कबंध से भेंट

राम और लक्ष्मण की कबंध राक्षस से भेंट, उसका वध और सुग्रीव से मित्रता का उपदेश।

विवरण

इस सर्ग में श्रीराम और लक्ष्मण, सीता की खोज में दण्डकारण्य में भ्रमण करते हुए, एक भयंकर राक्षस कबंध से मिलते हैं। कबंध आकाश में उड़ने वाला, बिना सिर और गर्दन का, विशाल भुजाओं वाला विचित्र दानव था। वह राम-लक्ष्मण पर आक्रमण करता है, किन्तु दोनों भाई उसकी भुजाओं को काट डालते हैं। मरणासन्न कबंध अपने वास्तविक रूप (गन्धर्व) में आ जाता है और बताता है कि वह एक शाप के कारण इस रूप में था। वह राम को सलाह देता है कि वे ऋष्यमूक पर्वत पर निवास करने वाले वानरराज सुग्रीव से मित्रता करें, जो सीता के विषय में जानकारी दे सकते हैं। इस प्रकार यह सर्ग राम-सुग्रीव मिलन की भूमिका तैयार करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ११३

(कबंध से भेंट – सुग्रीव की ओर संकेत)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोदशाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में भटकते हुए राम और लक्ष्मण दण्डकारण्य के घोर वन में प्रवेश करते हैं। वहाँ उनका सामना एक विचित्र राक्षस कबंध से होता है। यह सर्ग उस भेंट, संघर्ष और अंततः कबंध द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन का वर्णन करता है, जो राम को सुग्रीव तक ले जाएगा।

🌲 दण्डकारण्य में प्रवेश और कबंध दर्शन (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रविश्य रामस्तु दण्डकारण्यमव्ययम् ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा ददर्श विपुलं भयम् ॥
स तु दण्डकमासाद्य रामः सह लक्ष्मणेन वै ।
ददर्श विपुलं कायं कबन्धं नाम राक्षसम् ॥
महोरस्कं महाकायं महाबाहुं महाबलम् ।
विकृतं घोरसंकाशं निर्मांसं रुधिरोक्षितम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रविश्य = प्रवेश करके; रामः = राम; तु = तो; दण्डकारण्यम् = दण्डकारण्य वन में; अव्ययम् = नित्य; लक्ष्मणेन = लक्ष्मण के साथ; सह = साथ; भ्रात्रा = भाई; ददर्श = देखा; विपुलम् = भयानक; भयम् = भय; सः = उन्होंने; तु = और; दण्डकम् = दण्डक वन; आसाद्य = पाकर; रामः = राम; सह = साथ; लक्ष्मणेन = लक्ष्मण के; वै = ही; ददर्श = देखा; विपुलम् = विशाल; कायम् = शरीर; कबन्धम् = कबंध; नाम = नामक; राक्षसम् = राक्षस को; महोरस्कम् = विशाल वक्षस्थल वाला; महाकायम् = विशाल शरीर वाला; महाबाहुम् = लंबी भुजाओं वाला; महाबलम् = महान बल वाला; विकृतम् = विकराल; घोरसंकाशम् = भयंकर दिखने वाला; निर्मांसम् = मांसरहित; रुधिरोक्षितम् = रक्त से सनी हुई (भुजाएँ)।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् राम नित्य दण्डकारण्य वन में लक्ष्मण के साथ प्रवेश करके वहाँ भयंकर दृश्य देखा। उस दण्डक वन में राम और लक्ष्मण ने एक विशालकाय राक्षस को देखा, जिसका नाम कबंध था। वह विशाल वक्षःस्थल वाला, लंबी-लंबी भुजाओं वाला, महाबली, विकराल, भयंकर दिखने वाला और उसकी भुजाएँ मांसरहित एवं रक्त से सनी हुई थीं।
🔍 व्याख्या : कबंध का यह विचित्र रूप उसे किसी शाप का परिणाम बताता है। बिना सिर और गर्दन का यह राक्षस केवल अपनी लंबी भुजाओं से ही आक्रमण कर सकता था।

