन करता है।
💔 राजा दशरथ का विलाप (श्लोक १-५)
रामे वनं गते राजा विललाप सुदुःखितः ॥
कौसल्या राममेवैका चिन्तयन्ती तपस्विनी ।
न शर्म लेभे दुःखार्ता नष्टचन्द्रेव नक्तवत् ॥
🏹 श्रवण कुमार वध की स्मृति (श्लोक ६-१५)
कृतं पुरा महाराज्ञि तच्छृणुष्व वदामि ते ॥
अहं हि बालभावेन राजपुत्रो महीपते ।
श्रुतवानस्मि विस्तीर्णे यान्तं शब्दं निशाचरम् ॥
ततो मया शरो मुक्तो यत्र शब्दो निशम्यते ।
गतासुर्व्याघ्रसिंहानां मध्ये संघो निपातितः ॥
रामव्यसनजं दुःखं ममैतत्संप्रवर्तते ॥
🕊️ राजा का अंतिम समय (श्लोक १६-२२)
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
⚖️ कर्म का सिद्धांत
यह सर्ग स्पष्ट करता है कि व्यक्ति को अपने कर्मों के फल से मुक्ति नहीं मिलती। राजा दशरथ ने अनजाने में श्रवण कुमार का वध किया था, किंतु उस पाप का फल उन्हें वर्षों बाद पुत्र-वियोग के रूप में भोगना पड़ा।
👴 मातृ-पितृ भक्ति का आदर्श
श्रवण कुमार की कथा माता-पिता के प्रति अटूट समर्पण का उदाहरण है। वे अपने अंधे माता-पिता की सेवा के लिए जल लेने गए थे और उसी कर्तव्यपालन में उनकी मृत्यु हुई।
😢 दशरथ का पश्चाताप
राजा दशरथ का पश्चाताप यह दर्शाता है कि पाप करने के बाद उसका स्मरण और ग्लानि भी एक प्रकार का कष्ट है। उन्होंने अपनी मृत्यु से पूर्व कौशल्या से अपनी भूल स्वीकार की और क्षमा माँगी।
🌑 अयोध्या में शोक की रात
इस सर्ग के साथ ही अयोध्या में अंधकार छा जाता है। राम के वनगमन के बाद राजा की मृत्यु से नगर अनाथ हो जाता है। यह करुणा का चरम बिंदु है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने कर्मों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। छोटी-सी भूल भी बड़ा दुःख दे सकती है। साथ ही, माता-पिता की सेवा का महत्व और पुत्र-प्रेम की गहराई भी समझ में आती है। राजा दशरथ का पश्चाताप और मृत्यु हमें यह भी सिखाती है कि समय रहते पाप का प्रायश्चित कर लेना चाहिए, अन्यथा वही पाप हमें निरंतर जलाता रहता है।