⚔️ कबंध का आक्रमण और भुजाओं का छेदन (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-९ ॥
स तौ दृष्ट्वा महावीर्यौ रामलक्ष्मणावन्तिके ।
उद्यम्य बाहू संप्राप्तो ग्रसिष्यन्निव राक्षसः ॥
तमापतन्तं सहसा रामो दृष्ट्वा महाबलः ।
लक्ष्मणं चाब्रवीद्वीक्ष्य कबन्धं घोरदर्शनम् ॥
अयं स लक्ष्मण क्रूरो राक्षसो विपुलोदरः ।
आपतत्यतिवेगेन नौ ग्रसिष्यन्निति स्थितः ॥
📖 भावार्थ : उस राक्षस ने समीप आए हुए महापराक्रमी राम-लक्ष्मण को देखकर अपनी भुजाएँ उठाईं और उन्हें निगलने के लिए दौड़ा। सहसा आते हुए उस भयंकर कबंध को देखकर महाबली राम ने लक्ष्मण से कहा, "हे लक्ष्मण! यह वही क्रूर, बड़े पेट वाला राक्षस है, जो अत्यधिक वेग से हमें निगलने के लिए दौड़ा आ रहा है।"
॥ श्लोक १०-१२ ॥
ततस्तौ चन्द्रसंकाशौ खड्गौ निष्कृष्य वीर्यवान् ।
चिच्छिदतुः कबन्धस्य बाहू परिघसंनिभौ ॥
निकृत्तबाहुः स रक्षो विस्वरं ननद भृशम् ।
पपात धरणीं चैव चकम्पे च वसुंधरा ॥
तस्य रामः क्षुरप्रेण बाहू छित्त्वा महाबलः ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा तस्थौ विगतकल्मषः ॥
📖 भावार्थ : तब उन दोनों वीरों ने चन्द्रमा के समान चमकीले खड्ग निकालकर कबंध की लोहे के समान कठोर भुजाओं को काट डाला। भुजाएँ कटने पर वह राक्षस भयंकर चीत्कार करता हुआ धरती पर गिरा, जिससे धरती काँप उठी। इस प्रकार महाबली राम ने लक्ष्मण के साथ मिलकर कबंध की भुजाएँ काट दीं और पापरहित होकर वहाँ खड़े रहे।
🔍 व्याख्या : कबंध की भुजाएँ काटना उसके शाप से मुक्ति का प्रथम चरण था। राम की कृपा से उसे अपने वास्तविक स्वरूप को पाने का अवसर मिला।

🗣️ कबंध की कथा और सुग्रीव का उपदेश (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१७ ॥
ततस्तु रामं काकुत्स्थं कबन्धः प्रत्यभाषत ।
विद्धि मां गन्धर्वराजं दानवेन्द्रविमर्दितम् ॥
अहं विश्वावसुर्नाम गन्धर्वो लोकविश्रुतः ।
शप्तः शापेन च तदा गन्धर्वैरभवं पुरा ॥
तं मामिह महाबाहो स्त्रीगन्धर्वेण मोहितम् ।
राक्षसत्वं गतं घोरं शापाद्विप्रकृतं पुनः ॥
त्वया चाहं कृतः स्वस्थश्छिन्नबाहुर्महाबल ।
सुग्रीवं नाम वैदेहि वानरेन्द्रं महाबलम् ॥
तेन सख्यं कुरु क्षिप्रं स हि ते साह्यमेष्यति ।
📖 भावार्थ : तब कबंध ने राम से कहा, "हे राम! मुझे एक गन्धर्वराज के रूप में जानो, जो दानवेन्द्र (रावण?) से पीड़ित हूँ। मेरा नाम विश्वावसु है और मैं लोकविश्रुत गन्धर्व हूँ। एक बार मैं शाप के कारण इस राक्षस योनि में आ गया। हे महाबाहो! उस समय स्त्री और गन्धर्वों के कारण मोहित होकर मैंने यह घोर राक्षसत्व प्राप्त किया। अब तुमने मेरी भुजाएँ काटकर मुझे शापमुक्त कर दिया है। हे महाबलशाली राम! तुम उस महाबली वानरराज सुग्रीव से शीघ्र मित्रता कर लो। वही तुम्हारी सहायता करेगा।"
॥ श्लोक १८-२५ ॥
एष पम्पे महारण्ये सुग्रीवो वानरर्षभः ।
ऋष्यमूक इति ख्याते वसते पर्वतोत्तमे ॥
तस्य त्वं सख्यमागच्छ वैरं येन च वानरैः ।
बलिना निहतः सौम्य वालिना च महाबलः ॥
स राम भ्रातृवान्सुग्रीवस्त्वां दृष्ट्वा मुदितो भवेत् ।
सीतायाश्च परं स्थानं वेद यत्र हि सा स्थिता ॥
इत्युक्त्वान्तर्हितो रामं कबन्धो दिवमाप्तवान् ।
रामोऽपि लक्ष्मणेनाथ संप्रहृष्टोऽभवत्तदा ॥
📖 भावार्थ : कबंध ने आगे कहा, "इस पम्पा सरोवर के पास महारण्य में ऋष्यमूक पर्वत पर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव रहते हैं। उनसे तुम मित्रता कर लो, क्योंकि वे बलि द्वारा पराजित होकर वहाँ निवास कर रहे हैं। वे सीता के विषय में जानते हैं कि वे कहाँ हैं।" ऐसा कहकर कबंध अन्तर्ध्यान हो गया और स्वर्ग को चला गया। राम भी लक्ष्मण सहित अत्यन्त प्रसन्न हुए।
🔍 व्याख्या : कबंध ने राम को न केवल सुग्रीव का पता बताया, बल्कि यह भी बताया कि सुग्रीव उनकी सहायता क्यों करेंगे – क्योंकि वे भी बलि से दुःखी हैं। यह एक समान हित का संबंध स्थापित करता है।

🚩 पम्पा की ओर प्रस्थान

॥ श्लोक २६-३५ ॥
ततो रामो महातेजाः लक्ष्मणेन समन्वितः ।
प्रययौ पम्पां तीर्थं वै यत्र सुग्रीव आश्रितः ॥
गच्छन्नेव च रामस्तु चिन्तयामास लक्ष्मणम् ।
सुग्रीवेण समं सख्यं कथं मे स्यान्महाबलः ॥
इति चिन्तयतस्तस्य लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् ।
राघवं प्रति संहृष्टो रामस्य हितकाम्यया ॥
श्रद्दधानो वचस्तस्य कबन्धस्य महात्मनः ।
प्रययौ राघवः श्रीमान् यत्र सुग्रीव आश्रमः ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् महातेजस्वी राम लक्ष्मण के साथ पम्पा तीर्थ की ओर चल पड़े, जहाँ सुग्रीव निवास करते थे। मार्ग में राम सोचने लगे कि कैसे सुग्रीव से मित्रता हो। तब लक्ष्मण ने राम को आश्वस्त करते हुए उनसे कहा कि कबंध के वचन सत्य हैं। इस प्रकार श्रीराम ने महात्मा कबंध के वचनों पर विश्वास करते हुए उस स्थान की ओर प्रस्थान किया जहाँ सुग्रीव का आश्रम था।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार यह सर्ग राम और सुग्रीव के मिलन की भूमिका तैयार करता है। अगले सर्ग में राम की पम्पा सरोवर यात्रा और शरद ऋतु का वर्णन है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌀 शाप और मोक्ष का चक्र

कबंध की कथा यह दर्शाती है कि कैसे एक गन्धर्व को शापवश राक्षस योनि मिली और राम की कृपा से उसे मुक्ति मिली। यह राम के परम कल्याणकारी स्वरूप को रेखांकित करता है।

🤝 सुग्रीव-मिलन का आधार

इस सर्ग में कबंध द्वारा दी गई जानकारी ही आगे चलकर राम-सुग्रीव मैत्री और सीता की खोज का मार्ग प्रशस्त करती है। यह घटना सम्पूर्ण रामायण की गति को बदल देती है।

🧭 मार्गदर्शक का महत्व

कबंध ने राम को सही दिशा दिखाई। यह बताता है कि संकट के समय भी सही मार्गदर्शन मिलने पर विजय सुनिश्चित होती है।

🌊 प्रकृति का वर्णन

इस सर्ग में पम्पा सरोवर और दण्डकारण्य के मनोरम वर्णन से आगे के सर्गों का वातावरण तैयार होता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और साहस नहीं छोड़ना चाहिए। राम की भाँति हमें भी सही मार्गदर्शन ग्रहण कर आगे बढ़ना चाहिए। कबंध की तरह व्यक्ति अपने पापों का प्रायश्चित करके मुक्ति पा सकता है, बशर्ते वह सत्पुरुषों का सहारा ले।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे त्रयोदशाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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